तर्पण हमारी सनातन संस्कृति की एक अनमोल परंपरा है, जो वैदिक काल से चली आ रही है। तर्पण हमारे देवताओं, ऋषियों और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम भी है। तर्पण का अर्थ है जल का अर्पण अर्थात तर्पण हमारे पूर्वजों, ऋषियों, देवताओं और यमों को जल अर्पित करने की प्रक्रिया है। इस कर्मकांड का उद्देश्य उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना, उनकी तृप्ति औरशांति की कामना करना है । यह कर्म, पितरों की तृप्ति और शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, पितृ दोष निवारण संबंधी अनुष्ठान को पूर्णता प्रदान करने और पितरों के विशेष आशीर्वाद हेतु तर्पण को सबसे प्रभावी माध्यम माना गया है। तर्पण करते समय कुछ महत्त्वपूर्ण पहलुओं की जानकारी अवश्य रखनी चाहिए जो कि इस प्रकार है:-
तर्पण में काल की विशेषता
तर्पण का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है,क्योंकि सही समय पर किए गए तर्पण से पितरों को अधिकतम तृप्ति प्राप्त होती है। सूर्योदय के बाद पहले प्रहर तक अर्पित किया गया जल अमृत स्वरूप माना जाता है, जो पितरों के लिए सबसे लाभकारी होता है। डेढ़ प्रहर तक अर्पित जल पितरों तक दुग्ध रूप में पहुंचता है, जिससे उनकी तृप्ति होती है। इसके बाद, तीन प्रहर तक अर्पित जल, सामान्य जल के रूप में पितरों द्वारा स्वीकार किया जाता है। इसीलिए तर्पण के उचित समय का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है। यदि आप अपनी राशि या कुंडली के अनुसार सही समय जानना चाहते हैं, तो मुहूर्त परामर्श अवश्य लें ताकि इ सका पूरा लाभ प्राप्त हो सके।
तर्पण सामग्री
कुश, अक्षत, जौ, तिल, जल, जनेऊ (यदि धारण करते हैं), अगौछा (कपड़े का टुकड़ा) एवं पैती।
तर्पणकर्ता की तैयारी
तर्पणकर्ता को पूर्व दिशा की तरफ मुख करके व कुशा के आसन पर बैठकर तीन बार आचमन करना चाहिए। तर्पण से पहले हाथ में जल और कुश लेकर सर्वप्रथम संकल्प लें । संकल्प लेते समय स्थान, काल, तिथि, गोत्र और पितरों का नाम लेते हुए तर्पण का संकल्प पढ़ा जाता है।
तर्पण सङ्कल्प
ॐ अद्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्ध श्री श्वेतवाराहकल्पे श्रीवैवस्वतमन्वन्तरे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशे
कलियुगे कलिप्रथमचरणे पुण्यक्षेत्रे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे
अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुकशर्माहं देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये।
तर्पण तीर्थ
तर्पण के दौरान हाथ के विभिन्न हिस्सों का प्रयोग किया जाता है, जो तर्पण तीर्थ कहलाते है।
- देवतीर्थ: अंगुलियों का अग्रभाग, देवताओं के लिए जल अर्पण करने का स्थान।
- कायतीर्थ: सबसे छोटी अंगुली का मूल भाग, जिसे प्रजापत्य भी कहते हैं।
- पितृतीर्थ: तर्जनी और अंगूठे के मध्यभाग से पितरों के लिए जल दिया जाता है।
तीन कुशों को आपस में लपेटकर उनके अग्र और मूल भाग को एकत्रित करने की प्रक्रिया को 'मोटक' कहा जाता है। इसी प्रकार, तीन कुशों के समूह को 'त्रिकुशा' कहा जाता है। तर्पण की विधि में पवित्रि (कुश से बनी अंगूठी), मोटक, और त्रिकुशा का विशेष महत्व होता है, और ये सभी तर्पण के दौरान अनिवार्य माने जाते हैं।
तर्पण के विभिन्न चरण
1. देवतर्पण: इस प्रकार के तर्पण में देवताओं को जल अर्पित किया जाता है। तर्पणकर्ता को सव्य होकर अर्थात बाएं कंधे पर जनेऊ रखकर पूर्व की ओर मुख करके बैठना चाहिए और देवताओं के नाम का उच्चारण करते हुए जल अर्पित करना चाहिए । जल अर्पित करते समय त्रिकुश और अक्षत से एक एक अंजली नीचे दिए गए प्रत्येक नाम को पढ़कर देना चाहिए।
ॐ ब्रह्मा तृप्यताम् । ॐ विष्णुस्तृप्यताम् । ॐ रुद्रस्तृप्यताम् । ॐ प्रजापतिस्तृप्तयताम् । ॐ देवास्तृप्यन्ताम् । ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम् । ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम् । ॐ वेदास्तृप्यन्ताम् । ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम् । ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ संवत्सरः सावयवस्तृप्यताम् । ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम् । ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम् । ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम् । ॐ नागास्तृप्यन्ताम् । ॐ सागरास्तृप्यन्ताम् । ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम्। ॐ सरितस्तृप्यन्ताम् । ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम् । ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम् । ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम् । ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम् । ॐ भूतानि तृप्यन्ताम् । ॐ पशवस्तृप्यन्ताम् । ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् । ॐ औषधयस्तृप्यन्ताम् । ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम् ।
2. मरीच्यादि(ऋषि)तर्पण: ऋषियों को जल अर्पित करने के लिए पुनःतर्पणकर्ता को सव्य होकर अर्थात बाएं कंधे पर जनेऊ रखकर पूर्व की ओर मुख करके बैठना चाहिए और देवताओं की तरह ऋषियों को भी देवतीर्थ से अक्षत सहित एक -एक अंजली जल मरीच्यादि ऋषियों को देना चाहिए। ऋषियों को जल देते समय निम्न नामों का उच्चारण करते रहना चाहिए:-
ॐ मरीचिस्तृप्यताम् । ॐ अत्रिस्तृप्यताम् । ॐ अङ्गिरातृप्यताम् । ॐ पुलहस्त्यतृप्यताम् । ॐ क्रतुस्तृप्यताम् ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम् । ॐ भृगुस्तृप्यताम् । ॐ नारदस्तृप्यताम् ।
3. दिव्यमनुष्यतर्पण: इस प्रकार के तर्पण में निवीती यानी माला के समान यज्ञोपवीत और अंगोछे को धारण करें । इसके बाद, उत्तर की दिशा में मुख करके, कायतीर्थ से त्रिकुशा और यव (जौ) के साथ प्रत्येक को निम्नलिखित नामों को बोलते हुए दो-दो अंजलि जल अर्पित करते जाएँ।
ॐ सनकस्तृप्यताम् । ॐ सनन्दनस्तृप्यताम् । ॐ सनातनस्तृप्यताम् । ॐ कपिलस्तृप्यताम् । ॐ बासुकिस्तृप्यताम् । ॐ वोढूस्तृप्यताम् । ॐ पञ्चशिखरस्तृप्यताम् ।
4. पितृतर्पण: यह तर्पण का सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है, इसमें तर्पणकर्ता को अपसव्य अर्थात जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित करना चाहिए । पितरों की मुक्ति और आत्मिक शांति के लिए त्रिकुशा के साथ त्रिपिंडी श्राद्ध जैसे विशेष अनुष्ठान किसी विशेषज्ञ आचार्य के मार्गदर्शन में ही संपन्न कराना श्रेष्ठ और शास्त्रसम्मत माना जाता है। इस प्रक्रिया में तर्पणकर्ता को दक्षिणाभिमुख होकर, बाएं घुटने को मोड़ते हुए (अगर मुड़ पाए तो), मोटक लेकर तिल सहित तीन-तीन अंजलि जल निम्नांकित मंत्रों का उच्चारण करते हुए पितृतीर्थ द्वारा प्रत्येक पितर को अर्पित करना चाहिए।
- ॐकव्यवाडनलस्तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वधा तस्मै स्वधा तस्मै स्वधा।
- ॐ सोमस्तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वघा तस्मै स्वधा तस्मै स्वधा।
- ॐ यमस्तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वधा तस्मै स्वधा तस्मै स्वधा।
- ॐअर्यमा तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वधा तस्मै स्वधा तस्मै स्वधा।
- ॐअग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्तामिदं जलं तेभ्यः स्वधा तेभ्यः स्वधा तेभ्यः स्वधा।
- ॐ सोमपाः पितरस्तृप्यन्तामिदं जलं तेभ्यः स्वधा तेभ्यः स्वधा तेभ्यः स्वधा।
- ॐबर्हिषदः पितरस्तृप्यन्तामिदं जलं तेभ्यः स्वधा तेभ्यः स्वधा तेभ्यः स्वधा।
5. यम तर्पण: यम तर्पण हेतु पुनः तर्पणकर्ता को अपसव्य अर्थात जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बाएं घुटने को मोड़ते हुए (अगर मुड सके) एक एक करके निम्नलिखित 14 यमों का नाम लेते हुए सभी को 3-3 अंजली जल अर्पित करना चाहिए ।
ॐ यमाय नमः। ॐ धर्मराजाय नमः। ॐ मृत्यवे नमः। ॐ अन्तकाय नमः। ॐ वैवस्वताय नमः। ॐ कालाय नमः। ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः। ॐ औदुम्बराय नमः। ॐ दध्नाय नमः। ॐ नीलाय नमः। ॐ परमेष्ठिने नमः। ॐ वृकोदराय नमः। ॐ चित्राय नमः। ॐ चित्रगुप्ताय नमः।
6. पितृतर्पण: यह तर्पण अपने पिता, पितामह (बाबा), प्रपितामह (परबाबा), नाना, परनाना, और वृद्ध परनाना, सभी सपत्नीक के लिए किया जाता है।
तर्पण करते समय तर्पणकर्ता को अपसव्य अर्थात जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बाएं घुटने को मोड़ते हुए तिल और मोटक लेकर तीन-तीन अञ्जलि जल पितरों को अर्पित करें और निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण करें:
· पिता के लिए: ॐ वसुरूपः अमुकगोत्रः अस्मत्पिता अमुकशर्मा तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वधा।(3 बार)
· पितामह (बाबा) के लिए: ॐ रुद्ररूपः अमुकगोत्रः अस्मत्पितामहः अमुकशर्मा तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वधा। (3 बार)
· प्रपितामह (परबाबा) के लिए: ॐ आदित्यरूपः अमुकगोत्रः अस्मत्प्रपितामहः अमुकशर्मा तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वधा।(3 बार)
इसी प्रकार माता, पितामही, प्रपितामही, नाना-नानी, मामा-मामी, और अन्य सपिंड रिश्तेदारों के लिए किया जाता है।
तर्पणकर्ता को अपसव्य अर्थात जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बाएं घुटने को मोड़ते हुए जल और तिल लेकर तीन-तीन अञ्जलि जल अर्पित करते हुए निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण करें:
· माता के लिए: ॐ गायत्रीरूपा अमुकगोत्रा अस्मन्माता अमुकी देवी तृप्यतामिदं जलं तस्यै स्वधा।(3 बार)
· पितामही (दादी) के लिए: ॐ सावित्रीरूपा अमुकगोत्रा अस्मत्पितामही अमुकी देवी तृप्यतामिदं जलं तस्यै स्वधा। (3 बार)
· प्रपितामही (परदादी) के लिए: सरस्वती रूपा अमुकगोत्रा अस्मत्प्रपितामही अमुकी देवी तृप्यामिदं जलं तस्यै स्वधा।(3 बार)
· नाना और नानी के लिए: अमुकगोत्रः अस्मन्मातामहः अमुकशर्मा सपत्नीकस्तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वधा। (3 बार)
· परनाना और परनानी के लिए: ॐ अमुकगोत्रः अस्मत्प्रमातामहः अमुकशर्मा सपत्नीकस्तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वघा। (3 बार)
· वृद्ध परनाना और परनानी के लिए: ॐ अमुकगोत्रः अस्मवृद्धप्रमातामहः अमुकशर्मा सपत्नीकस्तृप्यतामिदं जलं तस्मै स्वधा। (3 बार)
अन्य सपिंड रिश्तेदारों का तर्पण
उसी क्रम से अपने चाचा-चाची, भाई-भाभी, बहन, मामा-मामी, पितृष्वसा (बुआ), पितृष्वसीय (बुआ के पुत्र), मातृष्वसा (मौसी), मातृष्वसीय (मौसी के पुत्र), और मातुलेयादि (मामा के पुत्र) को अपसव्य अर्थात जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर, दक्षिण दिशा की ओर मुख करके घुटने को मोड़ते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल अर्पित करें। साथ ही ससुर, सास, और गुरु का भी विधि अनुसार तर्पण करें।
इसके अतिरिक्त यदि और भी पितर, देवता, मानव या अन्य जीवों को जल अर्पण करना अभीष्ट हो, तो नीचे दिए गए मंत्र के साथ पूर्व की तरफ मुख करके सव्य होकर अर्थात बाएं कंधे पर जनेऊ रखकर जल अर्पित करें। इस प्रक्रिया में मंत्र का पाठ निरंतर करते रहें और साथ में जल अर्पित करते जाएं।
मंत्र:
"देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसाः। पिशाचाः गुह्यकाः सिद्धाः कूष्माण्डास्तरवः खगाः।।
जलेचरा भूनिलया वाय्वाधाराश्च जन्तवः। तृप्तिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिलाः॥"
इसके बाद, उन पितरों को जल अर्पित करें जो भूलवश तर्पण से रह गए हों।
भूलवश छूटे हुए पितरों के लिए
दक्षिण की तरफ मुख करके, अपसव्य होकर अर्थात दायें कंधे पर जनेऊ रखकर जल अर्पित करते हुए निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते रहना चाहिए-
"ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः। तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥
अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्। आब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः। ते तृप्तिमखिला यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति॥"
कुल में जो अपुत्र या गोत्र में मृत हुए हों उनके लिए
(अपसव्य अर्थात दायें कंधे पर जनेऊ रखकर, दक्षिण की तरफ मुख करके) अंगोछे के खूँट से जल पृथ्वी पर बाईं तरफ निचोड़ते हुए निम्नलिखित श्लोक का पाठ करें-
"ये चास्माकं कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः। ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥"
भीष्मपितामह के लिए
भीष्म पितामह को तर्पण देते समय, सव्य होकर अर्थात बाएं कंधे पर जनेऊ रखकर पूर्व दिशा की तरफ मुख करके मोटक लेकर तीन अञ्जलि जल निम्नलिखित मंत्र के साथ अर्पित करें-
मंत्र:
"वैयाघ्रपदगोत्राय साङ्कृत्यप्रवराय च।अपुत्राय ददाम्येतज्जलं भीष्माय वर्मणे॥"
इस विधि द्वारा, भीष्म पितामह को श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करें, जिससे उनकी आत्मा तृप्त हो और उनका आशीर्वाद प्राप्त हो।
सूर्यार्घ्य अर्पण विधि
सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करते समय, सव्य होकर अर्थात बाएं कंधे पर जनेऊ रखकर पूर्व की तरफ मुख करके खड़े हों। लाल पुष्प, गंध, जल आदि लेकर पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव से निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण करते हुए अर्घ्य अर्पित करें:
मंत्र:
"ॐ एहि सूर्य सहस्त्रांशो, तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या, गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥"
इस विधि से सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करते हुए उनसे कृपा और आशीर्वाद की कामना करें, ताकि उनका तेज और ऊर्जा जीवन में सकारात्मकता और समृद्धि लाए।
पितृ शांति, त्रिपिंडी श्राद्ध या अन्य किसी भी अनुष्ठान के लिए निःशुल्क परामर्श हेतु आप हमसे संपर्क कर सकते हैं । हमारे अनुभवी आचार्य आपकी शंकाओं के समाधान और शास्त्रसम्मत विधि विधान के लिए सदैव तत्पर हैं।