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गणेश चतुर्थी 2025

गणेश महोत्सव की विधिवत शुरुआत भगवान गणेश की मूर्ति की स्थापना से होती है, जिसे 'गणेश स्थापना' कहा जाता है। यह स्थापना भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर, जो गणेश जी के जन्मदिवस के रूप में प्रसिद्ध है, घर के स्वच्छ और शांत वातावरण में अथवा किसी सार्वजनिक पंडाल में संपन्न की जाती है। मूर्ति रखने का स्थान फूलों, रंगोली, दीपों और घंटियों से सजाया जाता है और मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा को लाल कपड़े से ढकी ऊँची चौकी पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके स्थापित किया जाता है, क्योंकि ये दिशाएँ शुभ मानी जाती हैं। मूर्ति स्थापना के बाद 'प्राण प्रतिष्ठा' नामक विशेष पूजा होती है, जिसमें पुजारी मंत्रोच्चार द्वारा भगवान गणेश से मूर्ति में वास करने की प्रार्थना करते हैं, जिससे साधारण मूर्ति को जीवंत स्वरूप मान लिया जाता है और भक्तगण पूजा-अर्चना कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास की प्रार्थना पर गणेश जी ने दस दिनों तक महाभारत लिखी थी और दसवें दिन उनका शरीर अधिक तापयुक्त होने पर उन्हें नदी में स्नान कराया गया था, तभी से दस दिवसीय गणेश उत्सव की परंपरा आरंभ हुई। गणेश पूजन में दूर्वा का भी विशेष महत्व है; इसकी जड़ें जैसे चारों दिशाओं में फैलती हैं, वैसे ही भक्तों की प्रार्थनाएँ प्रसारित होती हैं। दूर्वा अमृतजन्य मानी जाती है और इसे अर्पित करने से वंशवृद्धि तथा आत्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 'गणपति बप्पा मोरया' के जयकारों की परंपरा चिंचवाड़ गाँव से मानी जाती है, जहाँ संत मोरया गोसावी ने जीवनभर गणेश भक्ति की और उनके स्वप्न में भगवान गणेश ने नदी से मूर्ति प्राप्ति का संकेत दिया था, जो सच हुआ और इसके बाद ही 'मोरया' के जयकारों से गणेश उत्सव गुंजायमान रहने लगा। मूर्ति स्थापना से लेकर भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को गणेश विसर्जन तक यह पर्व श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्र अनुसार, मूर्ति लाने के लिए मंगलवार, बुधवार और शनिवार को वर्जित माना गया है, क्योंकि इससे वार दोष लग सकता है, परंतु यदि बुध ग्रह अस्त न हो और भद्रा काल न हो तो बुधवार को मूर्ति लाना उचित माना जाता है।

गणेश स्थापना की तिथि व समय

गणेश चतुर्थी तिथि और समय
  1. चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 26 अगस्त 2025, दोपहर 1:56 P.M से
  2. चतुर्थी तिथि समाप्त: 27 अगस्त 2025, शाम 3:46 P.M तक
  3. स्थापना का समय: 27 अगस्त 2025 को 5:36 A.M से 8:48 P.M तक और 10:23 A.M से 11:59 A.M तक

चंद्र दर्शन वर्जित काल

गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन से बचने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में चंद्रमा को देखने से कलंक या मिथ्या आरोप लगने की आशंका होती है। अतः भक्तों से अनुरोध किया जाता है कि वे इस अवधि में चंद्रमा को न देखें और संपूर्ण श्रद्धा एवं विधि-विधान से पूजन करें।

गणेश विसर्जन तिथि और शुभ मुहूर्त

भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को कुछ भक्त 5 या 7 दिन तक गणेश स्थापना करने का संकल्प लेते है, वो अपनी सामर्थ्य और संकल्प पूरा होने के बाद 5 या 7 दिन में गणेश जी का विसर्जन कर सकते है। ऐसे में स्थानीय पंचांग के अनुसार ही शुभ मुहूर्त देखकर विसर्जन करना उचित होता है। जो पूरे दस दिन तक गणेश की स्थापना करते है वे भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को गणेश जी का विसर्जन करते है।
  1. चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ: 6 सितमबर 2025 सुबह 3:15A.M से
  2. चतुर्दशी तिथि का समापन: 7 सितम्बर को रात में 1:42 A.M पर
  3. विसर्जन का मुहूर्त: सुबह 7:14 से 8:48 तक, 11:56 से 4:38 तक

गणेश महोत्सव के कुछ खास नियम जो आपको पता होने चाहिए

  1. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान गणेश जी की मूर्ति लाने का सबसे शुभ दिन रविवार, सोमवार, गुरुवार और शुक्रवार माना जाता है। माना जाता है कि मंगलवार, बुधवार और शनिवार को गणेश जी की मूर्ति घर लाना वर्जित होता है, क्योंकि इन दिनों में मूर्ति लाने से वार दोष लग सकता है। इसलिए भगवान गणेशजी की मूर्ति लाने के लिए उचित दिन का चयन करना बहुत महत्वपूर्ण होता है, ताकि घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहे।
  2. भगवान गणेश जी के कई नाम हैं और हर नाम का अपना विशेष अर्थ और महत्व होता है। इनके नामों को स्मरण करने से भक्तों को शक्ति, सफलता और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
    गणेश जी के 10 प्रमुख नाम और उनके अर्थ:
    • गणपति — गणों के स्वामी, सभी बाधाओं को दूर करने वाले।
    • विघ्नहर्ता — विघ्नों (अड़चनों) को नष्ट करने वाले।
    • गजमुख — हाथी के मुख वाले, अज्ञात शक्तियों के प्रतीक।
    • लंबोदर — बड़े पेट वाले, समृद्धि और ज्ञान के सूचक।
    • क्रतुण्ड — घुमावदार सूंड वाले, शक्ति और धैर्य के प्रतीक।
    • सिद्धिविनायक — सफलता देने वाले, इच्छाएँ पूरी करने वाले।
    • मंगलमूर्ति — मंगल और शुभता के देवता।
    • विध्नेश्वर — विघ्नों के स्वामी, हर कार्य में सफलता प्रदान करने वाले।
    • एकदंत — एक दाँत वाले, अपूर्णता में पूर्णता के प्रतीक।
    • श्रीगणेश — सम्पत्ति और समृद्धि के देवता, मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाले।
  3. बुधवार को सामान्यतः गणेश जी का दिन माना जाता है, लेकिन ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन मूर्ति लाना वर्जित माना गया है क्योंकि यदि बुध ग्रह अस्त हो, भद्रा काल हो या कोई अन्य अशुभ काल चल रहा हो, तो यह कार्य शुभ फल नहीं देता और वार दोष लग सकता है। इसलिए शास्त्रों के अनुसार, यदि बुध ग्रह अस्त न हो, भद्रा काल या कोई अन्य अशुभ मुहूर्त न हो, तो बुधवार को भगवान गणेश जी की मूर्ति घर लाना उचित माना जाता है।
  4. भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश का जन्म हुआ था, जिसे गणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि महर्षि वेदव्यास जी की प्रार्थना पर गणेश जी ने लगातार दस दिनों तक महाभारत की रचना लिखी थी। दसवें दिन उनके शरीर का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया, जिसे शीतल करने के लिए उन्हें नदी में स्नान कराया गया। तभी से गणेश उत्सव मनाने की यह परंपरा शुरू हुई, जो आज भी श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ पूरे दस दिनों तक मनाई जाती है।
  5. भगवान गणेश की सूंड का बाईं ओर मुड़ना विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इसलिए बायीं ओर सूंड वाले गणपति को घर लाने से पूजा और अनुष्ठान सही दिशा में और विधिवत संपन्न होते हैं। प्रदक्षिणा की प्रक्रिया को शास्त्रों के अनुसार सही ढंग से पूरा करने के लिए बायीं सूंड वाले गणपति को ही घर में स्थापित किया जाता है। यह घर में सुख, शांति और शुभता बनाए रखने में सहायक माना जाता है।
  6. दूर्वा का भगवान गणेश से गहरा जुड़ाव विशेष महत्व रखता है। दूर्वा की जड़ें चारों दिशाओं में फैलती हैं, जैसे हमारी प्रार्थनाएँ सभी दिशाओं में प्रसारित होती हैं। अमृत से उत्पन्न दूर्वा शुद्धता का प्रतीक मानी जाती है। प्राचीन ग्रंथों में बताया गया है कि गणेश जी को दूर्वा अर्पित करना वंशवृद्धि और आध्यात्मिक प्रगति की कामना को दर्शाता है, जिससे जीवन में शांति और समृद्धि आती है।
  7. गणपति बप्पा मोरया के जयकारों की परंपरा की शुरुआत चिंचवाड़ गांव से मानी जाती है, जहां संत मोरया गोसावी का जन्म हुआ था। कहा जाता है कि उनका जन्म भगवान गणेश के आशीर्वाद से ही हुआ था। मोरया गोसावी ने 117 वर्षों तक हर गणेश चतुर्थी पर मयूरेश्वर मंदिर तक पैदल यात्रा की। एक बार उम्र के कारण वह यात्रा करने में असमर्थ हो गए, तब भगवान गणेश ने उन्हें स्वप्न में नदी में मूर्ति मिलने का संकेत दिया। सपने के अनुसार उन्हें नदी में गणेश प्रतिमा मिली, जिसे चमत्कार माना गया। इसी घटना के बाद भक्तों ने उन्हें श्रद्धा से 'मोरया' कहना शुरू किया और तभी से 'गणपति बप्पा मोरया' का जयकारा प्रचलित हुआ, जो आज तक भक्तों के उत्साह और आस्था का प्रतीक है।

गणेश महोत्सव की पूजा विधि

षोडशोपचार पूजा भगवान गणेश की पारंपरिक पूजा है, जिसमें 16 चरणों में उन्हें घर आए खास मेहमान की तरह पूजा जाता है। इस पूजा का उद्देश्य भगवान का स्वागत करना और उन्हें आदरपूर्वक सेवा देना होता है।
गणेश स्थापना और पूजा में सबसे पहले भगवान गणेश के स्वरूप का ध्यान किया जाता है, फिर निवेदन कर उनसे मूर्ति में विराजमान होने का आह्वान किया जाता है। उन्हें बैठने के लिए साफ़ लाल कपड़ा आसन स्वरूप दिया जाता है। चरणों को जल से धोकर पाद्य और हाथ धोने के लिए अर्घ्य अर्पित किया जाता है। फिर आचमन कराकर जल पीने के लिए दिया जाता है और मूर्ति को जल या पंचामृत से स्नान कराया जाता है। इसके बाद उन्हें साफ़ वस्त्र और जनेऊ पहनाया जाता है, चंदन या सुगंधित लेप लगाकर गहनों से सजाया जाता है। फिर इत्र, फूल, धूप और दीपक अर्पित किए जाते हैं। अंत में भगवान को मोदक या मिठाइयों का नैवेद्य चढ़ाकर पूजा संपन्न की जाती है।

पूजा का समापन

पूजा के बाद समापन की प्रक्रिया में तांबूल अर्पण के रूप में भगवान को पान और सुपारी चढ़ाई जाती है। श्रद्धा पूर्वक दक्षिणा दी जाती है, फिर भक्ति भाव से भगवान की आरती की जाती है। इसके बाद मूर्ति की प्रदक्षिणा कर हाथ जोड़कर नमस्कार किया जाता है और अंत में पूजा में अनजाने में हुई किसी भी त्रुटि के लिए क्षमाप्रार्थना की जाती है। इसी के साथ पूजा विधि पूर्ण होती है।
पूजा में भगवान को ऐसे पूजा जाता है जैसे कोई मान्य अतिथि घर आया हो। हर चरण उनके स्वागत, सेवा और सम्मान से जुड़ा होता है। यह पूजा भक्त और भगवान के बीच एक गहरा भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध बनाती है।

गणेश महोत्सव मंत्र जप

गणेश विसर्जन भगवान गणेश को विदा करने का पवित्र और भावनात्मक अवसर होता है। इस दिन भक्तजन मंत्रों के माध्यम से उन्हें आदरपूर्वक विदाई देते हैं और अगले वर्ष उनके फिर से आगमन की कामना करते हैं।

ॐ यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनरपि पुनरागमनाय च॥"

हे समस्त देवगण! मेरी यह पूजा स्वीकार कर कृपया अपने लोक में पधारें और मेरी इच्छाओं की पूर्ति हेतु पुनः आगमन करें।

गणेश विसर्जन का महत्व

गणेश विसर्जन गणेश उत्सव का अंतिम और सबसे भावनात्मक हिस्सा होता है। यह भगवान गणेश को श्रद्धा और प्रेम के साथ विदा करने की परंपरा है, जो आमतौर पर गणेश चतुर्थी के 10वें दिन की जाती है।
  • गणेश विसर्जन से यह भावना जागती है कि हर वस्तु का एक निश्चित काल होता है।
  • यह हमें सिखाता है कि हर आरंभ का एक अंत भी होता है।
  • विसर्जन से भगवान गणेश को सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है और फिर अगले वर्ष आने का निवेदन किया जाता है।
  • इससे मन में त्याग और वैराग्य की भावना भी विकसित होती है।
  • विसर्जन परिवार और समाज में एकता, प्रेम और उल्लास को बढ़ाता है।
  • पर्यावरण के साथ जुड़ने और जल स्रोतों की महत्ता को समझने का अवसर मिलता है।
  • यह पर्व नए उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा के साथ जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

गणेश विसर्जन की विधि

गणेश विसर्जन से पहले घर या पंडाल में भगवान गणेश की अंतिम पूजा और भावपूर्ण आरती की जाती है, जिसमें परिवार और आस-पड़ोस के लोग शामिल होते हैं। इसके बाद मोदक, लड्डू और अन्य मिठाइयाँ प्रसाद के रूप में सभी को वितरित की जाती हैं। फिर भगवान की मूर्ति को सुंदर फूलों, हारों और कपड़ों से सजाया जाता है और पालकी या सजे हुए वाहन में रखकर जुलूस की तैयारी होती है। ढोल-ताशों, नृत्य और भजन-कीर्तन के साथ मूर्ति को नदी, तालाब या कृत्रिम जल स्रोत तक ले जाया जाता है, जहाँ नारियल, फूल और पूजा सामग्री अर्पित कर अंतिम अनुष्ठान किया जाता है। अंत में भक्तगण 'गणपति बप्पा मोरया, अगले वर्ष जल्दी आना' के जयकारों के साथ मूर्ति को श्रद्धापूर्वक जल में विसर्जित करते हैं।

गणेश महोत्सव के लाभ

आध्यात्मिक शांति
  • पूजा, आरती और ध्यान से मन को शांति मिलती है।
  • गणेश जी की भक्ति से आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • तनाव कम होता है और मन मजबूत होता है।
सामाजिक एकता
  • यह त्योहार लोगों को जोड़ता है।
  • लोकमान्य तिलक ने इसे सबको एक साथ लाने के लिए शुरू किया था।
  • आज भी यह भाईचारे और मेलजोल का प्रतीक है।
संकटों से मुक्ति
  • गणेश जी की पूजा से जीवन की रुकावटें दूर होती हैं।
  • भक्त अपने दुख और परेशानियों से राहत पाने की प्रार्थना करते हैं।
सकारात्मक ऊर्जा का वातावरण
  • भजन, कीर्तन और आरती से घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।
  • पूरा माहौल भक्तिमय और खुशहाल होता है।
संस्कृति और रीति-रिवाजों की रक्षा
  • यह पर्व हमारी संस्कृति को जीवित रखता है।
  • नई पीढ़ी को परंपराओं के बारे में सीखने का मौका मिलता है।
  • संस्कृति को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है।

FAQ

1. हम गणेश महोत्सव (विसर्जन) क्यों मनाते हैं?
  • भगवान गणेश को विद्या, बुद्धि और शुभ कार्यों की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है।
  • गणेश महोत्सव में गणेश जी को कुछ दिनों तक घर या पंडाल में विराजित करके पूजा की जाती है।
  • यह पर्व हमें सिखाता है कि हर चीज़ का एक निश्चित समय होता है और फिर उसे संसार में विलीन होना होता है।
  • विसर्जन का अर्थ है गणेश जी को आदरपूर्वक विदा करना और उन्हें उनके लोक में लौटाना।
  • इससे घर और समाज में सामूहिक प्रेम, एकता और श्रद्धा की भावना मजबूत होती है।
  • विसर्जन से यह संदेश भी मिलता है कि जीवन में कोई भी चीज़ स्थायी नहीं है।
  • विसर्जन के साथ हम उनसे अगले वर्ष फिर आने का निवेदन करते हैं — "गणपति बाप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।"

2. गणेश महोत्सव (विसर्जन) में क्या करना चाहिए?
विसर्जन के दिन कुछ जरूरी धार्मिक और भावनात्मक क्रियाएं की जाती हैं,
  • सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • गणेशजी की विधिवत पूजा करें।
  • घर का वातावरण भक्ति, संगीत और आनंद से भरें।
  • सभी परिजन मिलकर आरती करें।
  • भगवान से क्षमा याचना करें और अगले वर्ष पुनः आने का निमंत्रण दें – "गणपति बाप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।"
  • मूर्ति का सम्मानपूर्वक और पर्यावरण के अनुकूल विसर्जन करें।

3. गणेश महोत्सव (विसर्जन) घर पर कैसे करें?
  • भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन गणेश जी की सुंदर मूर्ति घर लाएँ।
  • घर के किसी स्वच्छ और शांत स्थान पर चौकी बिछाकर नया कपड़ा बिछाएँ और मूर्ति स्थापित करें।
  • मूर्ति के पास एक कलश रखें, उसमें जल भरकर आम के पत्ते और नारियल रखें।
  • पूजा के लिए रोली, अक्षत, दूर्वा, फूल, माला, मोदक या लड्डू, पान-सुपारी, अगरबत्ती, दीपक और घी की बाती तैयार रखें।
  • सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें और उन्हें दूर्वा, फूल चढ़ाएँ।
  • गणेश जी को मोदक या लड्डू का भोग लगाएँ।
  • धूप और दीप जलाकर गणेश जी के मंत्र या आरती का जप करें जैसे – "ॐ गण गणपतये नमः"।
  • रोज़ सुबह और शाम परिवार के साथ मिलकर आरती करें और घर में भजन, शंख या घंटी की मंगल ध्वनि बनाए रखें।
  • पूजा के बाद सभी को प्रसाद बाँटें और ध्यान रखें कि प्रसाद शुद्ध और ताज़ा हो।
  • 1 दिन, 3 दिन, 5 दिन, 7 दिन या 10 दिन तक पूजा करने के बाद विसर्जन करें।
  • विसर्जन से पहले गणेश जी की अंतिम आरती करें।

4. गणेश महोत्सव (विसर्जन) की पूजा कैसे करें?
  • गणपति विसर्जन से पहले अंतिम पूजा इस प्रकार करें:
  • श्री गणेश को दूर्वा, ताजे फूल और मोदक अर्पित करें।
  • गंध, अक्षत, दीपक और धूप से पूजा करें।
  • "गणपति अथर्वशीर्ष" या "गणेश स्तोत्र" का पाठ करें।
  • श्री गणेश की आरती पूरे परिवार के साथ मिलकर करें।
  • अंत में उनसे सुख, समृद्धि और विघ्नों के नाश की प्रार्थना करें।

5. गणेश महोत्सव (विसर्जन) के दिन क्या नहीं करना चाहिए?
  • विसर्जन के दिन कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें:
  • उदासी या रोना नहीं चाहिए; यह विदाई का लेकिन आशा और पुनर्मिलन का उत्सव है।
  • पूजन किए बिना या जल्दबाज़ी में मूर्ति का विसर्जन न करें।
  • विसर्जन स्थल को गंदा न करें, सफाई बनाए रखें।
  • तेज म्यूज़िक, नशा या अभद्र भाषा/व्यवहार से बचें।
  • पूजा को ध्यान, भक्ति और पूर्ण श्रद्धा से करें, न कि किसी औपचारिकता के रूप में।

6. गणेश महोत्सव (विसर्जन) के दिन क्या करना चाहिए?
  • इस शुभ दिन को सकारात्मक और यादगार बनाने के लिए:
  • शुभ मुहूर्त में पूजा और विसर्जन करें।
  • समाज और परिवार के साथ मिलकर सांस्कृतिक कार्यक्रम करें।
  • घर का वातावरण गणेश भजन, आरती और मंत्रों से भक्तिमय बनाएं।
  • पर्यावरण का ध्यान रखते हुए प्राकृतिक रूप से मूर्ति का विसर्जन करें।
  • प्रसाद और मिठाइयों को सभी में बांटें, ताकि आनंद और समर्पण दोनों महसूस हों।

7. गणेश महोत्सव व्रत के दौरान क्या खा सकते हैं?
  • फल
  • सूखे मेवे
  • दूध और दही
  • साबूदाना
  • सिंघाड़ा या कुट्टू आटा
  • आलू और शकरकंद
  • मखाना खीर या भुने मखाने
  • सेंधा नमक
  • नींबू पानी या नारियल पानी

8. गणेश महोत्सव व्रत के दौरान क्या नहीं खाना चाहिए?
  • सामान्य नमक
  • अनाज
  • तामसिक भोजन
  • उत्तेजक पेय पदार्थ
  • तला हुआ भोजन, भारी मिठाइयाँ

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