पूर्णिमा व्रत 2026 में कब-कब है?
प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि पूर्णिमा तिथि होती है। इस प्रकार पूरे वर्ष में 12 पूर्णिमा होती हैं परंतु जब अधिमास पड़ जाता है तो एक पूर्णिमा बढ़कर 13 पूर्णिमा हो जाती हैं। वर्ष भर के प्रत्येक माह में पड़ने वाली विभिन्न पूर्णिमा इस प्रकार हैं।
1. चैत्र मास की पूर्णिमा
दिनांक: 01 अप्रैल 2026
प्रारंभ: 01 अप्रैल 2026 को सुबह 7:07 बजे
समाप्त: 02 अप्रैल 2026 को सुबह 7:42 बजे
चैत्र मास की पूर्णिमा वर्ष की प्रथम पूर्णिमा होती है। इस दिन व्रत रखने का विधान है साथ ही किसी पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। पुराणों में चैत्र की पूर्णिमा को मन्वादि तिथि कहा गया है।
इस तिथि में चंद्रमा की प्रसन्नता के लिए कच्चे अन्न और जल से भरे घड़े दान करना उत्तम माना जाता है। इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा सुनना अति उत्तम होता है। इस कथा के श्रवण से व्यक्ति के कष्टों का नाश होता है ।
चैत्र पूर्णिमा पर रात्रि के समय चंद्रमा के पूजन के बाद अर्घ्य दिया जाता है क्योंकि बिना अर्घ्य के व्रत पूर्ण नहीं होता है साथ ही रात्रि में माँ लक्ष्मी की पूजा करना अत्यंत श्रेष्ठकर होता है। व्रत ,स्नान और पूजा के साथ साथ दान देना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
इस तिथि पर विशेषकर गरीबों और जरुरतमन्द लोगों को दान देना पुण्यकारी माना जाता है। इस पुण्य तिथि को हनुमान जी का अवतरण हुआ था इसलिए इस तिथि पर हनुमान जी की भी पूजा की जाती है।
2. वैशाख मास की पूर्णिमा
दिनांक: 01 मई 2026
प्रारंभ: 30 अप्रैल 2026 को रात 9:13 बजे
समाप्त: 01 मई 2026 को रात 10:53 बजे
वैशाख पूर्णिमा वर्ष की द्वितीय पूर्णिमा है। यह पूर्णिमा बहुत पवित्र और शुभ फल देने वाली है। इस दिन पवित्र नदी में या घर पर शुद्ध जल से स्नान करके दान पुण्य करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। पुराणों के अनुसार वैशाख पूर्णिमा के दिन जल से भरा कलश और पकवान दान करना चाहिए ।
इस दिन दिए गए दान को गौ दान के समान फल देने वाला बताया गया है। वैशाख पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु ,चंद्र देव और भगवान बुद्ध की पूजा करने से मनुष्य के सभी शोक नष्ट हो जाते हैं और मनुष्य की सभी मनोकामनाए पूर्ण होती हैं।
वैशाख मास की पूर्णिमा पर ही भगवान बुद्ध का जन्म होने के कारण इस तिथि पर भगवान बुद्ध की भी पूजा की जाती है इसलिए इस तिथि को कुछ लोग बुद्ध पूर्णिमा के रूप में भी मनाते हैं।
3. ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा (अधिक मास)
दिनांक: 30 मई 2026
प्रारंभ: 30 मई 2026 को सुबह 11:58 बजे
समाप्त: 31 मई 2026 को दोपहर 2:15 बजे
ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा
दिनांक: 29 जून 2026
प्रारंभ: 29 जून 2026 को सुबह 3:07 बजे
समाप्त: 30 जून 2026 को सुबह 5:27 बजे
ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को वट सावित्री का व्रत होता है । इस दिन स्त्रियों को उपवास करके वट वृक्ष की पूजा करके उसकी परिक्रमा करनी चाहिए। इस प्रकार वट वृक्ष की पूजा करने से स्त्रियों को सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा को सुनने और पढ़ने तथा माता लक्ष्मी की पूजा करने से धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इस दिन चंद्र देव की उपासना करने से जीवन में सकरात्मकता आती है।
4. आषाढ मास की पूर्णिमा
दिनांक: 29 जुलाई 2026
प्रारंभ: 28 जुलाई 2026 को शाम 6:19 बजे
समाप्त: 29 जुलाई 2026 को रात 8:06 बजे
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गोपद्म व्रत का विधान है। गोपद्म व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। माना जाता है कि गोपद्म व्रत सभी सुख प्रदान करने वाला होता है। इस दिन प्रातः स्नान करके पूरे दिन भगवान श्री हरि के स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।
स्वरूप का ध्यान करते समय भगवान विष्णु के चार हाथ, विशाल व सुंदर सुडौल शरीर, शंख, चक्र, गदा, पद्म, लक्ष्मी तथा गरुड़ आदि के बारे में चिंतन करना चाहिए। इस प्रकार भगवान विष्णु का चिंतन करते हुए उनकी धूप, दीप, गंध, फूल आदि वस्तुओं से पूजा करनी चाहिए।
पूजा सम्पन्न कर लेने के उपरांत अपनी श्रद्धानुसार दान करना चाहिए। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन पूर्ण निष्ठा भाव से व्रत करने से जातक को भगवान विष्णु की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।
5. श्रावण मास की पूर्णिमा
दिनांक: 27 अगस्त 2026
प्रारंभ: 27 अगस्त 2026 को सुबह 9:09 बजे
समाप्त: 28 अगस्त 2026 सुबह 9:49 बजे
पुराणों में श्रावण मास की पूर्णिमा को वेदों का उपाकर्म (वेदों का आरंभ )बताया गया है। इस शुभ दिन पर सत्यनारायण व्रत, हवन या यज्ञ करके भगवान विष्णु की पूजा करना चाहिए। इस दिन स्नान, तप और दान का विशेष महत्व है। श्रावण पूर्णिमा के दिन ही रक्षाबंधन का त्यौहार भी मनाया जाता है।
अतः इस दिन देवी देवताओं की पूजा करने के उपरांत उन्हे भी रक्षासूत्र भेंट करना चाहिए। श्रावण मास में मुख्य रूप से भगवान शिव की पूजा की जाती है इसलिए श्रावण पूर्णिमा के दिन रुद्राभिषेक आदि अनुष्ठान मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। श्रावण पूर्णिमा के दिन वेदों का पाठ करना या सुनना अत्यंत लाभकारी और फलदायी माना गया है।
इस मास की पूर्णिमा को नारली पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। नारली पूर्णिमा का व्रत मुख्य रूप से मछुआरों के द्वारा मनाया जाता है क्योंकि इसी पूर्णिमा पर ये लोग समुद्र की पूजा करते हैं।
6. भाद्रपद मास की पूर्णिमा
दिनांक: 26 सितम्बर 2026
प्रारंभ: 25 सितम्बर 2026 को रात 11:07 बजे
समाप्त: 26 सितम्बर 2026 को रात 10:19 बजे
भाद्रपद मास की पूर्णिमा को उममाहेश्वर व्रत किया जाता है। इस पूर्णिमा पर माता पार्वती और भगवान शिव का श्रद्धापूर्वक विधि विधान से पूजन करना चाहिए और रात्रि के समय में जागरण करना चाहिए।
पुराणों में तो यहाँ तक बताया गया है कि भाद्रपद मास की पूर्णिमा को उमामाहेश्वर व्रत का पालन करने से मनुष्य इस पृथ्वी लोक पर विख्यात होता है साथ ही उसका सम्पूर्ण जीवन धन -धन्य से भर जाता है।
इस दिन दीनों और अनाथों को भोजन कराने से जातक को जीवन के सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है और मांगलिक सुख के साथ साथ दाम्पत्य सुख भी प्राप्त होता है ।
भाद्रपद पूर्णिमा व्रत स्त्रियों के लिए खास महत्व रखता है। इस व्रत के प्रभाव से स्त्रियों को संतान सुख व सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
7. आश्विन मास की पूर्णिमा
दिनांक: 25 अक्टूबर 2026
प्रारंभ: 25 अक्टूबर 2026 को सुबह 11:57 बजे
समाप्त: 26 अक्टूबर 2026 को सुबह 9:42 बजे
आश्विन मास की पूर्णिमा कोजागर व्रत किया जाता है। शरद ऋतु में पड़ने के कारण इस पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा भी कहा जाता है इस दिन सबेरे उठकर पवित्र नदी या घर में ही शुद्ध जल से स्नान करके व्रत करने का संकल्प लें और माता लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके उनकी विधि पूर्वक पूजा करनी चाहिए।
शाम के समय चंद्रमा के उदय होने पर किसी धातु या मिट्टी के बने घी के दीपक जलाए और मन ही मन माता के स्वरूप का ध्यान करें साथ ही घी और शक्कर मिलाकर खीर तैयार करें और उस खीर को चंद्रमा की रोशनी में रख दें जब एक प्रहर बीत जाए तो उस खीर का भोग माता लक्ष्मी को लगाएं। माता लक्ष्मी को भोग लगाने के पश्चात उस खीर को सभी को प्रसाद के रूप में वितरित कर दें।
इस दिन चंद्रमा अपनी सभी कलाओं से पूर्ण होता है इससे निकलने वाली किरणे अमृत के समान मानी जाती हैं चंद्रमा की किरणे खीर में पड़ने से खीर अत्यंत गुणकारी और लाभकारी हो जाती है।
इस पूर्णिमा की रात में जागरण करना अति उत्तम माना जाता है क्योंकि पुराणों में भी ऐसा कहा गया है कि इस रात को माता लक्ष्मी विचरण करती है और जो भक्त जागरण करते हैं उन्हें मनोवांछित फल और समृद्धि प्रदान करती हैं साथ ही उन्हें परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।
8. कार्तिक मास की पूर्णिमा
दिनांक: 24 नवम्बर 2026
प्रारंभ: 23 नवम्बर 2026 को रात 11:43 बजे
समाप्त: 24 नवम्बर 2026 को रात 8:24 बजे
सनातन धर्म में कार्तिक मास को बहुत ही पवित्र माना जाता है क्योंकि यह वह शुभ मास है जिसमें भगवान विष्णु अपनी चार माह की योग निंद्रा के पश्चात उठते हैं साथ ही इसी मास में माता तुलसी का विवाह भी होता है इसलिए कार्तिक पूर्णिमा के दिन किसी पवित्र नदी में स्नान करना अति उत्तम माना जाता है। पुराणों के अनुसार कार्तिक मास की पूर्णिमा पर भगवान कार्तिकेय जी का दर्शन और उनका पूजन करना अत्यंत शुभ माना गया है।
जो जातक इस शुभ दिन पर भगवान कार्तिकेय जी का विधिपूर्वक पूजन करते हैं उन्हे सम्पूर्ण शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। इस दिन क्षीर सागर दान और दीप दान का विशेष महत्त्व बताया गया है।
क्षीरसागर दान और दीपदान के लिए चंद्रमा उदय के समय कार्तिकेय ,वरुण और अग्नि देव की धूप दीप आदि के द्वारा पूजन करके घर के बाहर दीप का दान करना चाहिए साथ ही दीपकों के पास ही एक चार अंगुल का चौकोर गड्ढा खोदकर उसे गाय के दूध से भरकर उसमें मोती से बने नेत्रों वाली मछली डालकर धूप दीप आदि से पूजा करके उसे दान देना चाहिए।
इस प्रकार के क्षीरसागर दान के प्रभाव से मनुष्य भगवान विष्णु का प्रिय बन जाता है और उसे रुद्रलोक की प्राप्ति होती है साथ ही इस दिन भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी के साथ चंद्रदेव की पूजा करने से भक्तों की आर्थिक, मानसिक और शारीरिक समस्याएं दूर होती हैं।
9. मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा
दिनांक: 23 दिसम्बर 2026
प्रारंभ: 23 दिसम्बर 2026 को सुबह 10:48 बजे
समाप्त: 24 दिसम्बर 2026 को सुबह 6:58 बजे
मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि प्रदान करने वाली होती है। इस पूर्णिमा पर शरीर पर पीली सरसों का उबटन शरीर पर लगाकर जल से स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें और मन में भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए भगवान विष्णु , चंद्रमा ,इन्द्र ,बृहस्पति आदि देवताओं का विधिपूर्वक पूजन करें साथ ही व्रत का संकल्प लें।
पुराणों के अनुसार इस पूर्णिमा पर व्रत करने व नमक आदि का दान करने से मनुष्य के जीवन की दरिद्रता का नाश होता है व उसके सौभाग्य में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है।
10. पौष मास की पूर्णिमा
दिनांक: 22 जनवरी 2027
प्रारंभ: 21 जनवरी 2027 को रात में 9:30 बजे
समाप्त: 22 जनवरी 2027 को शाम 5:47 बजे
"पौष पूर्णिमा" पौष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस दिन स्नान ,दान और जप को बहुत अधिक महत्त्व दिया जाता है। इस दिन भगवान सूर्य, चंद्र देव, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है।
विष्णु की पूजा करने से मनुष्य पूर्व जन्मों में किए हुए अनजाने पाप से भी मुक्त हो जाते हैं और मनुष्य पाप मुक्त होकर स्वर्ग में स्थान पाता है। पौष पूर्णिमा के दिन पूजा के समय सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने का विशेष महत्व होता है।
इस कथा के सुनने से अमोघ फल प्राप्त होता है और सभी कष्टों का निवारण होता है। पूर्णिमा के दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को तिल, गुड़, कंबल आदि चीजें दान करना चाहिए।
11. माघ मास की पूर्णिमा
दिनांक: 20 फरवरी 2027
प्रारंभ: 20 फरवरी 2027 को सुबह 8:00 बजे
समाप्त: 21 फरवरी 2027 को सुबह 4:54 बजे
माघ मास की पूर्णिमा पर दान स्नान आदि का विशेष महत्त्व होता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करके दान करना अत्यंत उत्तम होता है। पुराणों के अनुसार इस पुण्य तिथि पर जो जातक भगवान शिव का निष्ठा पूर्वक विधि विधान से पूजन करते हैं उन्हें अश्व मेघ यज्ञ के समान उत्तम फलप्राप्त होता है ।
माघ पूर्णिमा पर जरुरतमन्द और अनाथ लोगों को तिल ,कंबल, पगड़ी और जूता आदि दान देने मनुष्य को स्वर्ग के समान सुख की प्राप्ति होती है साथ ही वस्त्र दान और गौ दान का विशेष महत्त्व होता है। इस दिन स्नान ,दान और जप करने से मनुष्य को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है व वर्तमान और पूर्व जन्म के सभी पापों से मुक्ति मिलती है।
12. फाल्गुन मास की पूर्णिमा
दिनांक: 21 मार्च 2027
प्रारंभ: 21 मार्च 2027 को शाम 6:22 बजे
समाप्त: 22 मार्च 2027 को शाम 4:14 बजे
फाल्गुन पूर्णिमा वर्ष की अंतिम पूर्णिमा होती है। इस पूर्णिमा को होलिका दहन के रूप में मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर पवित्र नदी में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। पवित्र स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा व सत्यनारायण का पाठ करना उत्तम फल प्रदान करता है।
फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होली का त्योहार पड़ता है जिसे बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाते है इसलिए यह पूर्णिमा अत्यंत शुभ मानी जाती है। इस पूर्णिमा पर व्रत रखने से मनुष्य को सभी कष्टों से छुटकारा मिलता है व घर में सुख समृद्धि का आगमन होता है।
फाल्गुन पूर्णिमा एकमात्र ऐसी पूर्णिमा है जिसमे काम वासना का दाह किया जाता है जिससे सभी लोग वर्ष भर प्रेमपूर्वक जीवन यापन करते हैं।
पूर्णिमा व्रत क्यों किया जाता है?
पूर्णिमा तिथि पर चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में होता है। हमारे सनातन धर्म में पूर्णिमा तिथि विशेष महत्त्व रखती है। पुराणों के अनुसार जो स्त्री पुरुष पूर्णिमा तिथि पर चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं और विधि विधान से पूरे श्रद्धा भाव के साथ पूर्णिमा व्रत रहते है उन पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा बनी रहती है साथ ही इस तिथि को धन और संतान दायक बताया गया है।
इस दिन चंद्र देव, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है। पूर्णिमा के दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को तिल, गुड़, कंबल आदि चीजें दान करनी चाहिए क्योंकि दान देने से व्यक्ति को सभी कष्टों और पापों से छुटकारा मिलता है। पूर्णिमाओं पर व्रत रखने का अपना अलग अलग महत्त्व होता है।
पूर्णिमा के व्रत की पूजा विधि
सर्वप्रथम सुबह उठकर नित्यक्रिया आदि से निवृत हो लें। तत्पश्चात गंगाजल छिड़क कर पूजा-स्थान को शुद्ध कर ले और स्वास्तिक बनाकर उसके ऊपर चौकी रखे। चौकी के ऊपर लाल कपड़ा बिछाए और लाल अक्षत रखकर उसपर सूर्य और चंद्र देवताओं की तस्वीर रखें।
अपने रिवाजों के अनुसार देवताओं को फल, पुष्प आदि अर्पित करें। धूप, दीप आदि के द्वारा पूजन व अर्चन करें। पूजा के दौरान सत्यनारायण भगवान की कथा का पाठ करें।
कथा समाप्त होने के पश्चात सत्यनारायण भगवान की आरती करें और उनकी स्तुति में भजन गाएं। पूजा के दिन संभव हो तो व्रत का पालन करें।