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दुर्गा विसर्जन: तिथि, पूजा विधि, महत्व और परंपरा
लेखक: रुचि

दुर्गा विसर्जन: तिथि, पूजा विधि, महत्व और परंपरा

नवरात्रि के नौ दिनों तक माँ दुर्गा की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने के बाद दुर्गा विसर्जन किया जाता है। शारदीय नवरात्रि में दशमी तिथि को माँ दुर्गा की पूजा, हवन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण करने के बाद उनकी पार्थिव प्रतिमा का विसर्जन करने की परंपरा है।

शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों की पूजा, देवी के नौ स्वरूप, तिथि और पूजा विधि की संपूर्ण जानकारी के लिए: - हमारा नवरात्रि लेख पढ़ें। 

यदि आप जानना चाहते हैं कि दुर्गा विसर्जन 2026 कब है, माँ दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन कैसे किया जाता है, इसका धार्मिक महत्व क्या है और विसर्जन के समय किन परंपराओं का पालन किया जाता है, तो इस लेख में आपको इसकी संपूर्ण जानकारी मिलेगी।

दुर्गा विसर्जन 2026 कब है?

दुर्गा विसर्जन 2026 में 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को है।

शारदीय नवरात्रि में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तिथि तक माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद दशमी तिथि यानी विजयादशमी के दिन माँ दुर्गा की पूजा करके उनकी पार्थिव प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

विसर्जन का समय और विधि अलग-अलग स्थानों तथा पारिवारिक परंपराओं के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए अपने शहर के अनुसार दुर्गा विसर्जन, दशमी तिथि और विसर्जन के शुभ समय की सही जानकारी के लिए: - हमारा विस्तृत पंचांग देखें। 

20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को विजयादशमी के अवसर पर माँ दुर्गा का विसर्जन किया जाएगा।

विजयादशमी 2026 की तिथि, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व जानने के लिए: -हमारा विजयादशमी लेख पढ़ें। 

दुर्गा विसर्जन क्या है?

नवरात्रि में प्रतिपदा से नवमी तक माँ दुर्गा की श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। इस दौरान भक्त देवी की सेवा, पूजा-अर्चना, हवन और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

दशमी तिथि को पूजा-अर्चना पूर्ण करने के बाद माँ दुर्गा की पार्थिव प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। धार्मिक परंपरा में पार्थिव प्रतिमा को विसर्जित करना पूजा के पूर्ण होने का प्रतीक माना जाता है।

यदि माँ दुर्गा की प्रतिमा किसी धातु से बनी हुई है, तो उसे जल में विसर्जित करने के बजाय उचित स्थान पर स्थापित करके आगे भी उसकी पूजा की जा सकती है।

दुर्गा विसर्जन का महत्व

शारदीय नवरात्रि की शुरुआत आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है। वहीं चैत्र नवरात्रि की शुरुआत चैत्र मास में होती है। नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है और दशमी तिथि को विसर्जन की परंपरा निभाई जाती है।

विसर्जन का अर्थ केवल पूजा का अंत नहीं माना जाता। सनातन परंपरा में विसर्जन को किसी धार्मिक कार्य के पूर्ण होने का प्रतीक भी माना जाता है।

माँ दुर्गा की पूजा नौ दिनों तक चलने के बाद प्रतिमा का विसर्जन करने से पूजा और अनुष्ठान को पूर्ण माना जाता है। अलग-अलग राज्यों और समुदायों में विसर्जन की विधि में कुछ अंतर हो सकता है, इसलिए अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार विसर्जन करना उचित माना जाता है।

दुर्गा विसर्जन की पूजा विधि

नवरात्रि में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दुर्गा विसर्जन करने की परंपरा है। विसर्जन से पहले माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना, अनुष्ठान और हवन करके प्रसाद का वितरण किया जाता है।

दुर्गा विसर्जन की सामान्य विधि इस प्रकार है:

1. सबसे पहले माँ दुर्गा की प्रतिमा के सामने पूजा-अर्चना करें। 

2. फूल, अक्षत, सिंदूर, धूप, नैवेद्य आदि अर्पित करें। 

3. माँ दुर्गा की आरती करें और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। 

4. नवरात्रि के दौरान स्थापित किए गए कलश की पूजा करें। 

5. कलश में भरे जल को किसी पवित्र वृक्ष, जैसे आम के वृक्ष, के नीचे अर्पित करें। 

6. माँ दुर्गा को अर्पित की गई पूजा और हवन सामग्री को व्यवस्थित करें। 

7. माँ दुर्गा की पार्थिव प्रतिमा को पूजा स्थान से सम्मानपूर्वक उठाकर विसर्जन स्थल तक ले जाएं। 

8. प्रतिमा को नदी, तालाब या निर्धारित विसर्जन स्थल पर ले जाते समय माँ दुर्गा का जयकारा लगाएं। 

9. वहाँ माँ दुर्गा को विदा करते हुए अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करें। 

10. अपनी मनोकामना की पूर्ति और परिवार के सुख-शांति के लिए माँ का आशीर्वाद मांगें। 

11. माँ दुर्गा का जयकारा लगाते हुए उनकी पार्थिव प्रतिमा का विसर्जन करें। 

सिंदूर खेला की परंपरा

पश्चिम बंगाल सहित कुछ क्षेत्रों में दुर्गा विसर्जन से पहले सिंदूर खेला की परंपरा भी निभाई जाती है। इसमें विवाहित महिलाएं पहले माँ दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस परंपरा के माध्यम से माँ दुर्गा से अखंड सौभाग्य और परिवार के कल्याण का आशीर्वाद मांगा जाता है।

दुर्गा विसर्जन के लिए नदी या तालाब न हो तो क्या करें?

यदि आपके निवास स्थान के पास नदी, तालाब या पोखर नहीं है, तो पारंपरिक रूप से बड़े पात्र में जल भरकर माँ दुर्गा की पार्थिव प्रतिमा का प्रतीकात्मक विसर्जन किया जा सकता है।

प्रतिमा के पूरी तरह घुल जाने के बाद उस जल को किसी पवित्र वृक्ष के नीचे अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।

हालांकि, प्रतिमा और विसर्जन सामग्री के संबंध में स्थानीय प्रशासन तथा पर्यावरण संबंधी नियमों का पालन करना भी आवश्यक है।

दुर्गा पूजा और विसर्जन की क्षेत्रीय परंपरा

दुर्गा पूजा का व्यापक पर्व असम, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड, मणिपुर और त्रिपुरा सहित कई राज्यों में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है।

इसके अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब और महाराष्ट्र सहित देश के अन्य हिस्सों में भी माँ दुर्गा की पूजा और विसर्जन की परंपरा देखने को मिलती है।

क्षेत्र के अनुसार विसर्जन की प्रक्रिया, धार्मिक अनुष्ठान और देवी को विदा करने की परंपराओं में अंतर हो सकता है।

दुर्गा विसर्जन के दिन क्या करें?

दुर्गा विसर्जन के दिन भक्त अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार:

• माँ दुर्गा की पूजा करें। 

• हवन और धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण करें। 

• माँ को फूल, अक्षत, सिंदूर और नैवेद्य अर्पित करें। 

• माँ दुर्गा की आरती करें। 

• प्रसाद का वितरण करें। 

• कलश की पूजा करके उसका जल उचित स्थान पर अर्पित करें। 

• माँ दुर्गा को श्रद्धापूर्वक विदा करें। 

• अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करें। 

• परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए माँ का आशीर्वाद लें। 

दुर्गा विसर्जन पर क्या न करें?

दुर्गा विसर्जन के समय धार्मिक श्रद्धा और पर्यावरण की स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए। इसलिए:

• प्रतिमा का अनादर न करें। 

• पूजा सामग्री को इधर-उधर न फेंकें। 

• विसर्जन स्थल को गंदा न करें। 

• स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित नियमों की अनदेखी न करें। 

• विसर्जन के दौरान अनावश्यक विवाद या अशांति से बचें। 

• पूजा और विसर्जन को केवल दिखावे तक सीमित न रखें। 

दुर्गा विसर्जन में कलश का क्या करें?

नवरात्रि के प्रारंभ में जिस कलश की स्थापना की जाती है, उसे भी नवरात्रि की पूजा पूर्ण होने पर उचित विधि से विसर्जित या समर्पित किया जाता है।

परंपरा के अनुसार कलश में भरे जल को किसी पवित्र वृक्ष, जैसे आम के वृक्ष, के नीचे अर्पित किया जा सकता है। इसे नकारात्मक ऊर्जा के नाश और सकारात्मक ऊर्जा के संचार से जोड़कर देखा जाता है।

दुर्गा विसर्जन में पूजा सामग्री का क्या करें?

नवरात्रि के नौ दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा, हवन और अनुष्ठान में उपयोग की गई सामग्री को विसर्जन के समय श्रद्धापूर्वक समर्पित करने की परंपरा है।

माँ को श्रृंगार में अर्पित की गई कुछ सामग्री को विवाहित महिलाएं प्रसाद के रूप में अपने पास रख सकती हैं और अपनी परंपरा के अनुसार उसका उपयोग कर सकती हैं।

हालांकि, सभी पूजा सामग्री को जल में प्रवाहित करना आवश्यक नहीं है। स्थानीय परंपरा और पर्यावरण संबंधी नियमों के अनुसार पूजा सामग्री का सम्मानपूर्वक निपटान करना बेहतर है।

दुर्गा विसर्जन का आध्यात्मिक संदेश

दुर्गा विसर्जन केवल माँ दुर्गा की प्रतिमा को जल में समर्पित करने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन में आगमन और प्रस्थान, निर्माण और विसर्जन तथा आरंभ और पूर्णता के भाव को समझने का अवसर भी देता है।

नवरात्रि के दौरान भक्त माँ दुर्गा की आराधना करके शक्ति, शांति और सकारात्मकता की कामना करते हैं। विसर्जन के समय देवी को विदा करते हुए भक्त उनके आशीर्वाद को अपने जीवन में बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।

यह भाव हमें याद दिलाता है कि देवी की उपासना केवल प्रतिमा तक सीमित नहीं है, बल्कि श्रद्धा और शक्ति का भाव हमारे भीतर भी बना रहना चाहिए।

दुर्गा विसर्जन 2026 से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. दुर्गा विसर्जन 2026 कब है?

दुर्गा विसर्जन 2026 में 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को है।

2. दुर्गा विसर्जन किस दिन किया जाता है?

शारदीय नवरात्रि में सामान्यतः दशमी तिथि यानी विजयादशमी के दिन माँ दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

3. क्या दुर्गा विसर्जन केवल नदी में ही किया जाता है?

परंपरागत रूप से नदी, तालाब या अन्य जलाशय में विसर्जन किया जाता रहा है। यदि ऐसा स्थान उपलब्ध न हो, तो स्थानीय परंपरा और प्रशासन द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार वैकल्पिक व्यवस्था की जा सकती है।

4. दुर्गा विसर्जन से पहले क्या पूजा करनी चाहिए?

विसर्जन से पहले माँ दुर्गा की पूजा, फूल, अक्षत, सिंदूर, धूप और नैवेद्य अर्पित करके आरती की जाती है। इसके बाद प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।

5. दुर्गा विसर्जन का क्या महत्व है?

धार्मिक परंपरा में विसर्जन को नवरात्रि की पूजा और अनुष्ठान के पूर्ण होने का प्रतीक माना जाता है। भक्त माँ दुर्गा को श्रद्धापूर्वक विदा करके उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं।

6. क्या दुर्गा विसर्जन दशमी के अलावा किसी अन्य दिन भी किया जा सकता है?

कुछ स्थानों पर प्रतिमाओं की संख्या अधिक होने या अन्य स्थानीय परिस्थितियों के कारण पंचांग के अनुसार एकादशी या द्वादशी को भी विसर्जन किया जाता है। यह स्थानीय परंपरा और शुभ समय पर निर्भर करता है।

दुर्गा विसर्जन 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त

दुर्गा विसर्जन 2026 में 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को किया जाएगा। विसर्जन के लिए अपने शहर के अनुसार शुभ समय और दशमी तिथि की जानकारी देखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में अंतर हो सकता है।

अपने शहर के अनुसार दुर्गा विसर्जन, विजयादशमी, दशमी तिथि और विसर्जन के शुभ मुहूर्त जानने के लिए: - हमारा विस्तृत पंचांग देखें। 

दुर्गा विसर्जन 2026 नवरात्रि की पूजा और साधना की पूर्णता का महत्वपूर्ण अवसर है। नौ दिनों तक माँ दुर्गा की पूजा-अर्चना, हवन और अनुष्ठान करने के बाद दशमी तिथि को माँ की पार्थिव प्रतिमा को श्रद्धापूर्वक विदा किया जाता है।

20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को माँ दुर्गा का विसर्जन किया जाएगा। भक्त अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार पूजा करके माँ दुर्गा से सुख, शांति, समृद्धि और परिवार के कल्याण का आशीर्वाद मांग सकते हैं।

माँ दुर्गा को विदा करते समय श्रद्धा के साथ प्रार्थना करें कि वे अगले वर्ष फिर हमारे घर और जीवन में आएं और अपनी कृपा बनाए रखें।

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