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स्कंद षष्ठी कब है? तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व और लाभ जानें
लेखक: रुचि

स्कंद षष्ठी कब है? तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व और लाभ जानें

स्कंद षष्ठी 2026 में कब है?

अक्टूबर 2026 की स्कंद षष्ठी 16 अक्टूबर 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इस दिन षष्ठी तिथि का प्रारंभ 16 अक्टूबर को रात 3:27 AM बजे होगा और इसका समापन 17 अक्टूबर को सुबह 5:55 AM बजे होगा।

स्कंद षष्ठी 2026 की तिथि और समय

स्कंद षष्ठी 2026 - 16 अक्टूबर 2026

· तिथि: षष्ठी

· षष्ठी तिथि आरंभ: 16 अक्टूबर 2026 को रात 3:27 AM बजे

· षष्ठी तिथि समाप्त: 17 अक्टूबर 2026 को सुबह 5:55 AM बजे

“2026 की सभी स्कंद षष्ठी तिथियां, नक्षत्र और सटीक समय जानने के लिए हमारा विस्तृत पंचांग जरूर देखें।”

स्कंद षष्ठी क्या है?

स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय को समर्पित व्रत है, जो हर माह शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन पूजा करने से शक्ति, साहस और बाधाओं से मुक्ति मिलती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी तिथि पर भगवान कार्तिकेय का प्राकट्य हुआ था। वे भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र हैं तथा देवताओं के सेनापति माने जाते हैं।

मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय ने इसी दिन तारकासुर जैसे शक्तिशाली राक्षस का वध कर देवताओं को विजय दिलाई थी।

कार्तिकेय के पूजन का महत्व कुछ मुख्य आधारों पर है:

मनोकामना सिद्धि: भगवान कार्तिकेय के पूजन से आपकी मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है। श्रद्धालु भक्त इस दिन पूजा और व्रत करके अपनी इच्छाओं को प्राप्त करने की कामना करते हैं।

रोग और दुःखों का निवारण: स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा से रोग, दरिद्रता और दुःखों का निवारण होता है। भक्त इस दिन उनसे कृपा और आशीर्वाद मांगते हैं।

श्रेष्ठता के प्रतीक: कार्तिकेय को देवताओं के सेनापति और शक्ति का अधिदेव माना जाता है। उनके पूजन से भक्तों को सामरिक शक्ति, वीरता, और सौभाग्य प्राप्त होता है।

नारद और लोभ का उद्धार: एक पौराणिक कथा के अनुसार, कार्तिकेय के पूजन के दिन भगवान विष्णु ने मोह में पड़े नारद ऋषि का उद्धार किया और उन्हें लोभ से मुक्ति प्रदान की थी। इसीलिए कार्तिकेय के साथ भगवान विष्णु को भी पूजा जाता है।

पूजा विधि: -

स्कंद षष्ठी के दिन, सुबह स्नान कर शुद्धि करें। पूजा के लिए एक पवित्र स्थान तैयार करें, जिसमें पूजा थाली, मूर्तियाँ, धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य, जल, रोली, चावल, दूध, और पूजा सामग्री रखें। सबसे पहले भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान कार्तिकेय, गणेश जी, और गंगा माता की पूजा करें। भगवान कार्तिकेय के मंत्रों का जाप करें।

इसके बाद देवताओं की पुष्प, धूप, दीप, और नैवेद्य से अर्चना करें और आरती उतारें। व्रत रखने पर, उसके नियमों का पालन करें। स्कंद पुराण की कथा सुनें या पढ़ें और अंत में दान करें। पूरी भक्ति और श्रद्धा से भगवान कार्तिकेय की पूजा करें, जिससे आपको शांति और समृद्धि की प्राप्ति हो।

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स्कंद षष्ठी व्रत कथा: भगवान कार्तिकेय का जन्म और तारकासुर वध

दक्ष प्रजापति ने जब यज्ञ प्रयोजन रचा तो सती माता बिना बुलाये ही चली गयी और अपने पति शिव जी का स्थान न देखकर और शिवजी का अपमान सहन न कर पाने के कारण उसी यज्ञ में अपनी आहुति दे दी। जब यह खबर राक्षसों ने सुनी तो उन्होंने आतंक करना शुरू कर दिया।

राक्षस तारकासुर ने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया। तारकासुर राक्षस को यह वरदान था कि उसका वध केवल शिव पुत्र ही कर सकते है। और सती का यज्ञ में भस्म हो जाना उनके लिए हर्ष की बात थी क्योकि अब शिव पुत्र का जन्म होना असंभव है ऐसा उन्होंने सोचा।

सती के अग्नि में भस्म हो जाने के कारण शिव जी बहुत क्रोधित हुए और घोर तपस्या में लीन हो गए। सभी राक्षसों को किसी भी प्रकार का भय नहीं था, राक्षसों के आतंक से पीड़ित होकर सभी देवता ब्रह्माजी के पास गए और उनसे अपनी परेशानी को दूर करने का उपाय पूछने लगे। उधर भगवान हरि के वरदान स्वरूप माता सती ने पर्वतराज हिमाचल के घर जन्म लिया तदन्तर कुछ समय के बाद पार्वती जी का विवाह शिव जी के साथ हुआ।

पार्वती जी एक बार एक सरोवर के तट के किनारे विहार कर रही थी वह सरोवर सुवर्णमय कमलों से सुशोभित था। वे सखियों के साथ साथ सरोवर के किनारे बैठी थी उन्हे सरोवर के निर्मल और पंकजो से सुशोभित जल पीने की इच्छा हुई इतने मे ही उन्हे सूर्य के समान तेजस्विनी छः कृत्तिकाये दिखाई दी वे कमल के पत्ते से उस सरोवर का जल लेकर जब अपने घर को जाने लगी , तब पार्वती देवी ने खुश होकर कहा -देवियों ! कमल के पत्ते मे रखे जल को मै भी देखना चाहती हूं ।

वे बोली- सुमुखि ! हम तुम्हें एक शर्त पर जल दे सकते है कि तुम्हारे प्रिय गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न हो ,वह पुत्र हम लोगों का भी माना जाए एवं वह पुत्र हम लोगों मे भी मात्रत्व रखने वाला हो और हमारा रक्षक हो। उनकी बात सुनकर पार्वती जी ने कहा - अच्छा ऐसा ही होगा। यह उत्तर पाकर कृत्तिकाओ को बहुत खुशी हुई और उन्होंने कमल-पत्र मे स्थित जल मे से थोड़ा जल माता पार्वती जी को भी दे दिया। उनके साथ माता पार्वती जी ने भी क्रमशः उस जल का पान किया।

जल पीने के तुरंत बाद ही रोग-शोक का नाश करने वाला एक सुंदर और अद्भुत बालक भगवती पार्वती की दाहिनी कोख से उत्पन्न हुआ । उस बालक का शरीर सूर्य की किरणों के समान प्रकाश -पुंज से व्याप्त था। उसने अपने हाथ मे तीक्ष्ण शक्ति, शूल और अंकुश धारण कर रखे थे। वह अग्नि के समान तेजस्वी और सुवर्ण के समान गोरे रंग का बालक दैत्यों को मारने के लिए प्रकट हुआ था, इसलिए उसका नाम 'कुमार' हुआ।

वह कृत्तिका के दिए हुए जल से साखाओ सहित प्रकट हुआ था। वे कल्याणमयी शाखाये छहों मुखों के रूप मे विस्तृत थीं, इन्ही सब कारणों से वह बालक तीनों लोको मे विशाख, स्कन्द, षड़ानन और कार्तिकेय आदि नामों से विख्यात हुआ। तत्पश्चात देवताओं के स्तवन और आग्रह के उपरांत कार्तिकेय महाराज ने तारक नामक दैत्य का नरसंहार किया।

जब उन्होंने तारकासुर दैत्य को मार डाला तब देवताओं ने खुश होकर कार्तिकेय महाराज को वरदान दिए कि जो परम बुद्धिमान मनुष्य कार्तिकेय जी से संबंधित इस कथा को सुनेगा अथवा सुनायेगा वह यशस्वी होगा उसकी आयु बढ़ेगी ,वह सौभाग्यशाली,समस्त प्राणियों से निर्भय तथा सब दुखों से मुक्त होगा।

इस प्रकार चूकि भगवान कार्तिकेय का जन्म शुक्ल पक्ष की षष्टी तिथि को हुआ था, इसलिए शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि के दिन स्कंद षष्ठी व्रत किया जाता है।

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