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महाराणा प्रताप जयंती कब है? जानें इतिहास, जयंती तिथि, जीवन परिचय और वीरता गाथा
लेखक: रुचि

महाराणा प्रताप जयंती कब है? जानें इतिहास, जयंती तिथि, जीवन परिचय और वीरता गाथा

महाराणा प्रताप जयंती 2026 में कब है?

महाराणा प्रताप का जन्म ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को 9 मई सन 1540 ईo में राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में महाराणा उदयसिंह के घर पर सिसोदिया वंश में हुआ था। राजस्थान के उस वीर पुरुष के जन्मोत्सव को महाराणा प्रताप जयंती के रूप में मनाते है। 

महाराणा प्रताप जयंती 2026 में 9 मई या 17 जून?

9 मई इनके जन्म की तारीख है जबकि ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्ष की तृतीया इनके जन्म की तिथि है। राजस्थान में लोग इनका जन्म दिवस तिथि के अनुसार मनाते है न की जन्म तारीख के अनुसार। पंचांग में तिथि बदलती रहती है जैसे दीपावली और होली की तिथि बदलती है। 

2026 में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 17 जून 2026 को पड़ रही है। इसलिए महाराणा प्रताप जयंती 17 जून को मनायी जाएगी। 

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महाराणा प्रताप का जन्म और प्रारम्भिक जीवन

जब दिल्ली में मुगलों का शासन था। तब राजस्थान के राजपुताना की लगभग 200 रियासतों ने अकबर की सत्ता को स्वीकार कर लिया और गुलामी की बेड़ियों में बंध गए। वही मेवाड़ का सिसोदिया वंश पूरी दुनिया के सामने स्वाभिमान के साथ अपने तेज से चमक रहा था। उस समय मेवाड़ में राजा उदयसिंह का शासन था। जिन्होंने अपने पूर्वजों की तरह किसी की भी अधीनता को स्वीकार नहीं किया।

बचपन में महाराणा प्रताप को ‘कीका’ क्यों कहा जाता था?

जब महाराणा प्रताप का जन्म हुआ तो मुगलों का ही शासन चल रहा था। मेवाड़ के पास से निकलने वाली मुगलों की सेना पर ये गुलेल से वार कर देते थे। इनका शरीर और बच्चों से कई गुना मजबूत था। इनकी माता का नाम जैवन्ता बाई था। बचपन से ही इन्हे अस्त्र शस्त्र चलाना बहुत प्रिय था। इसलिए ये गुरुकुल में अध्ययन के लिए चले गए। शाम को ये भीलों के साथ भाला चलाने का अध्ययन करते थे। भीलों के साथ रहने के कारण इन्हे बचपन में ‘कीका’ नाम से पुकारते थे।

इनकी माता ने श्री कृष्ण जी की कहानी और महाभारत से युद्ध नीति का ज्ञान दिया। जिसके फलस्वरूप ये युद्ध नीति में सकुशल हो गए।

महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक कैसे हुआ?

उदय सिंह की कई पत्नियाँ थी। इनके 33 बच्चे थे। सभी रानियों से इन्हे धीरबाई शाह सबसे अधिक प्रिय थी। उसी के कहने पर उदय सिंह ने उसके पुत्र जगमाल को मेवाड़ का राणा घोषित कर दिया। जबकि महाराणा प्रताप उदय सिंह के सबसे बड़े पुत्र थे। शास्त्रों के अनुसार सदैव बड़ा पुत्र ही राजा बनता है पर महाराणा प्रताप ने अपने छोटे भाई को सत्ता देना स्वीकार कर लिया।

अचानक उदय सिंह का स्वास्थ्य खराब हो गया और 1572 को उदयसिंह का देहांत हो गया। जब इनका देहांत हुआ तो सभी सामंत, मंत्री और पुत्र वहाँ उपस्थित थे। पर इनका छोटा पुत्र जगमाल महल में अपना राज्याभिषेक करा रहा था। वह अपने पिता की मृत्यु में उपस्थित नहीं हुआ।

इस बात पर सभी सामंतों और सैनिकों ने महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक कर दिया। महाराणा प्रताप सैनिकों सहित जगमाल के महल की ओर चले। जब जगमाल ने यह खबर सुनी तो वह महल छोड़कर भाग गया और राजा अकबर की शरण ली। बस तभी से मुगलों का युद्ध महाराणा प्रताप से कई बार हुआ और हर बार राणा की विजय हुई। अकबर महाराणा प्रताप से कभी जीत ही नहीं पाया।

महाराणा प्रताप की वीरता और हल्दीघाटी का युद्ध

18 जून 1576 को हल्दीघाटी का महान युद्ध हुआ। जिस युद्ध में एक तरफ थी 80 हजार मुगलों की सेना और दूसरी ओर थी मेवाड़ की 20 हजार सेना। दोनों सेनाएं आमने-सामने आ चुकी थी।

महाराणा प्रताप की शक्ति और युद्ध कौशल

जैसे ही महाराणा प्रताप ने युद्ध भूमि में अपना कदम रखा तभी मुगलों की सेना में दहशत का माहौल फैल गया। महाराणा जिस ओर बढ़ जाते वहाँ शत्रुओं की लाशों के ढेर लग जाते थे। मुगलों ने उस समय पहली बार ही महाराणा प्रताप को देखा था, इससे पहले उन्होंने केवल नाम ही सुना था।

महाराणा प्रताप 7 फुट 5 इंच के थे। इनका वजन लगभग 110 किलो का था। जब ये युद्ध करने जाते थे तब 55 किलोग्राम की दो तलवारे (एक अपने लिए और एक निहत्थे शत्रु के लिए ताकि युद्ध बराबरी का हो सके), 72 किलोग्राम का कवच और 81 किलोग्राम का भाला लेकर चलते थे। युद्ध के दौरान ये 208 किलोग्राम का वजन लेकर युद्ध करते थे।

बहलोल खान और महाराणा प्रताप का युद्ध

इनकी एक तलवार के प्रहार से बहलोल खान के घोड़े सहित दो टुकड़े हो गए थे। बहलोल खान राजा अकबर का सेनापति था।

चेतक की वीरता की कहानी

इनके घोड़े का नाम चेतक था। वह 11 फुट लंबा तथा नीले रंग का अति सुंदर दिखने वाला घोड़ा था। उसका मुखौटा हाथी का लगा रहता था ताकि युद्ध में आए हाथियों को भ्रम रहे कि यह हाथी है या घोड़ा। चेतक इतना तेज था कि हवा से बातें करता था।

घबराई हुई मुगलों की सेना अरावली की घाटी की ओर भागने लगी। सेना को भागती देख मेहतर खां जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि बादशाह अकबर विशाल सेना लेकर स्वयं युद्ध भूमि में आ रहे हैं। यह सुनकर मुगल सेना सोच में पड़ गई कि भागे तो अकबर मार डालेगा और रुके तो महाराणा प्रताप मार डालेंगे।

इसके बाद महाराणा प्रताप का घोड़ा मानसिंह के सामने आ गया। चेतक ने अपने दोनों पैर मानसिंह के ऐरावत पर टिका दिए, पर उसके आगे लगी तलवार से चेतक का पैर घायल हो गया। चेतक को घायल अवस्था में देखकर मुगलों की सेना ने महाराणा प्रताप को घेरना चाहा, परंतु चेतक परिस्थिति को समझकर महाराणा प्रताप को वहाँ से सुरक्षित निकाल लाया।

जब चेतक महाराणा प्रताप को युद्ध भूमि से लेकर भाग निकला तो मुगलों की सेना ने उनका पीछा करना शुरू कर दिया। रास्ते में एक 26 फुट चौड़ा नाला आया और चेतक ने उसे पार करने के लिए छलांग लगा दी। नाले की चौड़ाई अधिक होने के कारण घायल चेतक नाले के पार गिर पड़ा, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

भील सेना और मेवाड़ की रक्षा

इसके बाद भीलों की सेना ने मोर्चा संभाला और भील सेना से मुगलों की सेना का युद्ध हुआ। इस प्रकार राजपूताना और भील सेना ने मिलकर मुगलों को कड़ी टक्कर दी। अंततः मानसिंह ने मुगलों की सेना को अजमेर की ओर मोड़ लिया।

हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप कुंभलगढ़ आ गए। युद्ध के दौरान उनका राजकोष खाली हो गया था। हल्दीघाटी युद्ध के कुछ महीनों बाद ही अकबर ने 1577 में कुंभलगढ़ पर आक्रमण कर दिया। उचित सेना न होने के कारण मुगलों की सेना भारी पड़ने लगी। तब महाराणा प्रताप ने किले को त्याग दिया और मुगलों ने कुंभलगढ़ पर अधिकार कर लिया।

महाराणा प्रताप ने मेवाड़ को फिर कैसे जीता?

कुछ महीनों बाद महाराणा प्रताप ने फिर से सेना तैयार की और कुंभलगढ़ को वापस जीत लिया। इसके बाद वे गुजरात गए, जहाँ उन्होंने विशाल सेना तैयार की और पुनः मेवाड़ के किलों को जीतना प्रारम्भ किया।

ऐसा करते-करते उन्होंने 32 किलों पर अपना ध्वज फहरा दिया और अकबर को बेचैन कर दिया।

महाराणा प्रताप का अंतिम समय

इसके बाद 12 वर्षों तक महाराणा प्रताप ने मेवाड़ में शासन किया और उसकी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया।

19 जनवरी 1597 को 57 वर्ष की आयु में शिकार के दौरान गंभीर चोट लगने से महाराणा प्रताप का देहांत हो गया।

महाराणा प्रताप जयंती का महत्व

महाराणा प्रताप जयंती केवल एक जन्मोत्सव नहीं, बल्कि वीरता, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मानी जाती है। महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में कभी भी मुगल शासन की अधीनता स्वीकार नहीं की और मातृभूमि की रक्षा के लिए कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना किया। यही कारण है कि आज भी उन्हें भारतीय इतिहास के सबसे महान योद्धाओं में गिना जाता है।

यह जयंती लोगों को साहस, आत्मसम्मान, संघर्ष और स्वतंत्रता के महत्व की प्रेरणा देती है। धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यता है कि महाराणा प्रताप का जीवन हमें यह सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने धर्म, स्वाभिमान और कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए।

राजस्थान सहित पूरे भारत में महाराणा प्रताप जयंती को श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करते हैं, शोभायात्राएं निकाली जाती हैं तथा उनके शौर्य और बलिदान को याद किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. महाराणा प्रताप जयंती 2026 में कब मनाई जाएगी?

वर्ष 2026 में महाराणा प्रताप जयंती ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि, 17 जून 2026 को मनाई जाएगी।

2. महाराणा प्रताप का जन्म कब हुआ था?

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में सिसोदिया राजवंश में हुआ था।

3. महाराणा प्रताप का घोड़ा कौन था?

महाराणा प्रताप के प्रसिद्ध और वीर घोड़े का नाम चेतक था। चेतक अपनी तेज गति, निष्ठा और वीरता के लिए प्रसिद्ध था।

4. हल्दीघाटी का युद्ध कब हुआ था?

हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध 18 जून 1576 को महाराणा प्रताप और मुगल सेना के बीच लड़ा गया था।

5. महाराणा प्रताप किस वंश के थे?

महाराणा प्रताप मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश से संबंधित थे।

6. महाराणा प्रताप जयंती क्यों मनाई जाती है?

महाराणा प्रताप जयंती उनके साहस, त्याग, राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान को सम्मान देने के लिए मनाई जाती है। यह दिन लोगों को वीरता और देशभक्ति की प्रेरणा देता है।

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