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दुर्गा अष्टमी (महागौरी): तिथि, पूजा विधि, महत्व और कन्या पूजन
लेखक: रुचि

दुर्गा अष्टमी (महागौरी): तिथि, पूजा विधि, महत्व और कन्या पूजन

नवरात्रि के पावन पर्व में दुर्गा अष्टमी का विशेष धार्मिक महत्व है। चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि, दोनों में अष्टमी तिथि को माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ माँ की आराधना करते हैं तथा कन्या पूजन, कन्या भोज, हवन और देवी पाठ जैसे धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

यदि आप जानना चाहते हैं कि दुर्गा अष्टमी 2026 कब है, माँ महागौरी की पूजा कैसे करें, कौन-सा भोग लगाएं, कन्या पूजन का क्या महत्व है और दुर्गा अष्टमी का धार्मिक महत्व क्या है, तो इस लेख में आपको इसकी विस्तृत जानकारी मिलेगी।

दुर्गा अष्टमी 2026 कब है?

दुर्गा अष्टमी 2026 में 19 अक्टूबर 2026, सोमवार को है।

यह शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि होगी। इस दिन माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की विशेष पूजा की जाती है। दुर्गा अष्टमी के अवसर पर भक्त माँ की आराधना के साथ कन्या पूजन, कन्या भोज, हवन और दुर्गा सप्तशती के पाठ जैसी धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं।

चैत्र और शारदीय नवरात्रि की तिथि, नौ दिनों की पूजा विधि, देवी के नौ स्वरूप और Navratri से जुड़ी संपूर्ण जानकारी के लिए: -हमारा विस्तृत नवरात्रि लेख पढ़ें। 

20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को महानवमी मनाई जाएगी।

चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि दोनों में दुर्गा अष्टमी आती है, लेकिन दोनों की तिथियां हर वर्ष पंचांग के अनुसार बदलती हैं। इसलिए अपने शहर के अनुसार अष्टमी तिथि और पूजा के शुभ मुहूर्त की जानकारी के लिए विस्तृत पंचांग देखना उचित है।

अपने शहर के अनुसार चैत्र नवरात्रि, शारदीय नवरात्रि, दुर्गा अष्टमी, नवमी और पूजा के शुभ समय जानने के लिए: -हमारा विस्तृत पंचांग देखें। 

दुर्गा अष्टमी और माँ महागौरी का स्वरूप

शारदीय या चैत्र नवरात्रि में माँ दुर्गा की महागौरी माता के रूप में पूजा की जाती है। माँ दुर्गा के 9 रूप और 10 महाविधाएं सभी आदिशक्ति के अंश और रूप ही हैं, लेकिन महागौरी भगवान शिव के साथ उनकी अर्धांगिनी के रूप में हमेशा विराजमान रहती हैं। देवी पार्वती ने राजा हिमालय के घर जन्म लिया था।

आठ वर्ष की आयु में ही उन्हें अपने पिछले जन्म की घटनाओं का स्मरण होने लगा था। तभी से ही उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या करनी शुरू कर दी थी। कठोर तपस्या के प्रभाव से देवी पार्वती को महान गौरव प्राप्त हुआ जिससे उनका नाम महागौरी पड़ गया।

महागौरी का वर्ण रूप से गौर अर्थात् सफेद है और इनके वस्त्र व आभूषण भी सफेद रंग के ही हैं। माँ का वाहन वृषभ अर्थात बैल है, जो भगवान शिव का भी वाहन है। माँ का दाहिना ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है और नीचे वाले हाथ में दुर्गा शक्ति का प्रतीक त्रिशुल है। महागौरी के बाएं ऊपर वाले हाथ में शिव का डमरू है।

डमरू धारण करने के कारण माँ को शिवा के नाम से भी जाना जाता है। मां का बायाँ नीचे वाला हाथ अपने भक्तों को अभय देता हुआ वरमुद्रा में हैं और मां सदैव शांत मुद्रा में वृषभ पर विराजमान रहती है। आदिशक्ति माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप में महागौरी माता की पूजा-अर्चना करने से सभी ग्रह-दोषों से मुक्ति मिल जाती है।

माँ गौरी की पूजा करने से वैवाहिक जीवन सुखमय हो जाता है, व्यापार बढ़ता है। धन समृद्धि में वृद्धि होती है। उनकी शक्ति अचूक और हमेशा पुण्यकारी व फलदायी है। महागौरी की पूजा करने से उपासक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, और वह अक्षय पुण्य के भागीदार हो जाता है।

पूजा के बाद घरों में कन्या पूजा अष्टमी तिथि को करना बहुत शुभकारी होता है। हालांकि कुछ लोग नवमी तिथि पर कन्या पूजा करते हैं। परंतु अष्टमी के दिन कन्याओं का पूजन , दान करना अति श्रेष्ठकारी माना गया है। कन्या पूजन में 9 कन्याओं का पूजन ,भोज और उनको दान देना अति शुभकारी होता है लेकिन यदि आपको 9 कन्याएं नहीं मिल पाती है तो कम से कम दो कन्याओं का पूजन करना अत्यंत आवश्यक होता है।

अष्टमी के दिन नारियल का भोग लगाने के बाद वही नारियल प्रसाद के रूप में कन्याओं और अन्य भक्तों को बांटा जाता है तथा कन्याओं के भोज के लिए हलवा-पूड़ी सब्जी और काले चने का प्रसाद अति उत्तम होता है। इन सब चीजों की व्यवस्था न होने पर भी आप अपनी श्रद्धा अनुसार कन्याओं को भोज और उनको दान दे सकते है।

दुर्गा अष्टमी का धार्मिक महत्व

दुर्गा अष्टमी के दिन माँ महागौरी की पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ माँ की आराधना करके सुख, सौभाग्य, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माँ महागौरी की पूजा करने से उपासक के पाप नष्ट होते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है। माँ की कृपा से वैवाहिक जीवन में सुख, व्यापार में वृद्धि तथा धन-समृद्धि प्राप्त होने की भी मान्यता है।

माँ महागौरी की शक्ति को अचूक, पुण्यकारी और फलदायी माना गया है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार माँ की पूजा करके उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं।

दुर्गा अष्टमी पूजा विधि

सुबह उठकर नित्यकर्म आदि करके पवित्र हो लें और पूजा स्थान को साफ करके पूजा प्रारंभ करे। पूजा स्थान पर बैठकर सबसे पहले माँ गौरी का ध्यान करें और अपने सुख और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें।

इसके बाद विधि पूर्वक इनकी पूजा करें। देवी दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी को मोगरा का फूल बहुत प्रिय है। ऐसे में साधक को इस दिन देवी माँ के चरणों में यह फूल अर्पित करना चाहिए। इसके साथ ही माँ को नारियल, बर्फी और लड्डू का भोग लगाएं क्योंकि नारियल को माँ का सबसे प्रिय प्रसाद माना जाता है।

अगर आप प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती के १३ अध्यायों का पाठ विधिपूर्वक कर सकते हैं तो अति उत्तम है और बहुत फलकारी है। पर अगर समय का अभाव है तो अपनी सुविधानुसार पूरे नौ दिनों में इन १३ अध्यायों का पाठ या श्रवण किया जा सकता है। लेकिन माता के 108 नामों का जाप प्रतिदिन करना अत्यंत आवश्यक और फलकारी होता है।

माता के नामों का जाप करते समय इनके नामों का अर्थ भी समझते रहना चाहिए। ऐसा करने से माँ बहुत प्रसन्न होती हैं और उपासक को सुख, समृद्धि और जीवन में सफलता प्राप्त करने का आशीर्वाद प्रदान करती है। माता जगदंबा के 108 नाम इस प्रकार हैं :-

1-ॐ सती नमः, 2- ॐ साध्वी नमः, 3- ॐ भवप्रीता नमः (भगवान शिव पर प्रीति रखने वाली), 4- ॐ भवानी नमः, 5- ॐ भवमोचनी नमः (संसार बन्धन से मुक्त करने वाली ), 6- ॐ आर्या नमः, 7- ॐ दुर्गा नमः, 8- ॐ जया नमः, 9- ॐ आद्या नमः, 10- ॐ त्रिनेत्रा नमः, 11 - ॐ शूलधारिणी नमः, 12- ॐ पिनाकधारिणी नमः, 13 - ॐ चित्रा नमः, 14- ॐ चण्डघण्टा नमः (प्रचण्ड स्वरसे घण्टानाद करने वाली), 15- ॐ महातपा नमः (भारी तपस्या करने वाली), 16- ॐ मन नमः (मनन- शक्ति), 17- ॐ बुद्धि नमः (बोधशक्ति), 18- ॐ अहंकारा नमः (अहंताका आश्रय), 19- ॐ चित्तरूपा नमः, 20- ॐ चिता नमः, 21- ॐ चिति नमः (चेतना), 22- ॐ सर्वमन्त्रमयी नमः, 23- ॐ सत्ता नमः (सत्-स्वरूपा), 24- ॐ सत्यानन्दस्वरूपिणी नमः, 25- ॐ अनन्ता नमः (जिनके स्वरूपका कहीं अन्त नहीं), 26 - ॐ भाविनी नमः (सबको उत्पन्न करनेवाली), 27- ॐ भाव्या नमः (भावना एवं ध्यान करनेयोग्य), 28- ॐ भव्या नमः (कल्याणरूपा), 29- ॐ अभव्या नमः (जिससे बढ़कर भव्य कहीं है नहीं), 30 – ॐ सदामति नमः, 31- ॐ शाम्भवी नमः (शिवप्रिया), 32- ॐ देवमाता नमः, 33- ॐ चिन्ता नमः, 34- ॐ रत्नप्रिया नमः, 35- ॐ सर्वविद्या नमः, 36- ॐ दक्षकन्या नमः, 37- ॐ दक्षयज्ञविनाशिनी नमः, 38- ॐ अपर्णा नमः (तपस्याके समय पत्तेको भी न खानेवाली), 39- ॐ अनेकवर्णा नमः (अनेक रंगोंवाली), 40- ॐ पाटला नमः (लाल रंगवाली), 41- ॐ पाटलावती नमः (गुलाबके फूल या लाल फूल धारण करनेवाली), 42- ॐ पट्टाम्बरपरीधाना नमः (रेशमी वस्त्र पहननेवाली), 43- ॐ कलमंजीररंजिनी नमः (मधुर ध्वनि करनेवाले मंजीरको धारण करके प्रसन्न रहनेवाली), 44- ॐ अमेयविक्रमा नमः (असीम पराक्रमवाली), 45- ॐ क्रूरा नमः (दैत्योंके प्रति कठोर), 46- ॐ सुन्दरी नमः, 47- ॐ सुरसुन्दरी नमः, 48 ॐ वनदुर्गा नमः, 49- ॐ मातंगी नमः, 50 - ॐ मतंगमुनिपूजिता नमः, 51- ॐ ब्राह्मी नमः, 52- ॐ माहेश्वरी नमः, 53- ॐ ऐन्द्री नमः, 54- ॐ कौमारी नमः, 55- ॐ वैष्णवी नमः, 56- ॐ चामुण्डा नमः, 57- ॐ वाराही नमः, 58- ॐ लक्ष्मी नमः,59 – ॐ पुरुषाकृति नमः, 60- ॐ विमला नमः, 61- ॐ उत्कर्षिणी नमः, 62- ॐ ज्ञाना नमः,63- ॐ क्रिया नमः, 64- ॐ नित्या नमः, 65- ॐ बुद्धिदा नमः, 66- ॐ बहुला नमः, 67- ॐ बहुलप्रेमा नमः, 68- ॐ सर्ववाहनवाहना नमः, 69- ॐ निशुम्भ-शुम्भहननी नमः,70- ॐ महिषासुरमर्दिनी नमः, 71- ॐ मधुकैटभहन्त्री नमः, 72 - ॐ चण्डमुण्डविनाशिनी नमः,73- ॐ सर्वासुरविनाशा नमः, 74- ॐ सर्वदानवघातिनी नमः,75- ॐ सर्वशास्त्रमयी नमः, 76- ॐ सत्या नमः, 77- ॐ सर्वास्त्रधारिणी नमः, 78- ॐ अनेकशस्त्रहस्ता नमः, 79- ॐ अनेकास्त्रधारिणी नमः, 80- ॐ कुमारी नमः, 81- ॐ एककन्या नमः, 82- ॐ कैशोरी नमः, 83- ॐ युवती नमः, 84- ॐ यति नमः, 85- ॐ अप्रौढा नमः, 86- ॐ प्रौढा नमः, 87- ॐ वृद्धमाता नमः, 88- ॐ बलप्रदा नमः, 89- ॐ महोदरी नमः, 90- ॐ मुक्तकेशी नमः, 91- ॐ घोररूपा नमः, 92- ॐ महाबला नमः, 93- ॐ अग्निज्वाला नमः, 94- ॐ रौद्रमुखी नमः, 95- ॐ कालरात्रि नमः 96- ॐ तपस्विनी नम, 97- ॐ नारायणी नमः, 98- ॐ भद्रकाली नमः, 99- ॐ विष्णुमाया नमः,100 - ॐ जलोदरी नमः, 101 - ॐ शिवदूती नमः, 102- ॐ कराली नमः, 103- ॐ अनन्ता नमः (विनाश रहिता), 104- ॐ परमेश्वरी नमः, 105- ॐ कात्यायनी नमः, 106 - ॐ सावित्री नमः, 107 - ॐ प्रत्यक्षा नमः, 108- ॐ ब्रह्मवादिनी नमः।। 

माता अपने भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होती हैं न कि दिखावे से इसलिए हम जो भी अपने सामर्थ्य अनुसार करें उसे पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ माता को अर्पित करें और किंचित मात्र भी अहंकार न करें और निरंतर मन में यह बात रखें कि हम सब उन्ही माँ की संतानें है। 

माँ दुर्गा शक्ति रूप हैं जो समस्त संसार में हर कण में व्याप्त हैं, यह वही योग निंद्रा हैं जो भगवान विष्णु के हृदय में व्याप्त हैं जिन्होंने महा विष्णु को भी घोर निंद्रा में डाल कर रखा हुआ है,

यही देवी सब प्राणियों में बुद्धि के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में निंद्रा के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में क्षुदा (भूख )के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में छाया के रूप में स्थित हैं,

यही देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में तृष्णा के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में क्षमा के रूप में स्थित हैं ,यही देवी सब प्राणियों में लज्जा के रूप में स्थित हैं,

यही देवी सब प्राणियों में शांति के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में कान्ति के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में श्रद्धा के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में लक्ष्मी के रूप में स्थित हैं,

यही देवी सब प्राणियों में वृत्ती के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में स्मृति के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में तुष्टि के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में दया के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में माता के रूप में स्थित हैं, यही देवी सब प्राणियों में भ्रांति के रूप में स्थित हैं,

यही देवी सब जगह हर एक कण में रहने वाली हैं, यही देवी चैतन्य रूप में सभी जीवों में सम्पूर्ण जगत में व्याप्त हैं, यही देवी कल्याणमयी, मंगलमयी और सभी आपत्तियों का नाश करने वाली है। अतः सम्पूर्ण जगत में जो शक्ति सारे कार्य करवा रही है वह शक्ति माँ दुर्गा ही है। 

पूरे नवरात्रि उत्सव में इन दुर्गा रूपी कन्याओं को भोजन कराना व उन्हे उनकी पसंदीदा वस्तुए या अपनी सामर्थ के अनुसार उन्हे वस्तुएं दान करना अतिफलदायी और शुभकारी होता है। 

नवरात्रि पर्व के दौरान पूरे नौ दिन कन्याओं को भोजन कराना व उन्हे दान देना शुभ होता है। लेकिन अगर आपके पास समय का अभाव है और आप प्रतिदिन कन्याओं को भोज नहीं करा सकतें है तो नौ दिनों में किसी भी दिन कन्याओं को भोजन और वस्तुओं का दान कर सकते हैं।

यह परंपरा सनातन काल से चली आ रही है और इसका सामाजिक महत्त्व भी बहुत है। इसका अर्थ यह है कि सनातन समाज ने हमेशा से ही पुरुष और नारी को एक समान माना है। सनातन धर्म के अनुसार नारी शक्ति के बिना पुरुष शक्ति बिल्कुल व्यर्थ है। 

एक पुरुष परिवार या वंश के उत्थान में जितनी अहम भूमिका निभाता है उससे कहीं ज्यादा एक नारी अपने परिवार के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रकार यह पर्व नारी का समाज मे और कन्या के घर में होने के महत्त्व को दर्शाता है। 

चैत्र नवरात्रि 2027 की तिथि, घटस्थापना मुहूर्त, नौ दिनों की पूजा, दुर्गा अष्टमी, राम नवमी और व्रत के नियमों की संपूर्ण जानकारी के लिए पढ़ें: [चैत्र नवरात्रि 2027]। 

चैत्र और शारदीय नवरात्रि में दुर्गा अष्टमी

दुर्गा अष्टमी चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि दोनों में मनाई जाती है।

दोनों नवरात्रियों में अष्टमी तिथि को माँ महागौरी की पूजा, देवी आराधना और कई स्थानों पर कन्या पूजन की परंपरा है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की विधि तथा धार्मिक परंपराओं में अंतर हो सकता है।

चैत्र नवरात्रि की अष्टमी और शारदीय नवरात्रि की अष्टमी की तिथि हर वर्ष अलग होती है। इसलिए किसी विशेष वर्ष में सही तिथि जानने के लिए पंचांग देखना चाहिए।

दुर्गा अष्टमी 2026 में शारदीय नवरात्रि के दौरान 19 अक्टूबर, सोमवार को है।

चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि की तिथि, अष्टमी-नवमी और अपने शहर के अनुसार शुभ मुहूर्त जानने के लिए: -हमारा विस्तृत पंचांग देखें। 

दुर्गा अष्टमी पर दुर्गा सप्तशती का पाठ

दुर्गा अष्टमी के दिन माँ दुर्गा की आराधना के साथ दुर्गा सप्तशती का पाठ या श्रवण करना भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

यदि साधक प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती के सभी 13 अध्यायों का पाठ कर सकता है, तो श्रद्धा के साथ ऐसा करना उत्तम माना जाता है। यदि समय का अभाव हो तो अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार नवरात्रि के नौ दिनों में पाठ या श्रवण किया जा सकता है।

इसके साथ माँ दुर्गा के नामों का जाप भी श्रद्धा के साथ किया जा सकता है। देवी के नामों का जाप करते समय उनके अर्थ को समझने का प्रयास करना भी साधना को अधिक भावपूर्ण बना सकता है।

माँ दुर्गा का सर्वव्यापी स्वरूप

माँ दुर्गा को आदिशक्ति और जगदंबा के रूप में माना जाता है। देवी उपासना की परंपरा में शक्ति को सम्पूर्ण संसार में व्याप्त माना गया है।

देवी को सभी प्राणियों में बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षमा, लज्जा, शांति, कांति, श्रद्धा, लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, तुष्टि और दया के रूप में स्थित माना गया है।

इसी भाव से माँ दुर्गा को सम्पूर्ण जगत में व्याप्त शक्ति और चेतना के रूप में देखा जाता है। वे कल्याणमयी, मंगलमयी और सभी आपत्तियों का नाश करने वाली शक्ति मानी जाती हैं।

इसलिए दुर्गा अष्टमी की पूजा केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं है, बल्कि अपने भीतर स्थित शक्ति, श्रद्धा और सकारात्मक चेतना को पहचानने का भी अवसर है।

नवरात्रि में कन्या पूजन का महत्व

पूरे नवरात्रि पर्व में कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान देने की परंपरा है। कन्या पूजन के माध्यम से नारी शक्ति के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त किया जाता है।

नवरात्रि के पूरे नौ दिनों में कन्याओं को भोजन कराना और उन्हें अपनी सामर्थ्य के अनुसार वस्तुएं दान करना शुभ माना जाता है। यदि प्रतिदिन कन्या पूजन संभव न हो तो नवरात्रि में अपनी सुविधा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार किसी भी दिन कन्या पूजन किया जा सकता है।

कन्या पूजन की यह परंपरा धार्मिक होने के साथ-साथ सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण संदेश देती है। यह हमें नारी के सम्मान और परिवार तथा समाज में उसके महत्वपूर्ण योगदान का स्मरण कराती है।

दुर्गा अष्टमी पर क्या करें?

दुर्गा अष्टमी के दिन भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार:

• माँ महागौरी की पूजा करें। 

• दुर्गा सप्तशती का पाठ या श्रवण करें। 

• देवी के नामों और मंत्रों का जाप करें। 

• माँ को पुष्प और भोग अर्पित करें। 

• कन्या पूजन एवं कन्या भोज करें। 

• जरूरतमंद लोगों को भोजन या वस्तुओं का दान करें। 

• परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें। 

• अपने भीतर के क्रोध, लोभ, अहंकार और नकारात्मक विचारों का त्याग करने का संकल्प लें। 

दुर्गा अष्टमी पर क्या न करें?

दुर्गा अष्टमी के दिन धार्मिक भावना और श्रद्धा बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए:

• पूजा के दौरान किसी का अपमान न करें। 

• क्रोध, विवाद और नकारात्मक व्यवहार से बचें। 

• देवी-देवताओं के प्रति अनादर न करें। 

• केवल दिखावे के लिए पूजा या अनुष्ठान न करें। 

• अपनी पारिवारिक और धार्मिक परंपरा के विरुद्ध कोई अनुष्ठान न करें। 

• पूजा और दान करते समय अहंकार से बचें। 

दुर्गा अष्टमी का आध्यात्मिक संदेश

माँ दुर्गा शक्ति का स्वरूप हैं और यह शक्ति प्रत्येक जीव में किसी न किसी रूप में विद्यमान मानी जाती है।

दुर्गा अष्टमी हमें यह संदेश देती है कि बाहरी पूजा के साथ-साथ हमें अपने भीतर की शक्ति और चेतना को भी पहचानना चाहिए।

क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और नकारात्मक विचारों पर विजय प्राप्त करना भी देवी आराधना का महत्वपूर्ण आध्यात्मिक संदेश माना जा सकता है।

जब मनुष्य अपने भीतर के विकारों को दूर करने का प्रयास करता है, तब उसका चित्त अधिक शांत और शुद्ध होता है। यही आत्मशुद्धि देवी उपासना के आध्यात्मिक उद्देश्य को और गहरा करती है।

दुर्गा अष्टमी 2026 से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. दुर्गा अष्टमी 2026 कब है?

दुर्गा अष्टमी 2026 में 19 अक्टूबर 2026, सोमवार को है।

2. दुर्गा अष्टमी किस देवी को समर्पित है?

दुर्गा अष्टमी के दिन माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की पूजा की जाती है।

3. क्या दुर्गा अष्टमी चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्रि में आती है?

हाँ। चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि दोनों में अष्टमी तिथि को दुर्गा अष्टमी मनाई जाती है। दोनों की तिथि हर वर्ष पंचांग के अनुसार अलग होती है।

4. दुर्गा अष्टमी पर कन्या पूजन क्यों किया जाता है?

धार्मिक परंपरा में कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में मानकर उनका पूजन और सम्मान किया जाता है। कन्या पूजन के माध्यम से नारी शक्ति के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।

5. दुर्गा अष्टमी पर माँ महागौरी को कौन-सा भोग लगाएं?

माँ महागौरी को श्रद्धा के अनुसार नारियल, बर्फी और लड्डू का भोग लगाया जा सकता है। कन्या भोज में हलवा, पूरी, सब्जी और काले चने का प्रसाद भी कराया जाता है।

6. दुर्गा अष्टमी पर क्या पूजा करनी चाहिए?

इस दिन माँ महागौरी की पूजा, आरती, मंत्र-जप, दुर्गा सप्तशती का पाठ या श्रवण और अपनी परंपरा के अनुसार कन्या पूजन किया जा सकता है।

दुर्गा अष्टमी चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि दोनों का महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन माँ दुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। कन्या पूजन, कन्या भोज, दान, दुर्गा सप्तशती का पाठ और देवी के नामों का जाप इस दिन की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल हैं।

दुर्गा अष्टमी 2026 में 19 अक्टूबर, सोमवार को है। भक्त अपनी श्रद्धा, सामर्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार माँ महागौरी की पूजा करके सुख, शांति, सौभाग्य और समृद्धि की प्रार्थना कर सकते हैं।

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