Sanatan Logo
Ganesh Logo
जीवित्पुत्रिका व्रत क्या है? जानें पूजा विधि, कथा और महत्व
लेखक: रुचि

जीवित्पुत्रिका व्रत क्या है? जानें पूजा विधि, कथा और महत्व

जीवित्पुत्रिका व्रत 2026 में कब है?

2026 में जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को मनाया जाएगा। 

• अष्टमी तिथि: 3 अक्टूबर, शनिवार 

• अष्टमी तिथि प्रारंभ: 3 अक्टूबर 2026 को सुबह 8:01 बजे 

• अष्टमी तिथि समाप्त: 4 अक्टूबर 2026 को सुबह 5:52 बजे 

अधिक जानकारी के लिए: - हमारा विस्तृत पंचांग अवश्य देखे।  

जीवित्पुत्रिका व्रत क्या है?

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे आमतौर पर 'जितिया व्रत' के नाम से भी जाना जाता है, एक अत्यंत महत्वपूर्ण सनातन पर्व है जो सितंबर या अक्टूबर माह के मध्य मनाया जाता है। 

यह पर्व माताओं द्वारा अपने पुत्रों की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और कल्याण के लिए रखा जाता है। व्रत के दौरान, महिलाएँ सूर्य नारायण की पूजा करती हैं और संतान की लंबी उम्र और सुखी जीवन की कामना करती हैं। यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, और नेपाल के कुछ हिस्सों में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह उस महान घटना की याद दिलाता है जब भगवान श्रीकृष्ण ने परीक्षित की रक्षा की थी।

जीवित्पुत्रिका व्रत की पूजा विधि

इस पर्व को मनाने की कोई विशेष विधि नहीं है। महिलाओं को अपने रीति रिवाजों के अनुसार ही पूजा करनी चाहिए। प्रमुख रूप से इस पर्व में भगवान सूर्य नारायण की पूजा की जाती है। 

सनातन ज्योति में अनुभवी आचार्यों द्वारा विभिन्न देवी-देवताओं के वैदिक अनुष्ठान पूर्ण विधि-विधान के साथ संपन्न कराए जाते हैं। यदि आप किसी विशेष अनुष्ठान की विधि, धार्मिक महत्व या उससे जुड़े आध्यात्मिक लाभों के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो: -अनुष्ठानों से संबंधित निःशुल्क परामर्श एवं विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। पाण्डव विजयी होकर हस्तिनापुर लौट आए थे। एक रात, जब पाण्डव अनुपस्थित थे, अश्वत्थामा ने अपने साथियों को साथ लेकर पाण्डवों के शिविर पर धावा बोल दिया। उसने सोते हुए द्रोपदी के पाँचों पुत्रों को पाण्डव समझकर उनके सिर धड़ से अलग कर दिए।

अर्जुन को जब इस भयावह घटना का पता चला, तो उनका क्रोध चरम सीमा पर पहुँच गया। वे भगवान श्रीकृष्ण को साथ लेकर अश्वत्थामा को ढूंढ़ने निकल पड़े। कई दिनों की तलाश के बाद, उन्होंने अश्वत्थामा को पकड़ लिया। अर्जुन अश्वत्थामा को मार देना चाहते थे, लेकिन धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान श्रीकृष्ण के समझाने पर उन्होंने अश्वत्थामा के सिर की मणि लेकर उसे छोड़ दिया।

इस अपमान से तिलमिलाए अश्वत्थामा ने प्रतिशोध की आग में जलते हुए अमोघ अस्त्र का प्रयोग कर दिया। यह अस्त्र पांडव वंश के इकलौते उत्तराधिकारी, उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु पर छोड़ा गया था। पाण्डव इस अस्त्र का प्रभाव रोकने का उपाय नहीं जानते थे। सभी पांडवों ने भगवान श्रीकृष्ण से उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु की रक्षा की प्रार्थना की।

भगवान श्रीकृष्ण ने सूक्ष्म रूप धारण करके उत्तरा के गर्भ में प्रवेश किया और शिशु की रक्षा की। उन्होंने उस शिशु को नया जीवन दिया। वही शिशु आगे चलकर पाण्डव वंश का महान कर्णधार परीक्षित बना। 

शिशु को जीवनदान मिलने की इस अद्भुत घटना के कारण इस व्रत का नाम "जीवित्पुत्रिका" पड़ा। 

यदि आप संतान सुख, संतान की रक्षा, पुत्र-पुत्री के उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, उज्ज्वल भविष्य तथा भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्ति हेतु विशेष वैदिक साधना करना चाहते हैं तो: -संतान गोपाल मंत्र जप अनुष्ठान के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

Youtube
Facebook
Instagram
Astrologer
हम से बात करें