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श्राद्ध 2025(Shradh)

श्राद्ध क्या है?

भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक ये 16 दिनों का समय पितर पक्ष कहलाता है।

इन दिनों में किया गया श्राद्ध, दान, पुण्य पितरों को प्राप्त होता है जिससे वे तृप्त होते है और प्रसन्न होकर श्राद्ध दान आदि करने वाले यजमान को आशीर्वाद देते है। पितृ पक्ष में यदि पुत्र या परिवारजन अपने पित्रों का नियमपूर्वक श्राद्ध करते है या 'गया तीर्थ' में जाकर उनकी मुक्ति के लिए अनुष्ठान करते है तो वह मरने के बाद पित्रों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करते है और तृप्त रहते है इसलिए बुद्धिजीवी को अपने पित्रों का शाकाहारी अन्न द्वारा श्राद्ध जरूर करना चाहिए इससे धन की कभी कमी नहीं होती। पितृजन तृप्ति के बाद उन्हे आशीर्वाद देते है जिससे वह कुल सौभाग्यवान रहता है।

श्राद्ध 2025: तिथि और समय

श्राद्ध भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से लेकर अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक रहते हैं। इसे ही पितृ पक्ष कहा जाता है। इन 16 दिनों में सभी तिथियाँ आती हैं, जिनकी जानकारी आप श्राद्ध 2025 तिथियाँ के अनुसार देख सकते हैं। अपने पिता (या पुरुष पूर्वजों) का श्राद्ध उसी तिथि को करें जिस तिथि को उनका अंतिम संस्कार हुआ हो। माता (या महिलाओं) का श्राद्ध नवमी तिथि को करना उचित माना गया है। यदि अंतिम संस्कार की तिथि ज्ञात न हो तो सभी पितरों का श्राद्ध अमावस्या को करना श्रेष्ठ माना गया है। श्राद्ध का शास्त्रों में निर्दिष्ट उत्तम समय दोपहर (अपराह्न काल) होता है

2025 में श्राद्ध तिथियाँ

श्राद्ध तिथिदिनांक (2025)वारतिथि प्रारंभतिथि समाप्त
पूर्णिमा श्राद्ध7 सितम्बररविवार7 सितम्बर, रात 1:43 A.M7 सितम्बर, रात 11:39 P.M
प्रतिपदा श्राद्ध8 सितम्बरसोमवार7 सितम्बर, रात 11:40 P.M8 सितम्बर, रात 9:13 P.M
द्वितीया श्राद्ध9 सितम्बरमंगलवार8 सितम्बर, रात 9:14 P.M9 सितम्बर, शाम 6:30 P.M
तृतीया श्राद्ध10 सितम्बरबुधवार9 सितम्बर, शाम 6:31 P.M10 सितम्बर, दोपहर 1:39 P.M
चतुर्थी श्राद्ध10 सितम्बरबुधवार10 सितम्बर, दोपहर 1:40 P.M11 सितम्बर, दोपहर 12:47 P.M
पंचमी श्राद्ध11 सितम्बरबृहस्पतिवार11 सितम्बर, 12:48 P.M12 सितम्बर, 10:06 A.M
षष्ठी श्राद्ध12 सितम्बरशुक्रवार12 सितम्बर, 10:07 A.M13 सितम्बर, 7:24 A.M
सप्तमी श्राद्ध13 सितम्बरशनिवार13 सितम्बर, 7:24 A.M14 सितम्बर, 5:04 A.M
अष्टमी श्राद्ध14 सितम्बररविवार14 सितम्बर, 5:05 A.M15 सितम्बर, 5:05 A.M
नवमी श्राद्ध15 सितम्बरसोमवार15 सितम्बर, 5:06 A.M16 September, 1:31 A.M
दशमी श्राद्ध16 सितम्बरमंगलवार16 सितम्बर, 1:32 A.M17 सितम्बर, 12:21 A.M
एकादशी श्राद्ध17 सितम्बरबुधवार17 सितम्बर, 12:22 A.M17 सितम्बर, 11:39 P.M
द्वादशी श्राद्ध18 सितम्बरगुरुवार17 सितम्बर, 11:40 P.M18 सितम्बर, 11:24 P.M
त्रयोदशी श्राद्ध19 सितम्बरशुक्रवार18 सितम्बर, 11:25 P.M19 सितम्बर, 11:36 P.M
चतुर्दशी श्राद्ध20 सितम्बरशनिवार19 सितम्बर, 11:37 P.M21 सितम्बर, 12:18 A.M
सर्वपितृ अमावस्या21 सितम्बररविवार21 सितम्बर, 12:19 A.M22 सितम्बर, 1:23 A.M

श्राद्ध की कथा

श्राद्ध की कथा महाभारत युग से जुड़ी हुई है। प्राचीन पुराणों और महाभारत में वर्णित है कि जब कर्ण की मृत्यु हो गई, तब उनकी आत्मा स्वर्ग में पहुँची। वहाँ उन्हें भोजन की अपेक्षा सोने-चांदी की थाली दी गई। कर्ण स्वयं भूख से तड़प रहे थे, और जब इंद्र ने पूछा कि भोजन के स्थान पर सोना क्यों दिया गया। तो कर्ण ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में स्वर्णदान के साथ-साथ अपने पूर्वजों के लिए कभी भी भोजन दान नहीं किया था। इंद्र ने कर्ण को पुनः 16 दिनों (श्राद्ध पक्ष) के लिए पृथ्वी पर भेजा, जहाँ उन्होंने अपने पूर्वजों के लिए श्रद्धापूर्वक भोजनदान (पिंडदान) किया तथा तर्पण किया। इस प्रकार पितरों की संतुष्टि और कर्ण का पितृऋण मुक्त होना श्राद्ध पर्व की उत्पत्ति का कारण बना। इस कथा के आधार पर ही पितृ पक्ष के 15-16 दिनों तक श्राद्ध अनुष्ठान किया जाता है।

श्राद्ध के पवित्र तीर्थ स्थल

श्राद्ध के लिए कुछ तीर्थ स्थल अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यहाँ श्राद्ध करने से पितरों को विशेष शांति प्राप्त होती है:
  • गया जी (बिहार)
  • वाराणसी (काशी)
  • प्रयागराज (त्रिवेणी संगम)
  • हरिद्वार
  • उज्जैन
  • पुष्कर
  • रामेश्वरम (दक्षिण भारत)

श्राद्ध की मुख्य विधि और अनुष्ठान

श्राद्ध मुख्य रूप से अपने पितरों (पूर्वजों) के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का एक तरीका है, जिससे उनकी आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त हो सके। इसमें कई महत्वपूर्ण क्रियाएं शामिल होती हैं:
  1. तर्पण
    तर्पण का अर्थ है जल से पितरों को तृप्त करना। यह श्राद्ध का एक महत्वपूर्ण अंग है।
    कैसे करें:
    • सुबह स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें।
    • हाथ में जल, जौ, काले तिल और थोड़े फूल लेकर अपने पितरों का ध्यान करें।
    • जल को अंजुली में लेकर धीरे-धीरे धरती पर छोड़ें।
    • यह क्रिया न्यूनतम तीन बार की जाती है, यद्यपि कुछ श्रद्धालु 7, 11 अथवा 14 बार भी करते हैं।
    • तर्पण करते समय पितरों के नाम और गोत्र का उच्चारण करें।
    • दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करना शुभ माना जाता है।
  2. पिंडदान
    पिंडदान का अर्थ है चावल, जौ के आटे, दूध और तिल से बने पिंडों को पितरों को अर्पित करना। पिंड, पितरों के सूक्ष्म शरीर का प्रतीक माने जाते हैं।
    कैसे करें:
    • पवित्र स्थान पर बैठकर शुद्धिकरण करें।
    • चावल, जौ के आटे, दूध, शहद और काले तिल मिलाकर पिंड बनाएं।
    • इन पिंडों को कुश के आसन पर रखकर पितरों को अर्पित करें।
    • पिंडदान करते समय 'ॐ पितृभ्यो नमः' या अन्य विशिष्ट मंत्रों का जाप करें।
    • पिंडदान के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं।
    • मान्यता है कि श्राद्ध में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है।
  3. ब्राह्मण भोज
    ब्राह्मणों को भोजन कराना श्राद्ध का एक अनिवार्य अंग है। ब्राह्मणों को पितरों का स्वरूप माना जाता है।
    कैसे करें:
    • जितने ब्राह्मणों को भोजन कराना हो, उन्हें आमंत्रित करें।
    • सात्विक भोजन तैयार करें, जिसमें खीर, पूड़ी, और अन्य पितरों को प्रिय व्यंजन शामिल हों।
    • भोजन कराने से पहले ब्राह्मणों के पैर धोएं और उन्हें आसन पर बिठाएं।
    • भोजन परोसने से पहले गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए भोजन का अंश निकालें।
    • भोजन के बाद ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा और वस्त्र आदि भेंट करें।
    • भोजन कराने के बाद उनका आशीर्वाद लें।
  4. कौवे, कुत्ते और गाय को भोजन
    श्राद्ध में पंचबलि का विशेष महत्व है, जिसमें कौवे, कुत्ते, गाय, चींटियां और देवताओं के लिए भोजन निकाला जाता है।
    कैसे करें:
    • तैयार भोजन से एक हिस्सा कौवे के लिए, एक कुत्ते के लिए और एक गाय के लिए अलग से निकालें।
    • इनको अलग-अलग पात्रों में रखकर उचित स्थान पर रखें।
    • कौवे को पितरों का रूप माना जाता है, इसलिए उन्हें भोजन कराना विशेष फलदायी होता है।
  5. विशेष श्राद्ध प्रकार

    विभिन्न दोषों और मृत्यु परिस्थितियों के अनुसार कुछ विशेष श्राद्ध भी किये जाते हैं:

    श्राद्ध प्रकारकब करना चाहिएकिसे करना चाहिएश्राद्ध प्रकार
    त्रिपिंडी श्राद्धजब पितृ शांत न हों या मृत्यु तिथि अज्ञात होसंतान या परिवारजनत्रिपिंडी श्राद्ध
    नारायण बलीअकाल मृत्यु, आत्महत्या या पिंडदान निषेध मृत्युपरिवारजननारायण बली
    नाग बलीसर्प दोष, सपने में बार-बार सांप देखनाकुल की रक्षा हेतु कोई भीनाग बली

    श्राद्ध की क्षेत्रीय परंपराएँ

    भारत में भिन्न-भिन्न प्रदेशों में श्राद्ध की विशेष परंपराएं हैं:
    • महाराष्ट्र में पिंड पीपल के पेड़ के नीचे रखा जाता है।
    • दक्षिण भारत में जल तर्पण और ब्राह्मण भोज विशेष रीति से होता है।
    • कुछ स्थानों पर आंवले के पेड़ के नीचे भी पिंडदान की परंपरा है।

  6. श्राद्ध में ध्यान रखने योग्य बातें
    • समय: श्राद्ध हमेशा अपराह्न (दोपहर) के समय किया जाता है, जब सूर्य मध्याह्न से ढलने लगता है। रात में श्राद्ध नहीं किया जाता।
    • पवित्रता: श्राद्ध के दौरान पूरी पवित्रता बनाए रखें।
    • बर्तन: श्राद्ध में पीतल या तांबे के पात्रों का प्रयोग शुभ माना जाता है; लोहे के बर्तन वर्जित हैं।
    • बाल और दाढ़ी: श्राद्ध के दिनों में बाल और दाढ़ी नहीं कटवानी चाहिए।
    • शुभ कार्य: पितृ पक्ष के दौरान कोई भी नया या शुभ कार्य (जैसे शादी, मुंडन, गृह प्रवेश, नए व्यापार की शुरुआत) नहीं करना चाहिए। नए कपड़े या गहने भी नहीं खरीदने चाहिए।
    • दान: इस दौरान दान का विशेष महत्व है। किसी जरूरतमंद को अपनी सामर्थ्य अनुसार दान करें।
    • सदाचार: क्रोध से बचें, शांतचित्त रहें और किसी का अपमान न करें। अपने पितरों के अच्छे कार्यों को याद करें और उनका आभार व्यक्त करें।
    • तिल और कुश: श्राद्ध कर्म में काले तिल और कुश का उपयोग अनिवार्य माना जाता है।

श्राद्ध में वर्जित चीज़ें

श्राद्ध के समय कुछ वस्तुएं और दान वर्जित माने गए हैं, इन्हें ध्यान से बचें।क्या न दान करें:
  • मांसाहार, मछली, तामसिक आहार
  • शराब, तंबाकू या कोई नशीला पदार्थ
  • जूते-चप्पल या चमड़े की वस्तुएं
  • अयोग्य, अपवित्र या अनुचित व्यक्ति को दान न दें

श्राद्ध में क्या खाएं और क्या न खाएं

अनुशंसित खाद्य पदार्थ:
  • खीर
  • पूरी
  • मूंग दाल
  • दही
  • केला
  • गंगाजल
वर्जित खाद्य पदार्थ:
  • मांसाहार और मछली
  • तीखे या अधिक मसालेदार व्यंजन
  • कड़वी या खट्टी दालें
  • शराब और नशीले पदार्थ

मौन व्रत का महत्व

  • श्राद्ध करते समय मौन रहना और मन को शांत रखना श्रेष्ठ माना जाता है। मौन व्रत से मन की एकाग्रता बढ़ती है, पूर्वजों का आशीर्वाद अधिक प्रभावी होता है और पिंडदान-तर्पण सफल होता है।

अपने पितरों की मृत्यु तिथि के अनुसार ही श्राद्ध करें। यदि किसी को अपने पितरों की मृत्यु तिथि याद न हो, तो वे सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध कर सकते हैं।

श्राद्ध के लाभ

  • श्राद्ध से अनेक प्रकार के आध्यात्मिक एवं सांसारिक लाभ प्राप्त होते हैं। पुराणों के अनुसार पितरों को तर्पण देने से तीन पीढ़ियों के पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और श्राद्ध करने वाले पर उनकी कृपा बनी रहती है।
  • श्राद्ध से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और वैभव की प्राप्ति होती है।
  • भगवद्गीता में भी कहा गया है कि जैसे देवताओं की पूजा से देवता प्राप्त होते हैं, वैसे ही जो लोग पितरों की पूजा करते हैं उन्हें पितरों का सहयोग मिलता है।
  • हिन्दू धर्म में यह माना जाता है कि हम अपने पूर्वजों के ऋणी हैं, इसलिए श्राद्ध द्वारा ऋण चुकाने से आत्मिक शांति मिलती है।
  • यदि पूर्वज-मंजुषा (कुंडली) में पितृदोष हो तो श्राद्ध तर्पण व पिंडदान से दोष निवारण होता है।
  • कुल मिलाकर, श्राद्ध के अनुष्ठान से पितृ दोष के शमन से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और संस्कार करने वाले को पुण्यफल की प्राप्ति होती है।

श्राद्ध मंत्र जप

  • "ॐ पितृ देवतायै नमः"
    अर्थ- पितृ देवताओं को नमस्कार है।
  • "नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः"
    अर्थ- स्वाहा और स्वधा देवी को सदा नमस्कार है।
  • "ॐ पितृगणाय विद्महे जगद् धारिणी धीमहि तन्नो पितृः प्रचोदयात्" ।
    अर्थ- हम पितृगण को जानते हैं, जो संपूर्ण जगत को धारण करते हैं; वे पितृ हमें प्रेरणा दें।
इन मंत्रों को जपने से पितृ प्रसन्न होते हैं और पितृ-पक्ष के दान-पुण्य का फलक मिलता है।

श्राद्ध का महत्त्व

  • श्राद्ध पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का माध्यम है।
  • यह आत्मीय संबंधों की स्मृति को जीवित रखता है और कुल परंपरा से जोड़ता है।
  • श्राद्ध से पितरों की आत्मा को शांति और तृप्ति मिलती है।
  • यह पितृ ऋण चुकाने का धार्मिक और आध्यात्मिक कर्तव्य है।
  • श्राद्ध करने से पितृलोक में सुख मिलता है और वे प्रसन्न होकर वंश को आशीर्वाद देते हैं।
  • श्राद्ध कर्म कुल की रक्षा, वंशवृद्धि और सुख-समृद्धि का कारण बनता है।
  • यह कर्मकांड वैदिक परंपराओं का पालन करते हुए जीवन में संतुलन और शुद्धता लाता है।
  • पितरों की संतुष्टि से वर्तमान पीढ़ियों की बाधाएँ दूर होती हैं।
  • श्राद्ध से व्यक्ति में विनम्रता, सेवा-भाव और धर्म के प्रति आस्था उत्पन्न होती है।
  • यह जीवन और मरण के चक्र को समझने तथा आत्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।

शास्त्रीय ग्रंथों में श्राद्ध का उल्लेख

श्राद्ध कर्म का विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्म पुराण, नारद संहिता आदि ग्रंथों में मिलता है। ये ग्रंथ श्राद्ध की विधियों का आधार स्तंभ हैं।

श्राद्ध का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत पुरातन है। पुराणों में वर्णित है कि देवताओं को प्रसन्न करने से पहले पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। हिन्दू ज्योतिष में पितृदोष को सबसे जटिल दोष माना गया है, इसलिए श्राद्धपक्ष में किए गए तर्पण-पिंडदान से पितरों की आत्मा की शांति होती है। पौराणिक मान्यता है कि श्राद्धकाल में पूर्वज कौवे का रूप धारण कर पृथ्वी पर आते हैं, इसलिए कावों को भोज अर्पित करने की परंपरा भी चली आ रही है। श्राद्ध से पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है और मनुष्य की भावी पीढ़ियाँ भी सुरक्षित रहती हैं। इसी कारण से पितृ पक्ष के 15-16 दिनों में कोई मंगल कार्य नहीं किया जाता, क्योंकि यह समय पूर्वजो को समर्पित है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

  1. हम श्राद्ध क्यों मनाते हैं?
    श्राद्ध हिन्दू धर्म में एक बहुत महत्वपूर्ण कर्मकांड है, जो हमारे पूर्वजों (पितरों) को श्रद्धा और कृतज्ञता अर्पित करने के लिए किया जाता है। इसे करने का मुख्य कारण है-
    • पूर्वजों का ऋण चुकाना: हिन्दू मान्यता के अनुसार, हर व्यक्ति तीन ऋण लेकर जन्म लेता है — देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। पितृ ऋण का मतलब है कि हमारे पूर्वजों ने हमें जीवन दिया, संस्कृति दी, परिवार दिया - इसलिए उनका ऋण चुकाना जरूरी होता है। श्राद्ध के माध्यम से हम उनके लिए तर्पण, पिंडदान व भोजन दान करते हैं।
    • पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए: ऐसा माना जाता है कि पितरों की आत्मा को शांति और तृप्ति तभी मिलती है जब उनके वंशज समय पर श्राद्ध कर्म करते हैं। इससे उनकी आत्मा प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती है।
    • पितृ दोष से मुक्ति: ज्योतिष के अनुसार, जिनके कुल में पितृ दोष होता है उनके जीवन में कई बाधाएँ आती हैं - जैसे संतान में विलंब, धन हानि, अशांति आदि। श्राद्ध करने से पितृ दोष शांत होता है और जीवन में सुख-शांति आती है।
    • श्राद्ध करने वाले को पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इससे परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है, संकट टलते हैं और वंश वृद्धि होती है।
    • परंपरा और संस्कृति को बनाए रखना: यह कर्म हमारी सनातन परंपरा का हिस्सा है। इससे नई पीढ़ी को भी यह सीख मिलती है कि अपने पूर्वजों का सम्मान और स्मरण करना कितना जरूरी है।
  2. श्राद्ध में क्या करना चाहिए?
    श्राद्ध के दिन कुछ विशेष नियमों और कर्मों का पालन करना बहुत जरूरी माना जाता है।
    मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
    • सूर्योदय के बाद सबसे पहले स्नान करें।
    • शुद्ध वस्त्र पहनें और घर या वह स्थान जहाँ श्राद्ध करना है, उसे अच्छी तरह स्वच्छ करें।
    • श्राद्ध कर्म शुरू करने से पहले हाथ में जल, फूल और तिल लेकर संकल्प लें - कि आप अपने अमुक पूर्वज (जैसे पिता, दादा आदि) के लिए श्रद्धा से तर्पण और पिंडदान कर रहे हैं।
    • एक पात्र में शुद्ध जल, काले तिल, दूर्वा घास और गंगाजल मिलाकर तर्पण के लिए रखें।
    • "ॐ पितृभ्यो नमः" कहते हुए जल अर्पित करें।
    • तर्पण देव, ऋषि और पितृ - तीनों के लिए करना चाहिए।
    • चावल, जौ या आटे से गोल पिंड बनाकर पूर्वजों के नाम से अर्पित करें। इन्हें किसी पीपल के पेड़ के नीचे या किसी पवित्र स्थान पर रख सकते हैं।
    • मान्यता है कि ब्राह्मणों को भोजन कराना और दक्षिणा देना बहुत पुण्यकारी होता है। इससे पूर्वज प्रसन्न होते हैं।
    • यह माना जाता है कि पूर्वज कौवे के रूप में भोजन ग्रहण करने आते हैं। इसलिए पिंड या भोजन कौओं को भी डालें।
    • गाय, कुत्ते और चींटियों को भी हिस्सा दें - यह बहुत शुभ माना जाता है।
    • सबसे अंत में परिवारजन स्वयं भोजन करें।
  3. घर पर श्राद्ध कैसे करें?
    • पितृ पक्ष श्राद्ध में हर पूर्वज के लिए उसकी तिथि पर श्राद्ध करना उचित होता है।
    • अगर तिथि न पता हो तो सर्वपितृ अमावस्या पर करें।
    • दोपहर के वक्त श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना जाता है।
    • श्राद्ध वाले दिन घर को अच्छे से साफ करें।
    • पूजा या श्राद्ध करने की जगह पर गंगाजल छिड़कें।
    • स्नान के बाद साफ कपड़े पहनें।
    • पूजा स्थान पर आसन बिछाएँ।
    • हाथ में जल, चावल या तिल लेकर संकल्प लें कि आप पितृ पक्ष श्राद्ध कर रहे हैं।
    • पूर्वजों का स्मरण करें - जैसे पिता, दादा या अन्य जिनका श्राद्ध कर रहे हैं।
    • एक तांबे या पीतल के लोटे में पानी, काले तिल, चावल और दूर्वा डालें।
    • पूर्वजों का नाम लेते हुए "ॐ पितृभ्यो नमः" बोलकर तीन बार तर्पण करें।
    • चावल या जौ के पिंड बनाकर प्लेट या केले के पत्ते पर रखें।
    • इन्हें कौओं या गाय को खिलाएँ।
    • मान्यता है कि पितर कौवे के रूप में आते हैं।
    • किसी जरूरतमंद को भोजन या अनाज दान करें।
    • इससे भी पूर्वज तृप्त होते हैं।
    • सात्विक भोजन ग्रहण करें।
  4. श्राद्ध की पूजा कैसे करें?
    • सूर्योदय के बाद स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें।
    • पूजा स्थान को साफ करके गंगाजल छिड़कें।
    • पूर्वजों की तस्वीर या प्रतीक चिह्न रखें।
    • हाथ में जल, चावल या तिल लेकर संकल्प लें।
    • तांबे या पीतल के लोटे में जल, काले तिल और दूर्वा डालें।
    • पूर्वजों का नाम लेकर तीन बार तर्पण करें।
    • चावल या जौ के पिंड बनाकर प्लेट या पत्ते पर रखें।
    • पिंड या भोजन कौओं को डालें।
    • ब्राह्मण को भोजन कराएँ या किसी गरीब को दान दें।
    • खुद और परिवारजन सात्विक भोजन करें।
    • पूजा के दौरान शांत मन से पूर्वजों का स्मरण और प्रार्थना करें।
  5. 2025 में श्राद्ध कब से शुरू होगा?
    2025 में श्राद्ध पक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से शुरू होगा, जो 7 सितम्बर को है। इसके बाद कृष्ण पक्ष की हर तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। यह श्राद्ध पक्ष 21 सितम्बर को अमावस्या के दिन समाप्त होगा।
  6. श्राद्ध की तिथियाँ क्या हैं?
    श्राद्ध तिथि दिनांक (2025) वार
    पूर्णिमा श्राद्ध7 सितम्बर 2025रविवार
    प्रतिपदा श्राद्ध8 सितम्बर 2025सोमवार
    द्वितीया श्राद्ध9 सितम्बर 2025मंगलवार
    तृतीया श्राद्ध10 सितम्बर 2025बुधवार
    चतुर्थी श्राद्ध10 सितम्बर 2025बुधवार
    पंचमी श्राद्ध11 सितम्बर 2025गुरुवार
    षष्ठी श्राद्ध12 सितम्बर 2025शुक्रवार
    सप्तमी श्राद्ध13 सितम्बर 2025शनिवार
    अष्टमी श्राद्ध14 सितम्बर 2025रविवार
    नवमी श्राद्ध15 सितम्बर 2025सोमवार
    दशमी श्राद्ध16 सितम्बर 2025मंगलवार
    एकादशी श्राद्ध17 सितम्बर 2025बुधवार
    द्वादशी श्राद्ध18 सितम्बर 2025गुरुवार
    त्रयोदशी श्राद्ध19 सितम्बर 2025शुक्रवार
    चतुर्दशी श्राद्ध20 सितम्बर 2025शनिवार
    सर्वपितृ अमावस्या21 सितम्बर 2025रविवार
  7. श्राद्ध हर साल क्यों किया जाता है?
    पितृ पक्ष सनातन धर्म में बहुत महत्वपूर्ण समय माना जाता है। यह हर साल भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक लगभग 15–16 दिन चलता है।

    मान्यता है कि इस दौरान हमारे पितर लोक (पूर्वजों की आत्मा) धरती पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण, पिंडदान व श्राद्ध की अपेक्षा रखते हैं।

    हर साल श्राद्ध करने के पीछे मुख्य कारण:
    • पूर्वजों का ऋण चुकाना — जिससे उनका आशीर्वाद मिलता रहे।
    • पितरों की आत्मा को शांति और संतोष प्रदान करना।
    • परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और संतति सुख बना रहे।
    • पितृ दोष से मुक्ति मिले और जीवन की बाधाएँ दूर हों।
    • अपने कुल और संस्कृति को जीवित रखना।

    पितृ पक्ष के दौरान किया गया तर्पण और पिंडदान बहुत पुण्यकारी माना जाता है। ऐसा न करने पर पितर अप्रसन्न होकर पितृ दोष उत्पन्न कर सकते हैं, जिससे जीवन में परेशानियाँ आती हैं।
    इसलिए हिन्दू परंपरा में हर साल यह श्राद्ध कर्म पूरी श्रद्धा और विधि से करने की परंपरा है ताकि पूर्वज प्रसन्न हों और आशीर्वाद देते रहें।
  8. श्राद्ध के 15 दिन क्या हैं?
    श्राद्ध के ये 15-16 दिन पितृ पक्ष कहलाते हैं। यह भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा (श्राद्ध पूर्णिमा) से आरंभ होकर आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाले दिन होते हैं। इन दिनों पूर्वजों का सम्मान करते हुए प्रतिदिन तर्पण-पिंडदान करने की प्रथा है।
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