Muhurat Consultation
The full benefits of an auspicious task are achieved only when it is performed at the right time. But do you know that the auspicious timing (Muhurta) for each person varies according to their birth sign?
Annaprashan Muhurat

Annaprashan Muhurat
Annaprashan Muhurat: Auspicious Dates and Time to Begin Your Baby’s First Feeding
अन्नप्राशन मुहूर्त
अन्नप्राशन मुहूर्त (Annaprashan Muhurat) सनातन धर्म के सोलह संस्कारों में से एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार है। 'अन्नप्राशन' का शाब्दिक अर्थ है – 'अन्न ग्रहण कराना'। यह वह शुभ समय होता है जब शिशु को पहली बार, शुभ अन्नप्राशन मुहूर्त (Shubh Annaprashan Muhurat) में, माँ के दूध के अलावा हलवा या खीर अपनी परंपरा के अनुसार खिलाया जाता है।
यह संस्कार बच्चे के स्वस्थ विकास और पाचन शक्ति की शुरुआत का प्रतीक है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, शुभ मुहूर्त में अन्नप्राशन करने से बालक को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
इस लेख में, आपको अन्नप्राशन मुहूर्त (Annaprashan Muhurat) से जुड़ी सटीक, ज्योतिषीय और वैदिक जानकारी मिलेगी, ताकि आप अपने शिशु के लिए सर्वश्रेष्ठ अन्नप्राशन मुहूर्त (Best Annaprashan Muhurat) चुन सकें।
अन्नप्राशन मुहूर्त (Annaprashan Muhurat) ज्योतिषीय गणना के आधार पर निकाला गया वह सटीक समय होता है, जब अन्नप्राशन मुहूर्त (Hindu Annaprashan Muhurat) परंपरा के अनुसार, शिशु को पहली बार अन्न (भोजन) कराया जाता है।
- शारीरिक तैयारी: यह संस्कार बताता है कि शिशु का शरीर अब भोजन को पचाने के लिए शारीरिक रूप से तैयार हो गया है। आयुर्वेद भी 6 महीने बाद अन्न शुरू करने की सलाह देता है।
- शुभ समय: यह संस्कार आमतौर पर शिशु के जन्म के पांचवें ,छठे या सातवें महीने में किया जाता है, जब चंद्रमा (Moon) या गुरु (Jupiter) का बल शुभ हो।
- ज्योतिषीय महत्व: शुभ मुहूर्त में अन्न ग्रहण कराने से बच्चे की बुद्धि, पाचन क्षमता, और रोग-प्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि होती है। यह बच्चे के भविष्य को मंगलमय और समृद्ध बनाता है।
अन्नप्राशन मुहूर्त का महत्व (Annaprashan Muhurat Importance) सिर्फ भोजन खिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चे के पूरे जीवन के लिए एक शुद्धिकरण और ऊर्जावान प्रक्रिया है।
- पाचन शक्ति को बढ़ावा देना: यह संस्कार शिशु की जठराग्नि (Digestive Fire) को मजबूत करने और ठोस भोजन के लिए उसके पाचन तंत्र को तैयार करने का एक आध्यात्मिक और शारीरिक कदम है।
- देवी अन्नपूर्णा का आशीर्वाद: शुभ समय में संस्कार करने से देवी अन्नपूर्णा (भोजन की देवी) की कृपा प्राप्त होती है, जिससे बच्चा जीवनभर पोषण और आरोग्य प्राप्त करता है।
- ग्रहों की अनुकूलता: अन्नप्राशन का महत्व (Annaprashan Significance) यह है कि शुभ मुहूर्त में ग्रहों की सकारात्मक ऊर्जा बच्चे के साथ जुड़ जाती है, जिससे उसे उत्तम स्वास्थ्य और लंबी उम्र मिलती है।
- बुद्धि और ज्ञान: इस संस्कार से बच्चे की ज्ञानेंद्रियों (Sense Organs) का विकास होता है और उसकी बुद्धि तीव्र होती है। यह first feeding benefits में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
सर्वश्रेष्ठ अन्नप्राशन मुहूर्त (Best Annaprashan Muhurat) खोजने के लिए अनुभवी आचार्य की सलाह लेना सबसे अच्छा है।
शुभ अन्नप्राशन डेट (Shubh Annaprashan Date) या best annaprashan muhurat खोजने के लिए इन ज्योतिषीय तत्वों पर ध्यान दिया जाता है:
- वार (Day): सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार को अन्नप्राशन (Annaprashan) के लिए बहुत शुभ माना जाता है। मंगलवार और शनिवार को टालना चाहिए।
- तिथि (Tithi): द्वितीया, तृतीया, पंचमी, दशमी और त्रयोदशी तिथियाँ शुभ होती हैं। रिक्ता तिथियाँ (4, 9, 14) वर्जित हैं।
- नक्षत्र (Nakshatra): शुभ अन्नप्राशन समय (Auspicious Time for Baby Feeding) के लिए रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, उत्तरा भाद्रपद सबसे उत्तम नक्षत्र हैं।
- लग्न शुद्धि: मुहूर्त के समय लग्न (Ascendant) का स्थिर या सौम्य होना चाहिए।
- चंद्र बल: अन्नप्राशन संस्कार के समय चंद्रमा का 4, 8, और 12वें भाव में होना अशुभ माना जाता है।
- भद्रा काल और रिक्ता तिथियाँ: इन दोनों ही समय में संस्कार नहीं करना चाहिए।
व्यक्तिगत अन्नप्राशन मुहूर्त (Annaprashan Muhurat) शिशु की जन्म कुंडली, नक्षत्र और ग्रह स्थिति देखकर तय किया जाता है। अनुभवी आचार्य शुभ तिथि, वार और लग्न का विचार कर सबसे उत्तम समय बताते हैं।
अन्नप्राशन विधि (Annaprashan Vidhi) को पूरी श्रद्धा और पवित्रता से किया जाता है। यह baby first feeding ceremony का एक धार्मिक और पारिवारिक उत्सव है।
- शुद्धिकरण और तैयारी:
संस्कार से पहले घर को शुद्ध करें। शिशु के बैठने के लिए एक शुभ आसन तैयार किया जाता है जिसमे घर के बड़े और बुजुर्क अपनी गोद में शिशु को लेकर बैठते है। - देवताओं का आह्वान:
अन्नप्राशन संस्कार (Annaprashan Sanskar) की शुरुआत में गणेश पूजा (Ganpati Puja), कुलदेवी/कुलदेवता पूजा, और देवी अन्नपूर्णा का आह्वान किया जाता है। - पवित्र भोजन की तैयारी:
शिशु को खिलाया जाने वाला भोजन (खीर, शहद, या चावल की पेस्ट) बहुत सात्विक और पवित्र होना चाहिए। यह भोजन माता-पिता द्वारा चांदी के पात्र में खिलाना शुभ माना जाता है। - अन्न ग्रहण कराना:
- सबसे पहले, शिशु के पिता (या माता) शुभ मुहूर्त में, अन्नप्राशन विधि (Annaprashan Vidhi) के अनुसार, थोड़ा सा पवित्र भोजन (अन्न) शिशु को खिलाते हैं।
- इस दौरान पंडित जी शिशु के उत्तम स्वास्थ्य और बुद्धि के लिए मंत्र पढ़ते हैं।
- सबसे पहले, शिशु के पिता (या माता) शुभ मुहूर्त में, अन्नप्राशन विधि (Annaprashan Vidhi) के अनुसार, थोड़ा सा पवित्र भोजन (अन्न) शिशु को खिलाते हैं।
- आशीर्वाद:
परिवार के बड़े-बुजुर्ग, पंडित जी और रिश्तेदार शिशु को फूल और अक्षत बरसाकर उसे दीर्घायु और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद देते हैं।
शुभ मुहूर्त फॉर फर्स्ट फीडिंग (Shubh Muhurat for First Feeding) में संस्कार करने के कई लाभ होते हैं, जो बच्चे के जीवन को समृद्धि और आरोग्य की ओर ले जाते हैं।
- शारीरिक और मानसिक विकास: अन्नप्राशन मुहूर्त लाभ (Annaprashan Muhurat Benefits) से शिशु की पाचन अग्नि (Digestive Fire) मजबूत होती है। यह बच्चे के शारीरिक विकास और उसकी मानसिक स्थिरता के लिए बहुत ज़रूरी है।
- शुभ ग्रहों का बल: शुभ समय में संस्कार करने से ग्रहों की अनुकूलता बढ़ती है। यह ग्रहों की नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर शिशु को उत्तम स्वास्थ्य और तेज प्रदान करता है।
- बीमारी से सुरक्षा: वैदिक फीडिंग बेनिफिट्स (Vedic Feeding Benefits) के तहत, यह माना जाता है कि शुभ मुहूर्त में अन्न ग्रहण करने से बच्चे की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) मजबूत होती है।
- परिवार की खुशी: यह संस्कार परिवार को एक साथ लाने और खुशी मनाने का अवसर देता है, जो बच्चे के चारों ओर सकारात्मकता का माहौल बनाता है।
वैदिक ग्रंथों के अनुसार, अन्नप्राशन संस्कार के लिए शिशु की उम्र का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है।
- लड़के के लिए: यह संस्कार छठे, आठवें महीने में करना शुभ माना जाता है।
- लड़की के लिए: यह संस्कार पाँचवें, सातवें महीने में करना शुभ माना जाता है।
हिंदू अन्नप्राशन संस्कार (Hindu Annaprashan Sanskar) को दोष मुक्त रखने के लिए इन समयों में अन्नप्राशन नहीं करना चाहिए:
- जन्म नक्षत्र (Janma Nakshatra): जिस नक्षत्र में बच्चे का जन्म हुआ हो, उस नक्षत्र में अन्नप्राशन नहीं करना चाहिए।
- रिक्ता तिथियाँ: चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी।
- ग्रहण काल: सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण के दौरान अन्नप्राशन वर्जित है।
- राहुकाल: राहुकाल में अन्नप्राशन समेत सभी शुभ कार्यों को टालना चाहिए।
अन्नप्राशन मुहूर्त वह शुभ समय है जब शिशु को पहली बार अन्न (भोजन) खिलाया जाता है। यह संस्कार बच्चे के स्वस्थ विकास और पाचन शक्ति की शुरुआत का प्रतीक है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, शुभ मुहूर्त में अन्नप्राशन करने से बालक को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
व्यक्तिगत अन्नप्राशन मुहूर्त (Annaprashan Muhurat) बच्चे की जन्म कुंडली, नक्षत्र और ग्रह स्थिति देखकर तय किया जाता है। अनुभवी आचार्य शुभ तिथि, वार और लग्न का विचार कर सबसे उत्तम समय बताते हैं। सनातन ज्योति (Sanatan Jyoti) पर विशेषज्ञ आचार्य सटीक अन्नप्राशन मुहूर्त सुझाते हैं, जिससे संस्कार सफल और मंगलकारी होता है।
संस्कार से पहले घर को शुद्ध करें, पूजा स्थल सजाएँ और गणेश-पूजन करें। बच्चे को माता-पिता या नाना द्वारा चांदी के पात्र में खीर या हलवा खिलाना शुभ माना जाता है। राहुकाल, ग्रहण या अमावस्या के दिन यह संस्कार न करें।
अन्नप्राशन मुहूर्त का उद्देश्य शिशु के जीवन में भोजन ग्रहण की शुभ शुरुआत करना है। यह वैदिक परंपरा बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास का आधार बनती है। शुभ समय में किया गया संस्कार देवी अन्नपूर्णा की कृपा से जीवनभर पोषण और आरोग्य देता है।
शुभ अन्नप्राशन मुहूर्त (Annaprashan Muhurat) में संस्कार करने से बच्चे को उत्तम स्वास्थ्य, बुद्धि और आयु प्राप्त होती है। यह ग्रहों की अनुकूलता बढ़ाता है और रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। वैदिक मान्यता है कि यह संस्कार बच्चे के भविष्य को मंगलमय और समृद्ध बनाता है।

