Sanatan Logo
Ganesh Logo
शीतला सतम: तिथि, पूजा विधि, कथा और धार्मिक महत्व
लेखक: रुचि

शीतला सतम: तिथि, पूजा विधि, कथा और धार्मिक महत्व

शीतला सतम गुजरात में मनाया जाने वाला माता शीतला को समर्पित एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु माता शीतला की पूजा करके अपने परिवार के अच्छे स्वास्थ्य, सुख-शांति और सुरक्षा की कामना करते हैं।

शीतला सतम की सबसे विशेष परंपरा यह है कि इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और ताजा भोजन नहीं बनाया जाता। इसके लिए एक दिन पहले, यानी षष्ठी तिथि को ही भोजन और माता के प्रसाद की तैयारी कर ली जाती है। अगले दिन इसी ठंडे भोजन का माता शीतला को भोग लगाया जाता है और परिवार के सदस्य इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता शीतला अपने भक्तों और उनके परिवारों को रोगों से सुरक्षा और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। शीतला सतम की कथा में भी बीमारी के समय नियम-संयम, स्वच्छता और सावधानी के महत्व को विशेष रूप से बताया गया है।

शीतला सतम 2026 कब है?

शीतला सतम 2026 में गुजरात में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाएगी। इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है और एक दिन पहले तैयार किए गए ठंडे भोजन का भोग लगाया जाता है।

शीतला सतम के दिन भक्त माता शीतला का पूजन करते हैं और परिवार के सभी सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य एवं कल्याण की प्रार्थना करते हैं।

शीतला सतम क्यों मनाई जाती है?

शीतला सतम माता शीतला की आराधना और परिवार के स्वास्थ्य से जुड़ा पर्व है। धार्मिक परंपरा में माता शीतला को रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता है।

मान्यता है कि माता शीतला की पूजा और व्रत करने से परिवार को चेचक, खसरा जैसी बीमारियों से रक्षा प्राप्त होती है। इसी भावना के कारण विशेष रूप से महिलाएं अपने बच्चों और परिवार के अच्छे स्वास्थ्य के लिए शीतला सतम का व्रत रखती हैं।

हालांकि, इन मान्यताओं को धार्मिक आस्था और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए। बीमारी होने पर उचित चिकित्सकीय सलाह और उपचार लेना आवश्यक है।

शीतला सतम की परंपरा केवल पूजा तक सीमित नहीं है। इस पर्व में स्वच्छता, संयम और स्वास्थ्य के प्रति सावधानी को भी विशेष महत्व दिया जाता है।

शीतला सतम पर बासी खाना क्यों खाया जाता है?

शीतला सतम की सबसे प्रसिद्ध परंपरा ठंडा या पहले से तैयार किया हुआ भोजन खाने की है। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और नया भोजन बनाने से बचा जाता है।

इसके लिए षष्ठी तिथि के दिन ही परिवार के लिए भोजन और माता शीतला के भोग की तैयारी कर ली जाती है। इसमें परिवार की परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार मीठी भात, पुए, दही, रबड़ी और अन्य पकवान तैयार किए जा सकते हैं।

सप्तमी के दिन सबसे पहले माता शीतला को इस भोजन का भोग लगाया जाता है। इसके बाद परिवार के सदस्य इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

धार्मिक दृष्टि से यह परंपरा माता शीतला के स्वरूप और उनके प्रति श्रद्धा से जुड़ी हुई है। आधुनिक समय में ठंडा या पहले से तैयार भोजन ग्रहण करते समय उसकी स्वच्छता, सुरक्षित भंडारण और खाद्य सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है।

शीतला सतम पूजा सामग्री

शीतला सतम की पूजा के लिए श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार सामग्री तैयार कर सकते हैं। पूजा में सामान्य रूप से इन वस्तुओं का उपयोग किया जाता है:

• माता शीतला की मूर्ति या चित्र 

• जल 

• रोली या कुमकुम 

• हल्दी 

• अक्षत 

• मेहंदी 

• कलावा 

• फूल 

• धूप 

• घी 

• आटे का दीपक 

• षष्ठी को तैयार किया गया ठंडा भोजन 

• दही 

• रबड़ी 

• मीठी भात 

• पुए आदि प्रसाद 

शीतला सतम की पूजा विधि

शीतला सतम की पूजा की तैयारी एक दिन पहले षष्ठी तिथि से शुरू करने की परंपरा है। इस दिन माता के भोग और परिवार के भोजन के लिए आवश्यक पकवान तैयार कर लिए जाते हैं।

1. सुबह स्नान करें

सप्तमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल और घर की साफ-सफाई करें।

2. माता शीतला की मूर्ति स्थापित करें

पूजा के लिए माता शीतला की मूर्ति या चित्र को स्वच्छ स्थान पर स्थापित करें। श्रद्धापूर्वक माता का स्मरण करें।

3. माता को जल अर्पित करें

माता शीतला को जल अर्पित करें। इसके बाद आटे का दीपक बनाकर उसमें घी डालें और दीपक प्रज्वलित करें।

4. पूजा सामग्री अर्पित करें

माता को रोली, मेहंदी, हल्दी, अक्षत, कलावा और फूल आदि अर्पित करें। अपनी श्रद्धा के अनुसार धूप और दीप जलाएं।

5. ठंडे भोजन का भोग लगाएं

षष्ठी तिथि को तैयार किए गए ठंडे भोजन का माता शीतला को भोग लगाएं। परिवार की परंपरा के अनुसार मीठी भात, पुए, दही, रबड़ी आदि का भोग लगाया जा सकता है।

6. माता शीतला की कथा सुनें

पूजा के बाद शीतला माता की कथा पढ़ें या सुनें। कथा के माध्यम से माता की महिमा और शीतला सतम की धार्मिक परंपरा का स्मरण किया जाता है।

7. परिवार के लिए प्रार्थना करें

अंत में माता शीतला से परिवार के सभी सदस्यों के अच्छे स्वास्थ्य, सुख-शांति, सुरक्षा और समृद्धि की प्रार्थना करें।

शीतला सतम की कथा

शीतला सतम से जुड़ी एक धार्मिक कथा में एक राजा और एक निर्धन ब्राह्मण के पुत्र का वर्णन मिलता है। दोनों बच्चे चेचक के प्रकोप से पीड़ित हो जाते हैं।

ब्राह्मण अत्यंत निर्धन था और भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन करता था। इसके बावजूद वह धार्मिक नियमों का पालन करता था और घर की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखता था।

जब ब्राह्मण के पुत्र को चेचक हुई, तब उसने श्रद्धा और नियमपूर्वक माता शीतला की पूजा शुरू की। उसने घर में तली-भुनी और गर्म चीजों के बनने पर रोक लगा दी। वह स्वयं भी गर्म भोजन से परहेज करता था और अपने पुत्र को भी ऐसा भोजन नहीं देता था।

ब्राह्मण प्रतिदिन माता शीतला की पूजा करता और अपने पुत्र के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना करता। धार्मिक कथा के अनुसार, कुछ समय बाद माता शीतला की कृपा से उसका पुत्र स्वस्थ हो गया।

राजा के पुत्र को चेचक क्यों बढ़ती गई?

दूसरी ओर, जब राजा का पुत्र चेचक से पीड़ित हुआ तो राजा ने भी माता शीतला की पूजा शुरू करवा दी। राजमहल में प्रतिदिन हवन होने लगा और राजपुरोहितों को लगातार माता की पूजा करने का आदेश दिया गया।

राजपुरोहित माता की पूजा तो कर रहे थे, लेकिन बीमारी के समय आवश्यक नियम-संयम पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा था।

राजमहल में रोज कई प्रकार के गर्म और स्वादिष्ट भोजन बनाए जाते थे। भोजन की खुशबू से राजकुमार का मन भोजन करने के लिए ललचाता और वह खाने की जिद करता। इकलौता राजकुमार होने के कारण उसकी कई जिद पूरी कर दी जाती थीं।

कथा के अनुसार, नियम-संयम का पालन न होने के कारण राजकुमार की बीमारी बढ़ती गई। उसके शरीर पर कई फोड़े हो गए और उनमें खुजली एवं जलन भी बढ़ने लगी।

राजा ने अपने पुत्र को स्वस्थ करने के लिए अनेक प्रयास किए, लेकिन उसकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ। राजा इस बात से बहुत परेशान था कि इतनी पूजा और अनुष्ठान करने के बाद भी उसके पुत्र की बीमारी शांत क्यों नहीं हो रही है।

राजा को ब्राह्मण के पुत्र के स्वस्थ होने का पता कैसे चला?

राजा की परेशानी देखकर राजदरबार के लोग भी चिंतित हो गए। धीरे-धीरे यह बात पूरे राज्य में फैल गई।

इसी दौरान राजा के एक गुप्तचर को पता चला कि राज्य में रहने वाला एक निर्धन ब्राह्मण भी अपने पुत्र की इसी बीमारी से परेशान था, लेकिन उसका पुत्र अब स्वस्थ हो चुका है।

यह सुनकर राजा और अधिक चिंतित हो गया। उसने सोचा कि उसने माता शीतला की पूजा और अनुष्ठान में कोई कमी नहीं छोड़ी, फिर भी उसका पुत्र स्वस्थ नहीं हुआ, जबकि निर्धन ब्राह्मण का पुत्र ठीक हो गया।

इन्हीं विचारों में डूबे राजा को रात में नींद आ गई।

माता शीतला ने राजा को क्या संदेश दिया?

धार्मिक कथा के अनुसार, जब राजा गहरी नींद में था, तब श्वेत वस्त्र धारण किए माता शीतला ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए।

माता ने राजा से कहा कि वे उसकी पूजा और सेवा से प्रसन्न हैं और इसी कारण उसका पुत्र जीवित है। लेकिन उसके पुत्र के ठीक न होने का मुख्य कारण बीमारी के समय आवश्यक नियमों का पालन न करना है।

कथा में माता राजा को राजमहल में कुछ नियमों का पालन करने का निर्देश देती हैं। इनमें नमक का प्रयोग बंद करना, सब्जियों में छौंक न लगाना और रोगी के अनावश्यक आने-जाने पर रोक लगाना प्रमुख था।

माता ने यह भी समझाया कि बीमारी के समय रोगी के लिए ऐसा वातावरण रखना चाहिए जिससे वह अनावश्यक रूप से भोजन के लिए आकर्षित न हो और दूसरे लोगों के संपर्क में आने से भी बचे।

राजा को इन नियमों का पालन करने का निर्देश देकर माता शीतला अंतर्ध्यान हो गईं और राजा की नींद खुल गई।

माता के निर्देशों के बाद राजकुमार स्वस्थ कैसे हुआ?

सुबह होते ही राजा ने स्वप्न में माता शीतला द्वारा बताए गए नियमों के अनुसार राजमहल में आवश्यक परिवर्तन करने का आदेश दिया। राजा ने स्वयं भी इन नियमों का पालन किया।

धार्मिक कथा के अनुसार, नियम-संयम का पालन शुरू होने के बाद राजकुमार की स्थिति धीरे-धीरे बेहतर होने लगी और कुछ ही समय में वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया।

यह कथा शीतला सतम की धार्मिक परंपरा में पूजा के साथ नियम-संयम और सावधानी के महत्व को दर्शाती है।

शीतला सतम व्रत का महत्व

शीतला सतम का व्रत परिवार के स्वास्थ्य, सुख और सुरक्षा की कामना से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता शीतला की पूजा करने से भक्तों को रोगों से रक्षा और स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

महिलाएं विशेष रूप से अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह व्रत रखती हैं और माता शीतला से परिवार के सभी सदस्यों के कल्याण की प्रार्थना करती हैं।

इस पर्व का एक महत्वपूर्ण संदेश स्वच्छता और संयम से भी जुड़ा है। शीतला सतम की कथा में बीमारी के समय भोजन, साफ-सफाई और रोगी की देखभाल से जुड़े नियमों पर जोर दिया गया है।

इसलिए शीतला सतम को केवल एक धार्मिक व्रत के रूप में ही नहीं, बल्कि परिवार के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए प्रार्थना करने वाले पर्व के रूप में भी देखा जाता है।

शीतला सतम पर क्या करना चाहिए?

शीतला सतम के दिन श्रद्धालु अपनी पारिवारिक और स्थानीय परंपरा के अनुसार कई धार्मिक कार्य करते हैं।

• माता शीतला की श्रद्धापूर्वक पूजा करें। 

• एक दिन पहले भोजन और प्रसाद तैयार करें। 

• माता को ठंडे भोजन का भोग लगाएं। 

• शीतला माता की कथा सुनें या पढ़ें। 

• परिवार के अच्छे स्वास्थ्य और सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें। 

• घर की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। 

• अपनी परंपरा के अनुसार व्रत या सात्त्विक आहार का पालन करें। 

शीतला सतम पर क्या नहीं करना चाहिए?

शीतला सतम की परंपरा के अनुसार इस दिन घर में चूल्हा जलाकर ताजा भोजन बनाने से बचा जाता है। भोजन पहले ही तैयार कर लिया जाता है और अगले दिन माता को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

बीमारी के संदर्भ में शीतला सतम की कथा में भी रोगी के लिए सावधानी और अनावश्यक संपर्क से बचने का संदेश मिलता है।

आज के समय में यह भी जरूरी है कि बासी या पहले से तैयार भोजन को सुरक्षित तरीके से रखा जाए। यदि भोजन खराब हो गया हो या उसकी स्वच्छता को लेकर संदेह हो, तो उसका सेवन नहीं करना चाहिए।

शीतला सतम और शीतला अष्टमी में क्या संबंध है?

शीतला सतम और शीतला अष्टमी दोनों ही माता शीतला की पूजा से संबंधित पर्व हैं। गुजरात में शीतला सतम का विशेष महत्व है, जबकि उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में इसी प्रकार की धार्मिक परंपरा शीतला अष्टमी या बासौड़ा के रूप में मनाई जाती है।

क्षेत्रीय पंचांग और स्थानीय धार्मिक परंपराओं के कारण इन पर्वों की तिथि और पूजा की विधि अलग-अलग हो सकती है। इसलिए किसी विशेष क्षेत्र के लिए तिथि निर्धारित करते समय उसी क्षेत्र के मान्य पंचांग को देखना उचित है।

शीतला सतम 2026 FAQs

शीतला सतम 2026 कब है?

शीतला सतम 2026 में गुजरात में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाई जाएगी। इसकी सटीक तिथि और पूजा मुहूर्त SanatanJyoti Panchang के अनुसार दिया जाएगा।

शीतला सतम पर चूल्हा क्यों नहीं जलाया जाता?

धार्मिक परंपरा के अनुसार शीतला सतम के दिन माता शीतला को ठंडे भोजन का भोग लगाया जाता है। इसलिए भोजन एक दिन पहले तैयार किया जाता है और सप्तमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता।

शीतला सतम पर क्या खाना चाहिए?

परंपरा के अनुसार षष्ठी तिथि को तैयार किए गए ठंडे भोजन को माता को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इसमें दही, रबड़ी, पुए, मीठी भात आदि शामिल हो सकते हैं। भोजन की स्वच्छता और सुरक्षित भंडारण का ध्यान रखना आवश्यक है।

शीतला सतम पर किसकी पूजा की जाती है?

शीतला सतम पर माता शीतला की पूजा की जाती है। भक्त माता से परिवार के अच्छे स्वास्थ्य, सुख-शांति और सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं।

शीतला सतम की कथा में राजा के पुत्र को कौन-सी बीमारी हुई थी?

धार्मिक कथा के अनुसार राजा का पुत्र चेचक से पीड़ित हुआ था। कथा में बीमारी के दौरान नियम-संयम और सावधानी के महत्व को बताया गया है।

क्या शीतला सतम पर व्रत रखना जरूरी है?

व्रत रखना धार्मिक आस्था और पारिवारिक परंपरा पर निर्भर करता है। श्रद्धालु अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रख सकते हैं तथा माता शीतला की पूजा करके परिवार के कल्याण की प्रार्थना कर सकते हैं।

शीतला सतम गुजरात का एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है, जो माता शीतला की पूजा और परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की कामना से जुड़ा हुआ है। इस दिन माता की पूजा के साथ एक दिन पहले तैयार किए गए ठंडे भोजन का भोग लगाने और प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा है।

शीतला सतम की धार्मिक कथा में राजा और ब्राह्मण के पुत्र के माध्यम से नियम-संयम, स्वच्छता और सावधानी के महत्व को समझाया गया है। महिलाएं विशेष रूप से अपने बच्चों और परिवार के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा के लिए माता शीतला का व्रत और पूजन करती हैं।

इस प्रकार शीतला सतम केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि परिवार के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण के लिए प्रार्थना करने वाली एक महत्वपूर्ण परंपरा भी है।

Youtube
Facebook
Instagram
Astrologer
हम से बात करें