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रोहिणी व्रत कब है? जानें सही तिथि, पूजा विधि, महत्व और लाभ
लेखक: रुचि

रोहिणी व्रत कब है? जानें सही तिथि, पूजा विधि, महत्व और लाभ

रोहिणी व्रत 2026 में कब है?

अक्टूबर 2026 में रोहिणी व्रत 29 अक्टूबर, गुरुवार को और नवंबर 2026 में रोहिणी व्रत 25 नवंबर, बुधवार को रखा जाएगा। यह व्रत रोहिणी नक्षत्र के प्रभावी होने पर किया जाता है।

रोहिणी व्रत की तिथि

रोहिणी व्रत रोहिणी नक्षत्र के प्रभावी होने पर रखा जाता है, इसलिए इसकी कोई निश्चित तिथि नहीं होती। यह व्रत तब किया जाता है जब सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र विद्यमान होता है, जो लगभग प्रत्येक महीने एक बार आता है।

29 अक्टूबर 2026 का रोहिणी व्रत

• व्रत तिथि: 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार

• रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ: 28 अक्टूबर 2026 को दोपहर 1:27 बजे

• रोहिणी नक्षत्र समाप्त: 29 अक्टूबर 2026 को सुबह 11:12 बजे

25 नवंबर 2026 का रोहिणी व्रत

• व्रत तिथि: 25 नवंबर 2026, बुधवार

• रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ: 24 नवंबर 2026 को रात 11:26 बजे

• रोहिणी नक्षत्र समाप्त: 25 नवंबर 2026 को रात 8:36 बजे

रोहिणी व्रत की सभी तिथियां, नक्षत्र और शुभ मुहूर्त जानने के लिए हमारा विस्तृत पंचांग अवश्य देखें।

रोहिणी व्रत क्या है?

रोहिणी व्रत आत्मा के विकारों को दूर कर कर्म बंध से छुटकारा दिलाने में सहायक है। इसका आयोजन उद्यापन से पहले 3, 5 या 7 वर्षों तक नियमित रूप से करने से व्रतार्थी को अधिक फल की प्राप्ति होती है। यह एक धार्मिक उत्सव के रूप में भी माना जाता है, जिसमें जैन समुदाय के सदस्य भगवान वासु की पूजा-उपासना करते हैं।

रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण और आदर्शित व्रत है, जो उन्हें धार्मिक दृष्टिकोण से सजग रहने और आचार-विचार में सुधार करने में सहायक होता है।

रोहिणी व्रत वैसे तो जैन समुदाय के लोग करते है पर इस व्रत को हम सब लोग भी रख सकते है। जैन समुदाय के धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुल सत्ताईस नक्षत्र में से एक रोहिणी नक्षत्र आता है।

यह नक्षत्र हर महीने आता है। सूर्योदय के बाद जब रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है तब रोहिणी व्रत रखा जाता है। इस दिन वासुपूज्य और रोहिणी देवी की पूजा की जाती है। महिलायें अपने पति की दीर्घायु के लिए इस व्रत को करती है।

मत्स्यमहापुराण के अनुसार- नारद जी ने श्री भगवान शंकर जी से पूछा-महादेव! जिस व्रत का अनुष्ठान करने से मनुष्य हर जन्म में दीर्घायु, आरोग्यता, कुलीनता और अभ्युदय से युक्त हो राजा के कुल में जन्म पाता है, उस उत्तम व्रत का वर्णन कीजिए।

श्री भगवान शंकर जी ने कहा- नारद! तुमने अति उत्तम बात पूछी है। अब मैं तुम्हें ऐसा गोपनीय व्रत बतलाता हूँ जो अक्षयफल देने वाला है, जिसे केवल वही ज्ञानी जानते है जो पुराण और वेद पढ़ते है।

इस लोक में ‘रोहिणी चंद्र शयन’ नामक व्रत बड़ा ही उत्तम और पुण्यकारी है। इसे रोहिणी व्रत भी कहते है।

पूजा विधि

इसमें चंद्रमा के नामों का उच्चारण करके भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करनी चाहिए। जब कभी सोमवार की पूर्णिमा तिथि को रोहिणी नक्षत्र हो, उस दिन मनुष्य सरसों के दानों से युक्त जल से स्नान करे तथा विद्वान पुरुष ‘आप्यायस्व०' इत्यादि मन्त्र को एक सौ आठ बार जपे तथा पाखण्डियों-विधर्मियों से बातचीत न करे।

जप करने के बाद अपने घर आकर फल- फूल, आदि के द्वारा भगवान् श्रीमधुसूदन की पूजा करे। साथ ही चन्द्रमा के नामों का उच्चारण करता रहे। 'सोमाय नमः' से भगवान्‌के दक्षिण चरण और 'शान्ताय नमः' से वाम चरण का, 'अनन्तधाम्ने नमः' का उच्चारण करके उनके घुटनों और पिंडलियों का, ‘जलोदराय नमः' से दोनों जाँघों का और 'अनन्तबाहवे नमः' से जननेन्द्रिय का पूजन करे। ‘कामसुखप्रदाय नमो नमः' से चन्द्रस्वरूप भगवान्‌ के कटिभाग की सदा अर्चना करनी चाहिये।

इसी प्रकार 'अमृतोदराय नमः' से उदर का और 'शशाङ्काय नमः' से नाभि का पूजन करे। 'चन्द्राय नमोऽस्तु' से कण्ठका और 'द्विजानामधिपाय नमः' से दाँतों का पूजन करना चाहिये।

'चन्द्रमसे नमः' से मुँह का पूजन करे। 'कुमुद्वन्तवनप्रियाय नमः' से ओठों का, 'वनौषधीनां नाथाय नमः' से नासिका का, 'आनन्दबीजाय नमः' से दोनों भौहों का, 'इन्दीवरव्यासकराय नमः' से चन्द्रस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णके कमल -सदृश दोनों नेत्रों का, 'समस्ताध्वरवन्दिताय दैत्यनिषूदनाय नमः' से दोनों कानों का, 'उदधिप्रियाय नमः' से चन्द्रमा के ललाट का, 'सुषुम्नाधिपतये नमः' से केशों का पूजन करे।

'शशाङ्काय नमः' से मस्तक का और 'विश्वेश्वराय नमः' से भगवान् मुरारि के किरीट का पूजन करें। तत्पश्चात

'रोहिणिनामलक्ष्म्यै सौभाग्यसौख्यामृतसागराय पद्मश्रियै नमः

रोहिणी नाम धारण करनेवाली सौभाग्य और सुखरूप अमृत के समुद्र लक्ष्मी को नमस्कार है।

इस मन्त्रका उच्चारण कर सुगन्धित पुष्प, नैवेद्य और धूप आदि के द्वारा इन्दुपत्नी रोहिणी देवी का पूजन करे।

इसके बाद रात के समय भूमि पर सोये और सबेरे उठकर स्नान करने के बाद 'पापविनाशाय नमः' का उच्चारण कर ब्राह्मण को घी और अपने सामर्थ्य के अनुसार सुवर्ण या किसी अन्य धातु का बना हुआ जल से भरा कलश दान करे। फिर दिनभर उपवास करने के पश्चात् गोमूत्र पीकर मांसवर्जित एवं खारे नमक से रहित अन्न के अट्ठाईस ग्रास, दूध और घी के साथ भोजन करे।

तदनन्तर दो घड़ी तक इतिहास, पुराण आदि का पाठ करे। नारद! चन्द्रस्वरूप भगवान् विष्णु को कदम्ब, नील कमल, केवड़ा, जाती-पुष्प, कमल, शतपत्रिका, बिना कुम्हलाये कुब्ज के फूल, सिन्दुवार, चमेली, अन्यान्य श्वेत पुष्प, करवीर-पुष्प तथा चम्पा – ये ही फूल चढ़ाने चाहिये। उपर्युक्त फूलोंकी जातियों में से एक-एक को सावन आदि महीनों में क्रमशः अर्पण करे।

जिस महीने में व्रत शुरू किया जाय, उस समय जो भी पुष्प उपलब्ध हों, उन्हीं के द्वारा श्रीविष्णु जी का पूजन करना चाहिये।

इस प्रकार एक वर्ष तक इस व्रत का विधिपूर्वक अनुष्ठान करके अंत के समय व्रती को चाहिये कि वह दर्पण तथा शयनोपयोगी सामग्रियों के साथ शय्यादान करे। रोहिणी और चन्द्रमा- दोनों की सुवर्णमयी मूर्ति बनवाये। उनमें चन्द्रमा 6 अङ्गुल के और रोहिणी 4 अङ्गुल की होनी चाहिये।

आठ मोतियों से युक्त तथा दो श्वेत वस्त्रों से आच्छादित उन प्रतिमाओं को अक्षत से भरे हुए काँसे के पात्र में रखकर दूध से भरे हुए कलश के ऊपर स्थापित कर दे और सुबह के समय अगहनी चावल, ईख और फल के साथ उसे मंत्रों का उच्चारण करते हुए दान कर दे। फिर जिसका मुख सुवर्ण से और खुर चाँदी से मढ़े गए हो, ऐसी वस्त्र और दोहिनी के साथ दूध देने वाली श्वेत रंग की गाय तथा सुंदर शंख प्रस्तुत करे।

फिर उत्तम गुणों से युक्त ब्राह्मण दम्पत्ति को बुलाकर उन्हे आभूषणों से अलंकृत करे। तथा मन में यह भावना रखे कि ब्राह्मण दम्पत्ति के रूप में रोहिणी सहित चंद्रमा ही विराजमान है। तत्पश्चात इनकी इस प्रकार प्रार्थना करे-‘श्री कृष्ण जिस प्रकार रोहिणी देवी चन्द्रस्वरूप आपकी शय्या को छोड़कर अन्यत्र नहीं जाती है, उसी तरह मेरा भी इन विभूतियों से कभी विछोह न हो।

चंद्रदेव! आप ही सबको परम आनंद और मुक्ति प्रदान करने वाले है। आपकी कृपया से मुझे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त हो तथा आप में मेरी सदा अनन्य भक्ति बनी रहे।‘ इस प्रकार विनय करके शय्या, प्रतिमा और धेनु सब कुछ ब्राह्मणों को दान कर दे।

जो संसार से भयभीत होकर मोक्ष पाने की इच्छा रखता है, उसके लिए यही एक व्रत सबसे उत्तम है। यह रूपरंग, रोगमुक्त आयु प्रदान करने वाला है।

नारद! यही पितरों को हमेशा प्रिय है। जो पुरुष इसका अनुष्ठान करता है, वह त्रिभुवन का अधिपति होकर इक्कीस सौ कल्पों तक चंद्रलोक में निवास करता है।

उसके बाद विद्युत होकर मुक्त हो जाता है अथवा जो स्त्री इस रोहिणी व्रत का अनुष्ठान करती है, वह भी उसी पूर्वोत्त फलों को प्राप्त करती है साथ ही वह इस जीवन के आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाती है। चंद्रमा के नाम कीर्तन द्वारा भगवान मधुसूदन की पूजा का प्रसंग जो रोज पढ़ता अथवा सुनता है, उसे भगवान उत्तम बुद्धि प्रदान करते है तथा वह भगवान श्री विष्णु के धाम में जाकर देवसमूह द्वारा पूजा जाता है।

यदि आप रोहिणी व्रत की सही पूजा विधि या व्रत से संबंधित कुछ भी जानकारी चाहते है तो हमारे अनुभवी आचार्यों से निःशुल्क परामर्श प्राप्त करें।

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