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जन्माष्टमी 2025
जन्माष्टमी, जिसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी या गोकुलाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। यह त्योहार संपूर्ण भारत सहित विश्वभर में विशेष श्रद्धा और भक्ति से मनाया जाता है, विशेषकर मथुरा और वृंदावन में, जहाँ श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल बिताया था।
जन्माष्टमी नाम सुनते ही मन श्री कृष्ण जी की बाल लीलाओं से अलंकृत होने लगता है। जो बहुत ही आनंददायक और ह्रदय को सुख देने वाला है। श्री कृष्ण जी का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में रोहिणी नक्षत्र के शुभ लग्न में अर्धरात्रि को हुआ था। उस समय सभी नक्षत्र, गृह, लग्न अनुकूल थे। इस दिन भक्त श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते हैं और उनके बाल रूप की पूजा करते हैं साथ ही भगवान कृष्ण कि कृपा प्राप्त करने हेतु व्रत भी रखते हैं।
देशभर में यह त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों और घरों में सजावट की जाती है और श्रीकृष्ण की लीलाओं की झाकियां सजाई जाती हैं। जन्माष्टमी पर विधि पूर्वक पूजन करने से घर में सुख-शांति आती है और सफलता भी मिलती है। जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर कृष्ण जी के बाल रूप का पूजन करना शुभ होता है।
कुछ समय उपरांत कंस की चचेरी बहन देवकी का विवाह वासुदेव के साथ हुआ। जब देवकी की विदाई होने लगी तो कंस अपनी चचेरी बहन को खुश करने के लिए स्वयं ही रथ हाकने लगा। जब कंस देवकी को विदा करने के लिए रथ पर सवार होकर जा रहा था , उसी समय आकाशवाणी हुई कि - हे कंस! जिस बहन की तू बड़े प्रेम से विदाई कर रहा है उस बहन की ही आठवीं संतान तुझे मार देगी।
कंस जो कि बड़ा पापी था जिसकी दुष्टता कि कोई सीमा नहीं थी ,आकाशवाणी सुनते ही क्रोध से तिलमिला उठा। कंस अत्यंत पापी तो था ही और पाप करते करते वह निर्लज्ज भी हो गया था तुरंत ही उसने अपनी तलवार निकाली और अपनी बहन देवकी की चोटी पकड़ कर उसे मारने के लिए तैयार हो गया। कंस ने सोचा कि अगर मैं देवकी को मार दूंगा तो न देवकी के पुत्र होगा और न ही मुझे कोई मार पाएगा। कंस को अत्यंत क्रोधी देखकर वासुदेव जी ने कंस को समझाया कि तुम्हें देवकी से तो कोई भय नहीं है और न ही देवकी आपका अहित कर पाएगी आप इसे दंड न दें। आकाशवाणी के अनुसार आपको देवकी के आठवें पुत्र से भय है अतः मैं आपको वचन देता हूँ कि मैँ अपनी आठवीं संतान को तुम्हे सौंप दूँगा। कंस ने वासुदेव जी की बात तो मान ली परंतु फिर भी उसका भय समाप्त नहीं हुआ इसलिए उसने वासुदेव और देवकी को कारावास में डाल दिया। कंस ने देवकी के गर्भ से उत्पन्न सभी संतानों को निर्दयता पूर्वक मार डाला।
देवकी कि आठवीं संतान के रूप में भगवान श्री कृष्ण जी का जन्म हुआ। भगवान श्री कृष्ण के जन्म लेते ही कारावास की कोठरी एक दिव्य तेज से चमक उठी। उस तेज को देखकर देवकी और वासुदेव अत्यंत भयभीत हो गए उसी समय भगवान विष्णु ने अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर वासुदेव और माता देवकी को दर्शन दिए। दर्शन देने के पश्चात भगवान ने वासुदेव जी से कहा कि आप मुझे तुरंत गोकुल में नन्द के घर पहुँचा दें और नन्द बाबा के घर जन्मी कन्या को लाकर कंस को सौंप दें। वासुदेव जी भगवान की इच्छा के अनुसार जैसे ही कारगार से बाहर लेकर चले वैसे ही कारागार के पट अपने आप खुलने लगे। कंस को जब पता चला कि देवकी के संतान हुई है तब वह तुरंत ही उसे मारने के लिए आया क्योंकि वह यह सोच रहा था कि इस बार तो मेरे काल का जन्म हुआ है। देवकी से उस कन्या को छीन कर जैसे ही कंस ने मारना चाहा वैसे ही वह कन्या कंस के हाथों से छूट गई और एक देवी का रूप धारण करके बोली कि – हे! दुष्टातमा कंस तू घोर पापी है और तेरा अंत निश्चय है, तेरा वध करने वाला इस धरती पर जन्म ले चुका है अब तू निर्दोष बालकों कि हत्या बंद कर दे। कंस से इस प्रकार कहकर वह योग माया वहाँ से अन्तर्धान हो गई। इस प्रकार का दृश्य देखकर कंस भय से व्याकुल हो उठा। वह अपनी बहन देवकी और वासुदेव जी से माफी मांगने लगा। उसकी करुणामयी बाते सुनकर और उसके पश्चाताप को देख कर वसुदेव जी और देवकी जी ने उसे माफ कर दिया फिर कंस ने भी उन्हे कैदखाने से आजाद कर दिया।
गोकुल में सुबह होते ही जब नंदबाबा ने देखा की यशोदा जी ने पुत्र को जन्म दिया है। तो उसके जन्मदिवस को उत्सव के रूप में मनाने को उत्सुक हुए। उन्होंने बड़ी धूम धाम से उनके जन्मदिवस को मनाया। पूरे गोकुल में खुशियों की लहर सी दौड़ पड़ी, सभी गोकुल वासी आनंदमग्न हो रहे थे। तभी से इस संसार में प्रभु श्री कृष्ण जी के जन्मदिवस को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा। प्रभु श्री कृष्ण जी का यह जन्म उत्सव बहुत ही आनंददायक और भक्तों को सुख देने वाला है। इसी सुख और आनंद को प्राप्त करने के लिए व प्रभु के प्रति प्रेम, भक्ति, लगाव बढ़ाने के लिए इस शुभ उत्सव को पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाने से अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
2. जन्माष्टमी पर क्या करना चाहिए?
3. घर पर जन्माष्टमी कैसे मनाएं ?
जन्माष्टमी नाम सुनते ही मन श्री कृष्ण जी की बाल लीलाओं से अलंकृत होने लगता है। जो बहुत ही आनंददायक और ह्रदय को सुख देने वाला है। श्री कृष्ण जी का जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में रोहिणी नक्षत्र के शुभ लग्न में अर्धरात्रि को हुआ था। उस समय सभी नक्षत्र, गृह, लग्न अनुकूल थे। इस दिन भक्त श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते हैं और उनके बाल रूप की पूजा करते हैं साथ ही भगवान कृष्ण कि कृपा प्राप्त करने हेतु व्रत भी रखते हैं।
देशभर में यह त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों और घरों में सजावट की जाती है और श्रीकृष्ण की लीलाओं की झाकियां सजाई जाती हैं। जन्माष्टमी पर विधि पूर्वक पूजन करने से घर में सुख-शांति आती है और सफलता भी मिलती है। जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर कृष्ण जी के बाल रूप का पूजन करना शुभ होता है।
जन्माष्टमी 2025: तिथि और समय
- श्री कृष्ण जन्माष्टमी की तिथि: 15 अगस्त 2025
- अष्टमी तिथि का प्रारंभ: 15 अगस्त 2025 को 11:51 P.M
- अष्टमी तिथि समाप्त: 16 अगस्त 2025 को 9:35 P.M
- रोहिणी नक्षत्र का प्रारंभ: 17 अगस्त 2025 को प्रातः 4:39 A.M
- रोहिणी नक्षत्र समाप्त: 18 अगस्त 2025 को प्रातः 3:17 A.M
जन्माष्टमी घर में कब मनाई जाती है? (स्मार्त परंपरा)
- घर में जन्माष्टमी सामान्यतः स्मार्त संप्रदाय के लोक मानते है।
- इसमें सिर्फ "अष्टमी तिथि" की शुद्धता का ध्यान रखा जाता है — यानी जब रात के 12 बजे अष्टमी तिथि हो, उसी दिन उपवास और पूजन किया जाता है।
- नक्षत्र (जैसे रोहिणी) का कोई विशेष नियम नहीं होता।
- अधिकतर गृहस्थ लोग इसी स्मार्त विधि के अनुसार व्रत करते हैं।
स्मार्त जन्माष्टमी = अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि (12 बजे) जब हो
जन्माष्टमी मंदिर में कब मनाई जाती है? (वैष्णव परंपरा)
- मंदिरों, खासकर इसकॉन, द्वारकाधीश, वृंदावन, मथुरा आदि में, वैष्णव परंपरा के अनुसार जन्माष्टमी मनाई जाती है।
- वैष्णव संप्रदाय अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र — दोनों के मेल को ही मानता है।
- यदि अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र एक साथ पहले दिन नहीं आते, तो वे जन्माष्टमी को अगले दिन मनाते हैं।
वैष्णव जन्माष्टमी = अष्टमी तिथि + रोहिणी नक्षत्र का संयोग (या रात में दोनों का योग)
तिथियाँ अलग क्यों होती हैं?
- हिंदू पंचांग चंद्रमा पर आधारित होता है, इसलिए अष्टमी तिथि किसी दिन दोपहर से शुरू होकर अगले दिन दोपहर तक भी जा सकती है।
- अगर पहले दिन रात 12 बजे अष्टमी न हो, तो स्मार्त लोग उसे छोड़कर अगले दिन व्रत करते हैं।
- वहीं वैष्णव अनुयायी रोहिणी नक्षत्र की अनिवार्यता के कारण तिथि को आगे-पीछे कर सकते हैं।
- इसलिए हर साल घर की और मंदिर की जन्माष्टमी में 1 दिन का अंतर हो सकता है।
घर की पूजा और मंदिर की पूजा में क्या अंतर है?
| विषय | घर में (स्मार्त) | मंदिरों में (वैष्णव) |
|---|---|---|
| तिथि का आधार | केवल अष्टमी तिथि | अष्टमी + रोहिणी नक्षत्र |
| व्रत का दिन | पहले दिन (जब अष्टमी लगती है) | अक्सर अगले दिन |
| अनुयायी | गृहस्थ और सामान्य श्रद्धालु | वैष्णव पंथ, इस्कॉन, मठ आदि |
| तिथि बदलने का कारण | चंद्र तिथि अनुसार | तिथि + नक्षत्र योग |
कृष्ण जन्म की कथा
द्वापर युग में मथुरा में महाराजा उग्रसेन का शासन था । उनके पुत्र का नाम कंस था। कंस अत्यंत निर्दयी और क्रूर स्वभाव का था । अपनी क्रूरता के कारण कंस ने अपने ही पिता उग्रसेन से बलपूर्वक सिंहासन छीन लिया और उन्हें बंदी बना कर कारागार में डाल दिया। पिता को बंदी बना लेने के बाद कंस ने स्वयं को मथुरा का राजा घोषित कर दिया।कुछ समय उपरांत कंस की चचेरी बहन देवकी का विवाह वासुदेव के साथ हुआ। जब देवकी की विदाई होने लगी तो कंस अपनी चचेरी बहन को खुश करने के लिए स्वयं ही रथ हाकने लगा। जब कंस देवकी को विदा करने के लिए रथ पर सवार होकर जा रहा था , उसी समय आकाशवाणी हुई कि - हे कंस! जिस बहन की तू बड़े प्रेम से विदाई कर रहा है उस बहन की ही आठवीं संतान तुझे मार देगी।
कंस जो कि बड़ा पापी था जिसकी दुष्टता कि कोई सीमा नहीं थी ,आकाशवाणी सुनते ही क्रोध से तिलमिला उठा। कंस अत्यंत पापी तो था ही और पाप करते करते वह निर्लज्ज भी हो गया था तुरंत ही उसने अपनी तलवार निकाली और अपनी बहन देवकी की चोटी पकड़ कर उसे मारने के लिए तैयार हो गया। कंस ने सोचा कि अगर मैं देवकी को मार दूंगा तो न देवकी के पुत्र होगा और न ही मुझे कोई मार पाएगा। कंस को अत्यंत क्रोधी देखकर वासुदेव जी ने कंस को समझाया कि तुम्हें देवकी से तो कोई भय नहीं है और न ही देवकी आपका अहित कर पाएगी आप इसे दंड न दें। आकाशवाणी के अनुसार आपको देवकी के आठवें पुत्र से भय है अतः मैं आपको वचन देता हूँ कि मैँ अपनी आठवीं संतान को तुम्हे सौंप दूँगा। कंस ने वासुदेव जी की बात तो मान ली परंतु फिर भी उसका भय समाप्त नहीं हुआ इसलिए उसने वासुदेव और देवकी को कारावास में डाल दिया। कंस ने देवकी के गर्भ से उत्पन्न सभी संतानों को निर्दयता पूर्वक मार डाला।
देवकी कि आठवीं संतान के रूप में भगवान श्री कृष्ण जी का जन्म हुआ। भगवान श्री कृष्ण के जन्म लेते ही कारावास की कोठरी एक दिव्य तेज से चमक उठी। उस तेज को देखकर देवकी और वासुदेव अत्यंत भयभीत हो गए उसी समय भगवान विष्णु ने अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट होकर वासुदेव और माता देवकी को दर्शन दिए। दर्शन देने के पश्चात भगवान ने वासुदेव जी से कहा कि आप मुझे तुरंत गोकुल में नन्द के घर पहुँचा दें और नन्द बाबा के घर जन्मी कन्या को लाकर कंस को सौंप दें। वासुदेव जी भगवान की इच्छा के अनुसार जैसे ही कारगार से बाहर लेकर चले वैसे ही कारागार के पट अपने आप खुलने लगे। कंस को जब पता चला कि देवकी के संतान हुई है तब वह तुरंत ही उसे मारने के लिए आया क्योंकि वह यह सोच रहा था कि इस बार तो मेरे काल का जन्म हुआ है। देवकी से उस कन्या को छीन कर जैसे ही कंस ने मारना चाहा वैसे ही वह कन्या कंस के हाथों से छूट गई और एक देवी का रूप धारण करके बोली कि – हे! दुष्टातमा कंस तू घोर पापी है और तेरा अंत निश्चय है, तेरा वध करने वाला इस धरती पर जन्म ले चुका है अब तू निर्दोष बालकों कि हत्या बंद कर दे। कंस से इस प्रकार कहकर वह योग माया वहाँ से अन्तर्धान हो गई। इस प्रकार का दृश्य देखकर कंस भय से व्याकुल हो उठा। वह अपनी बहन देवकी और वासुदेव जी से माफी मांगने लगा। उसकी करुणामयी बाते सुनकर और उसके पश्चाताप को देख कर वसुदेव जी और देवकी जी ने उसे माफ कर दिया फिर कंस ने भी उन्हे कैदखाने से आजाद कर दिया।
गोकुल में सुबह होते ही जब नंदबाबा ने देखा की यशोदा जी ने पुत्र को जन्म दिया है। तो उसके जन्मदिवस को उत्सव के रूप में मनाने को उत्सुक हुए। उन्होंने बड़ी धूम धाम से उनके जन्मदिवस को मनाया। पूरे गोकुल में खुशियों की लहर सी दौड़ पड़ी, सभी गोकुल वासी आनंदमग्न हो रहे थे। तभी से इस संसार में प्रभु श्री कृष्ण जी के जन्मदिवस को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा। प्रभु श्री कृष्ण जी का यह जन्म उत्सव बहुत ही आनंददायक और भक्तों को सुख देने वाला है। इसी सुख और आनंद को प्राप्त करने के लिए व प्रभु के प्रति प्रेम, भक्ति, लगाव बढ़ाने के लिए इस शुभ उत्सव को पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
जन्माष्टमी की पूजा विधि
पूजा विधि- जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव है, जिसे आनंद और भक्ति के साथ मनाना चाहिए।
- इस दिन को भगवान के आगमन की अनुभूति के साथ, गीता पाठ, कीर्तन, उपवास और हरी नाम संकीर्तन के रूप में मनाया जा सकता है।
- श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की पूजा रात्रि 12 बजे होती है।
- पूजा स्थान को अच्छे से साफ कर लें और गंगाजल का छिड़काव करके उसे पवित्र करें।
- पूजा स्थल को सजाएं और उसमें शुभता का संचार करें।
- सूर्य, पवन, भूमि, आकाश आदि को नमस्कार करें और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- एक चौकी पर स्वच्छ सफेद कपड़ा बिछाएं।
- उस पर लड्डू गोपाल की धातु की मूर्ति स्थापित करें।
- कुमकुम, चंदन
- धूप, दीपक (आरती के लिए)
- जल, फूल
- पंचामृत, पंजीरी, नारियल की मिठाई, फल आदि प्रसाद
- कुछ स्थानों पर रात्रि 12 बजे खीरे के तने को काटा जाता है, जो नवजात के जन्म के समय नाभि तने के कटने की प्रतीकात्मक प्रक्रिया मानी जाती है।
- आप चाहें तो यह प्रक्रिया न करके केवल उत्सव रूप में भगवान का स्वागत कर सकते हैं।
- भगवान के जन्म के पश्चात लड्डू गोपाल को स्नान कराएँ:
- शहद, घी, चीनी, दूध, दही, मेवा, गंगाजल से।
- फिर चंदन का तिलक लगाएं।
- स्वच्छ वस्त्र पहनाएं, मुकुट और बाँसुरी से सजाएं।
- भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें।
- भोग अर्पित करें (जैसे पंजीरी, मिठाई, फल आदि)।
- प्रसाद को घर के सभी सदस्यों में वितरित करें।
- यदि आपने उपवास रखा है, तो पूजा के पश्चात रात्रि में भोजन करें।
- उस भोजन को भी पहले लड्डू गोपाल को भोग लगाएं, फिर स्वयं ग्रहण करें।
जन्माष्टमी के लाभ व महत्व
जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की स्मृति मात्र नहीं, बल्कि धर्म, भक्ति और ज्ञान की पुनःस्थापना का पर्व है। यह त्योहार हमें बताता है कि अधर्म चाहे कितना भी बढ़े, उसका अंत निश्चित है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाने से अनेक आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
- पारिवारिक सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति
- नकारात्मक ऊर्जा और दोषों का निवारण
- मानसिक एकाग्रता और आध्यात्मिक उन्नति
- भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि
- बच्चों को नैतिक और धार्मिक शिक्षा मिलती है
जन्माष्टमी के धार्मिक महत्व
- सांस्कृतिक दृष्टि से: रासलीला, भजन, कीर्तन और सामूहिक आयोजन सामाजिक सहयोग और एकता को बढ़ाते हैं।
- आध्यात्मिक दृष्टि से: भक्ति मार्ग का पोषण होता है और आत्मा को शुद्धि मिलती है।
- सामाजिक दृष्टि से: दही हांडी जैसे आयोजन सामाजिक सहयोग और एकता को बढ़ाते हैं।
- दर्शनिक दृष्टि से: श्रीकृष्ण का जीवन कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का परिचायक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. हम जन्माष्टमी क्यों मनाते हैं?हम जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं, जिन्हें भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। यह पर्व प्रेम, सत्य, न्याय और धर्म के सिद्धांतों को स्थापित करने के लिए मनाया जाता है, जो श्रीकृष्ण के जीवन का आधार हैं। यह अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार, जन्माष्टमी का व्रत रखने से अकाल मृत्यु से मुक्ति मिलती है और सभी पापों का नाश होकर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
2. जन्माष्टमी पर क्या करना चाहिए?
जन्माष्टमी पर भक्त व्रत रखते हैं। प्रातः काल स्नान के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूरे दिन और रात भगवान बालकृष्ण का ध्यान, जप, पूजा, भजन और कीर्तन करना चाहिए। घरों को फूलों, रोशनी और रंगोली से सजाया जाता है। भगवान कृष्ण की मूर्ति को फूलों और चंदन से सजाकर एक विशेष स्थान पर रखा जाता है। मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है, जिसमें प्रार्थनाएं, मंत्रोच्चार और भजन गाए जाते हैं। दीपक जलाए जाते हैं और भगवान कृष्ण की मूर्ति को सजे हुए झूले में रखकर आरती की जाती है। जन्म के बाद, कुछ भक्त प्रसाद बांटकर अपना उपवास तोड़ते हैं और कुछ भक्त सूर्योदय के बाद अपना व्रत तोड़ते है। आप अपनी रीति-रिवाज के अनुसार व्रत पारण कर सकते है। घर के दरवाजों और रसोई के बाहर छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं, जो कृष्ण के घर में आने का प्रतीक हैं। अगले दिन दही हांडी उत्सव मनाया जाता है।
3. घर पर जन्माष्टमी कैसे मनाएं ?
- क्षेत्रों में भिन्नता होने के कारण पूजा विधि में भिन्नता हो सकती है। आपको अपनी रीति-रिवाज व पारंपरिक विधि से पूजा करनी चाहिए। घर पर जन्माष्टमी मनाने की विधि कुछ इस प्रकार है।
- जन्माष्टमी के एक दिन पहले ही घर की साफ-सफाई कर ले।
- जन्माष्टमी के दिन प्रातःकाल उठकर दैनिक क्रिया करके स्नान आदि करके स्वच्छ हो ले।
- पूजा में आवश्यक सामग्री को एकत्रित कर ले।
- हाथ में पुष्प लेकर व्रत करने का संकल्प ले और ये महसूस करे की आज मेरे घर भगवान आ रहे है।
- पूरे दिन भजन कीर्तन करे।
- पूजा करने से पहले एक बार फिर से अपने घर की सफाई और मंदिर को स्वच्छ कर ले।
- आप अपनी इच्छा अनुसार अपने घर को सजा सकते है।
- पूजा स्थान को फूलों, और दीप से सजाएँ।
- एक चौकी पर साफ सफेद या पीले रंग का कपड़ा बिछाकर लड्डू गोपाल की मूर्ति या झूला रखें।
- पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- शांत मन से श्रीकृष्ण का ध्यान करें और उनका आह्वान करें।
- भारत के कुछ जगहों पर खीरे के तने को रात 12 बजे काट कर भगवान श्री कृष्ण का जन्म किया जाता है। यह वैसा ही है जैसे एक शिशु के जन्म के समय उसका नाभि का तना माँ के गर्भाशय से अलग किया जाता है। आप चाहे तो यह प्रक्रिया ना कर के यूंही उनके आगमन का उत्सव मना सकते है।
- ठीक रात 12 बजे श्रीकृष्ण जन्म के प्रतीक रूप में लड्डू गोपाल की पूजा करें।
- पंचामृत और गंगाजल से उनका अभिषेक करें।
- उन्हें साफ वस्त्र पहनाएँ, चंदन का तिलक करें और फूल, मुकुट व बाँसुरी से सजाएँ।
- भोग अर्पित करें और आरती करें।
- जन्म के बाद भजन या कीर्तन करें।
- पूजा के बाद प्रसाद को सभी घर के सदस्यों में बाँटें।
- रात्रि में भोग अर्पित करके भोजन कर सकते है।
4. जन्माष्टमी की पूजा कैसे करें?
5. जन्माष्टमी पर क्या नहीं करना चाहिए?
6. जन्माष्टमी के दिन क्या करना चाहिए?
7. व्रत में क्या खा सकते हैं?
8. व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए?
- प्रातःकाल स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थान पर बालकृष्ण और माता देवकी की मूर्ति स्थापित करें।
- भगवान श्रीकृष्ण के चारों ओर गाय, कालिया नाग मर्दन और गिरिराज धारण जैसी सुंदर झांकियां सजाएं।
- माता देवकी और बालकृष्ण की षोडशोपचार विधि से श्रद्धापूर्वक पूजा करें।
- लड्डू गोपाल का पंचामृत से अभिषेक करें।
- अभिषेक के बाद उन्हें स्वच्छ नए वस्त्र पहनाएं।
- लड्डू गोपाल को श्रद्धापूर्वक झूले में झुलाएं।
- पंचामृत में तुलसी के पत्ते मिलाएं और माखन-मिश्री व धनिए की पंजीरी बनाकर भगवान को भोग लगाएं।
- भोग के बाद भगवान की आरती करें।
- आरती के बाद सभी भक्तों में प्रसाद वितरित करें।
- इस दिन चंद्रमा की पूजा करना भी शुभ माना जाता है।
5. जन्माष्टमी पर क्या नहीं करना चाहिए?
- जन्माष्टमी पर असत्य बोलने से बचना चाहिए।
- केवल अन्न का त्याग करना पर्याप्त नहीं होता, सभी इंद्रियों को संयम में रखना भी आवश्यक होता है।
- यदि इंद्रियों पर संयम नहीं रखा जाए तो व्रत का पूर्ण फल नहीं प्राप्त होता।
- व्रत के दौरान कठोर, तले हुए खाद्य पदार्थों और अत्यधिक मीठी चीजों से बचना चाहिए।
- व्रत तोड़ने के बाद अधिक मात्रा में भोजन नहीं करना चाहिए।
- खट्टे फल जैसे संतरा और नींबू तथा रात के भोजन के बाद जूस पीने से बचना चाहिए, क्योंकि ये पाचन में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।
- प्याज, लहसुन और मांसाहारी भोजन का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है।
- अत्यधिक शारीरिक मेहनत या तेज गतिविधियों से भी बचना चाहिए।
6. जन्माष्टमी के दिन क्या करना चाहिए?
- जन्माष्टमी के दिन व्रत का पालन करें।
- पूरे दिन और रात भगवान बालकृष्ण का ध्यान, जप, पूजा, भजन और कीर्तन करें।
- पास के मंदिरों में जाकर जन्माष्टमी उत्सव में भाग लें।
- मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाएं और प्रसाद वितरित करें।
- घर को सजाएं और भगवद गीता के श्लोकों या कृष्ण लीला से संबंधित धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें।
- रास लीला या कृष्ण लीला जैसे नृत्य-नाट्य कार्यक्रमों का आयोजन करें या उन्हें देखने जाएं।
- अगले दिन दही हांडी उत्सव में भाग लें और श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का आनंद लें।
7. व्रत में क्या खा सकते हैं?
- जन्माष्टमी व्रत के दौरान फल जैसे केले, सेब, अनार और खरबूजा खा सकते हैं।
- डेयरी उत्पादों में दूध, दही, पनीर, मक्खन और छाछ का सेवन किया जा सकता है।
- कंद वाली सब्जियों जैसे आलू और शकरकंद का उपयोग किया जा सकता है।
- सूखे मेवे, मूंगफली और बीजों का सेवन भी व्रत में किया जा सकता है।
- कुट्टू का आटा, मखाना और सिंघाड़े का आटा उपवास में मान्य होते हैं।
- सेंधा नमक का उपयोग सामान्य नमक की जगह किया जाता है।
- ताजा नारियल पानी, फलों का रस और नींबू पानी पीने के लिए उपयुक्त होते हैं।
- साबूदाना खिचड़ी या वड़ा के रूप में खाया जा सकता है, यह ऊर्जा का अच्छा स्रोत है।
8. व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए?
- जन्माष्टमी व्रत के दौरान अनाज नहीं खाना चाहिए।
- सभी प्रकार की दालें वर्जित होती हैं।
- प्याज और लहसुन तामसिक माने जाते हैं, इसलिए इनका सेवन नहीं करना चाहिए।
- मांसाहारी भोजन का सेवन पूरी तरह निषिद्ध है।
- खट्टे फल व्रत में नहीं खाने चाहिए।
- पेय पदार्थों से भी बचना चाहिए।
- अत्यधिक तले हुए खाद्य पदार्थ और भारी मिठाइयाँ खाने से परहेज करना चाहिए।
9. वृंदावन में जन्माष्टमी कैसे मनाई जाती है?
10. क्या वृंदावन में श्रीकृष्ण के प्रमाण हैं?
11. क्या जन्माष्टमी पर मथुरा जाना अच्छा है?
12. श्रीकृष्ण ने वृंदावन कब छोड़ा था?
- वृंदावन में जन्माष्टमी का उत्सव अत्यंत उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है, जो भगवान कृष्ण के बचपन की लीलाओं और उनके प्रति असीम प्रेम को समर्पित है।
- यह अक्सर मथुरा से एक दिन बाद मनाई जाती है। वृंदावन के 5,000 से अधिक कृष्ण और राधा मंदिरों को फूलों और रोशनी से भव्य रूप से सजाया जाता है।
- बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी पर बाला महाभिषेक होता है, जो साल में एक बार होता है। इस अभिषेक के बाद रात लगभग 2 बजे पीली पीताम्बरी पोशाक में बिहारी जी की मंगला आरती के दर्शन खुलते हैं, यह भी साल में एक बार ही होती है।
- भक्त भगवान कृष्ण की मूर्तियों को नए वस्त्र, आभूषण और फूलों से सजाते हैं, और उन्हें दूध, दही और मक्खन जैसे उनके पसंदीदा खाद्य पदार्थ अर्पित करते हैं।
- रास लीला या कृष्ण लीला जैसे नृत्य-नाट्य कार्यक्रम विशेष रूप से लोकप्रिय हैं, जो कृष्ण के जीवन के दृश्यों को दर्शाते हैं। भक्त पूरी रात भजन गाते हैं, मंत्रों का जाप करते हैं और भगवान कृष्ण के नाम का जप करते हैं, जिससे एक आध्यात्मिक और आनंदमय वातावरण बनता है। शंख बजाए जाते हैं और घंटियां बजाई जाती हैं।
- जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का उत्सव मनाया जाता है, जिसमें युवा समूह मानव पिरामिड बनाकर दही या मक्खन से भरी मिट्टी की हांडी को तोड़ते हैं, जो कृष्ण के बचपन की शरारतों का प्रतीक है।
10. क्या वृंदावन में श्रीकृष्ण के प्रमाण हैं?
वृंदावन को भगवान कृष्ण की लीलास्थली और उनके बचपन का घर माना जाता है, जहाँ उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष बिताए। यह ब्रजभूमि क्षेत्र में स्थित है और हिंदुओं के लिए एक अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थल है।
वृंदावन में 5,000 से अधिक मंदिर हैं जो भगवान कृष्ण और उनकी प्रमुख संगिनी राधा की पूजा को समर्पित हैं। 16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण के जीवन से जुड़े खोए हुए पवित्र स्थानों का पता लगाकर वृंदावन को "पुनर्खोज" किया था। यहाँ राधा रमण मंदिर में कृष्ण की एक मूल शालिग्राम मूर्ति स्थापित है, और गोविंद देव मंदिर (16वीं शताब्दी) वृंदावन के सबसे पुराने जीवित मंदिरों में से एक है। भंडिरवन जैसे स्थानों पर राधा और कृष्ण के विवाह समारोह और वेणु कूप (कृष्ण की बांसुरी से निर्मित) जैसी लीलाओं का उल्लेख मिलता है।
हालांकि, उपलब्ध शोध सामग्री में वृंदावन में कृष्ण की उपस्थिति के लिए विस्तृत ऐतिहासिक या पुरातात्विक प्रमाण विशेष रूप से उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थान मुख्य रूप से उनकी बचपन की लीलाओं और गहन आध्यात्मिक श्रद्धा का केंद्र है, जहाँ लाखों भक्त उनकी उपस्थिति को महसूस करते हैं और उनकी कहानियों को दैनिक रूप से पुनर्जीवित करते हैं।
वृंदावन में 5,000 से अधिक मंदिर हैं जो भगवान कृष्ण और उनकी प्रमुख संगिनी राधा की पूजा को समर्पित हैं। 16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण के जीवन से जुड़े खोए हुए पवित्र स्थानों का पता लगाकर वृंदावन को "पुनर्खोज" किया था। यहाँ राधा रमण मंदिर में कृष्ण की एक मूल शालिग्राम मूर्ति स्थापित है, और गोविंद देव मंदिर (16वीं शताब्दी) वृंदावन के सबसे पुराने जीवित मंदिरों में से एक है। भंडिरवन जैसे स्थानों पर राधा और कृष्ण के विवाह समारोह और वेणु कूप (कृष्ण की बांसुरी से निर्मित) जैसी लीलाओं का उल्लेख मिलता है।
हालांकि, उपलब्ध शोध सामग्री में वृंदावन में कृष्ण की उपस्थिति के लिए विस्तृत ऐतिहासिक या पुरातात्विक प्रमाण विशेष रूप से उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थान मुख्य रूप से उनकी बचपन की लीलाओं और गहन आध्यात्मिक श्रद्धा का केंद्र है, जहाँ लाखों भक्त उनकी उपस्थिति को महसूस करते हैं और उनकी कहानियों को दैनिक रूप से पुनर्जीवित करते हैं।
11. क्या जन्माष्टमी पर मथुरा जाना अच्छा है?
हाँ, जन्माष्टमी के दौरान मथुरा जाना अत्यधिक अनुशंसित है। मथुरा भगवान कृष्ण का जन्मस्थान है, जो इसे जन्माष्टमी समारोहों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण शहर बनाता है। यहाँ भव्य जन्माष्टमी समारोह होते हैं, जिनमें जीवंत अनुष्ठान, प्रार्थनाएं और सांस्कृतिक प्रदर्शन शामिल होते हैं। जन्माष्टमी के दौरान मथुरा का रात्रि जीवन यमुना आरती प्रदान करता है, जो एक अनूठा आध्यात्मिक आयाम है। सैकड़ों दीये जलाए जाते हैं, जिससे विश्राम घाट पर शाम की आरती के दौरान एक उज्ज्वल चमक पैदा होती है। सड़कें पारंपरिक कला और शिल्प से सजी होती हैं, और सांस्कृतिक प्रदर्शन, जुलूस और पवित्र मंत्रों से भरी होती हैं। आप पेड़ा, एक स्वादिष्ट मिठाई का आनंद ले सकते हैं। जन्माष्टमी के दौरान मथुरा-वृंदावन में पर्यटकों की भारी भीड़ होती है, इसलिए आवास पहले से बुक करना आवश्यक है। त्योहारों के दौरान मथुरा-वृंदावन जाने का सबसे अच्छा समय है, क्योंकि यह एक गहन अनुभव प्रदान करता है।
12. श्रीकृष्ण ने वृंदावन कब छोड़ा था?
श्रीकृष्ण ने वृंदावन लगभग 11 वर्ष की आयु में छोड़ा था। श्रीमद्भागवतम् के तीसरे स्कंध में उद्धव ने विदुर के प्रश्नों का उत्तर देते हुए बताया है कि श्रीकृष्ण ने वृंदावन में ग्यारह वर्ष बिताए थे। वृंदावन छोड़ने के बाद, वे मथुरा गए, जहाँ उन्होंने कंस का वध किया, जिसके बाद उनकी बाल लीलाएं समाप्त हो गईं और वे सांदीपनि ऋषि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने चले गए।

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