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गुरु पूर्णिमा 2025
गुरु पूर्णिमा क्या है?
गुरु पूर्णिमा प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा भारत में अपने आध्यात्मिक या फिर अकादमिक गुरुओं के सम्मान में, उनके वंदन और उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए मनाया जाने वाला पर्व है। सही मायने में गुरु ही अपने शिष्यों का उचित मार्गदर्शन करता है और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है । गुरु शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है -'गु' अर्थात अंधकार और 'रु' का अर्थ है प्रकाश । इस प्रकार गुरु का अर्थ है अंधकार से प्रकाश की तरफ ले जाने वाला मार्गदर्शक । हम सब मनुष्यों के जीवन निर्माण में गुरुओं की अहम भूमिका होती है। ऐसे में माना जाता है कि जिन गुरुओं ने हमें पढ़ाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है, उनके प्रति हमें कृतज्ञता का भाव बनाए रखना चाहिए । गुरू के प्रति समर्पण भाव दर्शाने के लिए ही गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है।
गुरु पूर्णिमा 2025 की तिथि
- तिथि: गुरुवार, 10 जुलाई 2025
- पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 10 जुलाई 2025 को 1:38 A.M
- पूर्णिमा तिथि समाप्त: 11 जुलाई 2025 को 2:06 A.M
- पूजन का शुभ मुहूर्त: 08:00 A.M से 01:15 P.M तक
गुरु पूर्णिमा की कथा
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जब वेदव्यास जी बाल्यावस्था में थे तब उन्होनें अपनी माता सत्यवती और पिता पराशर जी से प्रभु के दर्शन करने का आग्रह किया। व्यास जी के बाल्यावस्था में होने के कारण उनकी माता ने उन्हे ऐसा करने से मना कर दिया। व्यास जी दृढ़ संकल्पी थे, उनके बार-बार आग्रह करने पर उनकी माता ने उन्हे वन में जाकर तपस्या करने की आज्ञा दे दी और साथ में ये भी कहा कि यदि घर की याद आए तो वापस लौट आना।
माता की आज्ञा पाकर व्यास जी वन में तपस्या के लिए चले गए और वहाँ जाकर उन्होंने बहुत कठिन तपस्या की। इस तपस्या के प्रभाव से वेदव्यास जी संस्कृत भाषा में निपुण हो गए और उन्हे इस भाषा में अच्छी प्रवीणता प्राप्त हुयी। इसी ज्ञान के प्रभाव से वेदव्यास जी ने महाभारत, 18 पुराण और ब्रह्मसूत्र की रचना कर डाली। उन्होंने चारों वेदों का वर्गीकरण किया इसलिए ये वेदव्यास के नाम से विख्यात हुए । व्यास जी को कठिन तपस्या और ईश्वर की कृपा से ज्ञान की प्राप्ति हुयी तभी से गुरु पूजन की यह प्रथा चली आ रही है।
गुरुपूर्णिमा का पर्व गुरु-शिष्य के संबंध की महत्ता को दर्शाता है और ज्ञान के प्राप्ति के लिए आदर्श गुरु की पूजा और सेवा का महत्व बताता है। इस दिन पर गुरु की स्मृति में आयोजित पूजाएं, समारोह और संगोष्ठी आदि के माध्यम से उन्हें सम्मानित किया जाता है। इसके साथ ही, छात्रों और शिष्यों को गुरु के द्वारा सिखाए गए ज्ञान की प्राप्ति और उनके आदर्शों और मार्गदर्शन को अपनाने की प्रेरणा मिलती है। इस पर्व के माध्यम से लोग गुरुओं के आदर्शों और ज्ञान की महत्वपूर्णता को समझते हैं और अपने जीवन में उनकी शिक्षा को अमल में लाने का संकेत प्राप्त करते हैं।
माता की आज्ञा पाकर व्यास जी वन में तपस्या के लिए चले गए और वहाँ जाकर उन्होंने बहुत कठिन तपस्या की। इस तपस्या के प्रभाव से वेदव्यास जी संस्कृत भाषा में निपुण हो गए और उन्हे इस भाषा में अच्छी प्रवीणता प्राप्त हुयी। इसी ज्ञान के प्रभाव से वेदव्यास जी ने महाभारत, 18 पुराण और ब्रह्मसूत्र की रचना कर डाली। उन्होंने चारों वेदों का वर्गीकरण किया इसलिए ये वेदव्यास के नाम से विख्यात हुए । व्यास जी को कठिन तपस्या और ईश्वर की कृपा से ज्ञान की प्राप्ति हुयी तभी से गुरु पूजन की यह प्रथा चली आ रही है।
गुरुपूर्णिमा का पर्व गुरु-शिष्य के संबंध की महत्ता को दर्शाता है और ज्ञान के प्राप्ति के लिए आदर्श गुरु की पूजा और सेवा का महत्व बताता है। इस दिन पर गुरु की स्मृति में आयोजित पूजाएं, समारोह और संगोष्ठी आदि के माध्यम से उन्हें सम्मानित किया जाता है। इसके साथ ही, छात्रों और शिष्यों को गुरु के द्वारा सिखाए गए ज्ञान की प्राप्ति और उनके आदर्शों और मार्गदर्शन को अपनाने की प्रेरणा मिलती है। इस पर्व के माध्यम से लोग गुरुओं के आदर्शों और ज्ञान की महत्वपूर्णता को समझते हैं और अपने जीवन में उनकी शिक्षा को अमल में लाने का संकेत प्राप्त करते हैं।
सनातन परंपरा में गुरु पूर्णिमा
सनातन परंपरा में गुरु को भगवान से भी ऊपर स्थान दिया गया है। कहा गया है –
गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।।
इस दिन शिष्य अपने आध्यात्मिक, शैक्षिक या जीवन के किसी भी मार्गदर्शक गुरु की पूजा करते हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार गुरु पूर्णिमा को वेद व्यास जी का जन्मदिवस माना जाता है । जिन्होंने महाभारत की रचना की। इनके जन्म दिवस के कारण इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शस्त्रों में कहा गया है कि व्यास जी ने चारों वेदों का वर्गीकरण किया था इसलिए इनका नाम वेदव्यास पड़ गया। गुरु को मान्यता इसलिए दी जाती है क्योंकि वे ज्ञान, दिशा, और प्रेरणा के स्रोत होते हैं। गुरु हमें जीवन में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, विचारों को प्रेरित करते हैं और हमारे अंतर्मन में आत्मविश्वास उत्पन्न करते हैं। वेदों और शस्त्रों में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर माना गया है तभी कहा गया है कि-
गुरू ब्रह्मा गुरू विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।।
गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
ईश्वर की प्राप्ति बिना गुरु के आशीर्वाद के संभव ही नहीं है । गुरु की कृपा मात्र से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है ।कबीर दास जी ने अपने दोहे में गुरु की पूजा-अर्चना श्री हरि से पहले करने की बात कही है-
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।।
यानी गुरु और गोविंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे पहले प्रणाम करना चाहिए- गुरु को या गोविंद को?
फिर अगली पंक्ति में उसका जवाब देते हुए वे लिखते हैं कि ऐसी स्थिति हो तो गुरु के चरणों में प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उनके ज्ञान से ही आपको गोविंद के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है।
गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष।।
इस दोहे में कबीरदास जी ने जन मानस से कहा है कि गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है है।
जब तक गुरु की कृपा व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती, तब तक कोई भी व्यक्ति अज्ञानता के अधंकार में भटकता हुआ माया मोह के बंधनों में बंधा रहता है, अर्थात उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होता है । गुरु के बिना व्यक्ति को सच और झूठ के बीच अंतर का पता नहीं चलता, साथ ही उसे सही और गलत का ज्ञान नहीं हो पता है ।
गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।।
इस दिन शिष्य अपने आध्यात्मिक, शैक्षिक या जीवन के किसी भी मार्गदर्शक गुरु की पूजा करते हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार गुरु पूर्णिमा को वेद व्यास जी का जन्मदिवस माना जाता है । जिन्होंने महाभारत की रचना की। इनके जन्म दिवस के कारण इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शस्त्रों में कहा गया है कि व्यास जी ने चारों वेदों का वर्गीकरण किया था इसलिए इनका नाम वेदव्यास पड़ गया। गुरु को मान्यता इसलिए दी जाती है क्योंकि वे ज्ञान, दिशा, और प्रेरणा के स्रोत होते हैं। गुरु हमें जीवन में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, विचारों को प्रेरित करते हैं और हमारे अंतर्मन में आत्मविश्वास उत्पन्न करते हैं। वेदों और शस्त्रों में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर माना गया है तभी कहा गया है कि-
गुरू ब्रह्मा गुरू विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।।
गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
ईश्वर की प्राप्ति बिना गुरु के आशीर्वाद के संभव ही नहीं है । गुरु की कृपा मात्र से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है ।कबीर दास जी ने अपने दोहे में गुरु की पूजा-अर्चना श्री हरि से पहले करने की बात कही है-
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।।
यानी गुरु और गोविंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे पहले प्रणाम करना चाहिए- गुरु को या गोविंद को?
फिर अगली पंक्ति में उसका जवाब देते हुए वे लिखते हैं कि ऐसी स्थिति हो तो गुरु के चरणों में प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उनके ज्ञान से ही आपको गोविंद के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है।
गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष।।
इस दोहे में कबीरदास जी ने जन मानस से कहा है कि गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है है।
जब तक गुरु की कृपा व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती, तब तक कोई भी व्यक्ति अज्ञानता के अधंकार में भटकता हुआ माया मोह के बंधनों में बंधा रहता है, अर्थात उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होता है । गुरु के बिना व्यक्ति को सच और झूठ के बीच अंतर का पता नहीं चलता, साथ ही उसे सही और गलत का ज्ञान नहीं हो पता है ।
बौद्ध धर्म में गुरु पूर्णिमा
बौद्ध धर्म में भी गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था। उनके प्रथम पाँच शिष्यों को धम्म चक्र प्रवर्तन की शुरुआत इसी दिन से मानी जाती है।
गुरु पूर्णिमा 2025: लाभ
- आत्मज्ञान: गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा करने से हमें उनकी कृपा प्राप्त होती है और गुरु की कृपा से आत्मा का जागरण होता है, जिससे हम न केवल बाहरी ज्ञान प्राप्त करते हैं, बल्कि भीतर की चेतना भी जागृत होती है । गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु से ज्ञान ग्रहण करने का विशेष फल मिलता है, जिससे हमारी बुद्धि तीव्र होती है और समझ बढ़ती है।
- मन का संतुलन और तनाव से मुक्ति: गुरु पूर्णिमा के दिन हमें गुरु के उपदेशों को सुनना चाहिए, गुरु के उपदेश हमारे मन को स्थिरता देते हैं, जिससे तनाव कम होता है और हम मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं।
- मोक्ष का मार्ग: गुरु पूर्णिमा के व्रत, दान और सेवा से हमारे कर्म शुद्ध होते हैं जिसके फलस्वरूप हमें मोक्ष की प्राप्ति होती है।
गुरु पूर्णिमा 2025: पूजा विधि
- प्रभात स्नान और शुद्धता
- सूर्योदय होने से पहले उठे।
- गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान करें।
- स्वच्छ, हल्के या पीले रंग के वस्त्र पहनें।
- पूजा स्थान की तैयारी
- घर में एक शांत और पवित्र स्थान चुनें।
- एक चौकी पर लाल या पीले कपड़े का आसन बिछाएं और उस पर गुरु की तस्वीर, मूर्ति या चरण पादुका स्थापित करें।
- पूजा सामग्री संग्रह करें
- फूल (पीले/सफेद), अक्षत (चावल), चंदन, कुमकुम
- दीपक, धूप, कपूर
- मिठाई या फल (नैवेद्य)
- जल से भरा लोटा (या गंगाजल)
- वस्त्र/दक्षिणा (यदि गुरु प्रत्यक्ष मौजूद हों)
- गुरु का आवाहन (मानसिक रूप से)
- अपने गुरु का ध्यान करें।
- मानसिक रूप से उन्हें आमंत्रित करें और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करें।
- पवित्र जल अर्पण
- गुरु के चरणों में गंगाजल या शुद्ध जल अर्पित करें।
- यदि प्रतिमा है, तो चरण स्पर्श करें। नहीं तो केवल मन से अर्पित करें।
- धूप और दीप प्रज्वलन
- पहले दीपक जलाएं, फिर धूप।
- दीपक को तीन बार गुरु के चित्र या चरणों के समक्ष घुमाएं।
- नैवेद्य अर्पण
- ताजे फल, मिठाई या खीर को थाली में रखकर गुरु को अर्पित करें।
- भोग लगाते समय मौन रहें।
- गुरु मंत्र का जप
- निम्नलिखित श्लोक का जप करें: ॐ गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः।
- कम से कम 11 बार, आदर्श रूप में 108 बार जप करें।
गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः॥ - गुरु की आरती
- गुरु की आरती करें।
- आरती करते समय "जय गुरु देव" या अपनी श्रद्धा से कोई भजन गाएं।
- क्षमा प्रार्थना और समर्पण
- गुरु से जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगें।
- अपने जीवन को उनके मार्गदर्शन में चलाने का संकल्प लें।
गुरु पूर्णिमा 2025: मंत्र जप
- "ॐ गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।" - "ॐ ऐं ह्रीं श्रीं गुरवे नमः" – इस बीज मंत्र का जप करें।
गुरु पूर्णिमा 2025: महत्व
गुरु पूर्णिमा का पर्व शिष्यों द्वारा अपने आध्यात्मिक गुरुओं और अकादमिक शिक्षकों को नमन और आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। गुरु वह प्रकाश स्तंभ होते हैं जो अपने शिष्यों के जीवन को ज्ञान, मार्गदर्शन और प्रेरणा से रोशन करते हैं। सभी गुरु अपने शिष्यों की भलाई के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर देते हैं।
आध्यात्मिक गुरु सदैव संसार के दुखी और अनाथ लोगों की सहायता करते आए हैं। इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब गुरुओं ने अपने ज्ञान और अनुभव से अनेक पीड़ित लोगों के दुखों का अंत किया है। स्वामी विवेकानंद और गुरु नानक जैसे महान गुरु सदैव मानवता की भलाई के लिए कार्यरत रहे। उन्होंने न केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया, बल्कि समाज सुधार में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गुरु पूर्णिमा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि भूटान, नेपाल जैसे देशों में भी बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। भारत की समृद्ध गुरु-शिष्य परंपरा धीरे-धीरे इन देशों तक पहुंची और वहां भी इसने अपने गहरे प्रभाव छोड़े। यह परंपरा मुख्यतः आध्यात्मिक गुरुओं के प्रवास के कारण फैली, जिन्होंने अपने ज्ञान का विस्तार विभिन्न क्षेत्रों में किया।
आध्यात्मिक गुरु सदैव संसार के दुखी और अनाथ लोगों की सहायता करते आए हैं। इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जब गुरुओं ने अपने ज्ञान और अनुभव से अनेक पीड़ित लोगों के दुखों का अंत किया है। स्वामी विवेकानंद और गुरु नानक जैसे महान गुरु सदैव मानवता की भलाई के लिए कार्यरत रहे। उन्होंने न केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन दिया, बल्कि समाज सुधार में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गुरु पूर्णिमा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि भूटान, नेपाल जैसे देशों में भी बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। भारत की समृद्ध गुरु-शिष्य परंपरा धीरे-धीरे इन देशों तक पहुंची और वहां भी इसने अपने गहरे प्रभाव छोड़े। यह परंपरा मुख्यतः आध्यात्मिक गुरुओं के प्रवास के कारण फैली, जिन्होंने अपने ज्ञान का विस्तार विभिन्न क्षेत्रों में किया।
गुरु पूर्णिमा का सांस्कृतिक महत्व
हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों में गुरुओं को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इन संस्कृतियों में अनेक ऐसे शैक्षणिक और आध्यात्मिक गुरु हुए हैं, जिन्हें भगवान तुल्य माना गया। जैसे स्वामी अभेदानंद, आदिशंकराचार्य, चैतन्य महाप्रभु आदि हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध गुरु हैं, जिन्होंने आध्यात्मिक जगत में जनमानस की सेवा की।
आध्यात्मिक गुरु जहां जनसमाज को मोक्ष और आध्यात्मिक ज्ञान देते हैं, वहीं अकादमिक गुरु ज्ञान और विद्या प्रदान करते हैं। इन सभी गुरुओं के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए हर वर्ष गुरु पूर्णिमा का पावन त्यौहार मनाया जाता है।
गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह गुरु-शिष्य संबंध की गहराई, सम्मान और आभार व्यक्त करने का अवसर है, जो जीवन में ज्ञान और प्रेम का दीप जलाता है।
आध्यात्मिक गुरु जहां जनसमाज को मोक्ष और आध्यात्मिक ज्ञान देते हैं, वहीं अकादमिक गुरु ज्ञान और विद्या प्रदान करते हैं। इन सभी गुरुओं के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए हर वर्ष गुरु पूर्णिमा का पावन त्यौहार मनाया जाता है।
गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह गुरु-शिष्य संबंध की गहराई, सम्मान और आभार व्यक्त करने का अवसर है, जो जीवन में ज्ञान और प्रेम का दीप जलाता है।
गुरु पूर्णिमा 2025: महत्व और उद्देश्य
गुरु पूर्णिमा का पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है, इसी दिन महर्षि वेद व्यास जी का जन्म हुआ था। धार्मिक मान्यता के अनुसार, वेद व्यास जी ने वेदों और पुराणों की रचना की, और इसी कारण उन्हें आदिगुरु माना जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन सभी जातक अपने-अपने गुरु की पूजा करते है साथ ही महर्षि वेदव्यास जी और भगवान विष्णु जी की भी पूजा करते है तथा उपवास रहते है।
ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और श्रद्धा से पूजन करने से साधक पर प्रभु की कृपा बनी रहती है और जीवन सुखमय होता है। साथ ही, यह पर्व गुरु-शिष्य परंपरा का उत्सव भी है, जो भारतीय ज्ञान प्रणाली में ज्ञान के संरक्षण और उसके निरंतर हस्तांतरण को दर्शाता है। शैक्षणिक जगत में भी इसका विशेष महत्व है, जहां शिक्षक, शोधकर्ता और प्रशिक्षक गुरु की भूमिका निभाते हुए ज्ञान और अनुभव की रोशनी फैलाते हैं।
ऐसा माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और श्रद्धा से पूजन करने से साधक पर प्रभु की कृपा बनी रहती है और जीवन सुखमय होता है। साथ ही, यह पर्व गुरु-शिष्य परंपरा का उत्सव भी है, जो भारतीय ज्ञान प्रणाली में ज्ञान के संरक्षण और उसके निरंतर हस्तांतरण को दर्शाता है। शैक्षणिक जगत में भी इसका विशेष महत्व है, जहां शिक्षक, शोधकर्ता और प्रशिक्षक गुरु की भूमिका निभाते हुए ज्ञान और अनुभव की रोशनी फैलाते हैं।
गुरु पूर्णिमा का उद्देश्य
- गुरु-शिष्य संबंध को सुदृढ़ करना: गुरु पूर्णिमा का मूल उद्देश्य इस दिव्य संबंध को और भी मजबूत बनाना है ताकि ज्ञान का प्रवाह न रुके और संस्कारों की परंपरा आगे बढ़ती रहे।
- ज्ञान और शिक्षा को बढ़ावा देना: यह दिन एक ऐसा अवसर है, जो समाज को शिक्षकों, विद्वानों और ज्ञान के मूल्य को समझने और उसका सम्मान करने की प्रेरणा देता है।
- आध्यात्मिक जागरण को प्रेरित करना: गुरु पूर्णिमा लोगों को आत्मा से जुड़ने और आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है।
- सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन: इस दिन गुरु के प्रति आदर, सेवा और आभार व्यक्त कर हम यह स्वीकारते हैं कि उनका योगदान हमारे जीवन की नींव है।
- ज्ञान की सतत खोज की प्रेरणा: गुरु पूर्णिमा हमें यह सिखाती है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। यह जीवन भर सीखते रहने और जिज्ञासा बनाए रखने की भावना को मजबूत करती है।
गुरु पूर्णिमा 2025: अनुष्ठान / रीति-रिवाज
गुरु ही सच्चे दीप हैं, जो अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। गुरु पूर्णिमा का दिन उन दिव्य शक्तियों के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता प्रकट करने का महान अवसर है जिन्होंने हमारे जीवन को दिशा दी है। इस दिन यदि श्रद्धा और विधिपूर्वक अनुष्ठान किए जाएं तो जीवन में चमत्कारी परिवर्तन संभव है।
- गुरु पूजन (Guru Puja): इस दिन अपने आध्यात्मिक या लौकिक गुरु का पूजन करें। चरणों में पुष्प, चंदन, वस्त्र, फल अर्पित करें। उनके साक्षात दर्शन हों तो चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें, न हों तो उनकी तस्वीर के समक्ष श्रद्धा से प्रणाम करें।
- व्यास पूजन (Vyasa Puja): महर्षि वेदव्यास को गुरु परंपरा का जनक माना जाता है। उन्होंने वेदों की रचना की। इस दिन उनका पूजन कर गुरु परंपरा को नमन करें।
- गुरु मंत्र जप: इस दिन अपने गुरु द्वारा दिए गए मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें। यदि कोई विशेष मंत्र न हो, तो निम्न सरल और प्रभावशाली गुरु मंत्रों का जप करें:
- "ॐ गुरवे नमः"
- "ॐ श्री गुरुभ्यो नमः"
- "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः..."
- गुरु गीता पाठ: "गुरु गीता" में शिव-पार्वती संवाद के माध्यम से गुरु की महिमा का विस्तृत वर्णन है। इसका पाठ करने से आत्मा गुरु के प्रति समर्पण में रच-बस जाती है और साधना को एक नई ऊंचाई मिलती है।
- ध्यान और स्वाध्याय: गुरु पूर्णिमा आत्मनिरीक्षण और आत्मविकास का दिन है। एकांत में बैठकर गुरु के उपदेशों, मंत्रों, ज्ञान और आत्म-चिंतन में लीन हों। अपने लक्ष्य, दोष और सुधार की दिशा में स्वयं को समर्पित करें।
- दान: योग्य ब्राह्मणों या साधकों को भोजन करवाएं, वस्त्र दें और यथासंभव दक्षिणा प्रदान करें। यह दान गुरु सेवा का श्रेष्ठतम रूप माना गया है।
- सत्संग, कथा या प्रवचन का श्रवण: इस दिन किसी संत, आचार्य या गुरु के सत्संग में भाग लें या उनका प्रवचन सुनें। नहीं जा सकें तो ऑनलाइन सत्संग या पुरानी वाणी का श्रवण करें।
- दीक्षा या संकल्प ग्रहण: यदि आप किसी गुरु की शरण में जाना चाहते हैं, या कोई साधना प्रारंभ करना चाहते हैं, तो यह दिन विशेष रूप से शुभ होता है। गुरु पूर्णिमा को लिए गए संकल्प अत्यंत फलदायी सिद्ध होते हैं।
- अन्नदान, वस्त्रदान एवं सेवा कार्य: किसी ज़रूरतमंद को भोजन, वस्त्र, पुस्तकें या साधन देना- यह भी गुरु की कृपा पाने का माध्यम बन सकता है।
- गुरु वंदना एवं गुरु की कृपा की प्रार्थना: अपने हृदय से गुरु के प्रति प्रार्थना करें-"हे गुरुदेव! मेरे जीवन को सच्चे ज्ञान से आलोकित करें, मुझे सत्य, सेवा और साधना के पथ पर अग्रसर करें।"
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा क्यों कहा जाता है?
गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दिन को महर्षि वेदव्यास जी का जन्मदिन माना जाता है। वेदव्यास जी ने वेदों का वर्गीकरण किया, महाभारत, 18 पुराण और ब्रह्मसूत्र जैसी महान ग्रंथों की रचना की। इस कारण से गुरु पूर्णिमा के दिन उनकी भी पूजा और श्रद्धांजलि दी जाती है। इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
गुरु पूर्णिमा के दिन किस देवता की पूजा की जाती है?
गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु देव की पूजा की जाती है। हिंदू धर्म में गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ दर्जा प्राप्त है, इसलिए गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के समतुल्य माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से महर्षि वेदव्यास की भी पूजा की जाती है क्योंकि यह उनका जन्मदिन है। इसके अलावा, शिष्यों और साधकों द्वारा अपने आध्यात्मिक गुरु या जीवन के मार्गदर्शक गुरु की भी पूजा, सम्मान और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए यह पर्व मनाया जाता है।
एक विद्यार्थी के जीवन में गुरु क्यों महत्वपूर्ण होते हैं?
एक विद्यार्थी के जीवन में गुरु इसलिए महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि:
- ज्ञान का स्रोत होते हैं - गुरु विद्यार्थियों को पढ़ाई का सही मार्ग और ज्ञान प्रदान करते हैं जो उनके उज्जवल भविष्य की नींव बनता है।
- मार्गदर्शन करते हैं - वे न केवल शैक्षणिक विषय पढ़ाते हैं बल्कि जीवन के सही रास्ते भी दिखाते हैं, जिससे विद्यार्थी सही निर्णय ले पाता है।
- प्रेरणा और समर्थन देते हैं - गुरु विद्यार्थी को आगे बढ़ने और मुश्किलों का सामना करने के लिए प्रेरित करते हैं।
- संकल्प और अनुशासन सिखाते हैं - गुरु के अनुशासन से विद्यार्थी में सही आदतें और मेहनत की भावना विकसित होती है।
- आत्मविश्वास बढ़ाते हैं- गुरु की देखभाल और विश्वास से विद्यार्थी में आत्मबल और सकारात्मक सोच आती है।
इसलिए गुरु विद्यार्थी के जीवन का प्रकाश स्तंभ होते हैं जो उसके संपूर्ण विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।
क्या बुद्ध पूर्णिमा और गुरु पूर्णिमा एक ही हैं?
नहीं, बुद्ध पूर्णिमा और गुरु पूर्णिमा एक ही नहीं हैं, दोनों अलग-अलग पर्व हैं:
- बुद्ध पूर्णिमा: यह भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति और मोक्ष का दिन है। इसे वैशाख मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य बुद्ध के जीवन और उनकी शिक्षाओं का स्मरण करना है।
- गुरु पूर्णिमा: यह आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य अपने गुरुओं, चाहे वे आध्यात्मिक हों या अकादमिक का सम्मान और आभार प्रकट करना है। यह दिन महर्षि वेदव्यास की जयंती भी माना जाता है।
संक्षेप में, बुद्ध पूर्णिमा भगवान बुद्ध से संबंधित है, जबकि गुरु पूर्णिमा गुरु-शिष्य संबंध और ज्ञान की महत्ता को समर्पित है।
गुरु पूर्णिमा कैसे मनाई जाती है?
गुरु पूर्णिमा मनाने के प्रमुख तरीके इस प्रकार हैं:
- प्रातःकालीन स्नान और शुद्धता
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान किया जाता है।
- साफ-सुथरे, हल्के या पीले रंग के वस्त्र पहने जाते हैं।
- पूजा स्थल की तैयारी
- घर में किसी शांत और पवित्र स्थान पर गुरु की तस्वीर, मूर्ति या चरण पादुका स्थापित की जाती है।
- पूजा के लिए लाल या पीले कपड़े का आसन बिछाया जाता है।
- पूजा सामग्री एकत्रित करना
- फूल, अक्षत (चावल), चंदन, कुमकुम, दीपक, धूप, कपूर, मिठाई या फल, जल आदि एकत्रित किए जाते हैं।
- गुरु का आवाहन और श्रद्धा के साथ पूजा
- गुरु का ध्यान करके उन्हें आमंत्रित किया जाता है।
- गुरु के चरणों में जल अर्पित किया जाता है।
- दीपक और धूप प्रज्वलित करके गुरु की आरती की जाती है।
- गुरु मंत्र का जप किया जाता है, जैसे "ॐ गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः..."
- दान और सेवा
- इस दिन दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है, जैसे पीले वस्त्र, धार्मिक पुस्तकें, फल, मिठाई आदि जरूरतमंद को देना।
- गुरु की सेवा और उनके प्रति समर्पण भाव प्रकट करना।
- गुरु के प्रति आभार व्यक्त करना
- गुरु को धन्यवाद देते हुए उनकी शिक्षा को जीवन में अपनाने का संकल्प लेना।
- अन्य रीति-रिवाज
- कुछ लोग व्रत रखते हैं।
- मंदिरों या आश्रमों में प्रवचन, भजन-कीर्तन और सत्संग होते हैं।
- ध्यान और साधना की जाती है।
इस प्रकार गुरु पूर्णिमा श्रद्धा और भक्ति के साथ गुरु-शिष्य संबंध को मजबूत करने और ज्ञान के महत्व को समझने का पर्व है।
क्या गुरु पूर्णिमा पर उपवास किया जाता है?
हाँ, गुरु पूर्णिमा पर कई लोग उपवास रखते हैं। यह एक धार्मिक और आध्यात्मिक प्रथा है जिससे व्यक्ति अपने मन और शरीर को शुद्ध करता है और गुरु की कृपा पाने की इच्छा व्यक्त करता है।
गुरु पूर्णिमा का उपवास आमतौर पर ऐसा होता है:
- कुछ लोग पूरे दिन निर्जल (पानी भी नहीं पीते) उपवास रखते हैं।
- कई लोग फला हारी या फल और दूध से ही अपना उपवास रखते हैं।
- कुछ लोग हल्का भोजन करते हैं और पूरी श्रद्धा से गुरु की पूजा करते हैं।
उपवास का उद्देश्य होता है ध्यान और साधना को मजबूत करना, गुरु के प्रति सम्मान और भक्ति दिखाना, और आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ना।
लेकिन अगर शारीरिक स्वास्थ्य ठीक न हो तो उपवास न रखना ही बेहतर होता है। गुरु पूर्णिमा का महत्व उपवास में नहीं, बल्कि गुरु की श्रद्धा और आभार में है।
क्या भारत के बाहर भी गुरु पूर्णिमा मनाई जा सकती है?
हाँ, भारत के बाहर भी गुरु पूर्णिमा श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका और यूके जैसे देशों में रहने वाले भारतीय, बौद्ध समुदाय के लोग इस दिन अपने गुरुओं को याद करते हैं और पूजा-पाठ करते हैं। कई आध्यात्मिक संगठन भी इस अवसर पर भक्ति कार्यक्रम, सत्संग और प्रवचन का आयोजन करते हैं।
इन जगहों पर भारतीय और अन्य संस्कृति के लोग गुरु पूर्णिमा के पर्व को अपनी परंपराओं के अनुसार मनाते हैं। वहां भी गुरु-शिष्य संबंध का सम्मान किया जाता है, गुरु की पूजा होती है और उनकी शिक्षाओं को याद किया जाता है।
गुरु पूर्णिमा 2025 का संदेश क्या है?
गुरु पूर्णिमा 2025 का संदेश:
- ज्ञान का दीप जलाएं: गुरु पूर्णिमा का दिन ज्ञान के प्रकाश को अपनाने और अज्ञान के अंधकार को दूर करने का है। गुरु हमें जीवन के सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर हों: यह दिन आत्म-चिंतन, साधना और ध्यान के माध्यम से आत्मिक उन्नति की दिशा में कदम बढ़ाने का है।
- गुरु-शिष्य परंपरा का सम्मान करें: गुरु पूर्णिमा गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखने और उसे सम्मानित करने का अवसर प्रदान करती है।
- आभार व्यक्त करें: गुरु के प्रति आभार व्यक्त करके हम उनके योगदान को सम्मानित करते हैं और उनके आशीर्वाद से जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं।
गुरु पूर्णिमा 2025 का संदेश हमें जीवन में ज्ञान की महत्ता, गुरु के प्रति आस्था और आत्मिक उन्नति की दिशा में प्रेरित करता है। यह दिन हमें अपने जीवन में गुरु के योगदान को सम्मानित करने और उनके आशीर्वाद से जीवन को सफल बनाने का अवसर प्रदान करता है।
गुरु पूर्णिमा 2025 के दिन हमें क्या करना चाहिए?
गुरु पूर्णिमा 2025 के दिन हमें निम्नलिखित कार्य करने चाहिए ताकि यह पावन दिन सही मायनों में सफल और सार्थक बन सके:
- गुरु की पूजा और आभार व्यक्त करें: अपने गुरु, अध्यापक या जीवन में ज्ञान देने वाले किसी भी व्यक्ति की पूजा करें और उनका आभार मन से व्यक्त करें।
- गुरु के चरणों में प्रणाम करें: गुरु के चरणों में नमन करके उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करें।
- ध्यान और साधना करें: इस दिन आत्म-चिंतन करें, ध्यान लगाएं और अपने भीतर ज्ञान और शांति का अनुभव करें।
- ज्ञान प्राप्ति के लिए नये संकल्प लें: गुरु पूर्णिमा के अवसर पर पढ़ाई, सीखने और ज्ञान के लिए नए संकल्प लें।
- गुरु-शिष्य परंपरा का सम्मान करें: गुरु से मिली शिक्षा को दूसरों तक पहुंचाने का प्रयास करें और गुरु-शिष्य की परंपरा को जीवित रखें।
इस प्रकार गुरु पूर्णिमा 2025 पर ये कार्य करने से हम गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा और सम्मान व्यक्त कर सकते हैं और आत्मिक विकास की ओर बढ़ सकते हैं।

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