गोवत्स द्वादशी 2026 में कब है?
वर्ष 2026 में गोवत्स द्वादशी 5 नवंबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। सनातन धर्म में यह पावन पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है और गौ माता तथा बछड़े की पूजा के लिए विशेष महत्व रखता है। यह पर्व विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। कई स्थानों पर इसे बछ बारस के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन गौ माता और बछड़े की पूजा, सेवा एवं संरक्षण का संकल्प लेने से परिवार में सुख-समृद्धि, संतान का कल्याण तथा पुण्य की प्राप्ति होती है।
यह उत्सव कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को विशेष रूप से उत्तर भारत में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है, जहां इसे व्यापक रूप से मनाया जाता है।
पूजा विधि
प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ और शुद्ध वस्त्र पहन लें। पूजा से पहले व्रत का संकल्प लें और मन में गोमाता की सेवा का संकल्प करें। यदि आपके पास दूध देने वाली गाय और उसका बछड़ा है, तो उन्हें स्नान कराकर साफ करें। फिर हल्दी और कुमकुम से उनके सींगों को सजाएं और माला पहनाएं। अगर आपके पास गाय और बछड़ा उपलब्ध नहीं हैं, तो घर के एक स्वच्छ स्थान पर गोबर से लीपकर चौक बनाएं और उस पर शुद्ध मिट्टी से बनी गाय और बछड़े की मूर्ति या उनका चित्र स्थापित करें।
पूजन के लिए जल, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प और फल का प्रबंध करें। पूजा विधि की शुरुआत गाय और बछड़े को तिलक लगाने से करें और उन्हें अक्षत अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप जलाकर उनकी आरती करें और गाय के चारों ओर परिक्रमा करें। पूजा के बाद गाय और बछड़े को गुड़, हरी घास, केला, और अन्य फल-फूल अर्पित करें।
इस दिन विशेष रूप से महिलाएं अन्न का सेवन नहीं करतीं और फलाहार करती हैं। ध्यान रखें कि दूध और दूध से बनी वस्तुओं का सेवन वर्जित है क्योंकि इस दिन बछड़े के लिए गाय का दूध छोड़ा जाता है। पूजन के अंत में गोवत्स द्वादशी की व्रत कथा सुनना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके बाद, दिनभर संभव हो तो गाय और बछड़े की सेवा में समय बिताएं।
यदि आप गोवत्स द्वादशी, गौ पूजा, गोसेवा अथवा अन्य वैदिक अनुष्ठानों की विधि, धार्मिक महत्व और आध्यात्मिक लाभों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो: - अनुष्ठानों से संबंधित निःशुल्क परामर्श एवं विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
गोवत्स द्वादशी की कथा
एक किवदंती के अनुसार, बहुत समय पहले सुवर्णपुर नामक नगर में एक परोपकारी और धर्मप्रिय राजा राज्य करता था। उसके दो पतिव्रता रानियाँ थीं – सीता और गीता। राजा ने अपने महल में एक गाय, उसका बछड़ा, और एक भैंस पाल रखी थी। सीता भैंस की देखभाल करती थी, जबकि गीता गाय और उसके बछड़े की सेवा करती थी। गीता अपने बछड़े से पुत्रवत स्नेह करती थी और उसका अत्यंत ख्याल रखती थी। गाय और बछड़े के प्रति गीता का प्रेम अद्वितीय था, वह उनकी देखभाल पूरी ममता के साथ करती थी।
एक दिन, ईर्ष्यालु भैंस ने रानी सीता के कानों में चुगली कर दी कि गीता रानी मुझसे ईर्ष्या करती है और अपने गाय व बछड़े को मुझसे अधिक महत्व देती है। भैंस की इस चुगली ने सीता के मन में जलन का बीज बो दिया। अपनी ईर्ष्या में अंधी होकर, सीता ने एक दिन मौका पाकर गाय के निर्दोष बछड़े को मार दिया और उसे गेहूँ के ढेर में छिपा दिया।
उसी दिन जब राजा भोजन करने के लिए बैठा, तो अचानक आसमान से मांस और रक्त की वर्षा होने लगी। महल के अंदर हर तरफ खून और मांस के टुकड़े दिखाई देने लगे। राजा के भोजन की थाली में भी मल-मूत्र प्रकट हो गया। यह दृश्य देखकर राजा स्तब्ध हो गया और यह भयंकर आपदा उसकी समझ से परे थी। वह बेहद परेशान हो उठा और उसे कारण समझ नहीं आ रहा था।
तभी आकाशवाणी हुई, "हे राजन्! तुम्हारी रानी सीता ने गाय के बछड़े की हत्या कर उसे गेहूँ के ढेर में छुपा दिया है। कल गोवत्स द्वादशी का पावन दिन है। यदि तुम भैंस को राज्य से बाहर कर, गाय और बछड़े की पूजा करोगे, तो बछड़ा पुनः जीवित हो जाएगा।"
आकाशवाणी सुनकर राजा ने तुरंत भैंस को राज्य से बाहर निकलवा दिया और अगले दिन गोवत्स द्वादशी के अवसर पर विधिपूर्वक गोमाता और बछड़े की पूजा की। राजा ने अपने हृदय से गाय के बछड़े को याद किया और अपने समर्पण से पूजा संपन्न की। चमत्कार हुआ! जैसे ही राजा ने बछड़े को स्मरण किया, बछड़ा गेहूँ के ढेर से जीवित बाहर निकल आया। यह देख राजा और गीता रानी का हृदय खुशी से भर गया।
राजा ने अपने राज्य में यह आदेश दिया कि अब से हर साल गोवत्स द्वादशी का व्रत किया जाएगा ताकि सभी लोग गोमाता और बछड़े के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सकें। इस घटना के बाद सुवर्णपुर नगर में यह पर्व धूमधाम से मनाया जाने लगा, और सभी ने गाय की महिमा को समझते हुए उसकी सेवा का संकल्प लिया। इस तरह से गोवत्स द्वादशी का व्रत पूरे राज्य में एक पवित्र परंपरा बन गया।
गोवत्स द्वादशी का महत्त्व
सनातन परंपरा में गाय को विशेष सम्मान प्राप्त है, जिसे ‘गौ माता’ के रूप में पूजनीय माना जाता है। गोवत्स द्वादशी का पर्व विशेष रूप से गाय और उसके बछड़े की पूजा से जुड़ा हुआ है। इस दिन गायों के प्रति कृतज्ञता और उनका संरक्षण करने का संकल्प लिया जाता है, जो भारतीय कृषि और पर्यावरण के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
गाय का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि कृषि और ग्रामीण जीवन में उसकी अहम भूमिका के कारण भी है। गाय के गोबर और मूत्र से बनी जैविक खाद मिट्टी की उर्वरकता को बढ़ाती है, जिससे स्वस्थ और प्राकृतिक खेती संभव होती है। बछड़े बड़े होकर बैल के रूप में खेत जोतने और अन्य कृषि कार्यों में सहायक होते हैं, जिससे किसान की आजीविका सुदृढ़ होती है।
यदि आप संतान सुख, संतान की रक्षा, परिवार की सुख-समृद्धि, बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य तथा भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्ति हेतु विशेष वैदिक साधना करना चाहते हैं तो: - संतान गोपाल मंत्र जप अनुष्ठान के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
गोवत्स द्वादशी हमें यह सिखाती है कि गाय का संरक्षण और देखभाल सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि हमारे कृषि तंत्र और पर्यावरण के संतुलन के लिए भी अनिवार्य है। यह पर्व हमें प्रकृति, पशुधन और कृषि के प्रति हमारी जिम्मेदारी का एहसास कराता है, जो हमारे आर्थिक और सामाजिक जीवन का आधार हैं।