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गायत्री जयंती: तिथि, पूजा विधि, मंत्र, कथा और महत्व
लेखक: रुचि

गायत्री जयंती: तिथि, पूजा विधि, मंत्र, कथा और महत्व

गायत्री जयंती 2026 कब है?

वर्ष 2026 में गायत्री जयंती 25 जून 2026 को मनाई जाएगी। गायत्री जयंती हिंदू धर्म का अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। 

गायत्री जयंती 2026 तिथि

वर्ष 2026 में गायत्री जयंती 25 जून 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी। हिंदू पंचांग के अनुसार इस दिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पड़ रही है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी पावन तिथि पर निर्जला एकादशी और गायत्री जयंती का पर्व श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया जाएगा।

• एकादशी तिथि प्रारंभ – 24 जून 2026, शाम 06:14 बजे

• एकादशी तिथि समाप्त – 25 जून 2026, रात 08:10 बजे 

श्रावण मास की गायत्री जयंती 2026

मतांतर के अनुसार कुछ स्थानों पर श्रावण पूर्णिमा के दिन भी गायत्री जयंती मनाने की परंपरा प्रचलित है। इसी दिन माँ गायत्री का प्राकट्य हुआ था।

वर्ष 2026 में श्रावण पूर्णिमा आधारित गायत्री जयंती 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी। इसी दिन रक्षाबंधन और श्रावणी पूर्णिमा जैसे पावन पर्व भी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाए जाएंगे।

• पूर्णिमा तिथि प्रारंभ – 27 अगस्त 2026, प्रातः 09:10 बजे  

• पूर्णिमा तिथि समाप्त – 28 अगस्त 2026, प्रातः 09:49 बजे

यदि आप गायत्री जयंती, निर्जला एकादशी, श्रावण पूर्णिमा, रक्षाबंधन तथा अन्य सभी व्रत-त्योहारों की तिथि, शुभ मुहूर्त और पंचांग अनुसार सटीक समय जानना चाहते हैं तो:-हमारा विस्तृत पंचांग अवश्य देखें। 

सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी ने अपने चारों मुखों से गायत्री मंत्र की व्याख्या चारों वेदों में की थी और गायत्री माता का आवाहन किया था।

इसलिए गायत्री माता प्रसन्न होकर अवतरित हुयी थी। गायत्री माता जब अवतरित हुयी थी तब वह समय श्रावण मास की पूर्णिमा का ही था। उनके अवतरण दिवस को ही गायत्री जयंती के रूप में मनाया जाता है।

गायत्री ही ज्ञान है, वही वेद है इसलिए इन्हे वेदों की माता कहा जाता है। गायत्री माता तो पहले से ही थी पर कभी उनके दर्शन नहीं होते थे। गायत्री माता के दर्शन के लिए, उनके आवाहन के लिए, उन्हे प्रसन्न करने के लिए विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र की उत्पत्ति की।

गायत्री माता का स्वरूप

धार्मिक कथाओं के अनुसार मां गायत्री एक अत्यंत महत्वपूर्ण देवी हैं। ऐसा माना जाता है कि वह तीन देवताओं से बनी हैं: ब्रह्मा, विष्णु और महेश, और लोग इसी रूप में उनकी पूजा करते हैं।

मां गायत्री के पांच मुख और दस हाथ हैं। उनके चार मुख चारों वेदों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और उनका पांचवां मुख शक्ति का प्रतीक है। उनके दस हाथ भगवान विष्णु के प्रतीक हैं। मां गायत्री को भगवान ब्रह्मा की पत्नी भी कहा जाता है।

ऐसा कहा जाता है कि गायत्री मंत्र, ब्रह्मा के मुख से तब निकली जब संसार का निर्माण हुआ। मां गायत्री के आशीर्वाद से ब्रह्मा ने वेदों में गायत्री मंत्र की व्याख्या की।

पहले तो माता गायत्री के बारे में केवल देवता ही जानते थे, लेकिन विश्वामित्र नामक एक बुद्धिमान ऋषि ने बहुत तपस्या की और सभी को गायत्री मंत्र की महिमा के बारे में बताया।

गायत्री माता का विवाह 

एक समय की बात है, ब्रह्मा जो संसार की सृष्टि के निर्माण कर्ता है। वे यज्ञ समारोह करना चाहते थे। इस समारोह में ब्रह्मा के साथ उनकी पत्नी सावित्री का होना जरूरी था।

लेकिन उनकी पत्नी किसी कारणवश वहाँ मौजूद नहीं थी और समारोह का समय करीब आ रहा था। ब्रह्मा जी समारोह को अधूरा नहीं छोड़ना चाहते थे।

यज्ञ को पूरा करने के लिए, ब्रह्मा ने उस समय वहां मौजूद माता गायत्री को अपनी पत्नी का स्थान दिया और उन्हें अपने साथ लेकर यज्ञ समारोह सम्पन्न किया। साथ ही माँ गायत्री इस संसार की उत्पत्ति का कारक भी हैं ।

गायत्री मंत्र-

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहिधियो यो न: प्रचोदयात्।।

गायत्री मंत्र का अर्थ

सत्, चित्, आनंदस्वरूप, सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परमात्मा, उस प्रसिद्ध वरणीय तेज का हम ध्यान करते है, जो परमात्मा हमारी बुद्धि को सत्य की ओर प्रेरित करे। 

गायत्री मंत्र परमात्मा के प्रति समर्पण है।

गायत्री मंत्र कौन-कौन जप कर सकता है?

पूर्वकाल में गायत्री मंत्र केवल वही जप करते थे जो वेदपाठी होते थे। समय बदलने के अनुसार अब सभी लोग गायत्री मंत्र का जप कर सकते है।

जप करते समय आप रुद्राक्ष की माला का उपयोग कर सकते है या अगर न भी हो तो भी आप गायत्री मंत्र का जाप कर सकते है।

5 या 7 वर्ष में संस्कार द्वारा यज्ञोपवीत हो जाता है जो बालकों को गुरु मंत्र दिया जाता है वह गायत्री मंत्र ही होता है। इसी मंत्र का नियम पूर्वक जाप करने से शिष्यों की बुद्धि का विकास होता है।

गायत्री मंत्र का जप करने के लाभ

गायत्री मंत्र के जप से सभी प्रकार की परेशानियों से छुटकारा मिलता है, मानसिक शांति प्राप्त होती है। जो मनुष्य गायत्री मंत्र का जप विधिपूर्वक करता है। उसे कामधेनु की प्राप्ति होती है।

कामधेनु मनोवांछित फल देने वाली होती है। व्रत करने से जातक कुमार्ग पर नहीं जाता है। उसकी बुद्धि सत्य की ओर प्रेरित होने लगती है।

परंतु जातक को गायत्री मंत्र का अर्थ पूर्णतया समझ लेना चाहिए और उसे अपने अंतर्मन में धारण कर लेना चाहिए ।

गायत्री मंत्र जप करने की विधि

प्रतिदिन आप जिस समय नित्य कर्म करके अपने आराध्य देव की पूजा करते हैं उसके पश्चात इस मंत्र का जाप कर सकते हैं। पहले आपको ‘आयातु वरदा देवि’ इस मंत्र से महेश्वरी वेद माता गायत्री का आवाहन करना चाहिए।

पुनः तीन बार प्राणायाम करके बैठे-बैठे अथवा खड़े होकर एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार गायत्री जप प्रणव के साथ नियमपूर्वक करना चाहिए। इन तीनों में किसी एक विधि से ही जप करना चाहिए।

सूर्य को अर्घ्य देकर उनका पूजन करके प्रणाम करके ‘उत्तमे शिखरे देवी’ ऐसा कहकर माता का विसर्जन करके पूर्व दिशा में देखते हुए वेदमाता महेश्वरी गायत्री का अभिवंदन करके दोनों हाथ जोड़कर सूर्य से प्रार्थना करनी चाहिए।

गायत्री मंत्र का पाठ करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति में मदद मिलती है।

यदि आप गायत्री मंत्र की सही वैदिक पूजा विधि और जप करने की संपूर्ण प्रक्रिया जानना चाहते हैं, तो हमारे अनुभवी आचार्यों से निःशुल्क परामर्श प्राप्त कर सकते हैं। 

सावधानियाँ

गायत्री मंत्र का जप करते समय आपके होंठ हिले पर उच्चारण करने की आवाज इतनी धीमी होनी चाहिए की बगल वाला व्यक्ति भी न सुन सके। जप करते समय आपका मन पवित्र होना चाहिए मंत्र के अलावा आप अपने मन में किसी भी घटना का स्मरण न करे। केवल गायत्री माता का ही स्मरण करे। माता की पूजा सूर्य भगवान का चित्र रखकर दीपक जलाकर की जाती है।

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