केदार गौरी व्रत 2026 में कब है?
केदार गौरी व्रत कार्तिक मास की अमावस्या तिथि, अर्थात दीपावली के दिन रखा जाता है। यह पवित्र व्रत भगवान शिव और माता गौरी की आराधना के लिए समर्पित है तथा विशेष रूप से दक्षिण भारत में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
केदार गौरी व्रत 2026 में 8 नवंबर, रविवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत का पालन करने से दांपत्य सुख, सौभाग्य, समृद्धि, मनोकामना पूर्ति तथा भगवान शिव-पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। तमिलनाडु सहित दक्षिण भारत के अनेक क्षेत्रों में यह व्रत दीपावली उत्सव के साथ बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
अमावस्या तिथि: 8 नवंबर 2026, रविवार
• अमावस्या तिथि प्रारंभ: 8 नवंबर 2026 को सुबह 11:29 बजे
• अमावस्या तिथि समाप्त: 9 नवंबर को दोपहर 12:32 बजे
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केदार गौरी व्रत, जिसे 'केदारेश्वर व्रत' के नाम से भी जाना जाता है, सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जो भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित है। यह व्रत दिवाली के महापर्व के साथ, विशेष रूप से कार्तिक मास की 'अमावस्या' को मनाया जाता है। दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में, इसे भक्ति, श्रद्धा, और उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहां शिव भक्त भगवान शिव से घर-परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव का अंश बनने के लिए केदार गौरी व्रत का पालन किया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें 'अर्धनारीश्वर' का रूप प्राप्त हुआ। पारंपरिक रूप से, यह व्रत 21 दिनों तक चलता है, जिसमें भक्त भगवान शिव की आराधना करते हैं, परंतु मुख्य उपवास कार्तिक अमावस्या, यानी दिवाली के दिन रखा जाता है।
माना जाता है कि इस व्रत के पालन से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि, सौभाग्य, और शांति का आगमन होता है। केदार गौरी व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करने वाले शिव भक्तों का जीवन सुख-शांति और समृद्धि से भर जाता है।
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केदार गौरी व्रत की पूजा विधि
केदार गौरी व्रत की पूजा अत्यंत श्रद्धा और नियमों के साथ की जाती है। व्रत वाले दिन, भक्त सुबह उठकर स्नान करते हैं और भगवान के अनन्य नामों और स्वरूप का ध्यान करते हुए स्वच्छ वस्त्र धारण करके व्रत का संकल्प लेते हैं। पूजा की शुरुआत जल से भरे कलश की स्थापना से होती है, जिसके ऊपर एक मंडप बनाया जाता है। व्रत के लिए 21 गांठों वाला धागा तैयार किया जाता है, जिसे कलश के चारों ओर बांधा जाता है। पूजा के दौरान भक्त चंदन, चावल, फूल, फल और 21 प्रकार के नैवेद्य भगवान को अर्पित करते हैं। अपनी श्रद्धा के अनुसार, व्रती को 21 आचार्यों या जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र और दक्षिणा देकर पूजा संपन्न करनी चाहिए। इस दिन उपवास का विशेष महत्व होता है, जहां अधिकांश भक्त एक दिन का उपवास रखते हैं, जबकि कुछ भक्त भगवान शिव के प्रति अपनी अनन्य भक्ति प्रदर्शित करने के लिए 21 दिनों तक व्रत का पालन करते हैं। पूजा के बाद, व्रती एक बार भोजन ग्रहण कर सकते हैं, और यदि पूर्ण उपवास संभव न हो, तो फल, दूध, और दही का सेवन कर सकते हैं। अंत में, भक्त भगवान शिव और देवी गौरी से समृद्धि, धन और जीवन की बाधाओं के निवारण के लिए प्रार्थना करते हैं, जिससे उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
केदार गौरी व्रत का महत्व
केदार गौरी व्रत भगवान शिव और देवी पार्वती के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है, जो मनोकामनाओं की पूर्ति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। यह व्रत न केवल भक्तों को आध्यात्मिक संतोष और मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति, धन और समृद्धि, स्वास्थ्य, तथा दीर्घ जीवन का आशीर्वाद भी देता है। इसके अतिरिक्त, 21 ब्राह्मणों को दान देने की परंपरा समाज में सहानुभूति और सहयोग की भावना को बढ़ावा देती है, जिससे यह अनुष्ठान सामूहिक खुशियों और सामाजिक एकता का प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार, केदार गौरी व्रत श्रद्धा, भक्ति और समाज सेवा का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करता है, जो जीवन में सुख, समृद्धि और शांति की स्थापना करता है।
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