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जगन्नाथ रथ यात्रा 2025

जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा, भारत के सबसे भव्य और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध धार्मिक उत्सवों में से एक है। हर वर्ष ओडिशा के प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर से आरंभ होने वाली यह यात्रा न केवल भक्तिभाव से जुड़ी होती है, बल्कि यह भारतीय समाज में सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता का संदेश भी देती है। भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान, भक्तों का मानना है कि भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ भव्य रथों पर विराजमान होकर अपने भक्तों के बीच स्वयं आते हैं और उन्हें शुभ दर्शन देते हैं。

यह यात्रा प्रतीक है उस भावना की जिसमें भगवान केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे स्वयं अपने भक्तों के द्वार पर आकर उनका उद्धार करते हैं। यह दिव्य परंपरा यह दर्शाती है कि हर भक्त भगवान के लिए समान है, और भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा इसी विचार को जीवंत करती है。

पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा का उद्देश्य
हर वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा की शुरुआत होती है। इस दिन भव्य रूप से सुसज्जित रथों में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को पुरी जगन्नाथ मंदिर से लगभग पाँच किलोमीटर दूर स्थित श्री गुंडीचा मंदिर तक ले जाया जाता है। इस यात्रा को एक महान धार्मिक उत्सव के रूप में देखा जाता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं और रथ को खींचकर अपार पुण्य अर्जित करते हैं。

रथ खींचना केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भक्ति और सेवा का प्रतीक है। भक्त इस अवसर को अत्यंत सौभाग्यशाली मानते हैं क्योंकि जगन्नाथ मंदिर के भगवान स्वयं उनके निकट आकर दर्शन देते हैं और कृपा बरसाते हैं。

नौ दिन की दिव्य यात्रा
भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा कुल नौ दिनों तक चलती है। रथ यात्रा की शुरुआत द्वितीया तिथि को होती है जब भगवान गुंडीचा मंदिर में विराजमान होते हैं। वहाँ वे सात दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर दशमी तिथि को पुनः पुरी जगन्नाथ मंदिर लौटते हैं। इस वापसी को बहुदा यात्रा कहा जाता है। यह सम्पूर्ण उत्सव भजन, कीर्तन, आरती और पूजा-पाठ से परिपूर्ण होता है, जिससे संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है。

रथ यात्रा मार्ग को फूलों, तोरण द्वारों, रंगोली और भक्ति ध्वजों से सजाया जाता है। श्रद्धालु पूरे हर्षोल्लास से रथ खींचते हैं और यह विश्वास करते हैं कि इस पुण्य कार्य से उन्हें न केवल इस लोक में सुख की प्राप्ति होती है, बल्कि मृत्यु के पश्चात वे वैकुंठ लोक को प्राप्त करते हैं。

आज के समय में जगन्नाथ मंदिर की यह परंपरा भारत के अनेक राज्यों में अपनाई जा चुकी है। हालांकि कई स्थानों पर स्थानीय स्तर पर भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन होता है, लेकिन पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व और भव्यता सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। हर भक्त का यह सपना होता है कि वह जीवन में एक बार इस दिव्य यात्रा में भाग अवश्य ले。

तीनों रथों की विशेषता

  • नंदीघोष (भगवान जगन्नाथ का रथ): रंग: लाल और पीला, पहिए: 16, ऊंचाई: 45 फीट
  • तालध्वज (बलभद्र का रथ): रंग: हरा, लाल, पहिए: 14, ऊंचाई: 43 फीट
  • दर्पदलन (सुभद्रा का रथ): रंग: काला, लाल, पहिए: 12, ऊंचाई: 42 फीट
इन रथों को केवल लकड़ी से बनाया जाता है और इनमें किसी भी धातु का प्रयोग नहीं होता- यही पूरी जगन्नाथ रथ यात्रा के इतिहास की विशेष परंपरा है。

पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त और विशेष जानकारी
जगन्नाथ रथ यात्रा 2025 कब है?
पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा वर्ष 2025 में 27 जून, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह तिथि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया को पड़ती है, जो पंचांग के अनुसार इस महोत्सव की पारंपरिक तिथि है。
द्वितीया तिथि प्रारंभ: 26 जून 2025 को दोपहर 1:25 बजे
द्वितीया तिथि समाप्त: 27 जून 2025 को प्रातः 11:20 बजे

रथ यात्रा 2025 के प्रमुख कार्यक्रम
  • 27 जून 2025 (शुक्रवार): रथ यात्रा का प्रारंभ; देवताओं की जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक यात्रा।
  • 5 जुलाई 2025 (शनिवार): बहुदा यात्रा; देवताओं की वापसी यात्रा।

जगन्नाथ रथ यात्रा की कथा
द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीला पूर्ण कर पृथ्वी का त्याग किया, तब उनके शरीर का अंतिम संस्कार किया गया। किंतु अग्नि देव उनके हृदय को नहीं जला सके। वह हृदय, जो स्वयं ब्रह्म तत्व का प्रतीक था, अग्नि में भी अक्षुण्ण बना रहा। यह देख पांडव चकित रह गए। तभी आकाशवाणी हुई कि यह कोई साधारण अवशेष नहीं, बल्कि स्वयं परब्रह्म का स्वरूप है। इसे कुछ लकड़ियों के बीच में रखकर समुद्र में प्रवाहित कर देना चाहिए। पांडवों ने वैसा ही किया । श्रीकृष्ण का हृदय समुद्र को अर्पित कर दिया। समय बीता, और वह हृदय एक दिव्य काष्ठ खंड (लकड़ी के लठ्ठे) का रूप लेकर समुद्र की लहरों में बहता हुआ नीलांचल (वर्तमान पुरी, उड़ीसा) के तट पर आ गया। उसी समय राजा इंद्रद्युम्न अत्यंत धर्मपरायण और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उन्हें एक रात स्वप्न में श्रीकृष्ण ने दर्शन देकर कहा – "हे राजन्! मेरा दिव्य स्वरूप लकड़ी के रूप में समुद्र किनारे उपस्थित है। उसका अधिग्रहण करो और मेरे स्वरूप की स्थापना करो।" राजा इंद्रद्युम्न प्रातःकाल अपने दरबारियों सहित तट पर जाकर उस दिव्य काष्ठ को प्राप्त किया और उसे बड़े भक्तिभाव से अपने महल में ले आए। उन्होंने एक दिव्य मूर्तिकार (भगवान विश्वकर्मा के पुत्र ) के माध्यम से भगवान के तीन स्वरूप- भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ बनवाईं। किंतु यह मूर्तियाँ सामान्य नहीं थीं। उनमें श्रीकृष्ण का ब्रह्म हृदय प्रतिष्ठित किया गया- जो कालातीत है, अविनाशी है, और आज भी श्रीजगन्नाथ मंदिर, पुरी में उसी स्वरूप में प्रतिष्ठित है。

भक्तों के लिए एक अनोखी लीला - जब भगवान जगन्नाथ को आता है बुखार
पुरी जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं में एक अद्भुत प्रसंग आता है, जब स्वयं भगवान जगन्नाथ को बुखार हो जाता है। यह लीला हर वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाई जाने वाली देवस्नान पूर्णिमा के बाद शुरू होती है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को 108 पवित्र कलशों के शीतल जल से स्नान कराया जाता है。

इस विशेष स्नान के बाद मान्यता है कि भगवान को ज्वर हो जाता है। इस दौरान, पुरी जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह में भगवान को 15 दिनों के लिए विश्राम कराया जाता है। जिसे "अनवसर" या "अनासरा" कहा जाता है। इन दिनों में भगवान के दर्शन भक्तों के लिए वर्जित होते हैं, और केवल विशेष सेवक व वैद्य ही सेवा में नियुक्त रहते हैं。

यह समय भक्तों के लिए प्रतीक्षा और भावपूर्ण आराधना का समय होता है। जब भगवान स्वस्थ होते हैं, तब वे पुनः भव्यता के साथ रथ यात्रा में विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं। यह घटना न केवल भगवान की मानवीय संवेदनाओं को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि ईश्वर अपने भक्तों की भावना से जुड़ते हैं。

पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा के लाभ (Benefits of Jagannath Rath Yatra)
  • भगवान के रथ को खींचने मात्र से पापों का नाश होता है।
  • जो भी भक्त इस यात्रा में शामिल होता है, उसे वैकुंठ की प्राप्ति होती है।
  • दुःख से मुक्ति, सभी तीर्थों का फल, और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • इस यात्रा के दर्शन मात्र से व्यक्ति के जीवन में शांति, सौभाग्य, और धार्मिक उन्नति होती है।

पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व और आध्यात्मिक महत्त्व (Importance and Significance)
पुरी रथ यात्रा जगन्नाथ मंदिर की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है। यह न केवल ओडिशा, बल्कि पूरे भारत में मनाई जाती है। यह उत्सव हमें यह सिखाता है कि ईश्वर स्वयं अपने भक्तों के द्वार आते हैं। इसमें धार्मिक एकता, सांस्कृतिक समरसता, और मानवता का गहरा संदेश छिपा है。

जगन्नाथ रथ यात्रा की पूजा विधि-
  1. प्रातः स्नान और शुद्धता का पालन करें
    • प्रातः उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
    • पूजा स्थान को गंगाजल या शुद्ध जल से साफ करें।
    • जगन्नाथ मंदिर की परंपराओं की भांति, पवित्रता का विशेष ध्यान रखें।
  2. भगवान को चौकी पर विराजमान करें
    • लकड़ी की चौकी पर पीले या लाल वस्त्र बिछाएं।
    • भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों या चित्रों को स्थापित करें।
    • यह स्थापना उसी श्रद्धा से करें, जैसे पुरी में जगन्नाथ मंदिर में होती है।
  3. भक्ति भाव से षोडशोपचार पूजा करें
    • पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल) से भगवान का अभिषेक करें।
    • चंदन, फूल, अक्षत, धूप-दीप, वस्त्र और नैवेद्य अर्पित करें।
    • पूजा के दौरान भगवान कृष्ण के विशेष मंत्रों का जप करें।
    • तुलसी पत्र अर्पण करना अत्यंत आवश्यक है।
  4. भोग अर्पण करें
    • भगवान को घर में बनी खीर, फल, मिश्री, नारियल या पंचामृत अर्पित करें।
    • भोजन को पहले भगवान को समर्पित करें, फिर प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
  5. भजन, कीर्तन और पाठ करें
    • भगवान कृष्ण के भजनों से वातावरण को भक्तिमय बनाएं।
    • चाहें तो विष्णु सहस्रनाम या भगवान कृष्ण की लीलाओं का पाठ करें।
  6. आरती करें और संकल्प लें
    • घी का दीपक जलाकर आरती करें और घंटी बजाएं।
    • भगवान से अपने व्रत, संकल्प और परिवार के कल्याण के लिए प्रार्थना करें।
    • रथ यात्रा के दिन उपवास रखना भी पुण्यकारी माना जाता है।

जगन्नाथ रथ यात्रा मंत्र
  • "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः"
  • "जय श्री जगन्नाथाय नमः"
  • "हरे राम हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे"

जगन्नाथ रथ यात्रा की आरती
आरती श्री जगन्नाथ मंगल कारी,
आरती श्री बैकुंठ मंगलकारी,
मंगलकारी नाथ आपादा हरि,
कंचन को धुप दीप ज्योत जगमगी.....
भगवान जगन्नाथ की पूर्ण आरती का श्रद्धाभाव से गायन करें ।

जगन्नाथ रथ यात्रा का मिथक: क्या सच में मिलती है मोक्ष की प्राप्ति?
पुरी का जगन्नाथ मंदिर न केवल भारत के चार धामों में से एक है, बल्कि यहां आयोजित भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा आस्था और चमत्कारों से जुड़ी अनेक कथाओं का केंद्र है। इन्हीं में से एक प्रसिद्ध मान्यता यह है कि जो भक्त भगवान जगन्नाथ के रथ के नीचे आ जाता है, उसे जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है。

हालांकि आज के समय में सुरक्षा कारणों से इस परंपरा को सख्ती से नियंत्रित किया गया है, लेकिन यह मिथक अब भी भावनात्मक और आध्यात्मिक रूप से जीवित है। यह दर्शाता है कि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मोक्ष का प्रतीक है。

रथ यात्रा के दौरान, पुरी के जगन्नाथ मंदिर से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने रथों में विराजमान होकर श्री गुंडिचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। इस दौरान भक्तों को भगवान के साक्षात दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है, जिसे आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का अवसर माना जाता है。

क्यों मनाई जाती है भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा?
भगवान श्रीकृष्ण, बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण की स्मृति में हर वर्ष भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा मनाई जाती है। यह यात्रा पुरी का जगन्नाथ मंदिर से प्रारंभ होकर श्री गुंडिचा मंदिर तक जाती है, जहाँ भगवान कुछ दिन विश्राम करते हैं。

इसी दिन भगवान स्वयं रथ पर आरूढ़ होकर भक्तों के बीच आते हैं, जिससे सभी श्रद्धालु भगवान के दर्शन और कृपा का लाभ प्राप्त करते है। यह यात्रा भक्ति, सेवा और समर्पण का अद्भुत संगम मानी जाती है。

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि भगवान अपने भक्तों के दुख को हरने के लिए स्वयं चलकर अपने भक्तों के पास आते हैं, उनके दुख हरते हैं और उन्हें मोक्ष की ओर ले जाते हैं。

पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा: प्रमुख अनुष्ठान और पारंपरिक रस्में
पुरी का जगन्नाथ मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही दिव्य परंपराओं का प्रतीक है। हर वर्ष जब जगन्नाथ रथ यात्रा निकलती है, तब उसके साथ अनेक प्राचीन अनुष्ठान और परंपराएं निभाई जाती हैं, जो इस उत्सव को अद्वितीय बनाती हैं。

1. पाहंडी यात्रा
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को मंदिर से बाहर रथों तक लाने की रस्म को पाहंडी यात्रा कहा जाता है। भारी जनसमूह, मंत्रोच्चार, ढोल-नगाड़े और भक्तिमय कीर्तन के बीच यह अनुष्ठान अत्यंत भव्य रूप से संपन्न होता है। यही प्रक्रिया जगन्नाथ रथ यात्रा की आधिकारिक शुरुआत होती है。

2. चेरा पहारा
यह एक अद्वितीय रस्म है जिसमें पुरी के राजा स्वयं स्वर्ण झाड़ू से भगवान के रथों की सफाई करते हैं। यह परंपरा यह संदेश देती है कि भगवान के सामने सभी समान हैं – राजा हो या सामान्य भक्त। यह राजा की सेवा भावना और समर्पण का प्रतीक है。

3. दहुका बोली
रथ यात्रा के दौरान दहुकाओं द्वारा पारंपरिक शैली में गाए जाने वाले गीतों को दहुका बोली कहते हैं। इन गीतों के माध्यम से रथों की गति को प्रेरित किया जाता है। यह परंपरा ओडिशा की लोकसंस्कृति से जुड़ी हुई है और उत्सव की ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देती है。

4. हेरा पंचमी
रथ यात्रा के पांचवें दिन देवी लक्ष्मी की नाराजगी को दर्शाने वाला अनुष्ठान है हेरा पंचमी। मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ बिना देवी लक्ष्मी को साथ लिए गुंडिचा मंदिर चले जाते हैं, तो देवी उनसे नाराज होकर उन्हें वापस बुलाने आती हैं। यह एक प्रेम-प्रसंग जैसी लीलाओं से भरी रोचक परंपरा है。

5. बहुदा यात्रा
रथ यात्रा के नौवें दिन, भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने मूल मंदिर में वापस लौटते हैं। इस वापसी यात्रा को बहुदा यात्रा कहा जाता है। इसमें भी उसी भव्यता और श्रद्धा का भाव देखने को मिलता है, जैसा मुख्य यात्रा के दिन होता है。

6. सुनाबेश
बहुदा यात्रा बहुदा यात्रा के दौरान, भगवानों को स्वर्ण आभूषणों से सजाया जाता है। इस भव्य सजावट को "सुनाबेश" कहा जाता है。

भारत के 8 प्रमुख राज्यों में मनाई जाने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा
  • ओडिशा (पुरी): पुरी की रथ यात्रा विश्वप्रसिद्ध है, जहाँ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विशाल रथ लकड़ी से बने होते हैं। यह यात्रा सांस्कृतिक विरासत और समर्पण का प्रतीक है, जिसमें भक्त रथ खींचने को पुण्य मानते हैं।
  • पश्चिम बंगाल (कोलकाता/मायापुर): कोलकाता और मायापुर में इस्कॉन की रथ यात्रा अत्यंत भव्य होती है। कीर्तन, भोग वितरण, सांस्कृतिक झांकियां और विदेशी भक्तों की भागीदारी इसे अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देती है, जो भक्तिभाव और वैश्विक एकता को दर्शाती है।
  • झारखंड (रांची/जमशेदपुर): रांची और जमशेदपुर की रथ यात्रा में जनजातीय संस्कृति और वैष्णव परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलता है। स्थानीय भक्त इस यात्रा को पारंपरिक गीतों और नृत्य के साथ उत्सव का रूप देते हैं।
  • बिहार (पटना/गया): बिहार में पटना और गया की रथ यात्रा इस्कॉन की प्रेरणा से होती है, जहाँ भगवन्नाम संकीर्तन, वेदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक वेशभूषा में सजे भक्त इसे दिव्य आयाम देते हैं। यहाँ युवाओं की भागीदारी विशेष रहती है।
  • उत्तर प्रदेश (कानपुर/वाराणसी/लखनऊ): कानपुर, लखनऊ व वाराणसी की रथ यात्राएं धार्मिकता और जनसमूह की दृष्टि से अद्वितीय हैं। विशेष रूप से कानपुर में लाखों श्रद्धालु रथ खींचते हैं, और यहां की झांकियां धार्मिक शिक्षाओं को जीवंत करती हैं।
  • महाराष्ट्र (मुंबई/पुणे/नासिक): मुंबई और पुणे में रथ यात्रा इस्कॉन के भव्य आयोजन के कारण विशिष्ट है। यहां शहरी जीवन में भक्तिभाव का संगम देखने को मिलता है, जहाँ भोग वितरण, संगीत और शिक्षात्मक गतिविधियां भी होती हैं।
  • गुजरात (अहमदाबाद): अहमदाबाद की रथ यात्रा देश की दूसरी सबसे बड़ी मानी जाती है। यहाँ रथों की सुरक्षा सेना करती है, और यात्रा में शाही सजावट, सांप्रदायिक एकता व ऐतिहासिक परंपराएं इसे भव्य धार्मिक उत्सव बनाती हैं।
  • तेलंगाना (हैदराबाद): हैदराबाद की रथ यात्रा में विभिन्न राज्यों और देशों के श्रद्धालु भाग लेते हैं। यह सांस्कृतिक विविधता और वैश्विक भक्ति आंदोलन का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ भक्त भजन, झांकियों और रथ खींचने में उल्लासित रहते हैं।

FAQ
  1. जगन्नाथ किस भगवान के रूप हैं?
    भगवान जगन्नाथ श्रीकृष्ण के अवतार माने जाते हैं। वे भगवान विष्णु के स्वरूप हैं और उनके साथ उनके भाई बलभद्र व बहन सुभद्रा की पूजा होती है。
  2. जगन्नाथ पुरी में हर 12 साल में क्या होता है?
    हर 12वें वर्ष नवकलेवर उत्सव होता है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की पुरानी मूर्तियों को बदल कर नई मूर्तियाँ बनाई जाती हैं और ब्रह्म तत्व को उनमें प्रतिस्थापित किया जाता है。
  3. तीनों रथों के नाम क्या हैं?
    भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष, बलभद्र के रथ को तालध्वज और सुभद्रा के रथ को दर्पदलन कहा जाता है। हर रथ की बनावट, रंग और ध्वज अलग होता है。
  4. रथ यात्रा में विशेष भोजन क्या होता है?
    रथ यात्रा के दौरान श्रद्धालु भगवान को महाप्रसाद, खासकर खिचड़ी, खीर और पंचामृत अर्पित करते हैं। यह भोजन प्रसाद रूप में भक्तों को वितरित होता है。
  5. जगन्नाथ रथ का रंग कौन-सा होता है?
    भगवान जगन्नाथ के रथ का रंग लाल और पीला होता है, बलभद्र का नीला और सुभद्रा का काला और लाल रंग का रथ होता है। हर रथ की विशेष ध्वजा और सजावट होती है。
  6. रथ यात्रा कितने दिनों तक चलती है?
    पुरी की रथ यात्रा कुल 9 दिनों तक चलती है। पहले दिन भगवान गुंडिचा मंदिर जाते हैं और नौवें दिन बहुदा यात्रा में वापस जगन्नाथ मंदिर लौटते हैं。
  7. क्या मैं रथ यात्रा की शोभायात्रा में भाग ले सकता हूँ?
    जी हाँ, कोई भी श्रद्धालु पुरी की रथ यात्रा में भाग ले सकता है। लाखों लोग रथ खींचने और भगवान के दर्शन के लिए इस पवित्र यात्रा में शामिल होते हैं。
  8. रथ यात्रा में रथों का क्या महत्व है?
    रथ यात्रा में रथ भक्त और भगवान के बीच सेतु का कार्य करते हैं। यह प्रतीक है कि भगवान स्वयं भक्तों के पास आते हैं और उनके पापों का नाश कर मोक्ष प्रदान करते हैं。
  9. मैं रथ यात्रा 2025 के लिए अपनी यात्रा की योजना कैसे बना सकता हूँ?
    जगन्नाथ रथ यात्रा 2025 की तिथि 27 जून, शुक्रवार को है। इस भव्य उत्सव में भाग लेने के लिए यात्रा की योजना पहले से बनाना बेहद आवश्यक है。
    • टिकट और होटल बुकिंग: ट्रेन/फ्लाइट टिकट और होटल कम से कम 1-2 महीने पहले बुक करें।
    • पुरी एक दिन पहले पहुंचें: 26 जून को पुरी पहुँचना सही रहेगा ताकि आप रथ यात्रा का शुभारंभ देख सकें।
    • ऑनलाइन सेवाओं का लाभ लें: आनलाइन सेवा वेबसाइट्स से बुकिंग करें।
    • स्थानीय सहायता लें: गाइड या मंदिर सेवा केंद्रों की मदद लें।
    • सुरक्षा का ध्यान रखें: जरूरी सामान साथ रखें और प्रशासन के दिशा-निर्देशों का पालन करें।

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