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कंस वध की कथा: भगवान श्री कृष्ण ने कंस का वध कैसे किया?
लेखक: रुचि

कंस वध की कथा: भगवान श्री कृष्ण ने कंस का वध कैसे किया?

कंस वध 2026 में कब है?

वर्ष 2026 में कंस वध उत्सव 20 नवंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है और भगवान श्री कृष्ण द्वारा अत्याचारी राजा कंस के वध की स्मृति में आयोजित किया जाता है। यह दिन धर्म की अधर्म पर विजय, सत्य की असत्य पर जीत और भगवान श्री कृष्ण के दिव्य पराक्रम का प्रतीक माना जाता है। 

कंस वध दिवस का महत्व

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को कंस वध दिवस मनाया जाता है। यह उत्सव भी रावण के वध की तरह ही मनाया जाता है। जिस दिन कंस का वध हुआ था उस दिन मथुरा में मेला लगा था, ऐसा पुराणों में बताया गया है। इसलिए इस दिन कई स्थानों पर मेले और धार्मिक उत्सवों का आयोजन किया जाता है।

भगवान श्री कृष्ण जी ने इसी दिन दुरात्मा दैत्य कंस का वध करके बुराई का अंत किया था, जिससे धर्म की विजय और अधर्म का नाश हुआ। आज भी कंस वध का पर्व हमारे प्रमुख धार्मिक उत्सवों में से एक माना जाता है और इसे बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कंस वध की कथा का वर्णन विभिन्न पुराणों में विस्तार से मिलता है।

भगवान श्री कृष्ण ने कंस का वध कैसे किया?

पद्यपुराण के अनुसार उग्रसेन के दो पुत्र हुए। बड़े पुत्र का नाम कंस और छोटे पुत्र का नाम सुनामा था। उनकी एक पुत्री भी थी, जिसका नाम देवकी था। वह अत्यंत सुंदर और गुणवान थी। अन्य पुराणों में देवकी को उग्रसेन के भाई देवक की पुत्री बताया गया है, जो कल्पभेद के अनुसार संभव है।

देवकी का विवाह देवमीढ़ के पुत्र वसुदेव से हुआ। कंस अपनी बहन देवकी से अत्यंत प्रेम करता था। विवाह के बाद वह स्वयं देवकी और वसुदेव को रथ में बैठाकर विदा करने जा रहा था। तभी आकाशवाणी हुई—

"हे मूर्ख कंस! जिन देवकी को तू बड़े प्रेम से विदा कर रहा है, उनकी आठवीं संतान ही तेरी मृत्यु का कारण बनेगी।"

यह सुनकर कंस क्रोधित हो उठा और उसी समय देवकी को मारने के लिए तैयार हो गया। तब वसुदेव ने उसे समझाते हुए कहा कि वह देवकी की प्रत्येक संतान को जन्म लेते ही उसके हवाले कर देंगे। कंस ने उनकी बात मान ली, परंतु दोनों को कारागार में बंद कर दिया।

समय आने पर देवकी की छह संतानों का जन्म हुआ और कंस ने उन सभी की हत्या कर दी। सातवीं संतान को भगवान की योगमाया ने देवकी के गर्भ से निकालकर रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। यही संतान आगे चलकर बलराम जी के रूप में प्रकट हुई।

इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने देवकी के गर्भ से आठवीं संतान के रूप में जन्म लिया। भगवान की आज्ञा से योगमाया ने नंद बाबा की पत्नी यशोदा के यहाँ कन्या रूप में जन्म लिया। वसुदेव जी नवजात कृष्ण को गोकुल में नंद बाबा के घर छोड़ आए और वहाँ से यशोदा की कन्या को लेकर कारागार लौट आए।

जब कंस को कन्या के जन्म का समाचार मिला तो वह उसे मारने पहुँचा। जैसे ही उसने कन्या को भूमि पर पटकना चाहा, वह आकाश में उड़ गई और बोली: -

"हे दुराचारी कंस! तुझे मारने वाला जन्म ले चुका है।"

यह सुनकर कंस भयभीत हो गया और उसने व्रज तथा मथुरा के बालकों का वध करवाना प्रारंभ कर दिया। उसने अनेक राक्षसों को श्री कृष्ण को मारने के लिए भेजा, किंतु सभी कृष्ण और बलराम के हाथों मारे गए।

एक दिन देवर्षि नारद कंस के पास पहुँचे और उन्होंने उसे बताया कि नंद के पुत्र कृष्ण ही उसकी मृत्यु का कारण बनने वाले हैं। यह सुनकर कंस ने कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाने के लिए धनुष यज्ञ का आयोजन किया।

उसने अपने बलशाली पहलवान चारुण और मुष्टिक को तैयार किया तथा कुवलयापीड नामक विशाल हाथी को भी श्री कृष्ण के मार्ग में खड़ा कर दिया। कंस ने अपने मित्र अक्रूर को भेजकर कृष्ण, बलराम और अन्य गोपों को मथुरा बुलवा लिया।

जब श्री कृष्ण और बलराम मथुरा पहुँचे तो कुवलयापीड हाथी ने उन पर आक्रमण कर दिया। श्री कृष्ण ने उसे परास्त कर उसका एक दांत उखाड़ दिया और वह हाथी वहीं प्राण त्याग बैठा।

इसके बाद रंगभूमि में चारुण और मुष्टिक ने कृष्ण और बलराम पर आक्रमण किया, परंतु दोनों भाइयों ने उन्हें भी मार डाला। यह देखकर कंस अत्यंत भयभीत हो गया।

तब श्री कृष्ण स्वयं कंस के सिंहासन तक पहुँचे और उसे पकड़कर नीचे पटक दिया। भगवान के प्रहार से कंस का शरीर चूर-चूर हो गया। उसके मुख से रक्त निकलने लगा और वहीं उसका अंत हो गया।

कंस का छोटा भाई सुनामा भी बलराम जी के हाथों मारा गया। इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने अधर्मी, अत्याचारी और दुराचारी कंस का वध कर धर्म की स्थापना की।

कंस वध उत्सव और धार्मिक महत्व

कंस वध केवल एक दैत्य के अंत की कथा नहीं है, बल्कि यह धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक भी है। भगवान श्री कृष्ण ने कंस जैसे अत्याचारी शासक का वध करके यह संदेश दिया कि चाहे अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है।

कंस वध उत्सव के अवसर पर अनेक स्थानों पर मेले आयोजित किए जाते हैं। श्री कृष्ण की बाल लीलाओं और कंस वध की झांकियाँ सजाई जाती हैं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन तथा धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है।

भक्तजन भगवान श्री कृष्ण के पराक्रम और धर्म स्थापना के कार्यों का स्मरण करते हैं तथा उनसे जीवन में सत्य, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि कंस वध उत्सव आज भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में श्रद्धा, उत्साह और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। 

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