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गंगा दशहरा कब है? तिथि, स्नान, कथा, महत्व और लाभ जानें
लेखक: रुचि

गंगा दशहरा कब है? तिथि, स्नान, कथा, महत्व और लाभ जानें

गंगा दशहरा 2027 में कब है?

गंगा दशहरा रविवार, 13 जून 2027 को मनाया जाएगा। इस दिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि रहेगी। पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि का प्रारंभ 13 जून 2027 को सुबह 2:46 बजे होगा और इसका समापन 14 जून 2027 को सुबह 2:14 बजे होगा।

क्यों 2027 में गंगा दशहरा जून में पड़ रहा है?

गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2027 में ज्येष्ठ शुक्ल दशमी 13 जून को पड़ रही है, इसलिए इस वर्ष गंगा दशहरा जून महीने में मनाया जाएगा।

इस शुभ अवसर पर गंगा स्नान, दान और पूजा-पाठ करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन पवित्र गंगा में स्नान और दान करने से पापों का नाश होता है तथा व्यक्ति को सुख-शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

यदि आप गंगा दशहरा 2027 की सभी तिथियां, शुभ मुहूर्त और पंचांग अनुसार सटीक जानकारी जानना चाहते हैं: - तो हमारा विस्तृत पंचांग अवश्य देखें।   

गंगा दशहरा क्या है?

गंगा दशहरा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला पवित्र पर्व है, जिस दिन माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था।

इस दिन गंगा स्नान, दान और पूजा करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

गंगा दशहरा का महत्व और गंगा स्नान का फल

प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा दशहरा मनाया जाता है। इसके एक दिन बाद निर्जला एकादशी का व्रत होता है जो सभी एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ है।

इस पृथ्वी पर गंगा नदी को सबसे पवित्र नदी माना जाता है। जैसा की हम सभी जानते है कि सभी प्रकार के धार्मिक कार्यों में गंगा जल का उपयोग किया जाता है जो कि बहुत ही कल्याणकारी होता है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को माता गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुयी थी।

इसलिए इस दिन को गंगा दशहरा पर्व के रूप में मनाया जाता है। देवी गंगा को मुक्तिदायिनी तथा मोक्षदायिनी माना जाता है। इस दिन माता गंगा की पूजा-अर्चना की जाती है, इसके अलावा भक्त दान-स्नान तथा उपासना करते है। इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से सभी पापों का नाश हो जाता है। गंगा नदी में स्नान करने वाले मनुष्य को इस लोक में सुख और परलोक में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इस पृथ्वी पर माँ गंगा का अवतरण कैसे हुआ?

इस कथा का वर्णन श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के बालकाण्ड में है। जिसमे श्री रामजी के पूछने पर विश्वामित्र जी ने इस कथा का वर्णन किया था। वह कथा कुछ इस प्रकार है-

विश्वामित्र जी श्री राम जी को गंगा के अवतरण की कथा बताते हुए कहते है- कुछ काल पहले की बात है, इक्ष्वाकु वंश में सगर नामक धार्मिक राजा अयोध्या में राज्य करते थे। उनकी दो पत्नियाँ थी। उनकी ज्येष्ट पत्नी का नाम केशिनी था जो विदर्भ राजा की पुत्री थी।

वह बड़ी धर्मात्मा और सदैव सत्य वचन बोलने वाली थी।। सगर की दूसरी पत्नी का नाम सुमति था जो अरिष्टनेमि कश्यप की पुत्री थी तथा गरुड की बहिन थी। दोनों पत्नियों से ही पुत्र की प्राप्ति न होने के कारण राजा सगर अपनी पत्नियों के साथ हिमालय पर्वत पर जाकर भृगुप्रस्त्रवण नामक शिखर पर तपस्या करने लगे।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने राजा को वर दिया कि तुम्हें अनेक पुत्रों की प्राप्ति होगी। तुम्हारी एक पत्नी से एक पुत्र की प्राप्ति होगी जो तुम्हारे वंश को बढ़ाने वाला होगा और एक पत्नी से साठ हजार तेजस्वी, महापराक्रमी, वज्र के समान बलवान पुत्रों की प्राप्ति होगी। सगर की पत्नियों ने महर्षि भृगु जी को प्रणाम करके पूछा- किसे एक पुत्र की प्राप्ति होगी? और किसे साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति होगी? यह बताने की कृपा करे।

तब महर्षि ने दोनों रानियों से कहा तुम दोनों अपने मन में जैसी इच्छा हो वैसी कामना करो, जो एक पुत्र की कामना करेगी उसे एक पुत्र की प्राप्ति होगी और जो साठ हजार पुत्रों की कामना करेगी उसे साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति होगी। तब रानी केशिनी ने वंश बढ़ाने वाले एक पुत्र की कामना की और सुमति ने साठ हजार बलवान पुत्रों को प्राप्त करने की कामना की।

इस प्रकार रानी केशिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम असमंज हुआ और राजा की दूसरी पत्नी ने एक गर्भपिण्ड को जन्म दिया जिसके फूटने पर साठ हजार पुत्रों का जन्म हुआ। धीरे-धीरे सभी बालक युवावस्था में आ गए।

सगर का ज्येष्ठ पुत्र असमंज, नगर के बालकों को पकड़ कर सरयू के जल में फेक देता था, और जब वे डूबने लगते थे तो उनकी ओर देखकर हँसा करता था। उसके द्वारा सत्पुरुषों को पीड़ा देने के कारण पिता ने उसे राज्य से बाहर निकाल दिया। असमंज के जाने के कुछ दिन बाद उसकी पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम अंशुमान रखा गया। वह बहुत ही मधुर बोलने वाला,तेजस्वी, पराक्रमी बालक था।

कुछ समय बीतने के बाद राजा सगर ने यज्ञ करने का विचार किया। इसके बाद सभी मंत्री यज्ञ की तैयारी में लग गए। विंध्याचल और हिमवान् दोनों पर्वतों के बीच आर्यावर्त की पुण्यभूमि में उस यज्ञ का अनुष्ठान किया गया था।

एक अश्व को छोड़ा गया और उस अश्व की रक्षा का भार अंशुमान को दिया गया। अश्व कई राज्यों से होता हुआ निकला पर किसी ने उस अश्व को नहीं पकड़ा सबने सगर से मित्रता करना ही स्वीकार किया। यज्ञ सफल होते देख देवराज इन्द्र को अपना राज्य छिन जाने का भय उत्पन्न हो गया।

उसने एक राक्षस का रूप धारण करके अश्व को चुरा लिया और महर्षि कपिल जी के आश्रम में जाकर बांध दिया। अश्व चोरी हो जाने के कारण यज्ञ सफल नहीं हुआ क्योंकि यज्ञ सफल करने के लिए अंत में अश्व का दर्शन करना आवश्यक होता है अन्यथा यज्ञ सफल नहीं होता और यज्ञ का सफल न होना यानि अमंगल की सूचना देना होता है।

अश्व की खोज करने के लिए राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को आदेश दिया। आदेश पाकर उनके साठ हजार पुत्र अश्व की खोज के लिए निकल पड़े।

अश्व की खोज में पृथ्वी को खोदने लगे, उनका एक-एक प्रहार वज्र के समान था। एक-एक पुत्र ने एक-एक योजन भूमि बाँट ली और इस प्रकार साठ हजार योजन भूमि खोद डाली। उन्हे जितने भी जीव जन्तु मिलते वे उन्हे मार डालते थे।

यह देख कर सभी देवता घबरा कर ब्रह्मा जी के पास गए और कहा अगर ये ऐसे ही पृथ्वी को विदीर्ण करते रहेंगे तो सभी जीवों का नाश हो जाएगा और पूरी पृथ्वी विदीर्ण हो जायगी जिसके फलस्वरूप सृष्टि का सृजन नष्ट हो जाएगा।

तब ब्रह्मा जी ने देवताओं को समझाते हुए कहा महर्षि कपिल मुनि श्री हरि में विलीन रसातल में निवासित है वे ही इनका संहार करेंगे। राजा सगर के पुत्र अश्व खोजते-खोजते वे रसातल में कपिल मुनि के आश्रम पर पहुंचे। वह अश्व वहीं पर ही था।

सगर के साठ हजार पुत्रों ने कपिल मुनि को ही चोर समझा और उन्हे व्यंग वचन कहने लगे-यही पिता जी के यज्ञ में बाधक है, इसी ने अश्व को चोरी किया है। ऐसा कहते हुए वे उन्हे मारने के लिए दौड़े। उनके इस क्रिया कलाप से उनकी समाधि टूट गयी।

क्रोधिक होने के कारण उनकी आँखों से ज्वाला निकलने लगी जिसके प्रभाव से राजा सगर के साठ हजार पुत्र अग्नि में जल कर राख का ढेर हो गए।

बहुत समय बीत जाने पर भी राजा सगर के साठ हजार पुत्र जब वापस नहीं आए और न ही अश्व का पता चला, तब राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान को उनकी खोज करने और अश्व को खोज लाने का आदेश दिया।

राजा सगर की आज्ञा पाकर अंशुमान अपने चाचाओं की खोज के लिए निकल पड़े। अंशुमान अपने चाचाओं की खोज के लिए उसी मार्ग पर चले जिस मार्ग को उनके चाचाओं ने खोदकर बनाया था । अंशुमान को रास्ते में जो भी वीर पुरुष या विद्वान पुरुष मिलते अंशुमान उन्हे प्रणाम करते और कुशल समाचार पूछकर उनसे अपने चाचाओं और अश्व का पता पूछते जाते।

इस प्रकार सभी विद्वान और दिग्गज पुरुषों का आशीर्वाद लेकर अंशुमान उस स्थान पर पहुँच गए जहां पर उनके चाचा राख का ढेर हुए पड़े थे ।

जब अंशुमान ने अपने चाचाओं के राख के ढेर को देखा तो वह बहुत दुखी हुआ। साथ ही उन्होंने देखा कि अश्व भी वही पास में ही चर रहा था ।

अंशुमान अपने चाचाओं की मुक्ति के लिए उनको जलांजलि देने के लिए जल की खोज करने लगे परंतु उन्हे दूर दूर तक कहीं जलाशय नहीं दिखाई दिया। अंशुमान जब जलाशय की खोज में इधर उधर भटक रहे थे उसी समय रास्ते में उनकी भेंट गरुड जी से हुई।

अंशुमान ने उनसे भी जलाशय का पता पूछा। तब गरुड ने कहा मेरे भाँजे दिव्य दृष्टि की अग्नि से जलकर भस्म हुए है। केवल गंगा के जल से ही उन्हे मुक्ति मिल सकती है।

तुम अश्व लेकर जाओ और यज्ञ को पूर्ण करो तथा इनकी मुक्ति के लिए गंगा जी को पृथ्वी पर लाने के लिए तपस्या करो। गरुड की बात सुनकर अंशुमान अश्व लेकर वापस आ गए और राजा सगर को अपने चाचाओं की मृत्यु और गरुड जी की बतायी हुयी बात बतायी ।

यज्ञ पूर्ण होने के बाद राजा सगर गंगा को लाने का विचार करते रहे पर कुछ भी निश्चय नहीं कर पाए। कुछ काल के बाद राजा सगर की मृत्यु हो गयी। इसके बाद अपने चाचाओं की मुक्ति हेतु अंशुमान हिमालय के शिखर पर्वत पर जाकर तपस्या करने लगे।

कुछ काल तक तपस्या करने के बाद उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया और स्वर्ग को प्राप्त किया। अंशुमान के पुत्र का नाम दिलीप था । उन्होंने भी अपने पितरों की मुक्ति के लिए तपस्या की और अंत में शरीर का त्याग करके इंद्रलोक को प्राप्त हुए। दिलीप के पुत्र भागीरथ हुए।

वे बहुत पराक्रमी, धर्मात्मा और तेजस्वी थे। पुत्र की इच्छा और पूर्वजों की मुक्ति के लिए माता गंगा को पृथ्वी पर उतारने के प्रयत्न में वे भी लग गए। पहले उन्होंने तपस्या से ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया।

ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर भागीरथी से कहा-मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हूँ, तुम्हारी इच्छा के अनुसार गंगा पृथ्वी पर बड़े वेग से उतरेंगी। उनके वेग को केवल शिव जी ही नियंत्रित कर सकते है। इसलिए शिव जी की तपस्या करके उन्हे इस कार्य के लिए मनाओं।

इसके बाद भागीरथी ने शिव जी की तपस्या करनी शुरू कर दी। शिव जी ने भागीरथी की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हे वरदान दिया की वे अवश्य ही गिरीराजकुमारी गंगा देवी को अपने मस्तिष्क पर धारण करेंगे।

शंकर जी की स्वीकृति मिल जाने के बाद गंगा जी बहुत विकराल रूप धारण कर अत्यंत तीव्र वेग से आकाश से भगवान शंकर के मस्तिष्क पर उतरी । जिस समय माँ गंगा भगवान शंकर के मस्तिष्क पर उतरी तो उन्हे अपने वेग पर अभिमान हो गया, उन्होंने विचार किया कि शिव जी को अपने वेग के साथ लेकर सीधे पाताल लोक चली जाऊँगी।

शिव जी गंगा के अहंकार को पहचान गए। उन्होंने अपनी जटाओं को एक बंद गुफा का रूप दिया और जब गंगा जी बड़े वेग से पृथ्वी पर उतरने लगी तो शिव जी की जटाओं में ही फस गयी, प्रयत्न करने पर भी वे वहाँ से बाहर न निकल सकी। इसके बाद भागीरथ जी ने फिर शिव जी की तपस्या करनी शुरू कर दी।

तब शिव जी ने प्रसन्न होकर अपनी जटाओं से उन्हे पृथ्वी पर उतारा और बिन्दुसरोवर में छोड़ दिया। वहाँ छूटते ही वे सात धाराओं में बँट गयीं। ह्रादिनी, पावनी और नलिनी- ये तीन धाराएं पूर्व दिशा की ओर चली गई । सुचक्षु, सीता और महानदी सिंधु- ये तीन धाराएं पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हुयी। इसके अलावा जो सातवीं धारा थी वह भागीरथ के पीछे-पीछे अनुसरण करती हुई चली।

फिर देवी गंगा ने सगर के उन साठ हजार पुत्रों का आप्लावन किया। जिससे उन्हे मुक्ति मिली। इस प्रकार वे आकाश से महादेव जी के मस्तक से पृथ्वी पर आयीं थी। जिस दिन माता गंगा का इस पृथ्वी पर अवतरण हुआ वह दिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि का ही था। इसलिय इस दिन को गंगा दशहरा के पर्व के रूप में मनाया जाता है।

इस दिन गंगा नदी में स्नान करने से सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है तथा परलोक में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन गंगा जी में स्नान करने वाला मनुष्य, इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है तथा सदैव परमधाम में ही निवास करता है।

क्या गंगा दशहरा के इस पावन दिन का पूरा फल आपको मिल रहा है, या कुछ महत्वपूर्ण बातें अभी भी छूट रही हैं?

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