महेश नवमी 2026 में कब है?
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को महेश नवमी मनाई जाती है। वर्ष 2026 में महेश नवमी 23 जून, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा तथा माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति से जुड़ा हुआ माना जाता है।
महेश नवमी 2026 तिथि व समय
• महेश नवमी: 23 जून 2026, मंगलवार
• नवमी तिथि प्रारंभ: 22 जून 2026 को दोपहर 3:41 बजे
• नवमी तिथि समाप्त: 23 जून 2026 को शाम 4:40 बजे
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महेश नवमी क्या है?
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को महेश नवमी मनायी जाती है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष रूप से पूजा की जाती है और जलाभिषेक किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी दिन ‘माहेश्वरी समाज’ की उत्पत्ति की थी।
माहेश्वरी समाज एक ऐसा समुदाय है जिसकी उत्पत्ति भगवान शिव जी की कृपा से हुयी थी। भगवान शंकर जी ने माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को की थी इसलिए इस दिन को ‘महेश नवमी’ के रूप में मनाते है। माहेश्वरी समाज ‘राजपूत वंश’ को कहा जा सकता है।
माहेश्वरी समुदाय के विभिन्न उपनामों में मालपानी, काकानी, परतानी, गग्गर, साबू, सोमानी, सोनी, बिड़ला, झंवर, राठी, कल्याणी, बजाज, दमानी, जाजू, मुंडाडा, बियानी, समदानी, बिनानी, काबरा, पचीसिया आदि शामिल हैं।
सभी भक्त नवमी के दिन भगवान शिव जी के मंदिर में जाते है और भगवान शिव का जलाभिषेक करते है, माँ पार्वती, गणेश, कार्तिकेय जी की पूजा करते हैं। सभी देवों को श्रद्धा भाव के साथफल, फूल, नैवेद्य आदि अर्पित किये जाते है। वही मंदिर पर ही भगवान शिव का पाठ किया जाता है।
ऐसा करने से भगवान शिव अपने भक्तों के सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते है। भगवान शिव अपने भक्तों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते है। इस दिन गंगा जल से स्नान करने से तन और मन की शुद्धि हो जाती है।
मन के शुद्ध हो जाने से नकारात्मक विचर कभी भी मन में प्रवेश नहीं कर पाते है भगवान महेश की कृपा हमेशा बनी रहती है। इस शुभ दिन में जो भी भक्त दान-आदि देता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है अर्थात वह मृत्यु के बाद शिवलोक को गमन करता है।
कैसे करे भगवान महेश को प्रसन्न
माहेश्वरी समाज के लोग भगवान महेश को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान, जाप, तप, यज्ञ, पूजा-पाठ और आराधना करते है। इस दिन जो भी भक्त भगवान शिव जी के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करता है उसे भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
इस दिन भगवान शिव जी को प्रसन्न करने के लिए रुद्राभिषेक का अनुष्ठान करना अति उत्तम माना जाता है। जो साधक भगवान शिव जी को प्रसन्न करने के लिए इस दिन रुद्राभिषेक करते है तो भगवान शिव प्रसन्न होकर उनकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते है।
रुद्राभिषेक की पूजा विधि जानने के लिए हमारे इस लेख को पढ़े:-रुद्राभिषेक करने के विधि
यदि आप महेश नवमी में शिव जी को प्रसन्न करने के लिए रुद्राभिषेक कराना चाहते है पर आपके पास समय का अभाव है तो:-
महेश नवमी की पूजा विधि
क्षेत्रों और परंपराओं के अनुसार पूजा विधि में अंतर हो सकता है। यदि आप भगवान शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो अपनी पारंपरिक विधि के अनुसार पूजा-पाठ, जप, अनुष्ठान और यज्ञ कर सकते हैं। यहां भगवान शिव की सामान्य पूजा विधि बताई गई है, जिसके द्वारा श्रद्धापूर्वक पूजन करके महादेव की कृपा प्राप्त की जा सकती है।
पूजा से पहले क्या करें?
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन प्रातःकाल उठकर सभी नित्य कार्य पूर्ण करें और स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि आप व्रत रखना चाहते हैं, तो श्रद्धापूर्वक व्रत का संकल्प लें।
सूर्यदेव को अर्घ्य कैसे दें?
पूजा प्रारंभ करने से पहले सर्वप्रथम सूर्यदेव को जल अर्पित करें। धार्मिक मान्यता है कि सूर्यदेव को अर्घ्य देने से सकारात्मक ऊर्जा और शुभ फल की प्राप्ति होती है।
भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कैसे करें?
इसके बाद भगवान शिव के मंदिर में जाएं या घर में स्थापित भगवान शिव की प्रतिमा अथवा शिवलिंग का पूजन करें। भगवान शिव और माता पार्वती को फूल, फल, अक्षत, धतूरा, कुमकुम, दूध, दही और पंचामृत आदि अर्पित करें तथा सच्चे मन से उनकी पूजा-अर्चना करें।
महेश नवमी पर कौन-सा मंत्र जपें?
यदि संभव हो तो भगवान शिव की कथाओं का श्रवण करें और शिव चालीसा का पाठ करें। समय का अभाव होने पर “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 108 बार जाप अवश्य करें। धार्मिक मान्यता है कि इस मंत्र जाप से मानसिक शांति, आध्यात्मिक शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
व्रत और आरती कैसे करें?
भगवान शिव को भोग लगाएं, आरती करें और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। पूरे दिन श्रद्धापूर्वक उपवास रखें। शाम के समय आरती करने के बाद फलाहार किया जा सकता है। अगले दिन व्रत पूर्ण होने पर विधिपूर्वक पारण करके उपवास खोलें।
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पारंपरिक पूजा विधि का महत्व
यह भगवान शिव की सामान्य पूजा विधि है। विभिन्न क्षेत्रों और परंपराओं में पूजा के नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए साधक को अपनी पारंपरिक पूजा विधि और रीति-रिवाजों के अनुसार भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए।
माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति की कथा
एक बार की बात है, भारत के राजस्थान के कहंडेलग्राम के राजा खंडेलसेन बहुत उदार और धार्मिक राजा थे। उनकी दो अत्यंत सुंदर पत्नियाँ थी परंतु राजा के एक भी संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण राजा बहुत चिंतित रहा करते थे। यद्यपि राजा ने गरीबों और जरूरतमंदों की मदद के लिए बहुत से यज्ञ और दान किये लेकिन फिर भी राजा को इसका कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ।
हताश होकर राजा ने एक दिन अपना सम्पूर्ण दुख महर्षि याज्ञवल्क को बताया। राजा की अत्यंत दयनीय स्थिति को देखकर महर्षि को राजा पर दया आ गई तब उन्होंने बताया कि एक शाप के कारण आपको निःसंतानता का सामना करना पड़ रहा है। महर्षि याज्ञवल्क ने उन्हें बताया कि आपने पिछले जन्म में कई जानवरों की हत्या की और उनका मांस बेचकर अपना जीवन यापन किया।
उसी दौरान आपने एक हिरणी को शिकार बनाया जो उस समय गर्भवती थी। असहनीय पीड़ा के कारण वह गर्भवती हिरणी मर तो गई परंतु उसने आपको निःसंतान होने का श्राप दे दिया।
बाद में आपको इस कृत्य के लिए बड़ा पश्चाताप हुआ और अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए आप पुष्कर जैसे महान तीर्थ पर पहुंचे। उस महान तीर्थ के कारण ही आप इस जन्म में राजा हुए। अतः मैं आपको एक युक्ति बताता हूँ जो आपको उस शाप से मुक्ति दिला सकती हैं।
शिवलिंग की स्थापना और भगवान शिव की आराधना
महर्षि राजा को समझाते हुए कहते हैं कि यहां से कुछ ही दूर आगे जाकर एक भाष्कर राज्य पड़ता है जिसमें एक विशाल पीपल का पेड़ है। उस पेड़ के नीचे एक शिवलिंग दबा हुआ है। आप उस शिवलिंग को बाहर निकलवाए और एक भव्य मंदिर का निर्माण कर उसमें उस शिवलिंग को स्थापित कर दें साथ ही उसे श्रद्धा भाव के साथ सजायें और प्रतिदिन उनकी उपासना करें।
राजा ने महर्षि के आदेशानुसार ही कार्य किया और प्रतिदिन श्रद्धा भाव के साथ विधिपूर्वक पूजन करने लगे। कुछ समय उपरांत राजा की आराधना और भक्ति भाव से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने राजा को पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया।
राजा सुजानसेन का जन्म और राज्य संभालना
राजा ने अपने पुत्र का नाम सुजानसेन रखा। राजा ने बड़े लाड प्यार से अपने पुत्र का लालन पालन किया और जब राजकुमार युवावस्था में पहुँच गया तो राजा युद्धवीर की पुत्री राजकुमारी चंद्रवती से विवाह कर राज पाठ अपने पुत्र को सौंप स्वयं सन्यास लेकर वन को चले गए।
राजा सुजानसेन और 72 सैनिकों की शिकार यात्रा
एक दिन राजा सुजानसेन अपने 72 सैनिकों को लेकर जंगल में शिकार खेलने के लिए गये। शिकार खेलते खेलते राजा और उसके सैनिक भूख और प्यास से पीड़ित हो उठे। इधर उधर भटकते हुए उन्हें एक अच्छा भोजन पकने की सुगंध महसूस हुई।
राजा सहित सभी सैनिक उस सुगंध को ढूंढते हुए उस स्थान पर पहुंचे जहां कुछ ऋषि भगवान शिव के लिए यज्ञ कर रहे थे। भूख और प्यास से व्याकुल राजा और उनके सैनिकों ने भोग के लिए रखा प्रसाद ही खाना शुरू कर दिया और यज्ञ के लिए आरक्षित तालाब में पानी पीना शुरू कर दिया साथ ही अपने दाग लगे धनुष और बाण भी धोने लगे।
ऋषियों का श्राप और पत्थर बनने की घटना
इस प्रकार के उत्पात और कोलाहल से ऋषियों का ध्यान भंग हो गया और उन्होंने क्रोध में आकर राजा और उनके सभी सैनिकों को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया।
रानी और सैनिकों की पत्नियों की शिव आराधना
रानी और सैनिकों की पत्नियों ने बहुत दिनों तक अपने पतियों का इंतजार किया लेकिन जब उनके सब्र का बांध टूट गया तो वे सब मिलकर महर्षि जाबालि के पास गई। महर्षि जाबालि ने उन सभी को सम्पूर्ण स्थिति से अवगत कराया और उन्हें सुझाव दिया कि यदि वे सभी मिलकर भगवान शिव की श्रद्धा भाव से पूजा करें तो उन्हें अवश्य ही उनके पति पुनः प्राप्त हो जाएंगे।
भगवान शिव और माता पार्वती का पृथ्वी पर आगमन
उधर ऋषियों के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने पार्वती जी से कहा कि देवी! अब मेरे पृथ्वी पर जाने का समय आ गया है क्योंकि मेरे उपासक एक खास उद्देश्य के साथ भक्तिपूर्वक मेरी आराधना कर रहे हैं अतः मुझे उनकी उपासना को अवश्य ही सफल करना होगा।
परंतु माता पार्वती भगवान शिव से अलग नहीं रहना चाहती थी इसलिए उन्होंने भी उनके साथ पृथ्वी पर चलने की जिद पकड़ ली। भगवान शिव जी के द्वारा बहुत समझाने के बाद भी जब पार्वती जी नहीं मानी तो शिव जी उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए तैयार हो गए।
माता पार्वती ने पत्थर बने लोगों को जीवनदान दिलाया
अंततः भगवान शिव और माता पार्वती ने ऋषियों के आश्रम की तरफ अपनी यात्रा प्रारभ की परंतु जब भगवान उस जगह पहुंचे जहाँ रानी और सैनिकों की पत्नियाँ अपने पतियों के लिए भगवान शिव की आराधना कर रही थी तो पार्वती जी वहाँ पर रुक गई और उन्होंने भगवान शिव से उन सभी स्त्रियों के एकसाथ इकट्ठा होकर आराधना करने का कारण पूछा।
तब भगवान शिव ने माता पार्वती को सम्पूर्ण स्थिति से अवगत कराया। जब माता को सम्पूर्ण स्थिति का पता चला तो माता से उन स्त्रियों का दुख देखा न गया और माता पार्वती भगवान शिव के सामने उन पत्थर बने पतियों को जीवन दान देने के लिए जिद पर अड़ गई।
भगवान शिव जी ने माता पार्वती को बहुत समझाया और वहाँ से चलने को कहा परंतु माता नहीं मानी और मायुसी भरे वचनों के साथ भगवान शिव से प्रार्थना करते हुए कहती है कि हे भगवन! जब मैं आपके बिना एक पल नहीं रह पाती हूँ तो आप मुझसे यह उम्मीद कैसे रखते हैं कि मैं इन दुखित स्त्रियों को रोते हुए छोड़कर जा सकती हूँ। अतः आपको इनके पतियों को पुनः जीवन दान देना ही होगा।
माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति कैसे हुई?
भगवान शिव माता की जिद के आगे हारकर कहते हैं कि देवी! जब तुमने मेरे साथ चलने का फैसला लिया था तो मुझे इसी बात का डर था और वही हुआ।
इस प्रकार भगवान शिव ने राजा सुजानसेन और उनके 72 सैनिकों को पुनः जीवन दान दिया और महादेव राजा से बोले कि हे वत्स! चूंकि तुमने पापपूर्ण और अधर्म संगत कार्य किये हैं साथ ही तुमने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया इसलिए तुम्हें कष्टों से पीड़ित होना पड़ा।
अब मैं तुम्हें पुनः जीवन दान दे रहा हूँ इसलिए अब से आप लोग “महेश-वारिस” के रूप में जाने जाएंगे। आज से आप लोग क्षत्रीय भूमिका को भूलकर वैश्य की भूमिका में अपना जीवनयापन करेंगे। सभी हिंसक कार्यों को भूलकर अहिंसा का मार्ग अपनाएंगे।
महेश नवमी का महत्व
महेश नवमी के दिन जो साधक भगवान शिव और माँ पार्वती की पूजा करता है और शिव जी के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करता है तो उसके सभी कष्ट और दुःख दूर हो जाते है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।
इस दिन रुद्राभिषेक करने का विशेष महत्व होता है। महेश नवमी के दिन शिव जी के मंत्रों का जाप और शिव चालीसा पढ़ना अत्यंत शुभ और फलदायी होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. वर्ष 2026 में महेश नवमी कब है?
वर्ष 2026 में महेश नवमी 23 जून, मंगलवार को मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार यह पर्व ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आता है।
2. महेश नवमी क्यों मनाई जाती है?
महेश नवमी भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा तथा माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने माहेश्वरी समाज को आशीर्वाद प्रदान किया था।
3. माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति कैसे हुई थी?
धार्मिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने राजा सुजानसेन और उनके 72 सैनिकों को पुनर्जीवन देकर “महेश-वारिस” नाम प्रदान किया था। इन्हीं से आगे चलकर माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति मानी जाती है।
4. महेश नवमी पर रुद्राभिषेक करना क्यों शुभ माना जाता है?
महेश नवमी के दिन रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इससे सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
5. महेश नवमी पर कौन-सा मंत्र जपना फलदायी होता है?
महेश नवमी के दिन भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का जाप करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।