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नवपत्रिका पूजा क्या है? जानें पूजा विधि, महत्व और आध्यात्मिक लाभ
लेखक: Pawan Shukla

नवपत्रिका पूजा क्या है? जानें पूजा विधि, महत्व और आध्यात्मिक लाभ

नवपत्रिका पूजा 2026 कब है?

नवपत्रिका पूजा 2026 में 17 अक्टूबर, शनिवार को मनाई जाएगी। यह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि यानी महा सप्तमी के दिन होने वाला महत्वपूर्ण दुर्गा पूजा अनुष्ठान है। नवपत्रिका को बंगाल की परंपरा में कोलाबऊ या कलाबौ पूजा भी कहा जाता है। इस अनुष्ठान में नौ प्रकार के पौधों/पत्तों को एक साथ बांधकर उनका विधिपूर्वक स्नान और पूजन किया जाता है।

दुर्गा पूजा भारत के सबसे प्रमुख और भव्य त्योहारों में से एक है, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में, जहाँ इसे भक्ति, उत्साह और सांस्कृतिक धरोहर के साथ मनाया जाता है। यह महोत्सव माँ दुर्गा की शक्ति, साहस और करुणा का प्रतीक है, और इसे मनाने की परंपराएं अपने अनूठे अनुष्ठानों के लिए जानी जाती हैं।

बंगाल की परंपरा में नवपत्रिका पूजा दुर्गा पूजा के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक मानी जाती है। इसके अतिरिक्त बिल्व निमंत्रण, कल्पारंभ, अकाल बोधन और संधि पूजा जैसे विशेष अनुष्ठान भी संपन्न किए जाते हैं।

सनातन ज्योति में अनुभवी आचार्यों द्वारा विभिन्न देवी-देवताओं के वैदिक अनुष्ठान पूर्ण विधि-विधान के साथ संपन्न कराए जाते हैं। यदि आप किसी विशेष अनुष्ठान की विधि, धार्मिक महत्व या उससे जुड़े आध्यात्मिक लाभों के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो: - अनुष्ठानों से संबंधित निःशुल्क परामर्श एवं विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

षष्ठी तिथि को देवी दुर्गा के पृथ्वी पर आगमन का दिन माना जाता है। इस दिन कुछ विशेष पूजा विधियाँ आयोजित होती हैं, जैसे—बिल्व निमंत्रण, कल्पारंभ, अकाल बोधन, और आमंत्रण। इन अनुष्ठानों के माध्यम से माँ दुर्गा को आमंत्रित किया जाता है, जिससे वे भक्तों के बीच आकर उनपर अपनी कृपा बरसाएं। पूजा की शुरुआत बिल्व निमंत्रण से होती है, जिसमें बेल वृक्ष की पूजा कर माँ दुर्गा को आमंत्रित किया जाता है। इसके बाद कल्पारंभ और अकाल बोधन के द्वारा देवी का जागरण और आह्वान होता है।

नवपत्रिका पूजा क्या है?

सप्तमी के दिन नवपत्रिका पूजा का आयोजन होता है, जो बंगाल की दुर्गा पूजा का एक अनूठा हिस्सा है। इस अनुष्ठान में नौ विशेष पत्तों का प्रयोग होता है, जो देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक होते हैं। इस पूजा को "कला बऊ" भी कहा जाता है, और बंगाल में इसे बड़े उल्लास और श्रद्धा के साथ संपन्न किया जाता है।

महाष्टमी को दुर्गा पूजा का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस दिन की विशेष पूजा संधि पूजा होती है, जो अष्टमी और नवमी तिथि के संधिकाल अर्थात अष्टमी के अंतिम कुछ मिनट और नवमी के प्रारंभिक कुछ मिनटों में की जाती है। यह समय देवी दुर्गा की अत्यधिक शक्ति और आशीर्वाद प्राप्त करने का पवित्र मुहूर्त माना जाता है।

नवपत्रिका पूजा में कौन-कौन से पौधे शामिल होते हैं?

नवपत्रिका में नौ पवित्र पौधों का समावेश किया जाता है, जिनमें केला, बेल, हल्दी, धान, जौ, अनार, अशोक, कच्चू (अरबी) तथा अमरूद प्रमुख हैं। ये सभी पौधे देवी शक्ति और प्रकृति के विभिन्न स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

नव पत्रिका पूजन का आयोजन

दुर्गा पूजा के सप्तमी तिथि को सूर्योदय से पहले पानी में किसी पवित्र नदी का जल मिलाकर स्नान करके स्वयं पवित्र हो लें। इसके बाद नौ अलग-अलग पेड़ों के पत्तियां मिलाकर नवपत्रिका तैयार करें. इसमें बेल, केले, कच्चू (अरबी), हल्दी, जौ, धान, अनार, अशोक और अमरूद के पत्तों का इस्तेमाल होता है। हर पत्ता एक विशिष्ट देवी या देवता का प्रतिनिधित्व करता है, जैसे बेल शिव का, धान लक्ष्मी का, हल्दी दुर्गा का प्रतीक होती है।

इन पत्तियों को एकत्र कर एक साड़ी में लपेटकर सूत से बांधा जाता है और फिर इसे गंगा जल से शुद्ध किया जाता है। शुद्ध कर लेने के पश्चात नवपत्रिका को पूजा पंडाल में भगवान गणेश के दाहिने स्थापित किया जाता है और फिर षोडशोपचार विधि या अपने रीति रिवाजों के अनुसार श्रद्धा पूर्वक पूजन करें। नवपत्रिका पूजन में बंगाल के किसान बढचढ़ कर भाग लेते हैं क्योंकि उनका मानना है कि नवपत्रिका के पूजन फसलों की उपज अच्छी होती है।

नवपत्रिका पूजन का महत्त्व

नवपत्रिका पूजन का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्यावरण, प्रकृति और समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारियों को समझने का एक सशक्त माध्यम है। यह पूजा हमें जीवन में संतुलन बनाए रखने और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की सीख देती है।

नवपत्रिका में विभिन्न पत्तियों और पौधों का समावेश होता है, जैसे आम के पत्ते और जौ, जो प्रकृति के पांच तत्वों—जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश - का प्रतीक हैं। इनका पूजन कर हम प्रकृति के हर अंग के प्रति आभार प्रकट करते हैं, जो हमारे जीवन को संचालित करते हैं।

यह पूजा हमें पर्यावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने और उसकी रक्षा का संकल्प दिलाती है, साथ ही यह याद दिलाती है कि प्रकृति का संरक्षण और संतुलन बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है।

यदि आप माँ दुर्गा की कृपा, नकारात्मक शक्तियों से रक्षा, आध्यात्मिक उन्नति, शत्रु बाधा निवारण तथा जीवन में शक्ति, साहस और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति हेतु विशेष देवी साधना करना चाहते हैं तो: - दुर्गा सप्तशती पाठ अनुष्ठान के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

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