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तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् | संपूर्ण पाठ, अर्थ, लाभ और धार्मिक महत्व
लेखक: Pawan Shukla

तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम् | संपूर्ण पाठ, अर्थ, लाभ और धार्मिक महत्व

शुम्भ और निशुम्भ, जो कि अत्यंत भयंकर राक्षस थे, अपने अपार बल और शक्ति के अहंकार में डूबकर उन्होंने देवताओं से न केवल उनके यज्ञ भाग छीन लिए, बल्कि उनके राज्य और अधिकार भी हड़प लिए। वे इतने अहंकारी हो गए थे कि सूर्य, चंद्रमा, कुबेर, और यमराज तक के अधिकारों का स्वयं वहन करने लगे। उनके अत्याचार यहीं नहीं रुके, उन्होंने देवताओं का अपमान भी करना शुरू कर दिया।

इस घोर संकट से देवताओं को उबरने का कोई मार्ग नज़र नहीं आ रहा था। उस समय असुरों के अपमान और अत्याचारों से त्रस्त होकर, देवताओं ने तन्त्रोक्त देवीसूक्तम् के माध्यम से माँ दुर्गा को प्रसन्न कर उनका आह्वान किया। इन सूक्तों का प्रयोग देवी दुर्गा की प्रसन्नता के लिए किया गया था इसलिए इन्हें उत्तर चरित्र में दुर्गा सप्तशती के पंचम अध्याय में सम्मिलित किया गया है।

देवीसूक्तम् माँ दुर्गा की प्रसन्नता के लिए अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावी साधन है। इनके जप से मनुष्य की सभी विपत्तियाँ दूर होती हैं, और वह जीवन में सुरक्षा और सफलता प्राप्त करता है। यह दुर्गा सप्तशती का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंश है, जो संकटों को हरने और माँ दुर्गा का आशीर्वाद पाने का अचूक उपाय है।

माँ भगवती और माता महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए श्री सूक्तम् का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि आप भी वैदिक विधि-विधान के अनुसार श्री सूक्तम् पाठ करवाना चाहते हैं तो : -संपूर्ण वैदिक विधि-विधान, संकल्पपूर्वक एवं पूर्ण पारदर्शिता के साथ संपन्न किए जाने वाले श्री सूक्तम् पाठ अनुष्ठान को अभी बुक करें। 

देवीसूक्तम् प्रारंभ

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥ १ ॥

देवी को नमस्कार है, महादेवी शिवाय को हमेशा नमस्कार है। भद्रा एवं प्रकृति को हमारा प्रणाम है। हम लोग नियमपूर्वक जगदम्बा को नमस्कार करते हैं। 

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।

ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥ २ ॥

रौद्रा को नमस्कार है। गौरी, धात्री एवं नित्या को बार बार प्रणाम है। ज्योत्स्नामयी, चन्द्ररूपिणी एवं सुखस्वरूपा देवी को सतत नमस्कार है। 

कल्याण्यै प्रणतां वृद्धयै सिद्धयै कुर्मो नमो नमः ।

नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥ ३ ॥

शरण में आए हुए भक्तों का कल्याण करने वाली वृद्धि एवं सिद्धिरूपा देवी को हम बार-बार नमस्कार करते हैं। नैऋती (राक्षसों की लक्ष्मी), राजाओं की लक्ष्मी तथा शर्वाणी (शिवपत्नी)- स्वरूपा आप जगदम्बा को बार-बार नमस्कार है। 

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ।

ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥ ४ ॥

दुर्गा, दुर्गम संकट से पार उतारने वाली, सबकी सारभूता, सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा और धूम्रा देवी को सर्वदा नमस्कार है। 

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः ।

नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥ ५ ॥

अत्यन्त रौद्ररूपा तथा सौम्य देवी को हम नमस्कार करते हैं, उन्हें हमारा शत-शत प्रणाम है। जगत् की आधारभूता कृति देवी को बार-बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ६ ॥

जो देवी सब प्राणियों में विष्णु माया के नाम से जानी जाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ७ ॥

जो देवी सब प्राणियों में चेतना स्वरूप विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। 

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ८ ॥

जो देवी सब प्राणियों में बुद्धिरूप में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है॥

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ९ ॥

जो देवी सब प्राणियों में निद्रारूप में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १०॥

जो देवी सब प्राणियोंमें क्षुधा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ ११॥

जो देवी सब प्राणियों में छाया रूप में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। 

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १२॥

जो देवी सब प्राणियों में शक्तिरूप में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। 

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १३॥

जो देवी सब प्राणियों में तृष्णारूप में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। 

या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १४॥

जो देवी क्षान्ति (क्षमा) – रूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। 

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १५ ॥

जो देवी जाति रूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। 

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १६ ॥

जो देवी लज्जारूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १७॥

जो देवी शान्तिरूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १८ ॥

जो देवी श्रद्धारूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। 

या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ १९॥

जो देवी कान्तिरूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २०॥

जो देवी लक्ष्मी रूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥

या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २१॥

जो देवी वृत्ति रूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है॥

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २२ ॥

जो देवी सब प्राणियों में स्मृति रूप में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है॥

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २३ ॥

जो देवी दयारूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है॥

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥२४ ॥

जो देवी तुष्टिरूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २५ ॥

जो देवी मातारूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है ॥

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता ।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २६ ॥

जो देवी भ्रान्तिरूप में सब प्राणियों में विध्यमान हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है॥

इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।

भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ॥ २७ ॥

जो जीवों के इन्द्रियवर्ग की अधिष्ठात्री देवी एवं सब प्राणियों में सदा व्याप्त रहने वाली हैं, उन व्याप्ति देवी को शत-शत नमन है ॥

चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥ २८ ॥

जो देवी इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके चैतन्यरूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। 

स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रया-

त्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता ।

करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी

शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः ॥ २९ ॥

पूर्वकाल में अपने अभीष्टकी प्राप्ति होने से देवताओं ने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इन्द्र ने बहुत दिनों तक जिनका सेवन किया, वह कल्याण की साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मंगल करे तथा सारी आपत्तियों का नाश कर डाले ॥

या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-

रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते ।

या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति नः

सर्वापदो भक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥ ३० ॥

दैत्यों द्वारा सताये जाने पर, हम सभी देवता जिन परमेश्वरी को प्रणाम करते हैं, और जो भक्तिपूर्वक स्मरण करने वाले विनम्र पुरुषों की समस्त विपत्तियों का तुरंत नाश कर देती हैं, वे कृपालु जगदम्बा हमारी समस्त कठिनाइयों का निवारण करें।इस पाठ का नियमित रूप से जप करने से साधक की समस्त विपत्तियाँ धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं, और उसका जीवन सुख, शांति, तथा समृद्धि से परिपूर्ण हो जाता है। 

साथ ही, जो व्यक्ति झूठे मुकदमों या प्रशासनिक उलझनों से परेशान हैं, यदि वे इस सूक्त का विधिपूर्वक पूजन करते हैं, तो उन्हें इन समस्याओं से भी राहत मिलने लगती है। यह साधना जातक को जीवन की हर चुनौती का सामना करने की अचूक शक्ति प्रदान करती है।

तन्त्रोक्त देवीसूक्तम् का पाठ किन लोगों को करना चाहिए?

• जो जीवन में बार-बार बाधाओं का सामना कर रहे हों। 

• जो शत्रु, भय या नकारात्मकता से परेशान हों। 

• जो प्रशासनिक या कानूनी उलझनों से गुजर रहे हों। 

• जो मानसिक शांति और देवी कृपा प्राप्त करना चाहते हों। 

• जो दुर्गा सप्तशती साधना कर रहे हों।

यदि आप अपनी समस्या, मनोकामना या जीवन की परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त वैदिक अनुष्ठान करवाना चाहते हैं अथवा यह जानना चाहते हैं कि आपके लिए कौन-सा अनुष्ठान सबसे उपयुक्त रहेगा तो: - हमारे अनुभवी वैदिक आचार्यों से निःशुल्क परामर्श प्राप्त करें। 

वे आपकी आवश्यकता के अनुसार उचित अनुष्ठान और धार्मिक मार्गदर्शन प्रदान करेंगे। 

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