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प्रदोष व्रत कब है? क्या है, पूजा का सही समय, विधि और महत्व जानें
लेखक: रुचि

प्रदोष व्रत कब है? क्या है, पूजा का सही समय, विधि और महत्व जानें

प्रदोष व्रत कब होता है और किस तिथि को रखा जाता है?

प्रदोष व्रत 2026 कब है? यह सवाल हर शिव भक्त के मन में रहता है। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है, जो हर महीने में दो बार—कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। इस प्रकार पूरे साल में लगभग 24 प्रदोष व्रत होते हैं।

आश्विन मास में अक्टूबर 2026 के दो प्रदोष व्रत पड़ेंगे। कृष्ण पक्ष का प्रदोष व्रत 7 अक्टूबर 2026, बुधवार को और शुक्ल पक्ष का प्रदोष व्रत 23 अक्टूबर 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा।

7 अक्टूबर 2026 — कृष्ण पक्ष प्रदोष व्रत

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष का प्रदोष व्रत 7 अक्टूबर 2026, बुधवार को रखा जाएगा। इस दिन त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 7 अक्टूबर को रात 11:17 बजे होगा और इसका समापन 8 अक्टूबर को रात 10:15 बजे होगा।

तिथि: त्रयोदशी

प्रारंभ: 7 अक्टूबर 2026 को रात 11:17 बजे

समाप्त: 8 अक्टूबर 2026 को रात 10:15 बजे

23 अक्टूबर 2026 — शुक्ल पक्ष प्रदोष व्रत

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष का प्रदोष व्रत 23 अक्टूबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन त्रयोदशी तिथि का प्रारंभ 23 अक्टूबर को दोपहर 2:36 बजे होगा और इसका समापन 24 अक्टूबर को दोपहर 1:36 बजे होगा।

तिथि: त्रयोदशी

प्रारंभ: 23 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2:36 बजे

समाप्त: 24 अक्टूबर 2026 को दोपहर 1:36 बजे

प्रदोष व्रत: 23 अक्टूबर 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा।

यदि आप प्रदोष व्रत 2026 की सभी तिथियां, व्रत कब है और किस दिन प्रदोष व्रत रखा जाएगा, इसकी पूरी जानकारी चाहते हैं, तो नीचे आपको पूरे साल के प्रदोष व्रत की सूची मिल जाएगी।

सभी व्रतों की सटीक तिथि, दिन और पंचांग विवरण जानने के लिए हमारा विस्तृत पंचांग अवश्य देखें। 

प्रदोष काल क्या होता है और पूजा कब करें?

प्रदोष व्रत में पूजा का सबसे शुभ समय प्रदोष काल कहलाता है, जो सूर्यास्त के बाद लगभग 1 से 1.5 घंटे तक रहता है। इसे गोधूलि समय भी कहते है। इसी समय भगवान शिव की पूजा, अभिषेक और आरती करना सबसे फलदायी माना जाता है।

ध्यान रखें:

प्रदोष व्रत उसी दिन माना जाता है, जिस दिन सूर्यास्त (प्रदोष काल) में त्रयोदशी तिथि होती है।

• अगर सुबह द्वादशी हो लेकिन शाम तक त्रयोदशी आ जाए - उसी दिन व्रत रखें 

• अगर सूर्यास्त के समय चतुर्दशी हो जाए - वह दिन मान्य नहीं होता 

इसलिए सही पूजा समय जानना बेहद जरूरी है।

यदि आप अपने शहर के अनुसार प्रदोष व्रत 2026 का सटीक पूजा मुहूर्त जानना चाहते हैं, तो हमारे अनुभवी पंडितों से मुहूर्त परामर्श अवश्य लें। 

प्रदोष व्रत की पूजा विधि

प्रदोष काल में भगवान सदाशिव के लिंग स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। स्नान करने के बाद तिल, आंवला, सुगंधित द्रव्य, पुष्प और फलों से भगवान शिव का पूजन करें। इसके पश्चात प्रदोष काल में विधिपूर्वक शिवलिंग की पूजा-अर्चना करें।

कुएं या तालाब में सीधे उतरकर स्नान करना अशुभ माना गया है। इसलिए रस्सी और पात्र की सहायता से जल निकालकर स्नान करना चाहिए। नदियों में स्नान सबसे उत्तम बताया गया है और यदि गंगा स्नान का अवसर मिले तो उसे सर्वोत्तम माना गया है।

प्रदोष काल में स्नान के बाद मौन रहना चाहिए। भगवान शिव के समीप एक हजार दीपक जलाने का विधान है। यदि यह संभव न हो तो सौ या बत्तीस दीपक जलाने चाहिए। यदि इतना भी संभव न हो तो घी का दीपक अवश्य जलाना चाहिए, क्योंकि घी का दीप भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना गया है।

इसके साथ ही भगवान शिव के लिंग स्वरूप की षोडशोपचार विधि से पूजा करनी चाहिए, जिसमें फल, धूप, नैवेद्य, गंध और पुष्प आदि अर्पित किए जाते हैं। पूजा के बाद श्रद्धापूर्वक 108 बार भगवान शिव की परिक्रमा करनी चाहिए और भक्तिभाव से प्रार्थना करनी चाहिए। इसके पश्चात भगवान रुद्र के 108 नामों का जप करना शुभ माना जाता है।

इस प्रकार श्रद्धा और नियमपूर्वक प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।

यदि आप प्रदोष व्रत की सही पूजा विधि, शिव पूजन या अपनी कुंडली अनुसार विशेष मार्गदर्शन जानना चाहते हैं, तो हमारे अनुभवी आचार्यों से निःशुल्क परामर्श प्राप्त करें। 

प्रदोष व्रत की कथा

विदर्भ देश में सत्यरथ नाम के एक प्रसिद्ध राजा राज्य करते थे। वे धर्मपरायण, सत्यवादी और गुणवान राजा थे। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय धर्म के मार्ग पर चलते हुए व्यतीत किया था।

एक समय शाल्व देश के राजाओं ने विदर्भ नगरी पर आक्रमण कर दिया। राजा सत्यरथ ने वीरतापूर्वक युद्ध किया और अनेक शत्रुओं का संहार किया, किंतु अंततः वे युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए।

उस समय रानी गर्भवती थीं। पति की मृत्यु के शोक में वे राजमहल छोड़कर पश्चिम दिशा की ओर चली गईं। कुछ समय बाद वे एक सरोवर के किनारे एक वटवृक्ष के नीचे विश्राम करने लगीं। वहीं उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया।

पुत्र जन्म के तुरंत बाद अत्यधिक प्यास के कारण वे सरोवर में जल पीने उतरीं, तभी एक मगरमच्छ ने उन्हें पकड़ लिया और उनका अंत हो गया। इस प्रकार राजा और रानी दोनों के निधन के बाद वह बालक अनाथ हो गया।

कुछ समय बाद उमा नाम की एक निर्धन ब्राह्मणी उस स्थान पर आई। उसने उस बालक को देखा और आश्चर्यचकित हो गई कि यह बालक कौन है और किस कुल से संबंधित है। उसके मन में बालक को अपनाने की इच्छा हुई, लेकिन भय के कारण वह असमंजस में पड़ गई।

तभी वहां महर्षि शांडिल्य आए। उन्होंने उमा और उस अनाथ बालक को देखकर कहा, “भक्ति का प्रभाव अत्यंत अद्भुत होता है। यह बालक राजवंश में जन्म लेकर भी दूसरे के संरक्षण में अनाथ जीवन व्यतीत कर रहा है। इसके आचरण ब्राह्मणों के समान हैं, जबकि यह जन्म से क्षत्रिय है।”

यह सुनकर उमा ने महर्षि को प्रणाम किया और बालक के विषय में जानने की इच्छा प्रकट की। महर्षि ने बताया कि यह बालक विदर्भ के राजा सत्यरथ का पुत्र है और उसके माता-पिता की मृत्यु अत्यंत दुखद परिस्थितियों में हुई थी।

उमा यह सुनकर अत्यंत द्रवित हुई और उसने उस बालक को अपना पुत्र मानकर पालन-पोषण करने का निर्णय लिया। वह दोनों बच्चों को अपने घर ले आई और उनका पालन करने लगी।

एक दिन वह भिक्षा मांगने के लिए मंदिर गई, जहां पुनः महर्षि शांडिल्य से उसकी भेंट हुई। महर्षि ने बताया कि यह बालक पिछले जन्म में पांड्य देश के राजा का पुत्र था। उसका परिवार धर्म और शास्त्रों का ज्ञाता था।

एक बार प्रदोष काल में राजा भगवान शिव की पूजा कर रहे थे। उसी समय नगर में भारी उपद्रव मच गया। शोर सुनकर राजा अधूरी पूजा छोड़कर वहां चले गए। उस अवसर का लाभ उठाकर राजा के शत्रु मंत्री को पकड़कर उनके सामने लाया गया। क्रोधित होकर राजा ने मंत्री का वध कर दिया और क्रोध में शिव पूजा को अधूरा छोड़कर भोजन करके सो गए।

भगवान शिव की पूजा अधूरी छोड़ने और क्रोधवश हिंसा करने के कारण राजा का जीवन अधूरा रह गया और उन्हें मृत्यु प्राप्त हुई। उसी अधूरे पुण्य और दोष के कारण उनके पुत्र का यह जन्म हुआ।

महर्षि ने आगे बताया कि पिछले जन्म में बालक की माता ने छलपूर्वक एक स्त्री की हत्या की थी, जिसके फलस्वरूप इस जन्म में मगरमच्छ द्वारा उनकी मृत्यु हुई।

महर्षि ने कहा कि यह बालक पूर्व जन्म में एक सदाचारी ब्राह्मण था, इसलिए इसमें ब्राह्मण जैसे गुण दिखाई देते हैं। किंतु उसने यज्ञ और पुण्य कर्म नहीं किए थे, जिसके कारण उसे इस जन्म में दरिद्रता का सामना करना पड़ रहा है।

इन सभी दुखों और कष्टों से मुक्ति पाने के लिए महर्षि शांडिल्य ने भगवान शिव की शरण लेकर श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत करने का उपदेश दिया।

प्रदोष व्रत के लाभ

• भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

• जीवन के कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं।

• मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।

• मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

• परिवार में सुख-समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है। 

प्रदोष काल में क्या करना चाहिए?

• भगवान शिव का रुद्राभिषेक करें। 

• “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें। 

• घी का दीपक जलाएं। 

• शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करें। 

• जरूरतमंद लोगों को दान करें। 

यदि आप प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने हेतु सही पूजा विधि, रुद्राभिषेक या विशेष शिव अनुष्ठान कराना चाहते हैं, तो सनातन ज्योति में अनुभवी वैदिक आचार्यों द्वारा सभी अनुष्ठान पूर्ण विधि-विधान और पारदर्शिता के साथ संपन्न कराए जाते हैं।

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