





श्रावण पुत्रदा एकादशी 2025
सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रत्येक एकादशी का अपना एक विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व और उससे जुड़े लाभ होते हैं, जो भक्तों को आत्मिक उन्नति और मनोकामनाओं की पूर्ति का अवसर प्रदान करते हैं। इन सभी एकादशियों में, पुत्रदा एकादशी जो श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में आती है, एक विशेष महत्त्व रखती है, खासकर उन दंपतियों के लिए जो संतान सुख की कामना करते हैं। इसका नाम 'पुत्रदा' स्वयं इसके प्राथमिक उद्देश्य को स्पष्ट करता है – अर्थात् 'पुत्र प्रदान करने वाली' या 'संतान देने वाली' ।
यह व्रत केवल संतान प्राप्ति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने वाला भी माना जाता है ।
श्रावण पुत्रदा एकादशी क्या है?
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते है। श्रावण मास में होने के कारण इसे 'श्रावण पुत्रदा एकादशी' भी कहते है। 'पुत्रदा' शब्द का शाब्दिक अर्थ 'पुत्र प्रदान करने वाली' है, इस व्रत का सबसे प्रमुख महत्व उन दंपतियों के लिए है जो संतान सुख से वंचित हैं; यह उन्हें संतान प्राप्ति का आशीर्वाद प्रदान करने वाला माना जाता है ।यह समझना महत्वपूर्ण है कि पुत्रदा एकादशी वर्ष में दो बार आती है – एक श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में (श्रावण पुत्रदा एकादशी) और दूसरी पौष मास के शुक्ल पक्ष में (पौष पुत्रदा एकादशी)। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन दोनों एकादशियों का महत्व समान माना जाता है, और दोनों ही संतान सुख की कामना के लिए फलदायी हैं । यह दोहरी उपस्थिति भक्तों को वर्ष में दो अवसर प्रदान करती है, जिससे वे अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार इस पवित्र व्रत का पालन कर सकें।
श्रावण पुत्रदा एकादशी की तिथि व समय 2025
पुत्रदा एकादशी की तिथि – पुत्रदा एकादशी का व्रत 5 अगस्त 2025 को किया जाएगा।- एकादशी तिथि का प्रारंभ: 4 अगस्त को दिन में 11:44 A.M से
- एकादशी तिथि समाप्त: 5 अगस्त को दिन में 1:13 P.M तक
- व्रत पारण का समय: 6 अगस्त 2025 को सूर्योदय के पश्चात अपनी सुविधानुसार भगवान विष्णु का पूजन और दान करने के पश्चात व्रत का पारण करें।
श्रावण पुत्रदा एकादशी की कथा
हर साल, भक्त पुत्रदा एकादशी का व्रत करते हैं, जिसे संतान प्राप्ति का आशीर्वाद देने वाला एक पवित्र व्रत माना जाता है।प्राचीन काल की बात है, द्वापर युग के प्रारंभ का समय था, माहिष्मती पुर में राजा महीजीत अपने राज्य का पालन करते थे, किंतु उन्हें कोई पुत्र नहीं था; इसलिए वह राज्य उन्हें सुखदायक नहीं प्रतीत होता था। अपनी बढ़ती उम्र देख राजा को बड़ी चिंता हुई। उन्होंने प्रजावर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा- प्रजाजनों! इस जन्म में मुझसे कोई पाप नहीं हुआ। मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है। ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है। प्रजा का पुत्रवत पालन किया, धर्म से पृथ्वी पर अधिकार जमाया तथा दुष्टो को, वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों ना रहे हो, दंड दिया है। शिष्ट पुरुषों का सदा सम्मान किया और किसी को द्वेष का पात्र नहीं समझा। फिर क्या कारण है, जो मेरे घर में आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ। आप लोग इसका विचार करें। राजा के ये वचन सुनकर प्रजा और पुरोहितों के साथ ब्राह्मणों ने उनके हित का विचार करके गहन वन में प्रवेश किया। राजा का कल्याण चाहने वाले वे सभी लोग इधर-उधर घूम कर ऋषि सेवित आश्रमों की तलाश करने लगे। इतने में ही उन्हें मुनि श्रेष्ठ लोमश का दर्शन हुआ। लोमश जी धर्म के तत्वज्ञ संपूर्ण शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान, दीर्घायु और महात्मा है। उनका शरीर लोम से भरा हुआ है। वह ब्रह्मा जी के समान तेजस्वी हैं। एक-एक लोम विशीर्ण होकर टूट कर गिरता है; इसलिए उनका नाम लोमश हुआ। वे महामुनि तीनो कालो की बातें जानते हैं। उन्हें देखकर सब लोगों को बड़ा हर्ष हुआ। उन्हें निकट आया देख लोमश जी ने पूछा- तुम सब लोग किसलिए यहां आए हो? अपने आगमन का कारण बताओ। तुम लोगों के लिए जो हितकर कार्य होगा, उसे मैं अवश्य करूंगा। प्रजाओं ने कहा- ब्राह्मण! इस समय महीजित नाम वाले जो राजा हैं, उन्हें कोई पुत्र नहीं है। हम लोग उन्हीं की प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्र की भांति पालन किया है। उन्हें पुत्र हीन देख, उनके दुख से दुखित हो हम तपस्या करने का दृढ़ निश्चय करके यहाँ आए हैं। राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन मिल गया है। महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के सब कार्य सिद्ध हो जाते है। मुने अब हमें उस उपाय का उपदेश कीजिये, जिससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हो। उनकी बात सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी तक ध्यानमग्न हो गए। तत्पश्चात राजा के प्राचीन जन्म का वृतांत जानकर उन्होंने कहा-प्रजावृंद! सुनो राजा महीजित पूर्व जन्म में मनुष्यो को चूसने वाला धनहीन वैश्य था। वह वैश्य गांव-गांव घूमकर व्यापार किया करता था । एक दिन ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष में दशमी तिथि को, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वह गाँव की सीमा में एक जलाशय पर पहुँचा। पानी से भरी हुयी बावली देखकर वैश्य ने वहाँ जल पीने का विचार किया। इतने में ही वहाँ बछड़े के साथ एक गौ भी आ पहुँची। वह प्यास से व्याकुल और सूर्य के ताप से पीड़ित थी; अत: बावली में जाकर जल पीने लगी। वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हांककर दूर कर दिया और स्वयं पानी पिया। उसी पाप कर्म के कारण राजा इस समय पुत्र हीन हुए हैं। किसी जन्म के पुण्य से इन्हें अकण्टक राज्य की प्राप्त हुई है। प्रजाओं ने कहा-मुने! पुराण में सुना जाता है कि प्रायश्चित पुण्य से पाप नष्ट होते है; अत: पुण्य का उपदेश कीजिये, जिससे उस पाप का नाश हो जाये। लोमश जी बोले -प्रजाजनों! श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, वह पुत्रदा के नाम से विख्यात है। वह मनोवांछित फल प्रदान करने वाली है। तुम लोग उसी का व्रत करो। यह सुन कर प्रजाओं ने मुनि को नमस्कार किया और नगर में आकर विधि पूर्वक पुत्रदा एकादशी के व्रत का अनुष्ठान किया। उन्होंने विधि पूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा को दे दिया। तत्पश्चात रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसव का समय आने पर बलवान पुत्र को जन्म दिया। इसका माहात्म्य सुनकर मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है तथा इस लोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता है। इसलिए राजन! पुत्रदा एकादशी का व्रत पालन अवश्य करना चाहिए। जो मनुष्य एकचित्त होकर पुत्रदा एकादशी का पालन करते है। वे इस लोक में पुत्र प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त करते हैं, इस महत्व को पढ़ने और सुनने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है।
श्रावण पुत्रदा एकादशी की व्रत विधि
पौराणिक विधि:श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में दशमी के उत्तम दिन को श्रद्धायुक्त चित्त से प्रातः काल स्नान करें। फिर मध्याहन काल में स्नान करके एकाग्रचित्त हो एक समय भोजन करें तथा रात्रि में भूमि पर सोए रात के अंत में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन नित्यकर्म करके स्नान करे इसके बाद भक्ति भाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का संकल्प करें-
श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं में भवाच्युत।।
'कमलनयन भगवान, नारायण! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करूंगा। अच्युत! आप मुझे शरण दें। तत्पश्चात धूप और गंध आदि से भगवान हरीकेश का पूजन करके रात्रि में उनके समीप जागरण करें। पुनः सवेरा होने पर द्वादशी के दिन पुन: भक्ति पूर्वक श्री हरि की पूजा करें। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करा कर भाई- बंधु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करें।
महिलाओं के लिए विशेष निर्देश
- व्रत रखने वाली महिलाएं यदि गर्भवती हों तो फलाहार करें और जल सेवन अवश्य करें।
- रजस्वला स्त्रियाँ व्रत न रखें, केवल भगवान विष्णु का स्मरण करें।
- व्रत रखने से पहले संतान सुख की कामना से मन में स्पष्ट और शुभ संकल्प लें।
- पूजन में पीले वस्त्र धारण करें और तुलसी दल के बिना भगवान विष्णु को भोग न लगाएं।
श्रावण पुत्रदा एकादशी के लाभ
इस व्रत के लाभ केवल संतान प्राप्ति तक ही सीमित नहीं हैं। यह एक व्यापक आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में कार्य करता है जो भक्तों को कई अन्य आध्यात्मिक और भौतिक लाभ भी प्रदान करता है:
- संतान की उन्नति और दीर्घायु: यह व्रत संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य के लिए भी रखा जाता है, जिससे संतान से संबंधित सभी चिंताएं और समस्याएं दूर होती हैं।
- जीवन में सुख-शांति और समृद्धि: श्रावण पुत्रदा एकादशी का विधि-विधान से पालन करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
- आर्थिक लाभ और आरोग्य: यह व्रत आर्थिक तंगी को दूर करने, धन की प्राप्ति करने और शारीरिक आरोग्य प्रदान करने में भी सहायक माना जाता है।
- पाप मुक्ति और मोक्ष: इस व्रत को कई जन्मों के पापों से मुक्ति दिलाने वाला और अंततः मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला माना जाता है। यह वाजपेयी यज्ञ और गौदान के समान पुण्य फल प्रदान करता है।
- मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य: एकादशी का नियमित व्रत मन की चंचलता को समाप्त करता है, हार्मोन से जुड़ी समस्याओं को ठीक करने में मदद करता है और मनोरोगों को दूर करने में भी सहायक होता है। यह दर्शाता है कि प्राचीन धार्मिक प्रथाओं को समकालीन स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक चिंताओं को दूर करने के लिए भी देखा जाता है, जो समग्र कल्याण में विश्वास का एक उदाहरण है।
श्रावण पुत्रदा एकादशी की पूजा विधि (कथा)
श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित एक अत्यंत पवित्र और फलदायी उपासना है, जिसे विधिपूर्वक करने से विशेष रूप से संतान सुख, पारिवारिक समृद्धि और आध्यात्मिक कल्याण की प्राप्ति होती है। इस व्रत की शुरुआत दशमी तिथि से ही हो जाती है और इसका पारण द्वादशी तिथि पर होता है।
व्रत की शुरुआत: दशमी तिथि की तैयारी
- दशमी तिथि की संध्या से ही व्रती को सात्विक और अन्न रहित भोजन करना चाहिए।
- इस दिन से ब्रह्मचर्य, संयम, मौन और ध्यान का पालन आरंभ करें।
- रात्रि में भूमि पर शयन करें, जिससे शरीर और मन दोनों की शुद्धि होती है।
- प्रभात काल की शुरुआत
- सूर्योदय से पूर्व उठें।
- स्नान के जल में गंगाजल, तिल और आंवला मिलाएं – यह आध्यात्मिक और शारीरिक शुद्धि का प्रतीक है।
- वस्त्र और स्वच्छता
- स्नान के पश्चात पीले रंग के वस्त्र पहनें।
- पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें।
- मुख्य द्वार पर हल्दी से स्वस्तिक बनाएं।
- संकल्प विधान
- भगवान श्रीहरि का ध्यान करते हुए हाथ में पीला फूल और अक्षत लें।
- मनोकामना (विशेषतः संतान प्राप्ति) बोलते हुए व्रत का संकल्प लें।
- यदि व्रत संतान हेतु है तो पति-पत्नी दोनों को मिलकर यह संकल्प लेना चाहिए।
- सूर्य को अर्घ्य देना
- सूर्य नारायण को जल में रोली, गुड़, और लाल फूल मिलाकर अर्पित करें।
स्वच्छ चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और बाल स्वरूप श्रीकृष्ण की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।
- अभिषेक और श्रृंगार
- भगवान विष्णु का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें।
- उन्हें पीला वस्त्र पहनाएं और तुलसी दल अर्पित करें।
- माता लक्ष्मी को सोलह श्रृंगार अर्पण करें।
- पूजन सामग्री अर्पण करें
- वस्तुएँ अर्पण करें:
- फल (पीले फल), पीले फूल, तिल, तुलसी, आम के पत्ते, पंचमेवा, नारियल, सुपारी, दीपक, धूप, पीला चंदन, कुमकुम, खीर, मखाने, बेर, लौंग, पान आदि।
- बिना तुलसी दल के भगवान विष्णु को भोग न लगाएं।
- मंत्र जप और व्रत कथा
- भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करें-
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" - पुत्रदा एकादशी की कथा सुनें या पढ़ें – इससे व्रत का पुण्य और फल कई गुना बढ़ता है।
- भगवान विष्णु के मंत्रों का जप करें-
- आरती और प्रसाद वितरण
- भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और एकादशी माता की आरती करें।
- अर्पित भोग को प्रसाद रूप में परिजनों और भक्तों को वितरित करें।
- रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन
- रात भर जागरण करें, भजन-कीर्तन करें, और प्रभु का ध्यान करें।
- यह जागरण तप, साधना और आत्मशुद्धि का प्रतीक होता है।
- व्रत पारण विधि (द्वादशी तिथि)
- अगले दिन (द्वादशी तिथि) को प्रातः उठकर स्नान करें।
- भगवान विष्णु की पुनः पूजा करें।
- ब्राह्मणों को भोजन कराएं, यथाशक्ति दान दें।
यदि ब्राह्मण न हों तो गाय, गरीब या जरूरतमंद को भोजन दें। - तभी स्वयं अन्न ग्रहण करें – व्रत का पारण बिना दान के न करें।
- पारण का सर्वोत्तम समय
- सूर्योदय से पूर्व या शीघ्र बाद मध्याह्न में पारण वर्जित होता है।
श्रावण पुत्रदा एकादशी के मंत्र जप
मंत्र जप एकादशी व्रत का एक अभिन्न अंग है, जो मन को एकाग्र करने, सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करने और ईश्वरीय कृपा प्राप्त करने में सहायक होता है। संतान प्राप्ति की कामना के लिए विशेष मंत्रों का जप किया जाता है, जो अत्यंत प्रभावशाली माने जाते हैं।संतान गोपाल मंत्र
यह मंत्र संतान सुख की इच्छा रखने वाले दंपतियों के लिए अत्यंत प्रभावशाली और महत्वपूर्ण माना जाता है। पति-पत्नी दोनों को संयुक्त रूप से इस मंत्र का जप करना चाहिए, जिससे इसकी शक्ति और प्रभाव में वृद्धि होती है । यह मंत्र भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप को समर्पित है, जो संतान के दाता माने जाते हैं।
मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।
संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ केवल एकादशी के दिन ही नहीं, बल्कि 40 दिनों तक नियमित रूप से करने का नियम लिया जा सकता है, जिससे इसके प्रभाव में अत्यधिक वृद्धि होती है । यह दर्शाता है कि गहरे और वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए, जैसे कि संतान प्राप्ति, एक बार के अनुष्ठान के बजाय निरंतर और दीर्घकालिक भक्ति अभ्यास को अधिक शक्तिशाली और आवश्यक माना जाता है। यह आध्यात्मिक साधना में निरंतर प्रयास, अनुशासन और अटूट समर्पण के महत्व को रेखांकित करता है। कम से कम एकादशी के दिन सुबह और शाम इसका पाठ अवश्य करें ।
श्रावण पुत्रदा एकादशी का महत्त्व
श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और पुण्यदायक माना गया है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की प्राप्ति, पापों की शांति, और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए रखा जाता है। 2025 में यह एकादशी श्रावण मास में 5 अगस्त को पड़ रही है, जो स्वयं में अत्यधिक धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है।श्रावण पुत्रदा एकादशी का धार्मिक महत्व
- यह व्रत उन दंपत्तियों के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है जो संतान की इच्छा रखते हैं।
- इस दिन विधिपूर्वक व्रत और पूजा करने से पुत्र प्राप्ति का योग बनता है।
- यह व्रत पूर्व जन्म के पापों, संतान संबंधी दोषों और मानसिक कष्टों से मुक्ति प्रदान करता है।
- श्रावण मास में भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है, और पुत्रदा एकादशी उस पूजा का चरम रूप है।
- यह व्रत आत्मिक शुद्धि, मन की एकाग्रता और परिवार में सौहार्द बढ़ाने वाला होता है।
- व्रत रखने से मोक्ष, पुण्य और परम कृपा की प्राप्ति होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्रावण पुत्रदा एकादशी किस राज्य में मनाई जाती है?- उत्तर प्रदेश – खासकर वृंदावन, मथुरा और काशी में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा के साथ बड़ी श्रद्धा से मनाई जाती है।
- बिहार – एकादशी व्रत परंपरा का विशेष महत्व है, खासकर पुत्र प्राप्ति हेतु।
- मध्य प्रदेश – धार्मिक परिवारों में इसे पारंपरिक रूप से संतान सुख के लिए रखा जाता है।
- राजस्थान – भक्तगण पीले वस्त्र पहनकर विष्णु पूजन करते हैं।
- उत्तराखंड – चारधाम क्षेत्रों और पर्वतीय अंचलों में यह व्रत विशेष माना जाता है।
- महाराष्ट्र – एकादशी के दिन व्रत, भजन-कीर्तन और व्रत कथा का आयोजन होता है।
- गुजरात – विष्णु भक्तजन इसे पारंपरिक विधि से मनाते हैं।
- कर्नाटक व आंध्र प्रदेश – दक्षिण भारत में भी यह व्रत "पुत्रदा एकादशी" के रूप में श्रीविष्णु भक्तों द्वारा किया जाता है।
श्रावण पुत्रदा एकादशी एक अखिल भारतीय व्रत है जिसे उत्तर भारत, मध्य भारत और दक्षिण भारत में भगवान विष्णु और संतान सुख की कामना के साथ पूरे श्रद्धा भाव से मनाया जाता है।
2. श्रावण पुत्रदा एकादशी पूजा क्यों मनाई जाती है?
श्रावण पुत्रदा एकादशी की पूजा मुख्यतः पुत्र प्राप्ति की कामना से की जाती है। यह व्रत दंपत्तियों को संतान सुख देने वाला और पारिवारिक समृद्धि बढ़ाने वाला माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की उपासना से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत पूर्व जन्म के दोषों से भी मुक्ति दिलाता है। साथ ही यह आत्मिक शुद्धि और ईश्वर की कृपा पाने का श्रेष्ठ माध्यम है।
3. श्रावण पुत्रदा एकादशी पूजा में क्या करना चाहिए?
- दशमी की रात से ही सात्विक जीवन, संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें।
- पीले वस्त्र पहनें और घर व पूजा स्थान की शुद्धि करें।
- भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र की विधिपूर्वक पूजा करें।
- पंचामृत से अभिषेक करें और तुलसी दल सहित भोग अर्पित करें।
- पुत्रदा एकादशी व्रत कथा का श्रवण करें और विष्णु मंत्रों का जाप करें।
- रात्रि जागरण करें और भजन-कीर्तन करें।
- द्वादशी को सूर्योदय के बाद ब्राह्मण भोजन एवं दान देकर व्रत का पारण करें।
4. घर पर श्रावण पुत्रदा एकादशी पूजा कैसे करें?
- श्रावण एकादशी पूजा हम इन उपायों के माध्यम से घर पर ही कर सकते है।
- एक दिन पहले (दशमी) से सात्विक भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और पीले वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल को स्वच्छ करें और वहां गंगाजल का छिड़काव करें।
- चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी की मूर्ति या फोटो स्थापित करें।
- गंगाजल, पंचामृत से अभिषेक करें और तुलसी दल, फल-फूल, मिठाई अर्पित करें।
- विष्णु मंत्रों का जप करें और पुत्रदा एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- रात में जागरण करें और भजन-कीर्तन करें।
- द्वादशी को ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराकर व्रत का पारण करें।
5. श्रावण पुत्रदा एकादशी की पूजा कैसे करें?
- प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और शुद्ध पीले वस्त्र पहनें।
- पूजा स्थान को स्वच्छ कर गंगाजल छिड़कें और चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं।
- भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और बाल स्वरूप श्रीकृष्ण की मूर्ति/फोटो स्थापित करें।
- पंचामृत व गंगाजल से अभिषेक करें, तुलसी दल, पीले फूल, फल व मिष्ठान्न अर्पित करें।
- संतान प्राप्ति की कामना से व्रत का संकल्प लें और विष्णु मंत्रों का जप करें।
- पुत्रदा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें।
- रात में जागरण व भजन-कीर्तन करें, और द्वादशी को व्रत का विधिपूर्वक पारण करें।
- व्रत में खीर, मखाने, दूध, फल, शकरकंदी, सिंघाड़ा, साबूदाना इत्यादि फलाहार रूप में लें
- व्रत रखने वाली महिलाएं गर्भवती हों तो फलाहार करें, पानी अवश्य लें।
6. 2025 में श्रावण पुत्रदा एकादशी कब शुरू होगी?
श्रावण पुत्रदा एकादशी वर्ष 2025 में 5 अगस्त (मंगलवार) को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि का प्रारंभ 4 अगस्त 2025 को दिन में 11:44 बजे से होगा और इसका समापन 5 अगस्त 2025 को दोपहर 1:13 बजे पर होगा। उदया तिथि 5 अगस्त को पड़ने के कारण इसी दिन व्रत रखा जाएगा और पूजा-विधि संपन्न की जाएगी।
7. श्रावण पुत्रदा एकादशी के दिन क्या नहीं करना चाहिए?
- अन्न, चावल और तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
- झूठ बोलना, क्रोध करना और निंदा करना वर्जित माना गया है।
- बाल कटवाना, नाखून काटना और शेविंग जैसे कार्य न करें।
- दिन में सोना वर्जित होता है, इससे व्रत का पुण्य कम होता है।
- किसी को अपशब्द कहना या अपमान करना व्रत की शुद्धता को भंग करता है।
- विलासिता से दूर रहना चाहिए।
- पूजा और व्रत में लापरवाही या आलस्य से बचें।
8. श्रावण पुत्रदा एकादशी के दिन क्या करना चाहिए?
- सुबह जल्दी उठकर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें और शुद्ध वस्त्र पहनें।
- घर व पूजा स्थल को स्वच्छ कर गंगाजल का छिड़काव करें।
- भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा करें।
- तुलसी दल, पीले फूल, फल और मिठाई से भगवान को भोग लगाएं।
- व्रत का संकल्प लें, विशेष रूप से संतान सुख की कामना से।
- पुत्रदा एकादशी व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें।
- विष्णु मंत्रों का जप करें और रात्रि में जागरण व भजन-कीर्तन करें।
- द्वादशी तिथि पर ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराकर पारण करें।
यदि आप संतान प्राप्ति, पारिवारिक सुख और विष्णु कृपा की इच्छा रखते हैं, तो श्रावण पुत्रदा एकादशी का यह व्रत आपके जीवन में आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों रूपों में शुभता ला सकता है।






