हनुमान जी की पूजा को लेकर कई मान्यताएँ और परंपराएँ हैं, और हर व्यक्ति अपनी आस्था के अनुसार श्रद्धा से उनका पूजन करता है। इन्हीं मान्यताओं के तहत दीपावली से एक दिन पहले, जिसे हम छोटी दिवाली के नाम से जानते हैं, हनुमान जी का विशेष पूजन किया जाता है। इस दिन को काली चौदस या नरक चौदस के रूप में भी मनाया जाता है। अनेक लोग इस दिन हनुमान जी की पूजा बड़े धूमधाम और श्रद्धा के साथ करते हैं।
ऐसा माना जाता है कि काली चौदस की रात को नकारात्मक शक्तियां और बुरी आत्माएं अत्यधिक प्रभावशाली हो जाती हैं। इनसे बचाव और सुरक्षा के लिए हनुमान जी की विशेष पूजा का महत्व है, क्योंकि वे केवल बल, साहस और शक्ति के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि बुरी शक्तियों से रक्षा करने वाले महावीर भी माने जाते हैं। उनकी पूजा से व्यक्ति को इन बुराइयों से सुरक्षा और आत्मिक बल मिलता है।
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एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान राम के 14 वर्षों के वनवास और रावण के वध के बाद जब वे अयोध्या लौटे, तो हनुमान जी की भक्ति और समर्पण को देखकर भगवान राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया था कि जब भी संसार में उनकी पूजा होगी, उससे पहले भक्त हनुमान जी की पूजा करेंगे। इसी आशीर्वाद के तहत दीपावली से ठीक एक दिन पहले हनुमान जी की पूजा करने की परंपरा आरंभ हुई।
अयोध्या के प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी मंदिर में छोटी दिवाली के दिन हनुमान पूजन बड़ी धूमधाम से किया जाता है, जो भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन श्रद्धालु अपने दिलों में भक्ति और आस्था के साथ हनुमान जी का पूजन करते हैं, जिससे उन्हें शक्ति और साहस प्राप्त होता है, और वे नकारात्मकता से सुरक्षित रहते हैं।
हनुमान पूजा का आयोजन
पूजा विधि:
प्रातःकाल उठकर नित्यक्रिया आदि करके निवृत हो ले। हनुमान जी को लाल रंग अति प्रिय है इसलिए स्वच्छ लाल वस्त्र धारण करे। तत्पश्चात पूजा स्थल को साफ करके गंगाजल से छिड़क कर पूजा-स्थान को शुद्ध कर ले। फिर स्वास्तिक बनाकर उसके ऊपर चौकी रखे। चौकी के ऊपर लाल कपड़ा बिछाए। फिर लाल अक्षत रखकर उसपर श्री हनुमान जी की मूर्ति या तस्वीर रखे। हनुमानजी के दाहिनी ओर श्री राम की प्रतिमा या तस्वीर रखे और बायीं ओर कलश स्थापित करे। सबसे पहले गणेश जी का पूजन करे, फिर श्री रामजी का पूजन करे, इसके बाद हनुमान जी का पूजन करे।
कलश स्थापना:
एक तांबे या पीतल का कलश लेकर उसके ऊपर स्वास्तिक बनाए, कलश के मुँह पर मौनी धागा बांधे, इसके बाद कलश में गंगाजल, एक सिक्का , एक खड़ी हल्दी , एक सुपाड़ी डालें और अन्न से भरी कटोरी से आम के पत्ते लगाकर उसे ढक दे और लाल अक्षत रखकर हनुमानजी के बायीं ओर कलश स्थापित कर दे।
पूजन :
सबसे पहले गणेश जी को तिलक लगाए और उन्हे पीले वस्त्र अर्पित करे। फिर उन्हे पुष्प, फल, जनेऊ चढ़ायें। इसके बाद श्री राम जी को पीले वस्त्र अर्पित करे। फल, फूल, जनेऊ अर्पित करें ।
इसके बाद हनुमान जी को तिलक लगाएं। पुष्प, फल, लाल वस्त्र अर्पित करे। इसके बाद कलश और दीपक की पूजा करे और दीपक प्रज्वलित करे। तत्पश्चात दक्षिणा आदि अर्पित करके आरती करे। फिर सभी भक्तों को चढ़ायें गए फल आदि को मिला कर प्रसाद के रूप में वितरण कर दे।
हनुमान के जन्म की कथा
एक समय की बात है ऋष्यमूक पर्वत पर एक वानर राज रहते थे जिनका नाम केसरी था तथा इनकी भार्या का नाम अंजनी था। इनकी भार्या बहुत ही पवित्र सती साध्वी थी। अंजनी ने पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान शंकर की बहुत कठिन तपस्या की। वह शिव भक्तिनी भी थी। यह सब घटनाएं देव लीला के अंतर्गत हो रही थी ।
भगवान विष्णु को पृथ्वी पर भगवान श्री राम के रूप में अवतार लेकर रावण का वध करने के लिए संसार में आना ही था और भगवान विष्णु को नारद मुनि का श्राप था की मनुष्य अवतार में उन्हे वानरों की सहायता लेनी पड़ेगी । इसलिए जब माता अंजनी ने भगवान शिव को प्रसन्न करके वरदान में पुत्र मांगा तो उन्होंने विचार किया कि क्यों न मै ही भगवान विष्णु का भक्त बनकर उनकी सहायता करू । इस प्रकार विचार करके भगवान शिव ने अपने ही तेज (जो कि उनके प्रतिबिंब के समान था) को उत्पन्न किया और उस तेज को माता अंजनी तक पहुचाने का उत्तरदायित्व पवन देव को सौंपा । भगवान पवन देव ने शिव की आज्ञा के अनुसार शिव के तेज को माता अंजनी तक पहुँचाया । माता अंजनी ने भगवान शिव के तेज से गर्भ धारण किया जिससे उन्हे एकादश रुद्रावतार रूपी परमतेजस्वी और दिव्य पुत्र बजरंगी की प्राप्ति हुई ।
इस प्रकार हनुमान भगवान शिव के तेज , पवन देव की सहायता से माता अंजनी तक पहुंचे और केसरीनंदन जो की माता अंजनी के पति थे इसलिए ये हनुमान जी के सांसारिक पिता हुए । अतः इस प्रकार हनुमान जी भगवान शिव ,पवन देव और केसरीनंदन तीनों के ही पुत्र हुए ।
इस बात की पुष्टि करते हुए तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा में भी कहा है –
संकर सुवन केसरीनंदन तेज प्रताप महा जगवंदन।
भगवान शिव से बड़ा कोई हरिभक्त हो नहीं सकता है और हनुमान जी से बड़ा प्रभु श्री राम का आज तक कोई भक्त हुआ ही नहीं है । इस प्रकार वे स्वयं भगवान शिव जी ही है जो सदैव हरि नाम जपते रहे और उनके सारे कार्य प्रभु श्री राम के ही थे ।
इनका नाम हनुमान कैसे पड़ा?
एक बार की बात है जब बजरंगी सूर्य देव को लाल फल मानकर उसको प्राप्त करने के लिए निकल पड़े । बजरंगी उगते हुए सूर्य को फल समझ कर सिंह की तरह गर्जना करते हुए हाथ पैर फैलाकर उछल पड़े। कहा जाता है कि बजरंगी सूर्य को लाल फल मानकर उसको प्राप्त करने के लिए निकल पड़े परंतु यह भगवान की लीला थी क्योंकि उसी समय राहू सूर्य को अपना ग्रास बनाना चाह रहा था । अतः सूर्य को राहू के प्रकोप से बचाने कर लिए बजरंगी ने सूर्य की तरफ छलांग लगा दी और राहू को बीच रास्ते में ही रोक लिया । तदन्तर बजरंगी ने अपनी गदा से उसे घायल कर दिया। बजरंगी के प्रहार से राहू अत्यंत भयभीत हो मूर्च्छित होकर गिर गया। राहू ने इन्द्र की शरण में जाकर अपने घायल होने का सारा वृतांत सुनाया और छल भरी बातें बताकर कि एक प्रतापी वानर तुम्हारा राजपाठ और सिंहासन छीनने के लिए आ रहा है इस प्रकार इन्द्र को बजरंगी से युद्ध करने के लिए उकसाया ।
इन्द्र को सदैव अपनी सत्ता का लोभ रहा है । राहू की छल भरी बाते सुनकर इन्द्र घबरा गए और उसी समय इन्द्र, राहू सहित समस्त देवता हनुमान जी से युद्ध करने के लिए आ गए।
इन्द्र जब वहाँ पहुंचे तो वे बजरंगी को पहचान न सके और इन्द्र सहित सभी देवताओं ने बजरंगी पर प्रहार कर दिया । हनुमान जी ने राहू सहित समस्त देवताओं को युद्ध में परास्त कर दिया। उसी समय देवराज इन्द्र ने व्याकुल होकर अपने वज्र द्वारा पवनपुत्र महाबलशाली बजरंगी जी की हनु (ठुड्डी) पर प्रहार किया। यद्यपि बजरंगी जी इतने शक्तिशाली थे कि वे वज्र से भी बच सकते थे परंतु उन्होंने वज्र का सम्मान किया और वज्र की मार सह ली। वज्र के प्रहार से बजरंगी मूर्छित हो गए।
जब पवनदेव ने अपने पुत्र को मूर्छित अवस्था में देखा तो क्रोधित होकर समस्त देवताओं से बोले-‘जिसने मेरे पुत्र बजरंगी को मारा है उस इन्द्र को इसी क्षण मैं खत्म कर दूंगा । सभी चराचर के प्राणी एवं पितृभूत वायुरुप मे मैं ही हूँ।‘ इस प्रकार कहकर उन्होंने ऊपर की ओर सांस खीचकर समस्त संसार की वायु को खीच लिया। जब पवन देव ने संसार की वायु खीच ली तो समस्त ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया। सभी जीव व्याकुल होकर परेशान होने लगे और बिना वायु के वह मरने लगे । जीवों की यह दशा देखकर ब्रह्मा ,विष्णु और महेश सहित सभी देवता घबरा गए । उसी समय सभी देवता ब्रह्मा, विष्णु, शिव, अग्निदेव, कुबेर, वरुणदेव आदि देवता आकर कहने लगे- हे पवन देव! आप अपने पुत्र के लिए समस्त चराचर को क्यों नष्ट कर रहे है? पवन देव ने कहा- यदि मेरा पुत्र जीवित नहीं हुआ तो मैं समस्त सृष्टि को नष्ट-भ्रष्ट कर दूंगा। वायु देव के इस वचन को सुनकर समस्त देवता पवन देव से रहम करने की विनती करने लगे । सभी देवता विनती करके बोले हे पवन देव आप नाराज ना हों । फिर ब्रह्मा जी के आशीर्वाद से बजरंगी मूर्छित अवस्था से बाहर आ गए । बजरंगी को चेतन अवस्था में देखकर पवन देव खुश हुए । उसके बाद ब्रह्मा विष्णु और महेश ने पुत्र बजरंगी को विभिन्न प्रकार के अभय दान और दिव्य शक्तियों से सुशोभित किया। साथ ही सभी देवताओं ने उनको विभिन्न प्रकार के वरदान दिए जो इस प्रकार हैं :-
विष्णु जी ने कहा- हे पवनदेव! यह आपका पुत्र अत्यंत निर्भय तथा चिरंजीवी होगा।
महादेव जी ने कहा- मेरे तीसरे नेत्र से निकली अग्नि कभी इस बालक का अनिष्ठ नहीं करेगी, तथा मेरे अमोघ त्रिशूल आदि अस्त्र-शस्त्र इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगे।‘
ब्रह्मा ने कहा- ‘हे मारुत! आज से मेरे ब्रम्हास्त्र, ब्रह्मदण्ड, ब्रह्मपाश तथा अन्य शस्त्र आदि भी इसका कुछ अनिष्ट नहीं कर सकेंगे।
कुबेर ने कहा- आपके इस पुत्र के द्वारा सभी असुरों का विनाश होगा।
वरुण ने कहा- मित्र पवन देव! आज से आपका यह पुत्र मेरे समान ही बलशाली होगा जो बड़े से भी बड़े युद्ध में भी कभी थकावट का अनुभव नहीं करेगा।
इन्द्र ने कहा- ‘मैं आपके पुत्र को वरदान देता हूँ कि आज से मेरा अमोघ वज्र भी इस पर कुछ प्रभाव नहीं दिखा सकेगा और इसका शरीर वज्र के समान होगा तथा हनु(ठुड्डी) में मेरे द्वारा वज्र से प्रहार किए जाने के कारण जगत में यह पुत्र ‘हनुमान’ के नाम से प्रसिद्ध होगा। इस प्रकार बजरंगी का नाम हनुमान पड़ा। इस प्रकार सभी देवतागण वरदान देकर अपने-अपने लोक में चले गए।
हनुमान जी ने वज्र का सम्मान करके वज्र का तो मान रखा परंतु उन्होंने अपने मान का हनन किया इस कारण भी बजरंगी जगत में हनुमान नाम से प्रसिद्ध हुए ।
हनुमान जी को ऋषि मुनियों ने श्राप क्यों दिया?
देवताओं से विभिन्न प्रकार के वरदान और दिव्य शक्तियां प्राप्त हो जाने के कारण हनुमान अत्यंत प्रतापी और बलशाली हो गए थे । उनका तेज और बल अत्यंत पराक्रम से भरा हुआ था परंतु हनुमान जी अभी बाल्य अवस्था में ही थे और वे स्वभाव से अत्यंत चंचल प्रकृति के थे अतः ऋषियों व मुनियों ने सोचा कि इस बालक को आगे जाकर अपने जीवन में बहुत महान कार्य करना है । कहीं अपनी चंचलता के कारण यह बालक अपनी शक्तियों से अपना कुछ अनिष्ट न कर ले । इसलिए ऋषि मुनियों ने हनुमान जी को ऐसा श्राप ताकि ये अपनी शक्तियां भूल जाए और समय आने पर किसी महान व्यक्ति के द्वारा याद दिलाए जाने पर इसकी सारी शक्तियां पुनः वापस आ जाए ।
यदि आप हनुमान जी की कृपा, भय एवं नकारात्मक शक्तियों से रक्षा, साहस, आत्मबल तथा जीवन की बाधाओं को दूर करने हेतु विशेष साधना करना चाहते हैं: - तो सुंदरकांड पाठ अनुष्ठान के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।