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देवशयनी एकादशी 2025

देवशयनी एकादशी सनातन धर्म का प्रमुख व्रत है, जो आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनाया जाता है। इसे देवशयनी एकादशी, शयनी एकादशी, पद्म एकादशी आदि नामों से भी जाना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु जी चार माह की योग-निद्रा में चले जाते हैं, इसलिए इसे विष्णु का दिव्य निद्रा-उत्सव भी कहा जाता है।

देवशयनी एकादशी 2025 की तिथि और समय

  • तिथि: 6 जुलाई 2025
  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 5 जुलाई 2025 को शाम 7:00 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त: रविवार, 6 जुलाई 2025 को रात 9:16 बजे

देवशयनी एकादशी कथा

देवशयनी एकादशी की पौराणिक कथा पद्म पुराण आदि ग्रंथों में वर्णित है। कथा के अनुसार अतीत में सूर्यवंशी राजा मंधाता के राज्य में तीन वर्षों तक भीषण सूखा पड़ा था। प्रजा भूख-प्यास से त्रस्त हो गई। तब राजा ने तपस्वी ऋषि अंगिरा से परामर्श किया। अंगिरा मुनि ने बताया कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवशयनी एकादशी) का व्रत रखने से वर्षा होगी और राज्य पुनः समृद्ध होगा। राजा मंधाता ने अपने प्रजापालकों के साथ देवशयनी एकादशी का विधिवत् व्रत किया। आषाढ़ शुक्ल एकादशी के उपवास से तत्काल राज्य में वर्षा होने लगी और पहले जैसी खुशहाली लौट आई। इस प्रकार इस व्रत को सभी दुखों और पापों को नष्ट करने वाला माना गया है। इसलिए भक्तगण आज भी इस दिन नियमपूर्वक उपवास कर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं।

देवशयनी एकादशी 2025: व्रत विधि

देवशयनी एकादशी का व्रत एवं पूजा-सम्बंधी विधि:
  • दशमी की रात्रि (5 जुलाई): व्रत की तैयारी दशमी तिथि की रात्रि से ही शुरू हो जाती है। उस रात के भोजन में नमक और अनाज का त्याग करें। भोजन हल्का (फलाहारी) रखें और रात में सोने से पूर्व संकल्प लें कि आप सुबह व्रत करेंगे।
  • एकादशी की सुबह (6 जुलाई): सूर्योदय से पहले स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध एवं सफेद वस्त्र पहनें। पूजा-स्थल की स्वच्छता कर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र को आसन पर स्थापित करें।
  • पूजा-अर्चना: स्थापित मूर्ति को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान करवाएं। तत्पश्चात गंगाजल या शीतल जल से आचमन कर धूप-दीप और पुष्पार्चन करें। तुलसी, कंदमूल, शंख आदि अर्पित करें और भगवान के समक्ष फल, मेवे, मिठाई आदि नैवेद्य रखें। पूजा समाप्ति पर विष्णुजी के मंत्रों का जप करके उनकी स्तुति करें।
  • उपासना: दिनभर भगवान विष्णु की ही भक्ति और ध्यान में लीन रहें। गीता, विष्णु सहस्रनाम आदि का पाठ या विष्णु-चालीसा का पठन करें और हरि-भजन, कीर्तन में समय व्यतीत करें। दिनभर अहिंसा, सत्य, सात्विक व्रत नियमों का पालन करें।
  • रात्रि जागरण: रात्रि जागरण रखें और पूरी रात भगवान की कथा सुनने, मंत्र-जप या भजन-कीर्तन में बिताएं। यह जागरण भगवान को प्रसन्न करता है।
  • द्वादशी की प्रात (7 जुलाई): उपवास खोलने से पूर्व ब्राह्मणों को जल, फलादि दान देकर उनका आशीर्वाद लें। फिर 'ॐ पुण्डरीकाक्ष जगत्पते… अब अहर्निशं नमामि तुम्हें', यह मन्त्र बोलकर विष्णु जी से प्रार्थना करके भोजन ग्रहण करें।

देवशयनी एकादशी 2025: व्रत के प्रमुख लाभ

  • इस व्रत से जीवन में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  • जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं और सौभाग्य में वृद्धि होती है।
  • केवल व्रत की कथा सुनने या पढ़ने से भी पापों का नाश होता है।
  • श्रद्धा और नियमपूर्वक उपवास करने से आनंद, समृद्धि और भगवान का आश्रय प्राप्त होता है।
  • दान-पुण्य, विशेषकर भूखे-प्यासों की सेवा और ब्राह्मण-गाय को दान देने से अपार पुण्य मिलता है।
  • इस दिन परोपकार करने वालों पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है।
  • ब्राह्मण-दर्शन और उन्हें भोजन कराने से भी विशेष फल की प्राप्ति होती है।
  • पतिव्रता स्त्रियाँ इस दिन व्रत करके मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं और उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

देवशयनी एकादशी 2025: पूजा विधि

  • सुबह स्नान करके पूजा-स्थान को स्वच्छ करें।
  • लाल या पीले वस्त्र का आसन बिछाकर भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  • पंचामृत से अभिषेक करें और गंगाजल से आचमन कराएं।
  • चरणामृत का छिड़काव करें।
  • भगवान विष्णु को गंध, फूल, धूप-दीप और नैवेद्य (फल-मिठाई) अर्पित करें।
  • तुलसी पत्तियाँ मंत्रोच्चारण के साथ अर्पित करें।
  • 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जप करें।
  • अंत में भगवान को भोग लगाएं।
  • घर में विष्णु स्तोत्र, भजन-कीर्तन करें।
  • शाम को लक्ष्मी पूजन या हवन करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

देवशयनी एकादशी 2025: मंत्र जप

  • इस दिन विष्णु मंत्रों का जप शुभ और पुण्यकारी होता है।
  • प्रमुख मंत्र: "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"
  • अन्य मंत्र: "शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशि वर्णं चतुर्भुजम्…"
  • तुलसी माला से हरे राम-हरे कृष्ण मंत्र का 108 बार जप करें।
  • विष्णु सहस्रनाम और विष्णु स्तोत्रों का पाठ करें।
  • मंत्र जप करते समय मन शांत रखें और श्रद्धा से आराधना करें।
  • साधु-संतों का स्मरण भी विशेष फलदायी माना जाता है।

देवशयनी एकादशी के महत्व

  • भगवान विष्णु का शयनकाल: इस दिन से भगवान विष्णु अगले चार मास (चातुर्मास) के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान वे पाताल लोक में राजा बलि के यहां निवास करते हैं, जैसा कि उन्होंने वामन अवतार के समय वचन दिया था। इस अवधि में सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं।
  • पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति: शास्त्रों के अनुसार, देवशयनी एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक रखने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत न केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति कराता है, बल्कि जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाकर मोक्ष की ओर अग्रसर करता है।
  • समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति: जो भक्त सच्चे मन से इस दिन भगवान विष्णु की आराधना करते हैं और व्रत रखते हैं, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह संतान प्राप्ति, धन-धान्य और पारिवारिक सुख के लिए विशेष फलदायी माना जाता है।
  • सभी एकादशियों में श्रेष्ठ: इसे वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक माना जाता है, क्योंकि यह चातुर्मास की शुरुआत का प्रतीक है।

चातुर्मास का आरंभ और इसका सांस्कृतिक महत्व

देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास का आरंभ होता है। यह चार मास की अवधि (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक) आध्यात्मिक साधना और तपस्या के लिए विशेष मानी जाती है।
  • मांगलिक कार्यों पर विराम: चातुर्मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे सभी शुभ और मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस अवधि में भगवान विष्णु के शयन करने के कारण इन कार्यों के लिए पर्याप्त दिव्य ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती।
  • तपस्या और साधना का काल: यह अवधि साधु-संतों और गृहस्थों दोनों के लिए आत्म-चिंतन, जप, तप, ध्यान, और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए समर्पित होती है। इस दौरान अधिक से अधिक समय भगवान की भक्ति में लीन रहने का विधान है।
  • स्वास्थ्य और स्वच्छता: वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से भी चातुर्मास का महत्व है। वर्षा ऋतु के कारण इस समय आहार-विहार में संयम रखने, सात्विक भोजन ग्रहण करने और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी जाती है। धार्मिक नियमों का पालन अप्रत्यक्ष रूप से इन बातों को सुनिश्चित करता है।

FAQ

1. देवशयनी एकादशी क्यों मनाई जाती है? देवशयनी एकादशी भगवान विष्णु के चातुर्मास-आरंभ का दिन है। इस दिन भगवान विष्णु चार माह की योग-निद्रा में चले जाते हैं। इसलिए श्रद्धालु भक्त इस व्रत को रखते हैं, जिससे विष्णुजी की अनुपस्थिति में भी उनकी कृपा बनी रहे और समस्त बाधाएँ दूर हों।

2. देवशयनी एकादशी पर क्या करें?
  • पूरे दिन उपवास रखें (फलाहार या केवल जल ग्रहण करें)।
  • भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना पूरे मन से करें।
  • व्रत में सच्चाई और संयम का पालन करें।
  • तुलसी का दान करें, यह शुभ माना जाता है।
  • जरूरतमंदों को अन्न-दान करके परोपकार करें।
  • सुबह विष्णु स्तोत्र सुनें और दोपहर में भजन-कीर्तन करें।
  • शाम को ब्राह्मण को भोजन या दान दें।
  • इस दिन गाय का दान करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

3. घर पर देवशयनी एकादशी की पूजा कैसे करें?
  • सुबह स्नान करके पूजा स्थान को अच्छी तरह स्वच्छ करें।
  • भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर को लाल या पीले आसन पर स्थापित करें।
  • पंचामृत से भगवान का स्नान कराएं (अभिषेक करें)।
  • दुर्वा, फूल, फल, तुलसी पत्तियाँ अर्पित करें और षोडशोपचार पूजन करें।
  • मिट्टी के दीए में घी भरकर दीपक जलाएं।
  • शाम को दीप-आरती करें और विष्णु मंत्रों का जप करें।
  • पूजा के अंत में भगवान को भोग अर्पित करें और श्रद्धा से स्मरण करें।

4. देवशयनी एकादशी पर कैसे आराधना करें?
  • विष्णु सहस्रनाम, विष्णु चालीसा और पुराण कथाओं का पाठ करें।
  • महाभारत या अन्य धर्मग्रंथों से भगवान विष्णु से संबंधित प्रसंग पढ़ें।
  • "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जप करें।
  • तुलसी की माला से हरे कृष्ण-हरे राम मंत्र का जप करें।
  • हरि-कीर्तन और भजन-पूजन में समय बिताएं।
  • यह आराधना भगवान विष्णु को प्रसन्न करती है और भक्त को मन की शांति देती है।

5. देवशयनी एकादशी पर क्या नहीं करना चाहिए?
  • अनाज, दालें, तिलहन, मांस और मछली का सेवन न करें।
  • दशमी की रात के भोजन में नमक का त्याग करें।
  • क्रोध, छल, कपट और कटु व्यवहार से बचें।
  • मद्यपान और अन्य नशे की चीज़ों से दूर रहें।
  • गर्भनिरोध और नरकर्म (अशुभ कार्यों) से परहेज करें।
  • भोग-विलास से जुड़ी गतिविधियाँ ब्रह्म मुहूर्त से पहले समाप्त कर लें।

6. व्रत के दौरान क्या खाया जाए और क्या नहीं?
  • इस दिन अनाज, दालें, तिल और तैलीय चीजें, मांस-मछली का सेवन न करें।
  • दशमी की रात के भोजन में नमक नहीं लेना चाहिए।
  • क्रोध, झूठ, छल और कुटिल व्यवहार से दूर रहें।
  • मद्यपान और अन्य नशे से बचें।
  • गर्भनिरोधक या कोई भी अशुभ कर्म न करें।
  • भोग-विलास से जुड़ी सभी गतिविधियाँ ब्रह्म मुहूर्त से पहले समाप्त कर लें।

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