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गौरी व्रत: पूजा विधि, नियम, महत्व और माता गौरी की कृपा
लेखक: रुचि

गौरी व्रत: पूजा विधि, नियम, महत्व और माता गौरी की कृपा

गौरी व्रत 2027 कब है और कब से शुरू होगा?

वर्ष 2027 में गौरी व्रत 14 जुलाई, बुधवार से प्रारंभ होगा और 18 जुलाई, रविवार को समाप्त होगा। यह पवित्र व्रत आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से शुरू होकर गुरु पूर्णिमा तक मनाया जाता है।

अधिक जानकारी, व्रत तिथि, शुभ मुहूर्त एवं गुरु पूर्णिमा तक चलने वाले गौरी व्रत के विस्तृत विवरण के लिए: -हमारा विस्तृत पंचांग अवश्य देखें। 

सनातन परंपरा में गौरी व्रत का विशेष महत्व है, क्योंकि यह माता पार्वती की आराधना और मनोवांछित वर प्राप्ति के लिए किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो अविवाहित कन्याएं श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करती हैं, उन्हें माता गौरी के आशीर्वाद से योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है तथा विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। वहीं विवाहित महिलाएं इस व्रत को दांपत्य सुख, पति की दीर्घायु और पारिवारिक समृद्धि की कामना से करती हैं।

गौरी व्रत गुजरात में तथा अन्य पूर्वी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला मुख्य व्रत है। यह व्रत पाँच दिनों का होता है, जो आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होता है और गुरु पूर्णिमा के दिन समाप्त होता है।

इस व्रत में माँ पार्वती की पूजा की जाती है। गौरी व्रत मुख्य रूप से अविवाहित कन्याएँ मनोवांछित वर प्राप्ति के लिए रखती हैं। जो कन्याएँ श्रद्धा भाव के साथ इस व्रत को करती है तो उन्हे माता पार्वती के आशीर्वाद से सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है तथा विवाह में आने वाली बाधाओं से निजात मिलता है।

जिस कन्या के विवाह में देरी हो रही हो, उसे गौरी व्रत अवश्य करना चाहिए। यह आवश्यक नहीं है कि इस व्रत को केवल अविवाहित कन्याएँ ही कर सकती हैं। विवाहित महिलायें भी अपने पति की दीर्घायु और वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाए रखने की कामना से इस व्रत को कर सकती है।

व्रत की पूजा विधि

गौरी व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान-ध्यान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनकर व्रत करने का संकल्प लें। इस व्रत के प्रथम दिन व्रत शुरू करते समय सर्वप्रथम एक चौकी पर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।

चौकी के पास ही बालू या रेत का एक हाथी बनाएं और एक मिट्टी के कलश या किसी बर्तन में गेहू या जौ के कुछ बीज बोकर उसे पूजा के स्थान पर रख दें। जिस पात्र में गेहू के बीज बोए हैं उसमें जल,अक्षत, पुष्प, रोली, और नगला (नगला रूई से बनी एक प्रकार की माला होती है जिसे कुमकुम से सजाया जाता है) चढ़ाएं।

भगवान शिव और माता पार्वती को फूल, फल, अक्षत, धतूरा, कुमकुम, दूध, दही, पंचामृत आदि नैवेद्यों को अर्पित करें साथ में हाथी को भी फूल फल अर्पित करें और सच्चे मन से पूजा करे। भगवान को भोग लगाए, आरती करे और अपनी सुख-समृद्धि के लिए भगवान से प्रार्थना करे। पूरे दिन उपवास रखे, शाम के समय आरती करके फल आदि खा सकते है।

प्रतिदिन इसी प्रकार पूजा करें। व्रत के समापन वाले दिन पूजा पाठ करने के पश्चात यदि संभव हो या अपने सामर्थ्य के अनुसार रात्रि में भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें। अगले दिन रेत के हाथी और गेहूं के पौधों को पात्र से निकालकर किसी पवित्र नदी या जल में प्रवाहित कर दें क्योंकि ऐसा करने से जल में रहने वाले जीवों को उनका भोजन प्राप्त होता है जिसका पुण्य आपको मिलता है। अंत में गरीब बच्चों को भोजन कराकर उन्हें अपने सामर्थ्य के अनुसार उनकी जरूरत की चीजें दान दें क्योंकि ऐसा करने से माता पार्वती प्रसन्न होती है और अपनी विशेष कृपा बनाए रखती हैं।

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व्रत के नियम

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से प्रारंभ होकर गुरु पूर्णिमा के दिन समाप्त होने वाला गौरी व्रत जितना ही फलदायी होता है उतना ही इस व्रत के नियम संयम कठिन होते हैं। इस व्रत की अवधि के दौरान सर्वप्रथम तो पूजा पूरे विधि-विधान और श्रद्धा भाव के साथ की जानी चाहिए साथ ही व्रत के दौरान बुरी संगत और गलत कार्यों से दूर रहना चाहिए।

जितना हो सके व्रत के दौरान मन में “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते रहें। व्रत का संकल्प लेते समय इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि व्रत के दौरान अन्न और नमक का प्रयोग पूर्णतया वर्जित होता है।

गौरी व्रत का महत्त्व

गौरी व्रत को जो अविवाहित कन्याएँ नियम संयम के साथ पूर्ण करती हैं माता पार्वती के आशीर्वाद से उन्हें उनके सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है या जिस मनोकामना को लेकर व्रत करती है उसकी पूर्ति होती है।

वहीं सुहागन स्त्रियों द्वारा इस व्रत को करने से उनको दाम्पत्य सुख व अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ जो स्त्रियाँ इस व्रत को करती है साथ ही व्रत के कठोर नियमों का पालन करती हैं भगवान शिव व माता पार्वती के आशीर्वाद से उन्हें उत्तम व स्वस्थ संतान की प्राप्ति होती है। साथ ही घर में चल रही क्लेश और बाधाओं से छुटकारा मिलता है।

यदि आप माता पार्वती द्वारा भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की पौराणिक कथा और उनकी तपस्या के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं तो: - शिव-पार्वती विवाह कथा से संबंधित हमारा विस्तृत लेख अवश्य पढ़ें। 

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