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संकष्टी चतुर्थी कब है? जानें तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व और लाभ
लेखक: रुचि

संकष्टी चतुर्थी कब है? जानें तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व और लाभ

संकष्टी चतुर्थी 2026 में कब-कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि संकष्टी चतुर्थी 2026 में कब है और इस दिन भगवान गणेश की पूजा क्यों विशेष फलदायी मानी जाती है? सनातन धर्म में संकष्टी चतुर्थी भगवान श्री गणेश को समर्पित अत्यंत शुभ व्रत माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत तथा गणेश पूजन करने से जीवन के सभी संकट, बाधाएं और दुख दूर होते हैं।

वर्ष के प्रत्येक महीने में दो चतुर्थी तिथियां आती हैं - कृष्ण पक्ष की चतुर्थी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी। पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जबकि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है।

विनायक चतुर्थी के बारे में जानने के लिए हमारे लेख-“विनायक चतुर्थी कब है? 

वर्ष 2026 में अक्टूबर माह में संकष्टी चतुर्थी 29 अक्टूबर, गुरुवार को पड़ रही है, जबकि नवंबर माह में संकष्टी चतुर्थी 27 नवंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी।

संकष्टी चतुर्थी 2026 तिथि व समय

कार्तिक कृष्ण चतुर्थी — 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार

• चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 29 अक्टूबर 2026 को रात 1:08 AM बजे 

• चतुर्थी तिथि समाप्त: 29 अक्टूबर 2026 को रात 10:11 PM बजे

मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी — 27 नवंबर 2026, शुक्रवार

• चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 27 नवंबर 2026 को सुबह 9:50 AM बजे 

• चतुर्थी तिथि समाप्त: 28 नवंबर 2026 को सुबह 6:40 AM बजे

अपने शहर अनुसार चंद्रोदय समय और संकष्टी चतुर्थी का सटीक मुहूर्त जानने के लिए विस्तृत पंचांग देखें। 

संकष्टी चतुर्थी क्या है?

"संकष्टी" शब्द का अर्थ होता है " कठिन समय से छुटकारा," और इस दिन भगवान गणेश का पूर्ण निष्ठा एवं श्रद्धा भाव से पूजन करने से गणेश जी हमें सभी संकटों और कठिनाइयों से मुक्ति प्रदान करते हैं।

श्री गणेश जी सिद्धिविनायक है। उनके रूप अनेक हैं पर हाथी के मस्तक वाला रूप जिसमे उनके एक दाँत है, कान सूप के समान सुंदर है ,हाथों में पाश और अंकुश धारण कर रखा है। जो स्त्री पुरुष इस रूप की सच्ची भावना से पूजा अथवा व्रत करता है वह मनुष्य जिस भी धर्म संगत फल की कामना करता है उसे वह सब प्राप्त हो जाता है। भगवान शिव जी ने स्वयं शिवपुराण में कहा है कि गणेश भगवान प्रथम पूजनीय है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जी ने कहा- जो मनुष्य गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम न करके पहले हमारी करेगा तो उसे उस पूजा का कोई फल नहीं प्राप्त होगा।

गणेश जी के जन्म की कथा

माता पार्वती ने गणेश जी का निर्माण क्यों किया?

गणेश पुराण के अनुसार शौनक जी ने जब गणेश जी का चरित्र पूछा तब सूत जी ने उनका वर्णन करते हुए कहा- माता पार्वती जी की दो सखियाँ थी। जया और विजया। वे दोनों अत्यंत ही सुंदर, रूपवती, विवेकमयी, गुणवती और मधुभाषी थी। माता पार्वती उनका बहुत आदर करती थी। एक दिन उन सखियों ने माता पार्वती जी से निवेदन करते हुए कहा- सखी! अपना कोई गण नहीं है, इसलिए अपना एक निजी गण तो अवश्य ही होना चाहिए। 

सखियों के इस प्रकार कहने पर माता पार्वती ने आश्चर्यपूर्वक कहा- ये क्या कह रही हो सखि! हमारे पास करोड़ों गण है, जो शीघ्र ही आज्ञा का पालन करने में तत्पर रहते है। फिर किसी अन्य गण की क्या जरूरत है? सखियों ने कहा- सभी गण शिव भगवान के है। वे उन्ही की आज्ञा को प्रमुख मानते है। नंदी, भृंगी आदि गण जो हमारे कहलाते है, वे भी भगवान की आज्ञा को ही सर्वोपरि मानते है। यदि आप कोई आदेश दे और शिव भगवान उस आदेश की अवहेलना करे तो आपके आदेश को कोई भी गण नहीं मानेगा। आप पूछेंगी तो अवश्य ही कोई न कोई टालमटोल बता दिया जाएगा।

पार्वती जी ने थोड़ा विचार किया और फिर कहा- ‘ये जो प्रथमगण है क्या इनमे से भी कोई मेरी आज्ञा की अवहेलना कर सकता है? सखियाँ पार्वती जी को समझाते हुए बोली-‘ प्रथमगण में तो कोई भी हमारा नहीं है, वे सभी भगवान महादेव जी के सैनिक है। शिव जी की आज्ञा से ही वे हमारी रक्षा करने और सभी कार्यों के प्रति देखरेख के लिए ही नियुक्त है इसलिए कृपा करके अपने लिए एक निजी गण का निर्माण अवश्य कीजिए। माता पार्वती ने अपनी सखियों की सलाह को स्वीकार तो कर लिया, किन्तु इस सुझाव को कार्यरूप में अभी सम्पन्न नहीं किया था।

वह बात वहीं रही, और कुछ दिनों के साथ-साथ, वह इसे धीरे-धीरे भूल गई। एक दिन प्रातःकाल के समय, माता पार्वती स्नानकक्ष में स्नान के लिए जा रही थी। उन्होंने नंदी को आदेश दिया, "अगर कोई आए, तो रोक देना।" और फिर वे अंदर चली गईं। तभी भगवान शंकर कहीं से आकर भीतर प्रवेश करने लगे।

नंदीश्वर ने उन्हें रोकते हुए प्रार्थना की, "माता जी स्नान कर रही हैं, इसलिए यही ठहरने की कृपा करे।" इस पर शिव जी ने कहा- अरे करने दो स्नान। मुझे अत्यंत आवश्यक कार्य है। इस प्रकार नंदी के वचनों की अवहेलना करके शिव जी सीधे स्नानकक्ष में जा पहुंचे।

भगवान शिव जी के अचानक आगमन पर, स्नान करती हुयी जगत जननी लज्जावश अत्यंत सिमट गयी। शिव जी भी बिना कुछ कहे चुपचाप चले गए। फिर, स्नान करने के बाद, पार्वती वस्त्र पहनती हुई सोचने लगी कि जया और विजया का सुझाव सही था। मैंने व्यर्थ ही उसकी बात को अनसुना किया। यदि द्वार पर मेरा कोई निजी गण उपस्थित होता तो शिव जी को स्नानकक्ष में आसानी से नहीं आने देता। नंदी ने मेरी आज्ञा का निरादर किया। अब ऐसा प्रतीत होता है कि समस्त गणों पर मेरा पूरा अधिकार नहीं है इसलिए एक ऐसा गण होना चाहिए जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो जो मेरी आज्ञा की कभी उपेक्षा न करे, मेरा अपना हो।

जो शिव जी के गण है वो शिव जी की आज्ञा होने पर ही मेरी आज्ञा मानते है लेकिन मेरा निजी गण मेरी आज्ञा से ही उनकी आज्ञा मानेगा। मन ही मन ऐसा चिंतन कर उन्होंने अपने अत्यंत पवित्र देह का मैल उतारा और उससे एक चेतन पुरुष का निर्माण कर डाला। जो सभी शुभ लक्षणों से भलीभाँति युक्त था। वह सभी पहलुओं में दोषरहित था, आदर्शणीय सौन्दर्य से युक्त था, उसका रूप अद्वितीय और चमकदार था, वह अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी था।

माता पार्वती ने उसे अनेक प्रकार के वस्त्र, कई प्रकार के आभूषण और बहुत-सा उत्तम आशीर्वाद देकर कहा – 'तुम मेरे पुत्र हो। मेरे अपने ही हो। तुम्हारे समान प्यारा मेरा यहाँ कोई दूसरा नहीं है।' पार्वती के ऐसा कहने पर वह बालक उन्हें नमस्कार करके बोला। गणेश ने कहा- 'माता! आज आपको कौन-सा कार्य आ पड़ा है? मैं आपकी आज्ञा के अनुसार उसे पूर्ण करूँगा।'

गणेश के ऐसा पूछने पर पार्वती जी अपने पुत्र को उत्तर देते हुए बोलीं — “तात! तुम मेरे पुत्र हो, मेरे अपने हो। इसलिये तुम मेरी बात सुनो। आज से तुम मेरे द्वारपाल बन जाओ। सुपुत्र! मेरे आदेश के बिना कोई भी मेरे महल के भीतर प्रवेश न करने पाये, चाहे वह कहीं से भी आये, कोई भी हो।” ऐसा कहकर पार्वती ने गणेश के हाथ में एक बहुत मज़बूत छड़ी दे दी।

उस समय उनके सुन्दर रूप को देख कर पार्वती आनंद से भर गयी। उन्होंने परम स्नेहपूर्वक अपने पुत्र का मुख चूमा और छाती से लगा लिया। इसके बाद पार्वती जी ने छड़ी से युक्त गणेश को द्वार पर स्थापित कर दिया। फिर पार्वती नन्दन महावीर गणेश माता पार्वती की आज्ञा के अनुसार हाथ में छड़ी लेकर गृह-द्वार पर पहरा देने लगे।

भगवान शिव और गणेश जी का युद्ध

उधर पार्वती अपने पुत्र गणेश को अपने दरवाजे पर नियुक्त करके स्वयं सखियों के साथ स्नान करने लगीं। इसी समय भगवान् शिव, जो परम लीलामय तथा कई प्रकार की लीलाएँ रचने में कुशल हैं, द्वार पर आ पहुँचे। गणेश, शिव जी को पहचानते तो थे नहीं, अतः बोल उठे- 'देव! माता की आज्ञा के बिना आप अभी भीतर नहीं जा सकते। माता स्नान करने बैठ गयी हैं।' ऐसा कहकर गणेश ने उन्हें रोकने के लिये छड़ी हाथ में ले ली। 

उन्हें ऐसा करते देख शिवजी बोले- 'मूर्ख! तू किसे रोक रहा है? क्या तू मुझे नहीं जानता? मैं शिव ही हूँ और कोई नहीं।' फिर महादेव के गण उसे समझाकर हटाने के लिये वहाँ आये और गणेश से बोले- सुनो, हम मुख्य शिवगण ही द्वारपाल हैं और सर्वव्यापक भगवान् शंकर के आदेश से तुम्हें हटाने के लिए यहाँ आये हैं। तुम्हें भी गण समझकर हमलोगों ने मारा नहीं है, अन्यथा तुम कब के मारे गये होते।

अब चतुराई इसी में है कि तुम स्वयं ही दूर हट जाओ। क्यों फ़ालतू अपनी मृत्यु को बुलावा दे रहे हो? ऐसा कहने पर भी गणेशजी बिना डरे वहीं खड़े रहे। उन्होंने शिवगणों को फटकारा और दरवाजे को नहीं छोड़ा। तब उन सभी शिवगणों ने शिवजी के पास जाकर सारा हाल उन्हें सुनाया। उनसे सब बातें सुनकर संसार के गतिस्वरूप अद्भुत लीलाविहारी महादेव अपने उन गणों को डाँट, फटकार कर कहने लगे।

महेश्वर ने कहा- 'गणो! यह कौन है? जो इतना स्वेच्छाचारी होकर वैरी की भाँति बक रहा है? इस नये द्वारपाल को दूर भगा दो। तुम लोग कायर की तरह खड़े होकर उसका समाचार मुझे क्यों सुना रहे हो।' विचित्र लीला रचने वाले भगवान शंकर के ऐसा कहने पर वे गण दोबारा वहीं लौट आये।

तत्पश्चात गणेश द्वारा दोबारा रोके जाने पर शिवजी ने गणों को आदेश दिया कि 'तुम पता लगाओ, यह कौन है और क्यों ऐसा कर रहा है?' गणों ने पता लगाकर बताया कि 'ये श्री पार्वती माता के पुत्र हैं तथा द्वारपाल के रूप में बैठे हैं।' तब लीलारूप शंकर ने अनोखी लीला करनी चाही तथा अपने गणों का गर्व भी गलित करना चाहा। इसलिये गणों को तथा देवताओं को बुलाकर गणेशजी से भयंकर युद्ध करवाया। पर वे कोई भी गणेश को हरा न सके।

तब स्वयं हाथ में शूल धारण करनेवाले महेश्वर आये। गणेशजी ने माता के चरणों का स्मरण किया, तब शक्ति ने उन्हें बल प्रदान कर दिया। सभी देवता शिवजी के पक्ष में आ गये, भीषण युद्ध हुआ। अंत में स्वयं महादेव जी ने आकर त्रिशूल से गणेश जी का सिर‍ काट दिया।

जब यह संदेश माता पार्वती जी को मिला, तब वे गुस्से से भर आयीं और बहुत-सी शक्तियों को प्रकट करके उन्होंने बिना कुछ सोचे समझे उन्हें प्रलय करने का आदेश दे दिया। फिर शक्तियों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया। उन शक्तियों का वह प्रज्वलित प्रकाश सभी दिशाओं को प्रज्वलित कर देता है। उसे देखकर सभी शिवभक्त डर गये और भागकर दूर खड़े हो गये।

उसी समय देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे। नारद जी के वहाँ पहुँचने से देवता बहुत प्रसन्न हुए। तब नारद जी ने ब्रह्मा तथा अन्य देवताओं सहित शंकर जी को प्रणाम किया और कहा कि इस विषय पर सभी को मिलकर विचार करना चाहिए। तब वे सभी देवता नारद जी से परामर्श करने लगे कि इस दुःख को किस प्रकार कम किया जा सकता है।

तब उन्होंने निश्चय किया कि जब तक माता पार्वती उन पर कृपा नहीं करेंगी, उन्हें सुख प्राप्त नहीं हो सकेगा। ऐसा विश्वास लेकर नारद सहित सभी देवता और ऋषि-मुनि माता के क्रोध को शांत करने के लिए उनके पास गए और उन्हें प्रसन्न करने लगे। उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें प्रसन्न करते हुए अनेक स्तोत्रों से उनकी स्तुति की और बार-बार उनके चरणों में नमस्कार किया।

देवर्षियों ने कहा- “जगदम्बे! तुम्हें नमस्कार है। शिवपलि! तुम्हें प्रणाम है। चण्डिके! तुम्हें हमारा अभिवादन प्राप्त हो। कल्याणि! तुम्हें बारंबार प्रणाम है। अम्बे! तुम्हीं आदि- शक्ति हो। आप पुण्य जगत की रचयिता, पालनकर्ता और संहारक हैं। देवी! आपका क्रोध समस्त संसार को व्याकुल कर रहा है इसलिए अब प्रसन्न होकर क्रोध को शांत करें।”

सभी देवर्षि ऐसा कहकर अत्यन्त नम्रतापूर्वक, बेचैन हो हाथ जोड़कर चण्डिका के सामने खड़े हो गये। उनकी ऐसी बात सुनकर चंडिका (पार्वती) प्रसन्न हो गयी। उनके हृदय में करुणा भर गई। तब उन्होंने ऋषियों से कहा — “यदि मेरा पुत्र जीवित हो जाये और वह आपके बीच पूजनीय समझा जाये तो संहार नहीं होगा।”

गणेश जी को हाथी का सिर कैसे मिला?

पार्वती की यह बात सुनकर सभी ऋषि-मुनि उन देवताओं के पास आये और सारा समाचार सुनाया। यह सुनकर इंद्र आदि सभी देवताओं के चेहरे पर उदासी छा गई। वे शंकरजी के पास गए, हाथ जोड़कर उनके चरणों में प्रणाम किया और सारा समाचार निवेदित किया। देवताओं की बात सुनकर भगवान शिव ने कहा- “ठीक है, हमें भी ऐसा ही करना चाहिए, जिससे सभी लोकों को सुख मिले।”

ऐसा कहकर शिव जी ने देवताओं को आज्ञा दी कि आप लोगों को अब उत्तर दिशा की ओर जाना चाहिए और जो प्राणी सबसे पहले मिले उसका सिर काटकर इस बालक के धड़ से जोड़ देना चाहिए। इसके बाद भगवान शिव की आज्ञा का पालन करने वाले देवताओं ने सारा काम पूरा कर दिया।

उन्होंने बालक के शरीर को धोया-पोंछा और उसकी विधिवत पूजा की। फिर वे उत्तर की ओर चले गये। वहां उन्हें सबसे पहले एक दांत वाला हाथी मिला। वे उसका सिर ले आये और उस बालक के धड़ से जोड़ दिया। हाथी के उस सिर को जोड़ने के बाद सभी देवताओं ने भगवान शिव को प्रणाम किया और कहा कि हमने अपना काम पूरा कर लिया है। अब जो कुछ करना बाकी है, उसे आप लोग पूरा करे।

तब ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवताओं ने भगवान शंकर को प्रणाम करके कहा- “स्वामिन्! जिस महात्मा की कोख से हम सब पैदा हुए हैं वही तेज इस बालक में वेद मंत्र के उच्चारण के साथ प्रविष्ट हो।” इस प्रकार सभी देवताओं ने मिलकर वेद मंत्रों से जल को अभिमंत्रित किया, फिर भगवान शिव का स्मरण कर उस शुद्ध जल को बालक के शरीर पर छिड़क दिया।

जैसे ही जल उस बालक को छुआ, वह जीवित होकर उठ बैठा। उसका मुख हाथी के समान था और उसका रूप अत्यंत तेजस्वी दिखाई दे रहा था। उसे जीवित देखकर वहां उपस्थित सभी लोग हर्षित हो गये और सभी का दुःख दूर हो गया।

गणेश जी प्रथम पूजनीय कैसे बने?

तब सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उस बालक को माता पार्वती जी को दिखाया। अपने पुत्र को जीवित देखकर पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न हुईं। इसके बाद भगवान शिव और सभी देवताओं ने गणेश जी को प्रथम पूजनीय देवता का स्थान प्रदान किया।

भगवान शिव ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि संसार में किसी भी शुभ कार्य से पहले सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाएगी। जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से गणेश जी का स्मरण करेगा, उसके सभी विघ्न दूर होंगे और उसके कार्य सफल होंगे।

इस प्रकार भगवान गणेश प्रथम पूजनीय देवता बने। धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धापूर्वक भगवान गणेश के इस चरित्र को सुनता या पढ़ता है, उसके जीवन के शुभ कार्यों में आने वाले विघ्न दूर होते हैं तथा उसे कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि :-

प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को 'संकष्टी चतुर्थी' बतलाया जाता है। उसमे उपवास का संकल्प लेकर व्रती पुरुष सबेरे से चंद्रोदय काल तक नियम पूर्वक रहे। मन को काबू में रखे। चंद्रोदय होने पर मिट्टी की गणेशमूर्ति बनाकर पीढ़े पर स्थापित करें। गणेश जी के साथ उनके आयुध और वाहन भी होने चाहिए।

मूर्ति में गणेश की स्थापना करके षोडशोपचार से विधिपूर्वक उनका पूजन करें। फिर मोदक तथा गुड़ में बने हुए तिल के लड्डू का नैवेद्य अर्पण करें ।

तत्पश्चात ताम्बे के पात्र में लाल चन्दन, कुश, दूर्वा, फूल, अक्षत, शमीपत्र, दधि और जल एकत्र करके चन्द्रमा को अर्घ्य दे। उस समय निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करें। 

गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते ।

गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ॥

 'गगनरूपी समुद्रके माणिक्य चन्द्रमा! दक्षकन्या रोहिणीके प्रियतम !

 गणेशके प्रतिविम्ब! आप मेरा दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार कीजिये।'

इस प्रकार गणेशजीको यह दिव्य तथा पापनाशक अर्घ्य देकर यथाशक्ति उत्तम ब्राह्मणोंको भोजन करानेके पश्चात् स्वयं भी उनकी आज्ञा लेकर भोजन करे।

इस प्रकार कल्याणकारी 'संकष्टव्रत' का पालन करके मनुष्य धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। वह कभी कष्टमें नहीं पड़ता।

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संकष्टी चतुर्थी में चंद्रमा को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?

संकष्टी चतुर्थी के व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देने का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि चंद्रोदय के बाद भगवान गणेश की पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात ही यह व्रत पूर्ण माना जाता है। इस दिन चंद्रमा को जल, दूर्वा, अक्षत और पुष्प अर्पित करके श्रद्धापूर्वक प्रार्थना की जाती है।

पुराणों के अनुसार चंद्रदेव को मन का कारक माना गया है। इसलिए संकष्टी चतुर्थी पर चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और शुभ फल की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता यह भी है कि भगवान गणेश और चंद्रमा से जुड़ी पौराणिक कथा के कारण इस दिन चंद्र दर्शन का विशेष महत्व बताया गया है।

व्रत का महत्त्व :-

इस प्रकार जो इस व्रत को पूर्ण करता है ,उसे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। जो श्रद्धासहित अपनी शक्ति के अनुसार नित्य गणेश जी की पूजा करता है उसके सभी मनोरथ सफल होते है। मनुष्यों को सिंदूर ,चन्दन ,चावल ,केतकी पुष्प आदि अनेको उपचारो द्वारा गणेश्वर का पूजन करना चाहिए।

इस प्रकार नाना प्रकार के उपचारो से भक्तिपूर्वक जो मनुष्य पूजा करता है उसके विघ्नो का सदा के लिए नाश हो जाता है और सदैव उसकी कार्यसिद्धि होती रहती है । 

सभी वर्ण के लोगो को ,विशेषकर स्त्रियों को ये पूजा अवश्य करनी चाहिए तथा अभ्युदय की कामना करने वाले राजाओ के लिए भी यह व्रत आवश्यक है व्रती मनुष्य जिस-जिस वस्तु की कामना करता है ,उसे निश्चय वह वस्तु प्राप्त हो जाती है ;

अतः जिसे किसी वस्तु की अभिलाषा हो, उसे अवश्य इस व्रत को करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से पुत्रहीन को पुत्र की, निर्धन को धन की, भार्यार्थी को भार्या की, प्रजार्थि को प्रजा की, रोगी को आरोग्य की और अभागे को सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

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