सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी ने अपने चारों मुखों से गायत्री मंत्र की व्याख्या चारों वेदों में की थी और गायत्री माता का आवाहन किया था। इसलिए गायत्री माता प्रसन्न होकर अवतरित हुयी थी। गायत्री माता जब अवतरित हुयी थी तब वह समय श्रावण मास की पूर्णिमा का ही था। उनके अवतरण दिवस को ही गायत्री जयंती के रूप में मनाया जाता है।
जबकि श्रावण मास की पूर्णिमा के एक दिन बाद अर्थात भाद्रपद मास की प्रतिपदा को गायत्री जपम का पर्व मनाया जाता है। वैसे तो पूरे भारत वर्ष में इस पर्व को मनाया जाता है परंतु दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में यह पर्व मुख्य रूप से बड़े हर्षोल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है साथ ही कुछ उपाकर्म क्रियाएं भी की जाती हैं।
गायत्री ही ज्ञान है, वही वेद है इसलिए इन्हे वेदों की जननी कहा जाता है। गायत्री तो पहले से ही थी पर कभी उनके दर्शन नहीं होते थे। गायत्री माता के दर्शन के लिए, उनके आवाहन के लिए, उन्हे प्रसन्न करने के लिए विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र की उत्पत्ति की।
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गायत्री मंत्र-
ॐ भूर्भुव: स्व:
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो न: प्रचोदयात्।
अर्थ- सत्, चित्, आनंदस्वरूप, सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा, उस प्रसिद्ध वरणीय तेज का हम ध्यान करते है, जो परमात्मा हमारी बुद्धि को सत्य की ओर प्रेरित करे।
गायत्री मंत्र परमात्मा के प्रति समर्पण है।
गायत्री मंत्र कौन-कौन जप कर सकता है?
पूर्वकाल में गायत्री मंत्र केवल वही जप करते थे जो वेदपाठी होते थे। समय बदलने के अनुसार अब सभी लोग गायत्री मंत्र का जप कर सकते है। जप करते समय आप रुद्राक्ष की माला का उपयोग कर सकते है या अगर न भी हो तो भी आप गायत्री मंत्र का जाप कर सकते है। 5 या 7 वर्ष में संस्कार द्वारा यज्ञोपवीत हो जाता है जो बालकों को गुरु मंत्र दिया जाता है वह गायत्री मंत्र ही होता है। इसी मंत्र का नियम पूर्वक जाप करने से शिष्यों की बुद्धि का विकास होता है।
गायत्री मंत्र का जप करने के लाभ
गायत्री मंत्र के जप से सभी प्रकार की परेशानियों से छुटकारा मिलता है, मानसिक शांति प्राप्त होती है। जो मनुष्य गायत्री मंत्र का जप विधिपूर्वक करता है। उसे कामधेनु की प्राप्ति होती है। कामधेनु मनोवांछित फल देने वाली होती है। व्रत करने से जातक कुमार्ग पर नहीं जाता है। उसकी बुद्धि सत्य की ओर प्रेरित होने लगती है। परंतु जातक को गायत्री मंत्र का अर्थ पूर्णतया समझ लेना चाहिए और उसे अपने अंतर्मन में धारण कर लेना चाहिए ।
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गायत्री मंत्र जप करने की विधि
प्रतिदिन आप जिस समय नित्य कर्म करके अपने आराध्य देव की पूजा करते हैं उसके पश्चात इस मंत्र का जाप कर सकते हैं। पहले आपको ‘आयातु वरदा देवि’ इस मंत्र से महेश्वरी वेद माता गायत्री का आवाहन करना चाहिए। पुनः तीन बार प्राणायाम करके बैठे-बैठे अथवा खड़े होकर एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार गायत्री जप प्रणव के साथ नियमपूर्वक करना चाहिए। इन तीनों में किसी एक विधि से ही जप करना चाहिए।
सूर्य को अर्घ्य देकर उनका पूजन करके प्रणाम करके ‘उत्तमे शिखरे देवी’ ऐसा कहकर माता का विसर्जन करके पूर्व दिशा में देखते हुए वेदमाता महेश्वरी गायत्री का अभिवंदन करके दोनों हाथ जोड़कर सूर्य से प्रार्थना करनी चाहिए। गायत्री मंत्र का पाठ करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति में मदद मिलती है।
सावधानियाँ
गायत्री मंत्र का जप करते समय आपके होंठ हिले पर उच्चारण करने की आवाज इतनी धीमी होनी चाहिए की बगल वाला व्यक्ति भी न सुन सके।
जप करते समय आपका मन पवित्र होना चाहिए मंत्र के अलावा आप अपने मन में किसी भी घटना का स्मरण न करे। केवल गायत्री का ही स्मरण करे। माता की पूजा सूर्य भगवान का चित्र रखकर दीपक जलाकर की जा सकती है।