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मासिक दुर्गाष्टमी कब है? तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व और लाभ जानें
लेखक: रुचि

मासिक दुर्गाष्टमी कब है? तिथि, पूजा विधि, कथा, महत्व और लाभ जानें

मासिक दुर्गाष्टमी 2026 कब है?

मासिक दुर्गाष्टमी माँ दुर्गा को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत है, जो प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्त श्रद्धा और विधिपूर्वक पूजा कर माँ दुर्गा की कृपा प्राप्त करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

सितंबर 2026 की मासिक दुर्गाष्टमी 19 सितंबर 2026, शनिवार को मनाई जाएगी। यह अष्टमी तिथि के आधार पर मनाई जाने वाली मासिक दुर्गाष्टमी है।

मासिक दुर्गाष्टमी 2026 की तिथि और समय

19 सितंबर 2026

• व्रत: मासिक दुर्गाष्टमी 

• तिथि: अष्टमी 

• तिथि प्रारंभ: 18 सितंबर 2026 को दोपहर 1:03 बजे 

• तिथि समाप्त: 19 सितंबर 2026 को दोपहर 3:28 बजे

मासिक दुर्गाष्टमी 2026 की सभी तिथियां और पंचांग अनुसार जानकारी जानने के लिए हमारा विस्तृत पंचांग अवश्य देखें।  

मासिक दुर्गाष्टमी माँ दुर्गा को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत है, जो प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाता है। इस दिन भक्त माँ दुर्गा की पूजा कर उनकी कृपा प्राप्त करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

चूंकि यह व्रत हर महीने आता है, इसलिए इसकी सटीक तिथि और शुभ मुहूर्त की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक होता है, ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त किया जा सके।

क्योंकि सही विधि और शुभ मुहूर्त में की गई पूजा का फल अधिक मिलता है,

इसलिए यदि आप अपने स्थान और कुंडली के अनुसार सटीक मुहूर्त जानना चाहते हैं, तो हमारे अनुभवी पंडितों से निःशुल्क परामर्श ले सकते हैं।  

मासिक दुर्गाष्टमी क्या है?

मासिक दुर्गा अष्टमी माता दुर्गा का त्योहार है जो प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को माँ दुर्गा की कृपा पाने के लिए मनाया जाता है । इस व्रत को करने का अत्यंत महत्त्वपूर्ण विधान है। 

सभी माह की पूजा का विधान अगल-अलग बताया गया है।

नारद पुराण के अनुसार :- चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को माँ भवानी की उत्पत्ति हुई थी। इस दिन पूजन करने के पश्चात भक्त हर्षोल्लास के साथ माता की यात्रा का महान उत्सव मनाते हैं। यह दिन जगदम्बा के दर्शन करने के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है।

इस दिन करुणामयी माँ जगदम्बा के दर्शन मनुष्यों के लिए सर्वथा कल्याण करने वाला होता है। विशेषतः, इस दिन अशोक कलिका खाने का भी विधान है।

जो लोग चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को पुनर्वसु नक्षत्र में अशोक की आठ कलिकाओं को ग्रहण करते है, वे ईश्वर की कृपा से सदैव सुख ही प्राप्त करते है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन देवी की पूजा का विधान होने से इस शुभ तिथि को 'महाष्टमी' भी कहा जाता है । 

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को, व्रत का संकल्प लेकर पहले जल से स्नान करें। फिर शर्करा से बनाया गया नैवेध भोग लगाएं और दूसरे दिन नवमी को, कुंवारी कन्याओं को देवी का शर्करा युक्त प्रसाद और भोजन कराएं।

इस प्रकार, देवी की पूजा करने से माता अपने भक्तों से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान करती हैं और उनका कल्याण करती है। जो मनुष्य श्रद्धाभाव के साथ ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को देवी की विधिवत पूजा करता है, वह गन्धर्वों और अप्सराओं की भांति सुख प्राप्त करता है।

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को, हल्दी मिश्रित जल से स्नान करने के बाद,मनुष्य को विधिवत तरीके से देवी को भी स्नान कराना चाहिए साथ ही उनका पूजन करना चाहिए।

तत्पश्चात, शुद्ध जल से स्नान कराना चाहिए और कपूर और चन्दन का लेप लगाना चाहिए। फिर शर्करा युक्त भोग को अर्पित करके आचमन करें। ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें अपने सामर्थ के अनुसार दक्षिणा दें और यदि संभव हो तो स्वर्ण का भी दान करें क्योंकि स्वर्ण दान उत्तम माना जाता है।

श्रद्धापूर्वक दक्षिणा अर्पित करने के पश्चात उन्हें प्रसन्नचित्त मन से विदा करें और स्वयं भी मौन होकर भोजन करें। इस प्रकार, श्रद्धापूर्वक इस व्रत का पालन करने से मनुष्य को देव लोक में शरण मिलती है। इसी प्रकार, हर मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को देवी की पूजा की जाती है। इसलिए इसे मासिक दुर्गाष्टमी कहा जाता है।

आइये जानते है मासिक दुर्गा अष्टमी की सामान्य पूजा विधि क्या है?

प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष के अष्टमी के दिन नित्यकर्म आदि क्रियाएं सम्पन्न करके यदि संभव हो तो पूर्ण निष्ठा भाव के साथ माँ दुर्गा के किसी मंदिर में जाकर विधिपूर्वक माता का पूजन करना चाहिए यदि संभव न हो तो आप घर पर ही प्रतिदिन पूजा की जाने वाली मूर्ति के समक्ष बैठकर माता के स्वरूप का ध्यान करें साथ ही धूप दीप आदि जलाकर व्रत का संकल्प लें।

व्रत का संकल्प लेने के पश्चात माता दुर्गा की अपने रीति रिवाजों के अनुसार विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। पूजन के दौरान सर्वप्रथम माता शुद्ध घी, दही, फल, फूल, अक्षत (चावल) आदि अर्पित करें। धूप, दीप आदि से माता जी की आरती करें।

माँ दुर्गा के विशेष मंत्रों का जाप करें और हो सके तो दुर्गा चालीसा व माता दुर्गा की कथा का पाठ करें। माता दुर्गा को नैवेद्य के रूप में मिठाई और फल अर्पित करें। पूजन के पश्चात माता से अपने जीवन का कल्याण करने हेतु प्रार्थना करें व माता के प्रसाद को परिवार के सदस्यों को वितरित करें। 

जो भक्त पूर्ण निष्ठा भाव और शुद्ध मन से माँ दुर्गा की उपासना करते हैं, उन्हें जीवन में सुख-समृद्धि एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। साथ ही वैवाहिक जीवन में सुख शांति बनी रहती है।

दुर्गा अष्टमी का व्रत मां दुर्गा के आराधना और पूजा का एक महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन कथा में मां दुर्गा की महिमा और विजय की कथा सुनाई जाती है। 

कथा :

बहुत समय पहले दैत्य राजा महिषासुर नामक दुर्जय एक बड़ा बलशाली राक्षस था। वह अत्याचारी और दुष्ट था जो देवताओं को परेशान कर रहा था। देवताओं ने उसके विरुद्ध युद्ध किया, परंतु महिषासुर ने उन्हें हरा दिया और स्वर्ग को अपने वश में कर लिया।

महिसासुर के इस प्रकार के अनैतिक कार्यों से देवताओं को परेशानी महसूस हो रही थी और वे बहुत दुखी थे। उन्होंने अपनी समस्या को ब्रह्मा जी के सामने रखा और उनसे मदद की गुहार लगाई। तब ब्रह्मा जी और विष्णु जी, शिव जी के पास गए और उन्हें अपनी बात बताई।

शिव जी ने अपनी शक्ति से एक विशेष तेज रूपी शक्ति को उत्पन्न किया और उसे एक स्वर्णिम सिंहासन पर स्थापित किया। उसके बाद उन्होंने कहा कि इस शक्ति के द्वारा ही महिषासुर को मारा जा सकेगा।

तब सभी देवताओं ने विशेष आयुधों से युक्त मां दुर्गा की उपासना की साथ ही मां दुर्गा से महिषासुर का वध करने की प्रार्थना की। मां दुर्गा ने देवताओं की प्रार्थना स्वीकार की और देवताओ को आश्वाशन दिया कि वह निश्चय ही महिषासुर का वध करेंगी।

महिषासुर एक अत्यंत पराक्रमी दैत्य था । महिषासुर ने माँ दुर्गा को युद्ध के लिए ललकारा और उनसे द्वन्द युद्ध किया, युद्ध के दौरान मां दुर्गा ने अपनी शक्ति का प्रयोग करके महिषासुर को युद्ध में हराया और उसे अपने त्रिशूल से मार दिया । 

देवताओं की विजय पर्वतराज हिमालय के आसपास धूमधाम के साथ मनाई गई। देवी दुर्गा ने देवताओं को शक्ति की विजय की खबर दी और उनसे प्रार्थना की कि वे हर साल माता दुर्गा के आगमन का आयोजन करें। इस प्रकार, मां दुर्गा के विजय का उत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता है, जिसे हम दुर्गा पूजा और नवरात्रि के रूप में जानते हैं।

यही है मां दुर्गा अष्टमी की संक्षेपित कथा, जो मां दुर्गा के महानतम विजय की कथा के संक्षेपित रूप में सारांशित करती है। यह दिन मां दुर्गा की पूजा, अर्चना, मंत्र जाप और आरती करके मनाया जाता है।

जिस प्रकार देवी की कृपा से सभी बाधाएं दूर होती हैं, उसी तरह आपकी कुंडली में भी यदि कोई ग्रह दोष बाधा बन रहा है, तो उसे जानना आवश्यक है -

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मासिक दुर्गाष्टमी व्रत के लाभ:

मासिक दुर्गाष्टमी व्रत मनुष्य के जीवन में आने वाली सभी कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करता है । 

भक्तों को माँ दुर्गा का आशीर्वाद मिलता है जिससे भक्तों को समृद्धि प्राप्त होती हैं।

इस दिन व्रत और पूजा करने से मनुष्य व्यापार में उन्नति, धन में समृद्धि और जीवन में सफलता मिलती है।

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