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विनायक चतुर्थी कब है? तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व और लाभ जानें
लेखक: रुचि

विनायक चतुर्थी कब है? तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व और लाभ जानें

विनायक चतुर्थी 2026 में कब है और इसका महत्व क्या है?

विनायक चतुर्थी भगवान श्री गणेश को समर्पित एक अत्यंत शुभ व्रत है, जो प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।

यह दिन गणेश जी की पूजा के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि वे विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देवता हैं।

हर महीने में दो चतुर्थी तिथियां पड़ती हैं — एक कृष्ण पक्ष में और दूसरी शुक्ल पक्ष में।

पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को “संकष्टी चतुर्थी” कहा जाता है, जबकि अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी “विनायक चतुर्थी” के नाम से जानी जाती है।

संकष्टी चतुर्थी चतुर्थी के बारे में जानने के लिए हमारा लेख: - संकष्टी चतुर्थी कब है?

2026 में अक्टूबर माह की विनायक चतुर्थी 14 अक्टूबर (बुधवार) को पड़ेगी, जबकि नवंबर माह में यह 13 नवंबर (शुक्रवार) को मनाई जाएगी।

धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधिपूर्वक भगवान गणेश की पूजा करने से जीवन के विघ्न, बाधाएं और कष्ट दूर होते हैं तथा सुख, समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है।

पूरे वर्ष 2026 की सभी विनायक चतुर्थी तिथियां और पंचांग अनुसार जानकारी जानने के लिए: - हमारा विस्तृत पंचांग अवश्य देखें।   

विनायक चतुर्थी का महत्व और परिचय

वर्ष के प्रत्येक महीने में दो चतुर्थी तिथि पड़ती है। प्रत्येक महीने में अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी मनाई जाती है।

इस प्रकार विनायक चतुर्थी प्रत्येक माह में आती है परंतु मुख्य विनायक चतुर्थी जिसे गणेश चतुर्थी के रूप में मानते है, भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ती है क्योंकि यह वह शुभ तिथि है जिस पर गणेश जी का जन्म हुआ था।

वहीं माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश जयंती के रूप में मानते हैं। श्री गणेश जी सिद्धि विनायक है। उनके रूप अनेक हैं पर हाथी के मस्तक वाला रूप जिसमे उनके एक दाँत है, कान सूप के समान सुंदर है, हाथों में पाश और अंकुश धारण कर रखा है।

जो स्त्री-पुरुष इस रूप की सच्ची भावना से पूजा अथवा व्रत करता है वह मनुष्य जिस भी धर्म संगत फल की कामना करता है उसे वह सब प्राप्त हो जाता है। भगवान शिव जी ने स्वयं शिवपुराण में कहा है कि गणेश भगवान प्रथम पूजनीय है।

ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी ने कहा- जो मनुष्य गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम न करके पहले हमारी करेगा तो उसे उस पूजा का कोई फल नहीं प्राप्त होगा।

गणेश जी के जन्म की कथा 

गणेश पुराण के अनुसार शौनक जी ने जब गणेश जी का चरित्र पूछा तब सूत जी ने उनका वर्णन करते हुए कहा- माता पार्वती जी की दो सखियाँ थी। जया और विजया। वे दोनों अत्यंत ही सुंदर, रूपवती, विवेकमयी, गुणवती और मधुभाषी थी। माता पार्वती उनका बहुत आदर करती थी।

एक दिन उन सखियों ने माता पार्वती जी से निवेदन करते हुए कहा- सखी! अपना कोई गण नहीं है, इसलिए अपना एक निजी गण तो अवश्य ही होना चाहिए।

सखियों के इस प्रकार कहने पर माता पार्वती ने आश्चर्यपूर्वक कहा- ये क्या कह रही हो सखि! हमारे पास करोड़ों गण है, जो शीघ्र ही आज्ञा का पालन करने में तत्पर रहते है। फिर किसी अन्य गण की क्या जरूरत है?

सखियों ने कहा- सभी गण शिव भगवान के है। वे उन्ही की आज्ञा को प्रमुख मानते है। नंदी, भृंगी आदि गण जो हमारे कहलाते है, वे भी भगवान की आज्ञा को ही सर्वोपरि मानते है। यदि आप कोई आदेश दें और शिव भगवान उस आदेश की अवहेलना करे तो आपके आदेश को कोई भी गण नहीं मानेगा। आप पूछेंगी तो अवश्य ही कोई न कोई टाल मटोल बता दिया जाएगा।

पार्वती जी ने थोड़ा विचार किया और फिर कहा- ‘ये जो प्रथमगण है क्या इनमे से भी कोई मेरी आज्ञा की अवहेलना कर सकता है?

सखियाँ पार्वती जी को समझाते हुए बोली-‘ प्रथमगण में तो कोई भी हमारा नहीं है, वे सभी भगवान महादेव जी के सैनिक है। शिव जी की आज्ञा से ही वे हमारी रक्षा करने और सभी कार्यों के प्रति देख-रेख के लिए ही नियुक्त है इसलिए कृपा करके अपने लिए एक निजी गण का निर्माण अवश्य कीजिए।

माता पार्वती ने अपनी सखियों की सलाह को स्वीकार तो कर लिया, किन्तु इस सुझाव को कार्यरूप में अभी सम्पन्न नहीं किया था। वह बात वहीं दब गई, और दिन बीतने के साथ-साथ, वह इस बात को धीरे-धीरे भूल गई।

एक दिन प्रातःकाल के समय, माता पार्वती स्नानकक्ष में स्नान के लिए जा रही थी। उन्होंने नंदी को आदेश दिया, "अगर कोई आए, तो रोक देना।" और फिर वे अंदर चली गईं। तभी भगवान शंकर कहीं से आकर भीतर प्रवेश करने लगे। नंदीश्वर ने उन्हें रोकते हुए प्रार्थना की, "माता जी स्नान कर रही हैं, इसलिए यही ठहरने की कृपा करें।

इस पर शिव जी ने कहा- अरे करने दो स्नान। मुझे अत्यंत आवश्यक कार्य है। इस प्रकार नंदी के वचनों की अवहेलना करके शिव जी सीधे स्नानकक्ष में जा पहुँचे।

भगवान शिव जी के अचानक आगमन पर, स्नान करती हुयी जगत जननी लज्जावश अत्यंत सिमट गयी। शिव जी भी बिना कुछ कहे चुपचाप चले गए। फिर, स्नान करने के बाद, पार्वती वस्त्र पहनती हुई सोचने लगी कि जया और विजया का सुझाव सही था।

मैंने व्यर्थ ही उसकी बात को अनसुना किया। यदि द्वार पर मेरा कोई निजी गण उपस्थित होता तो शिव जी को स्नानकक्ष में आसानी से नहीं आने देता।

नंदी ने मेरी आज्ञा का निरादर किया। अब ऐसा प्रतीत होता है कि समस्त गणों पर मेरा पूरा अधिकार नहीं है इसलिए एक ऐसा गण होना चाहिए जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो जो मेरी आज्ञा की कभी उपेक्षा न करे, मेरा अपना हो। जो शिव जी के गण है वो शिव जी की आज्ञा होने पर ही मेरी आज्ञा मानते है लेकिन मेरा निजी गण मेरी आज्ञा से ही उनकी आज्ञा मानेगा।

मन ही मन ऐसा चिंतन कर उन्होंने अपने अत्यंत पवित्र देह का मैल उतारा और उससे एक चेतन पुरुष का निर्माण कर डाला। जो सभी शुभ लक्षणों से भलीभाँति युक्त था। वह सभी पहलुओं में दोषरहित था, आदर्शणीय सौन्दर्य से युक्त था, उसका रूप अद्वितीय और चमकदार था, वह अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी था।

माता पार्वती ने उसे अनेक प्रकार के वस्त्र, कई प्रकार के आभूषण और बहुत-सा उत्तम आशीर्वाद देकर कहा – 'तुम मेरे पुत्र हो। मेरे अपने ही हो। तुम्हारे समान प्यारा मेरा यहाँ कोई दूसरा नहीं है।' पार्वती के ऐसा कहने पर वह बालक उन्हें नमस्कार करके बोला।

गणेश ने कहा- 'माता! आज आपको कौन-सा कार्य आ पड़ा है? मैं आपकी आज्ञा के अनुसार उसे पूर्ण करूँगा। गणेश के ऐसा पूछने पर पार्वती जी अपने पुत्र को उत्तर देते हुए बोलीं।

पार्वती जी ने कहा-तात! तुम मेरे पुत्र हो, मेरे अपने हो। इसलिये तुम मेरी बात सुनो। आज से तुम मेरे द्वारपाल बन जाओ। सुपुत्र! मेरे आदेश के बिना कोई भी मेरे महल के भीतर प्रवेश न करने पाये, चाहे वह कहीं से भी आये, कोई भी हो।

ऐसा कहकर पार्वती ने गणेश के हाथ में एक बहुत मज़बूत छड़ी दे दी। उस समय उनके सुन्दर रूप को देख कर पार्वती आनंद से भर गयी। उन्होंने परम स्नेहपूर्वक अपने पुत्र का मुख चूमा और छाती से लगा लिया। इसके बाद पार्वती जी ने छड़ी से युक्त गणेश को द्वार पर स्थापित कर दिया। फिर पार्वती नन्दन महावीर गणेश माता पार्वती की आज्ञा के अनुसार हाथ में छड़ी लेकर गृह-द्वार पर पहरा देने लगे।

उधर पार्वती अपने पुत्र गणेश को अपने दरवाजे पर नियुक्त करके स्वयं सखियों के साथ स्नान करने लगीं। इसी समय भगवान शिव, जो परम लीलामय तथा कई प्रकार की लीलाएँ रचने में कुशल हैं, द्वार पर आ पहुँचे।

गणेश, शिव जी को पहचानते तो थे नहीं, अतः बोल उठे- 'देव! माता की आज्ञा के बिना आप अभी भीतर नहीं जा सकते। माता स्नान करने बैठ गयी हैं। ऐसा कहकर गणेश ने उन्हें रोकने के लिये छड़ी हाथ में ले ली। उन्हें ऐसा करते देख शिवजी बोले- 'मूर्ख! तू किसे रोक रहा है ? क्या तू मुझे नहीं जानता? मैं शिव ही हूँ और कोई नहीं।

फिर महादेव के गण उसे समझाकर हटाने के लिये वहाँ आये और गणेश से बोले- सुनो, हम मुख्य शिवगण ही द्वारपाल हैं और सर्वव्यापक भगवान शंकर के आदेश से तुम्हें हटाने के लिए यहाँ आये हैं। तुम्हें भी गण समझकर हम लोगों ने मारा नहीं है, अन्यथा तुम कब के मारे गये होते। अब चतुराई इसी में है कि तुम स्वयं ही दूर हट जाओ।

क्यों फ़ालतू अपनी मृत्यु को बुलावा दे रहे हो? ऐसा कहने पर भी गणेश जी बिना डरे वहीं खड़े रहे। उन्होंने शिवगणों को फटकारा और दरवाजे को नहीं छोड़ा। तब उन सभी शिवगणों ने शिवजी के पास जाकर सारा हाल उन्हें सुनाया। उनसे सब बातें सुनकर संसार के गति स्वरूप अद्भुत लीला विहारी महादेव अपने उन गणों को डाँट, फटकार कर कहने लगे।

महेश्वर ने कहा- 'गणो! यह कौन है? जो इतना स्वेच्छाचारी होकर वैरी की भाँति बक रहा है? इस नये द्वारपाल को दूर भगा दो। तुम लोग कायर की तरह खड़े होकर उसका समाचार मुझे क्यों सुना रहे हो।' विचित्र लीला रचने वाले भगवान शंकर के ऐसा कहने पर वे गण दोबारा वहीं लौट आये।

तत्पश्चात गणेश द्वारा दोबारा रोके जाने पर शिवजी ने गणों को आदेश दिया कि 'तुम पता लगाओ, यह कौन है और क्यों ऐसा कर रहा है ?' गणों ने पता लगाकर बताया कि 'ये श्री पार्वती माता के पुत्र हैं तथा द्वारपाल के रूप में बैठे हैं।' तब लीलारूप शंकर ने अनोखी लीला करनी चाही तथा अपने गणों का गर्व भी गलित करना चाहा।

इसलिये गणों को तथा देवताओं को बुलाकर गणेश जी से भयंकर युद्ध करवाया। पर वे कोई भी गणेश को हरा न सके। तब स्वयं हाथ में शूल धारण करने वाले महेश्वर आये। गणेश जी ने माता के चरणों का स्मरण किया, तब शक्ति ने उन्हें बल प्रदान कर दिया। सभी देवता शिवजी के पक्ष में आ गये, भीषण युद्ध हुआ। अंत में स्वयं महादेव जी ने आकर त्रिशूल से गणेश जी का सिर‍ काट दिया।

जब यह संदेश माता पार्वती जी को मिला, तब वे गुस्से से भर आयीं और बहुत-सी शक्तियों को प्रकट करके उन्होंने बिना कुछ सोचे समझे उन्हें प्रलय करने का आदेश दे दिया। फिर शक्तियों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया। उन शक्तियों का वह प्रज्वलित प्रकाश सभी दिशाओं को प्रज्वलित कर देता है। उसे देखकर सभी शिव भक्त डर गये और भागकर दूर खड़े हो गये।

उसी समय देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे। नारद जी के वहाँ पहुँचने से देवता बहुत प्रसन्न हुए। तब नारद जी ने ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं सहित शंकर जी को प्रणाम किया और कहा कि इस विषय पर सभी को मिलकर विचार करना चाहिए। तब वे सभी देवता नारद जी से परामर्श करने लगे कि इस दुःख को किस प्रकार कम किया जा सकता है। उन्होंने निश्चय किया कि जब तक माता पार्वती उन पर कृपा नहीं करेंगी, उन्हें सुख प्राप्त नहीं हो सकेगा।

अब इस मामले में आगे सोचना बेकार है। ऐसा विश्वास लेकर नारद सहित सभी देवता और ऋषि-मुनि माता के क्रोध को शांत करने के लिए उनके पास गए और उन्हें प्रसन्न करने लगे। उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें प्रसन्न करते हुए अनेक स्तोत्रों से उनकी स्तुति की और बार-बार उनके चरणों में नमस्कार किया।

देवर्षियों ने कहा- जगदम्बे ! तुम्हें नमस्कार है। शिवपलि! तुम्हें प्रणाम है। चण्डिके ! तुम्हें हमारा अभिवादन प्राप्त हो। कल्याणि ! तुम्हें बारंबार प्रणाम है। अम्बे! तुम्हीं आदि- शक्ति हो। आप पुण्य जगत की रचयिता, पालनकर्ता और संहारक हैं। देवी! आपका क्रोध समस्त संसार को व्याकुल कर रहा है इसलिए अब प्रसन्न होकर क्रोध को शांत करें। देवी! हम आपके चरणों में सिर झुकाते हैं।

सभी देवर्षि ऐसा कहकर अत्यन्त नम्रता पूर्वक, बेचैन हो हाथ जोड़कर चण्डिका के सामने खड़े हो गये। उनकी ऐसी बात सुनकर चंडिका (पार्वती) प्रसन्न हो गयी। उनके हृदय में करुणा भर गई। तब उन्होंने ऋषियों से कहा, हे ऋषियों! यदि मेरा पुत्र जीवित हो जाये और वह आपके बीच पूज्यनीय समझा जाये तो संहार नहीं होगा।

संसार में शांति तभी हो सकती है जब आप सब मिलकर उसे ‘सर्वाध्यक्ष' का पद देंगे, अन्यथा आपको सुख नहीं मिल सकता।

पार्वती की यह बात सुनकर सभी ऋषि-मुनि उन देवताओं के पास आये और सारा समाचार सुनाया। यह सुनकर इंद्र आदि सभी देवताओं के चेहरे पर उदासी छा गई। वे शंकरजी के पास गए, हाथ जोड़कर उनके चरणों में प्रणाम किया और सारा समाचार निवेदित किया। देवताओं की बात सुनकर भगवान शिव ने कहा- 'ठीक है, हमें भी ऐसा ही करना चाहिए, जिससे सभी लोकों को सुख मिले।

ऐसा कहकर शिव जी ने देवताओं को आज्ञा दी कि आप लोगों को अब उत्तर दिशा की ओर जाना चाहिए और जो प्राणी सबसे पहले मिले उसका सिर काटकर इस बालक के धड़ से जोड़ देना चाहिए।

इसके बाद भगवान शिव की आज्ञा का पालन करने वाले देवताओं ने सारा काम पूरा कर दिया। उन्होंने बालक के शरीर को धोया-पोंछा और उसकी विधिवत पूजा की। फिर वे उत्तर की ओर चले गये। वहाँ उन्हें सबसे पहले एक हाथी मिला। वे उसका सिर ले आये और उस बालक के धड़ से जोड़ दिया।

हाथी के उस सिर को जोड़ने के बाद सभी देवताओं ने भगवान शिव को प्रणाम किया और कहा कि हमने अपना काम पूरा कर लिया है।

अब जो कुछ करना बाकी है, उसे आप लोग पूरा करे। तब शिव के पालन के विषय में देवताओं से ऐसे वचन सुनकर सभी देवताओं और पार्षदों को बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवताओं ने अपने स्वामी भगवान शंकर को निराकार रूप में प्रणाम करके कहा- 'स्वामिन्! जिस महात्मा की कोख से हम सब पैदा हुए हैं वही तेज इस बालक में वेद मंत्र के उच्चारण के साथ प्रविष्ट हो।

इस प्रकार सभी देवताओं ने मिलकर वेद मंत्रों से जल को अभिमंत्रित किया, फिर भगवान शिव का स्मरण कर उस शुद्ध जल को बालक के शरीर पर छिड़क दिया। जैसे ही जल उस बालक को छुआ, वह स्वेच्छा से सचेत हो गया और जीवित होकर ऐसे उठ बैठा जैसे सो रहा हो। वह भाग्यशाली बालक बहुत सुन्दर था। उनका मुख हाथी के समान है। शरीर का रंग हरा-लाल था। उसके चेहरे पर ख़ुशी खेल रही थी। उसकी आकृति बहुत खूबसूरत थी और उसकी सुंदरता की चमक फैल रही थी। उस बालक को जीवित देखकर वहां उपस्थित सभी लोग हर्षित हो गये और सभी का सारा दुःख दूर हो गया।

तब सभी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बालक को पार्वती जी को दिखाया। अपने पुत्र को जीवित देखकर पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न हुईं। इस प्रकार गणेश जी का प्राकट्य हुआ। जो श्री गणेश जी के इस चरित्र को सुनता है या पढ़ता है श्री गणेश उसके शुभ कार्यों में आने वाले विघ्नों को हर लेते है तथा श्रोता और वक्ता दोनों को ही अपने कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

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विनायक चतुर्थी की पूजा विधि

प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी आए तो सुबह स्नान करके विप्र अथवा पात्र को व्रत करने का संकल्प करना चाहिए।

यदि संभव हो सके तो धातु, मूंगा या सफेद मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसका अभिषेक करना चाहिए नहीं तो घर पर ही प्रतिदिन पूजा की जाने वाली मूर्ति का ही विभिन्न प्रकार के दिव्य गंधों, मोदक, चंदन और फूलों से भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिए।

इसके बाद धूप, दीप, नाना प्रकार के नैवेद्य, ताम्बूल, अर्घ्य तथा अन्य उत्तम द्रव्यों से गणेश जी की पूजा करें और उनकी स्तुति करके अपनी कामना के लिए प्रार्थना करें।

इस प्रकार गणेश जी का पूजन करके पूर्ण श्रद्धा भाव से अनाथ लोगों को दान करने से व्यक्ति की सम्पूर्ण मनोकामनाए पूर्ण होती हैं।

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विनायक चतुर्थी व्रत का महत्त्व

इस प्रकार जो इस व्रत को पूर्ण करता है,उसे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। जो श्रद्धासहित अपनी शक्ति के अनुसार नित्य गणेश जी की पूजा करता है उसके सभी मनोरथ सफल होते है। मनुष्यों को सिंदूर, चन्दन, चावल, केतकी पुष्प आदि अनेको उपचारो द्वारा गणेश्वर का पूजन करना चाहिए। इस प्रकार नाना प्रकार के उपचारो से भक्तिपूर्वक जो मनुष्य पूजा करता है उसके विघ्नो का सदा के लिए नाश हो जाता है और सदैव उसकी कार्यसिद्धि होती रहती है।

सभी वर्ण के लोगो को, विशेषकर स्त्रियों को ये पूजा अवश्य करनी चाहिए तथा अभ्युदय की कामना करने वाले राजाओ के लिए भी यह व्रत आवश्यक है व्रती मनुष्य जिस-जिस वस्तु की कामना करता है, उसे निश्चय वह वस्तु प्राप्त हो जाती है, अतः जिसे किसी वस्तु की अभिलाषा हो, उसे अवश्य इस व्रत को करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से पुत्रहीन को पुत्र की, निर्धन को धन की, भार्यार्थी को भार्या की, प्रजार्थि को प्रजा की, रोगी को आरोग्य की और अभागे को सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

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