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जगन्नाथ रथ यात्रा: इतिहास, महत्व, परंपराएं और उत्सव
लेखक: कृष्णा

जगन्नाथ रथ यात्रा: इतिहास, महत्व, परंपराएं और उत्सव

जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 कब है?

वर्ष 2026 में जगन्नाथ रथ यात्रा 16 जुलाई, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह पवित्र यात्रा आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को प्रारंभ होती है, जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा भव्य रथों में विराजमान होकर श्री जगन्नाथ मंदिर से गुंडीचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं।
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आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन जगन्नाथ की भव्य यात्रा निकाली जाती है, जिसमे बलभद्र, सुभद्रा और श्री कृष्ण जी विराजमान होते है। बहुत बड़े रथ को सजाकर ओडिशा की पुरी से सभी भक्त गुडीचा के मंदिर जाते है। ओडिशा की पुरी में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को सभी भक्त रथ को खीचते हुए ओडिशा के पुरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर से पाँच किलो मीटर दूर स्थित गुडीचा मंदिर तक ले जाया जाता है।

भगवान सात दिन गुडीचा के मंदिर में रुकते है और नौवें दिन यात्रा के दौरान भगवान को वापस धाम में ले आया जाता है। आषाढ़ मास की द्वितीया को यात्रा शुरू होती है और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान को उनके धाम में वापस ले आया जाता है। पुराणों के अनुसार यात्रा से लगाकर मंदिर प्रवेश करने तक पूरी यात्रा नौ दिनों की होती है। इसलिए यह उत्सव नौ दिनों का प्रमुख माना गया है।

इस यात्रा की तैयारी में लोग यात्रा के मार्ग को बहुत ही सुंदर ढंग से सजाते है। सभी भक्त इस दिन बलभद्र, सुभद्रा और श्री कृष्ण जी की पूजा करते है और उन्हे भव्य रथो में बैठाते है। जगन्नाथ की यात्रा वैसे तो अब भारत के कोने-कोने में निकाली जाती है, पर प्रमुख रूप से जगन्नाथ यात्रा ओडिशा की पुरी में विशेष रूप से आयोजित होती है।

सभी भक्त आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान कृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा को रथ पर बिठाकर महान उत्सव के साथ विधिपूर्वक पूजन करके जगन्नाथ धाम से गुंडीचा मंदिर में भगवान को प्रवेश कराकर भजन, कीर्तन और आराधना करते है जिसके फलस्वरूप वे पृथ्वीलोक में सुख भोगकर श्री विष्णु जी के पास जाकर वैकुंठ लोक में निवास करते है।

रथ यात्रा की तैयारी

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को तीन रथ तैयार किये जाते है। भगवान श्री कृष्ण जी के रथ पर ‘गरुड़ध्वज’ फहराया जाता है, सुभद्रा के रथ पर ‘कमल’ के चिह्न का ध्वज लगाया जाता है, बलभद्र के रथ पर ‘हल’ के चिह्न वाला ध्वज लगाया जाता है। भगवान श्री कृष्ण के रथ में सोलह पहिए होते है और उनका रथ सोलह हाथ लंबा होता है।

सुभद्रा के रथ में बारह पहिए होते है और वह रथ बारह हाथ लंबा होता है तथा बलभद्र के रथ में चौदह पहिए होते है और इनका रथ चौदह हाथ लंबा होता है। तीनों रथो को बहुत ही खूबसूरती के साथ सजाया जाता है। रथ सजाने में किसी भी प्रकार की कील या काँटों का उपयोग नहीं किया जाता है।

यात्रा के दौरान कुछ लोग मंगल गीत गाते है, कोई-कोई जयकारा लगाते है और मंत्रों का जप करते है। कुछ लोग भगवान के दोनों ओर से पंखा करते है। कई प्रकार के बाजे बजते है, इस प्रकार सुंदर उत्सव में श्री कृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा को धीरे-धीरे ले जाकर रथ में बैठाते है।

फिर भगवान को सुंदर वस्त्र, आभूषण और मालाओं से सजाते है, कई उपचारों से उनकी पूजा करते है। उस समय यात्रा करते हुए श्री जगन्नाथ जी का जो लोग दर्शन करते है, उनका भगवान के धाम में निवास होता है। जो श्रेष्ठ पुरुष है वे उस यात्रा में नाचते और गाते है। भगवान के नामों का कीर्तन करते हुए यात्रा के साथ-साथ जाते है। इस प्रकार भगवान की हर साल जगन्नाथ यात्रा निकाली जाती है।

रथ यात्रा का जगन्नाथ मंदिर से गुडीचा मंदिर में पहुंचना

जब जगन्नाथ यात्रा ओडिशा की पुरी में जगन्नाथ मंदिर से चलकर गुडीचा के मंदिर में पहुँच जाती है तो भगवान गुडीचा के मंदिर में ही सात दिनों तक निवास करते है; वहाँ भगवान को कई पदार्थों से स्नान कराया जाता है और उनकी पूजा की जाती है।

सभी भक्त सात दिनों तक वहाँ रथ की रक्षा करके आठवें दिन उन सब रथो को दक्षिणाभिमुख घूमा देते है, फिर पूजन करके भगवान की मूर्ति को रथ पर विराजमान करते है और जहाँ से यात्रा शुरू की थी वही फिर रथ को ले आया जाता है। भगवान को रथ में ही विराजमान रहने दिया जाता है और इनकी वहीं पूजा की जाती है फिर एकादशी के दिन उन्हे अपने धाम में स्थापित कर देते है तथा रथ को उसी दिन खोल दिया जाता है।

जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व

जगन्नाथ रथ यात्रा में जो भी भक्त उस रथ पर विराजमान भगवान श्री कृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा का दर्शन करता है वह अपने करोड़ों जन्मों के पापों का नाश कर लेता है। जो भी भक्त उस यात्रा में साथ-साथ जाता है और गुडीचा नगर पहुंचते ही श्री कृष्ण जी की ओर देखकर उनका जैकारा लगाता है तो वह फिर कभी माता के गर्भ का दुःख नहीं भोगता।

जो भक्त रथ के आगे खड़े होकर फूलों के गुच्छों से या पंखे से हवा करता है तो वह भक्त ब्रह्मलोक में जाकर मोक्ष पाता है। जहाँ तक यात्रा करनी होती वहाँ पहुँचकर भगवान सात दिनों तक वहाँ निवास करते है। उन सात दिनों में जो भी भक्त श्री जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का दर्शन करते है तो वे परम पवित्र होकर सब तीर्थों का फल पा लेते है।

जो भक्त भगवान के वहाँ रुकने तक विधिवत पूजा पाठ, तर्पण, आरती, आराधना और नमस्कार करता है तो वह भक्त विष्णु जी के लोक में वास करता है। जगन्नाथ यात्रा का मुख्य उद्देश्य भगवान की भक्ति, सामाजिक एकता, और सामाजिक उत्सव को बढ़ावा देना है। इस यात्रा में हजारों भक्तजन शामिल होते है और इसमें विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों, और धार्मिक आयोजनों का प्रयोजन होता है। जगन्नाथ यात्रा भारतीय सामाजिक और धार्मिक परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखती है और इसे बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है।
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