जीवित श्राद्ध की विधि
गरुड जी ने पृथ्वीलोक में भ्रमण करने के बाद जब देखा की सभी मनुष्य अपने स्वार्थ में ही निहित है तब उन्हे श्री कृष्ण जी की यह बात याद आयी कि उन्होंने कहा था कि श्राद्ध को करने से मनुष्य को शुभ गति प्राप्त होती है। ऐसा विचार कर गरुड जी ने सोचा की जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा तो उस मरने वाले पुरुष के लिए श्राद्ध करने का अधिकारी कौन होगा? इस प्रकार का प्रश्न मन में लेकर वे श्री कृष्ण जी के पास गए और उनसे पूछने लगे।
गरुड जी ने कहा- हे प्रभु! व्यक्ति के मरने के बाद उसका श्राद्ध-कार्य को पूरा करने का अधिकार किसके पास है ? मरने वाले व्यक्ति का श्राद्ध कौन कर सकता है ? यह क्रिया कितने प्रकार की होती है? कृपया मुझे यह सब बताएं।
श्रीकृष्ण ने कहा- हे गरुड! यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसका अंतिम संस्कार और श्राद्ध --उसके पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भाई के बच्चे या सपिंड या जाति के लोग कर सकते हैं। इन सब के न होने पर जिस संतान के सात पीढ़ियों के पूर्वज और मरने वाले व्यक्ति के पूर्वज एक ही हो वह इस कार्य को करने का अधिकारी है। यदि दोनों कुलों (मातृ और पितृ कुल) के पुरुषों की मृत्यु हो गई हो अर्थात कोई भी पुरुष न उपस्थित हो तो इस स्थिति पर स्त्रियाँ श्राद्ध-श्राद्ध कर्म का कार्य करा सकती हैं। यदि किसी मनुष्य ने स्वेच्छा से अपने सभी सम्बन्धियों से नाता तोड़ लिया हो तो उसका श्राद्ध-कार्य राजा (पंचायत मुखिया) को करना चाहिए।
यह क्रिया तीन प्रकार की होती है, जिन्हें पूर्व, मध्यम और उत्तर क्रिया का नाम दिया गया है। यह क्रिया प्रत्येक वर्ष एक विशिष्ट अनुष्ठान के साथ करना आवश्यक है। तुम मुझसे इस श्राद्ध कर्म का फल सुनो।
ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, सूर्य, अग्नि, वसु, मरुद्रण, विश्वेदेव, पितृगण, पक्षी, मनुष्य, पशु, सरीसृप, मातृगण और इनके अतिरिक्त जो भी प्राणी इस संसार में उपस्थित हैं, मनुष्य इनका श्राद्ध करके इन सबको प्रसन्न कर सकता है। इस प्रकार के श्राद्ध से पूरा संसार प्रसन्न हो जाता है।
जो लोग अपने रिश्तेदारों द्वारा किए गए श्राद्ध से संतुष्ट होते हैं, वे श्राद्ध करने वाले को पुत्र, पत्नी, धन आदि से संतुष्ट करते हैं। हे गरुड। इस प्रकार मैंने संक्षेप में अधिकार और कर्म के अंतर को समझाया है।
गरुड ने कहा- हे भगवन! आपने श्राद्ध करने वाले अधिकारी लोगों के विषय में मुझे अवगत कराया है, अगर मरने वाले व्यक्ति के श्राद्ध करने वाले अधिकारियों में से एक भी उपस्थित न हो तो उस समय मनुष्य को क्या करना चाहिए?
गरुड जी का प्रश्न सुनकर श्री कृष्ण बोले- जब कोई प्राधिकारी व्यक्ति न हो और न ही किसी के अधिकार को सुनिश्चित किया जा रहा हो तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अपने जीवनकाल में स्वयं ही जीवित श्राद्ध कर लेना चाहिए। व्रत और स्नान करके भगवान श्रीकृष्ण में मन लगाकर एकाग्र मन से कर्ता, भोक्ता, परमेश्वर विष्णु की पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात उस व्यक्ति को अपने पितरों के लिये तिल एवं दक्षिणा के साथ तीन जलधेनु (कल्पित धेनु)' 'ॐ पितृभ्यः स्वधा' कहकर समर्पित करे और धेनुदान करते समय 'ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नमः' तथा 'ॐ सोमाय त्वा पितृमते स्वधा नमः' ऐसा बोलते हुए उस व्यक्ति को दक्षिण की ओर मुख करके दक्षिणा के साथ तीसरी जलधेनु देते समय खासकर 'यमायाङ्गिरसे स्वधा नमः' यह बोलते रहना चाहिए। भगवान विष्णु के यज्ञ और जलधेनुदान के समय ब्राह्मणों को बुलाकर भोजन कराना चाहिए। उस व्यक्ति को पहली जलधेनु उत्तर दिशा में तथा दूसरी जलधेनु दक्षिण दिशा में रखनी चाहिए और उन दोनों धेनुओं के बीच में तीसरी धेनु रखकर आवाहन आदि करके श्राद्ध के बाकी बचे हुए कार्यों को करना चाहिए। यह आवाहन करने से पहले उसे विश्व देवताओं के प्रतिनिधि ब्राह्मणों का आवाहन करके और यह कहकर उनकी पूजा करनी चाहिए -
वसुभ्यस्त्वामहं विप्र रुद्रेभ्यस्त्वामहं ततः ।
सूर्येभ्यस्त्वामहं विप्र भोजयामीति तान्वदेत् ।।
इसके बाद आवाहनादि के बचे हुए कार्यों को पितरों के बचे हुए कार्यों की तरह ही करना चाहिए। फिर उसे वसु के निमित्त एक सुशील धेनुका ब्राह्मण को दान करना चाहिए। आग्नेय कोण में रुद्रदेव और दक्षिण दिशा में सूर्यदेव के लिए स्थित ब्राह्मणों को एक-एक गाय देनी चाहिए और विश्वदेवों के लिए तिल से भरा पात्र समर्पित करना चाहिए। इसके बाद ब्राह्मणों को अक्षयोदक दान करना चाहिये। व्यक्ति के कार्यों से प्रसन्न होकर ब्राह्मण को 'ॐ स्वस्ति' इस कथन से श्राद्ध कर्म की पूर्णता का आशीर्वाद देना चाहिए। फिर अष्टाक्षर-मंत्र से भगवान विष्णु का स्मरण करें और उनका विसर्जन करें।
इसके बाद स्वस्थ रहकर कुलदेवी, ईशानी, शिव और भगवान नारायण का स्मरण करें। फिर पंचांग के अनुसार शुद्ध चतुर्दशी तिथि को सर्वोत्तम सुगम्य नदी के तट पर जाएं। वहां कपड़े और लोहे के टुकड़े दान करें और दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके 'ॐ जितं ते' मंत्र का जाप करते हुए अग्नि जलाएं।
इस क्रिया को करने के पश्चात उसे पचास कुशों से पुतला बनाना चाहिए और उसे जलाना चाहिए। फिर श्मशान में विधिपूर्वक अंतिम संस्कार करें और अंत में पूर्णाहुति की रस्म पूरी करें। तत्पश्चात अग्नि रहित भूमि, यम और रुद्रदेव का स्मरण करें। हवन करने के बाद मुख्य स्थान पर उक्त देवताओं का आह्वान करना चाहिए। ऐसा करने के पश्चात उसे मूंग की दाल के साथ चरू को आग में पकाना चाहिए और बाद में दूसरे चरू को तिल के साथ मिलाकर पकाएं।
'ॐ पृथिव्यै नमस्तुभ्यं ' - इस मन्त्र से पहला चरु समर्पित करे । 'ॐ यमाय नमश्च' इस मन्त्र से यम को दूसरा चरु समर्पित करे। 'ॐ नमश्चाथ रुद्राय श्मशानपतये नमः' इस मन्त्र से श्मशान पति भगवान रुद्र को समर्पित करे। तत्पश्चात श्राद्धकर्ता को यमराज के निमित्त सात नामों से सात अंजलि जल निम्नलिखित मंत्र पढ़ते हुए छोड़नी चाहिए-
'ॐ यमाय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ धर्मराजाय स्वधा तस्यै नमः', 'ॐ मृत्यवे स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ अन्तकाय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ वैवस्वताय स्वधा तस्मै नमः', 'ॐ कालाय स्वधा तस्मै नमः' और 'ॐ सर्वप्राणहराय स्वधा तस्मै नमः ।'
फिर श्राद्धकर्ता कहता है, 'आप सभी अमुक(जिसका श्राद्ध हो रहा हो उसका नाम) गोत्र के हैं, यह तिलोदक आपके लिए होना ऐसा कहकर अर्घ्य के फूल के साथ दस पिंड दान करें। इसके बाद उन्हें धूप, दीप, नैवेद्य, गंध और अक्षय जल अर्पित करें। उपरोक्त दस पिंडों का दान करने के बाद भगवान विष्णु के सुंदर शुभ मुख का ध्यान करना चाहिए।
इस अनुष्ठान को करने के बाद अशौच के अंत में मासिक श्राद्ध और सपिंडीकरण करना चाहिए। श्राद्ध चाहे अपने लिए किया जाए या दूसरों के लिए, यही नियम है। इसके साथ ही तर्पण विधि का पालन करना पितरों के प्रति हमारी कृतज्ञता को दर्शाता है। बल, आरोग्य, धन और आयु- ये चारों अस्थिर हैं, अत: ऐसा जानकर जीवित रहते हुए ही अपना श्राद्ध कर लेना चाहिए।
यह वृतांत गरुण पुराण से लिया गया है। इस वृतांत में भगवान श्री कृष्ण श्राद्ध क्रिया के महत्त्व को बताते हुए कहते है कि श्राद्ध क्रिया ही मनुष्य का कल्याण कर सकती है । भगवान श्री कृष्ण जी गरुण जी को समझाते हुए इस बात पर स्पष्ट रूप से इस बात पर बल देते कहते हैं कि श्राद्ध क्रिया तो मानव कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक है ही परंतु यह आवश्यक नहीं है कि श्राद्ध क्रिया केवल मनुष्य का स्वयं का पुत्र ही कर सकता है। श्री कृष्ण जी कहते हैं कि श्राद्ध क्रिया तो कोई भी कर सकता है केवल वह श्राद्ध क्रिया को विधि विधान से करे।
जब गरुण जी ने श्री कृष्ण जी से पूछा कि यदि व्यक्ति का कोई संबंधी न हो तब कौन श्राद्ध कर सकता है तो इस बात को भी कृष्ण जी स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि श्राद्ध क्रिया सम्पन्न करना तो आवश्यक है ही तभी मनुष्य का कल्याण है। विशेष रूप से पितृ दोष की समस्या के लिए अनुष्ठान के तौर पर भी यह क्रिया अत्यंत फलदायी मानी गई है। यदि मृतक व्यक्ति का कोई भी संबंधी नहीं है तो उस क्षेत्र के मुखिया या पंच को उस व्यक्ति का श्राद्ध करना चाहिए। अगर वह भी श्राद्ध नहीं कर सकता है तो मनुष्य को इस बात को अवश्य जान लेना चाहिए कि श्राद्ध क्रिया के बिना वह भवसागर से पार नहीं हो सकता है अतः वह अपने जीवित रहते भी अपना श्राद्ध कर सकता है और इसमें त्रिपिंडी श्राद्ध का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। उस श्राद्ध के पुण्य मात्र से व्यक्ति मृत्यु के उपरांत आसानी से नई योनि में जन्म प्राप्त कर सकता है और यमलोक में मिलने वाली यातनाओं से छुटकारा प्राप्त कर सकता है ।
यह वृतांत सम्पूर्ण मानव जाति को यह संदेश देता है कि आज के आधुनिक युग में मनुष्य धीरे धीरे श्राद्ध आदि क्रियाओं को भूलता जा रहा है या फिर समय कि व्यस्तता के कारण विधि विधान से श्राद्ध क्रिया को सम्पन्न नहीं करते हैं परंतु मनुष्य को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बिना श्राद्ध क्रिया के उसका कल्याण संभव नहीं है अतः सम्पूर्ण मानव जाति को चाहिए कि वह खुद भी अपने पूर्वजों की श्राद्ध क्रिया को विधि पूर्वक सम्पन्न करें और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी इस श्राद्ध क्रिया को विधिपूर्वक करने की सलाह दें।