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भद्रा काल: भद्रा क्या है और शुभ कार्य क्यों वर्जित हैं?
लेखक: कृष्णा

भद्रा काल: भद्रा क्या है और शुभ कार्य क्यों वर्जित हैं?

आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा की भद्रा का शाब्दिक अर्थ- 'कल्याण करने वाली' होता है, फिर इस समय मांगलिक कार्य करना वर्जित क्यों है? क्या भद्रा कभी शुभ नहीं होती?

भद्रा का स्वरुप अत्यंत विकराल बताया गया है। भद्रा में रक्षाबंधन, उद्योग, कृषि, विवाह, गृहप्रवेश आदि कार्यों को नहीं करना चाहिए। किसी भी मांगलिक कार्य को करने से पहले भद्रा का पता लगाना अति आवश्यक है। आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा की भद्रा का शाब्दिक अर्थ- 'कल्याण करने वाली' होता है, फिर इस समय मांगलिक कार्य करना वर्जित क्यों है ? क्या भद्रा कभी शुभ नहीं होती ? पुराणों के अनुसार जब दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया था तब सूर्यदेव और उनकी पत्नी छाया की शक्ति से दैत्यों को मारने के लिए भद्रा का जन्म हुआ था। इसलिए इनको सूर्यदेव व छाया की पुत्री, शनि की बहन कहा जाता है।

जिस प्रकार शनि देव का स्वभाव है उसी प्रकार भद्रा का भी स्वभाव क्रोधी है। जन्म लेते ही इन्होने मांगलिक और धार्मिक कार्यों का नाश करना शुरू कर दिया था,क्योकि इनका लक्ष्य था पूरी पृथ्वी का विनाश करना। तब ब्रह्मा जी ने इन्हे समझाते हुए सातवें विष्टि करण में स्थान दिया और शाप दे दिया की भद्रा के समय कोई भी शुभ कार्य सफल नहीं होंगे। 

भद्रा क्या है? क्यों डरते है लोग

शस्त्रों मे भद्रा की आकृति काले रंग की, भयानक, नाक और ठुड्डी लंबे और चौड़े, मुख ऐसा जो सब कुछ खा जाए, और मुख से आग की लपटे निकलती हुई। सबकुछ नष्ट कर देने वाली। भद्रा एक अशुभ घड़ी है जो शुभ कार्यों मे सर्वथा त्याज्य है। पंचांग के अनुसार करण विष्टि को ही भद्रा कहते है। तिथि के आधे भाग को करण कहते है। एक तिथि में दो करण होते है और यह दो प्रकार के होते है - चर और अचर 

कुल 11 करण होते हैं, ४ अचर और ७ चर होते है-

चर करण :- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि (सातवें चर करण विष्टि को ही भद्रा कहते है)

अचर करण :- शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किंस्तुघ्न।

भद्रा प्रमाण

कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि और दशमी तिथि के बाद (परार्ध ) में तथा सप्तमी तिथि और चतुर्दशी तिथि के पहले (पूर्वार्ध ) में भद्रा रहती है और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि और चतुर्थी तिथि के बाद (परार्ध ) में तथा अष्टमी तिथि और पूर्णिमा के पहले (पूर्वार्ध ) में भद्रा रहती है।

पूरे साल में भद्रा कब-कब रहेगी, यह जानने के लिए: - अभी पंचांग देखें। 

पंचांग में आपको भद्रा काल की तिथि और समय के साथ वर्षभर के व्रत, त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियों की जानकारी भी मिल सकती है।

भद्रा तीनोंलोको में निवास करती है इसलिए भद्रा तीन प्रकार ही होती है। स्वर्गलोक , पाताल और मृत्युलोक की भद्रा। 

स्वर्गलोक की भद्रा:- जब चन्द्रमा मेष, वृष, मिथुन, वृश्चिक की राशियों में गोचर होता है तब भद्रा स्वर्गलोक में निवास करती है। 

पाताल लोक की भद्रा:- जब चन्द्रमा कन्या, मकर, धनु, और तुला राशियों में गोचर होता है। तब भद्रा पाताललोक में निवास करती है। 

मृत्युलोक की भद्रा :- जब चन्द्रमा कर्क, कुम्भ, सिंह एवं मीन राशियों पर गोचर होता है। तब भद्रा मृत्युलोक में निवास करती है। 

भद्रा निवास फल

स्वर्ग भद्रा शुभं कुर्यात, पाताले च धनागमम् ।

मृत्यु लोक गता भद्रा, सर्व कार्य विनश्यति।

जब भद्रा स्वर्ग में स्थित (निवास) होती है तो शुभ फल प्रदान करती है। 

जब भद्रा पाताल में स्थित (निवास ) होती है तो धन प्रदान करती है। 

जब भद्रा मृत्यु लोक में स्थित (निवास ) होती है तो सम्पूर्ण कार्यों का नाश करती है। 

भद्रा के कितने नाम होते है, वे नाम कौन कौन से है ?

भद्रा के बारह नाम है, जो इस प्रकार है :-

1. धन्या, 2.दधिमुखी, 3.भद्रा, 4.महामारी, 5.खरानना, 6.कालरात्रि, 7.महारुद्रा, 8.विष्टि, 9.कुलपुत्रिका, 10.भैरवी, 11.महाकाली,12. असुरक्षयकरी

वास्तव में भद्रा एक शक्ति है, जो माँ दुर्गा का ही अंश है। विध्वंसक शक्ति होने के कारण यह भयानक मानी जाती है। इसके बारह नाम है और उन्ही नामों से बने 12 मंत्रों से यह प्रसन्न भी होती है। वह बारह मंत्र इस प्रकार है :

1. ॐ धन्या स्वाहा 

2. ॐ दधिमुखी स्वाहा 

3. ॐ भद्रा स्वाहा 

4. ॐ महामारी स्वाहा 

5. ॐ खरानना स्वाहा 

6. ॐ कालरात्रि स्वाहा 

7. ॐ महारुद्रा स्वाहा 

8. ॐ विष्टि स्वाहा 

9. ॐ कुलपुत्रिका स्वाहा 

10. ॐ भैरवी स्वाहा 

11. ॐ महाकाली स्वाहा 

12. ॐ असुरक्षयकरी स्वाहा 

ॐ शान्ति स्वः ॐ शान्ति स्वः ॐ शान्ति स्वः

इन बारह मंत्रों का रोज़ 2-2 बार सवेरे शाम जाप करने से 100 प्रकार की विपत्तियाँ दूर होती है। 

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