विषुव (Equinox) वर्ष में दो बार होने वाली एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है। यह उस समय होता है जब सूर्य के केंद्र की apparent position पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल (Equatorial Plane) को पार करती है। इस समय सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा के आसपास सबसे सीधे पड़ती हैं और उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्ध को लगभग समान मात्रा में सूर्यप्रकाश मिलता है।
विषुव को आमतौर पर दिन और रात लगभग बराबर होने की घटना के रूप में समझा जाता है। हालांकि वैज्ञानिक रूप से विषुव के दिन हर स्थान पर दिन और रात ठीक 12-12 घंटे नहीं होते। इसका कारण सूर्य का आकार, पृथ्वी के वायुमंडल में प्रकाश का अपवर्तन और स्थान का अक्षांश है।
वर्ष में दो विषुव होते हैं:
1. वसंत विषुव (March/Vernal Equinox)
2. शरद विषुव (September/Autumnal Equinox)
वसंत विषुव (March Equinox)
मार्च में होने वाला विषुव वसंत विषुव कहलाता है। उत्तरी गोलार्ध में यह खगोलीय वसंत की शुरुआत का संकेत देता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में इसी समय खगोलीय शरद ऋतु शुरू होती है।
मार्च विषुव के समय सूर्य की apparent position दक्षिण से उत्तर की ओर celestial equator को पार करती है। यह सूर्य के वास्तविक रूप से उत्तर की ओर जाने का अर्थ नहीं है; यह पृथ्वी की कक्षा और उसकी झुकी हुई धुरी के कारण दिखाई देने वाला परिवर्तन है।
शरद विषुव (September Equinox)
सितंबर में होने वाला विषुव शरद विषुव कहलाता है। उत्तरी गोलार्ध में यह खगोलीय शरद ऋतु की शुरुआत का संकेत देता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में इसी समय वसंत ऋतु शुरू होती है।
सितंबर विषुव के समय सूर्य की apparent position उत्तर से दक्षिण की ओर celestial equator को पार करती है।
विषुव की तारीख हर वर्ष बिल्कुल समान नहीं होती। सामान्यतः मार्च विषुव 19 से 21 मार्च के बीच और सितंबर विषुव 22 से 23 सितंबर के आसपास होता है। इसकी सटीक तारीख और समय पृथ्वी की कक्षीय गति तथा कैलेंडर व्यवस्था के कारण वर्ष-दर-वर्ष बदल सकता है।
विषुव होने का कारण
विषुव को समझने के लिए पृथ्वी के अक्षीय झुकाव (Axial Tilt) और सूर्य के चारों ओर उसकी परिक्रमा (Revolution) को समझना जरूरी है।
पृथ्वी की घूर्णन धुरी अपने कक्षीय तल के लंबवत से लगभग 23.4° झुकी हुई है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते समय इसी झुकाव के साथ आगे बढ़ती है। इसके कारण वर्ष के अलग-अलग समय पर उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध को सूर्य का प्रकाश अलग-अलग कोणों और अलग-अलग अवधि तक मिलता है। यही पृथ्वी पर ऋतुओं के बनने का मुख्य कारण है।
वर्ष में दो बार पृथ्वी अपनी कक्षा में ऐसी स्थिति में पहुँचती है जब उसकी धुरी सूर्य की ओर या सूर्य से दूर किसी एक गोलार्ध को विशेष रूप से झुकी हुई नहीं होती। इसी समय सूर्य का केंद्र पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल को पार करता है और विषुव होता है।
इसलिए यह कहना अधिक वैज्ञानिक रूप से सही है कि विषुव पृथ्वी के घूर्णन की कोई विशेष अवस्था नहीं, बल्कि पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर कक्षा में उसकी स्थिति से संबंधित खगोलीय घटना है।
क्या सूर्य वास्तव में उत्तर और दक्षिण की ओर जाता है?
आसमान को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि सूर्य वर्ष के दौरान उत्तर और दक्षिण दिशा में अपनी स्थिति बदलता है। लेकिन वास्तव में सूर्य पृथ्वी के चारों ओर इस तरह उत्तर-दक्षिण दिशा में नहीं घूम रहा होता।
पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और उसकी धुरी लगभग 23.4° झुकी हुई है। इसी कारण पृथ्वी से देखने पर सूर्य की apparent position वर्ष के दौरान आकाश में उत्तर और दक्षिण की ओर बदलती हुई दिखाई देती है।
• मार्च विषुव के बाद सूर्य की apparent position उत्तर की ओर बढ़ती है।
• जून अयनांत के आसपास यह अपनी सबसे उत्तरी स्थिति पर पहुँचती है।
• सितंबर विषुव में यह फिर भूमध्यरेखीय तल को पार करती है।
• दिसंबर अयनांत के आसपास यह अपनी सबसे दक्षिणी स्थिति पर पहुँचती है।
इसलिए “सूर्य उत्तर से दक्षिण या दक्षिण से उत्तर जाता है” कहना केवल apparent motion के अर्थ में सही है।
विषुव के दिन दिन और रात बराबर क्यों नहीं होते?
विषुव का अर्थ ही equal night से जुड़ा है, इसलिए सामान्य रूप से कहा जाता है कि इस दिन दिन और रात बराबर होते हैं। लेकिन वास्तविक sunrise से sunset तक की अवधि को देखें तो यह हर जगह ठीक 12 घंटे नहीं होती।
इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण हैं।
1. सूर्य का आकार
सूर्य आकाश में एक बिंदु नहीं बल्कि एक गोलाकार disk के रूप में दिखाई देता है।
सूर्योदय उस समय माना जाता है जब सूर्य के ऊपरी किनारे का हिस्सा क्षितिज पर दिखाई देने लगता है। सूर्यास्त उस समय माना जाता है जब उसका दिखाई देने वाला हिस्सा पूरी तरह क्षितिज के नीचे चला जाता है।
इसलिए sunrise और sunset के समय सूर्य का केंद्र अभी बिल्कुल उसी ज्यामितीय स्थिति में नहीं होता जो केवल एक point source के लिए होती।
2. वायुमंडलीय अपवर्तन (Atmospheric Refraction)
पृथ्वी का वायुमंडल सूर्य से आने वाले प्रकाश की दिशा को थोड़ा बदल देता है। इसे वायुमंडलीय अपवर्तन कहते हैं।
क्षितिज के पास यह प्रभाव महत्वपूर्ण होता है। इसके कारण सूर्य अपनी वास्तविक ज्यामितीय स्थिति की तुलना में थोड़ा ऊपर दिखाई देता है। इसलिए सुबह सूर्य का ऊपरी किनारा उसके ज्यामितीय रूप से क्षितिज तक पहुँचने से कुछ पहले दिखाई दे सकता है और शाम को सूर्य ज्यामितीय रूप से क्षितिज के नीचे जाने के बाद भी कुछ समय तक दिखाई दे सकता है।
इसी वजह से विषुव के दिन भी दिखाई देने वाला daylight आम तौर पर बिल्कुल 12 घंटे का नहीं होता।
ध्यान देने योग्य बात: वास्तविक दिन और रात की बराबरी की तारीख भी हर स्थान पर एक जैसी नहीं होती। यह स्थान के अक्षांश पर निर्भर करती है।
विषुव के समय सूर्य कहाँ होता है?
विषुव के समय सूर्य का केंद्र पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल (Equatorial Plane) को पार करता है।
भूमध्य रेखा पर विषुव के समय दोपहर में सूर्य लगभग सिर के ठीक ऊपर दिखाई देता है। इसके अलावा, विषुव के आसपास पृथ्वी के अधिकांश स्थानों पर सूर्य लगभग ठीक पूर्व दिशा में उदित और पश्चिम दिशा में अस्त होता है।
इस स्थिति को पृथ्वी और सूर्य की ज्यामितीय व्यवस्था को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
विषुव और ऋतु परिवर्तन का क्या संबंध है?
विषुव और ऋतु परिवर्तन आपस में जुड़े हुए हैं, लेकिन ऋतुओं का मुख्य कारण विषुव नहीं है।
पृथ्वी पर ऋतुओं का मूल कारण उसकी लगभग 23.4° अक्षीय झुकाव और सूर्य के चारों ओर उसकी परिक्रमा है। पृथ्वी की कक्षा में अलग-अलग स्थानों पर पहुँचने के दौरान उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध को सूर्य की किरणें अलग-अलग कोणों और अलग-अलग अवधि तक मिलती हैं।
जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर अधिक झुका होता है, वहाँ सूर्य का प्रकाश अपेक्षाकृत अधिक सीधा पड़ता है और दिन लंबे होते हैं। इससे वहाँ गर्मी की परिस्थितियाँ बनती हैं। उसी समय दक्षिणी गोलार्ध सूर्य से अपेक्षाकृत दूर झुका होता है और वहाँ सर्दी होती है।
लगभग छह महीने बाद स्थिति इसके विपरीत हो जाती है।
इसलिए पृथ्वी का अक्षीय झुकाव और सूर्य की परिक्रमा ऋतुओं का मूल कारण हैं, जबकि विषुव ऋतु चक्र में दो महत्वपूर्ण खगोलीय संक्रमण बिंदुओं को दर्शाता है।
विषुव का पृथ्वी पर महत्व
विषुव पृथ्वी-सूर्य प्रणाली और वार्षिक ऋतु चक्र को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
1. ऋतु परिवर्तन का खगोलीय संकेत
मार्च और सितंबर विषुव उत्तरी तथा दक्षिणी गोलार्ध में ऋतु परिवर्तन के महत्वपूर्ण खगोलीय संकेत हैं। मार्च विषुव के बाद उत्तरी गोलार्ध गर्मियों की ओर बढ़ता है, जबकि सितंबर विषुव के बाद वह सर्दियों की ओर बढ़ता है। दक्षिणी गोलार्ध में इसका क्रम उल्टा होता है।
2. दोनों गोलार्धों में सूर्यप्रकाश का लगभग समान वितरण
विषुव के समय सूर्यप्रकाश दोनों गोलार्धों में लगभग समान रूप से वितरित होता है। इसी कारण पृथ्वी के दोनों गोलार्धों को मिलने वाली daylight की अवधि एक-दूसरे के काफी करीब होती है।
3. दिन और रात की अवधि लगभग समान
विषुव के आसपास अधिकांश स्थानों पर दिन और रात की अवधि लगभग समान होती है। हालांकि वास्तविक sunrise और sunset परिभाषा, सूर्य के आकार और atmospheric refraction के कारण यह बिल्कुल 12-12 घंटे नहीं होती।
4. सूर्य का लगभग पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होना
विषुव के समय पृथ्वी के अधिकांश स्थानों पर सूर्य लगभग पूर्व दिशा में उदित और पश्चिम दिशा में अस्त होता है।
5. खगोल विज्ञान में महत्व
विषुव पृथ्वी की कक्षा, पृथ्वी के axial tilt, सूर्य की apparent motion और ऋतु चक्र को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण astronomical reference point है।
विषुव और अयनांत (Solstice) में अंतर
विषुव (Equinox) और अयनांत (Solstice) दोनों पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर वार्षिक गति से जुड़ी महत्वपूर्ण खगोलीय घटनाएँ हैं, लेकिन दोनों की स्थिति अलग होती है।
विषुव मार्च और सितंबर में होता है, जब सूर्य का केंद्र पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल को पार करता है। इस समय दोनों गोलार्धों को सूर्यप्रकाश लगभग समान रूप से मिलता है।
अयनांत जून और दिसंबर में होता है। इन समयों पर सूर्य की apparent position भूमध्य रेखा के उत्तर या दक्षिण में अपनी अधिकतम स्थिति पर पहुँचती है। उत्तरी गोलार्ध में जून अयनांत वर्ष का सबसे लंबा daylight period और दिसंबर अयनांत सबसे छोटा daylight period दर्शाता है।
विषुव से जुड़े महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य
• विषुव वर्ष में दो बार होता है—मार्च और सितंबर में।
• विषुव के समय सूर्य का केंद्र पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल को पार करता है।
• भूमध्य रेखा पर विषुव के समय दोपहर में सूर्य लगभग सिर के ऊपर दिखाई देता है।
• विषुव के दिन दिन और रात लगभग बराबर होते हैं, लेकिन हर जगह बिल्कुल 12-12 घंटे नहीं होते।
• Atmospheric refraction sunrise को कुछ पहले और sunset को कुछ देर बाद दिखाई देने में योगदान देता है।
• पृथ्वी का लगभग 23.4° axial tilt ऋतुओं का मुख्य कारण है।
• मार्च विषुव के बाद सूर्य की apparent position उत्तर की ओर और सितंबर विषुव के बाद दक्षिण की ओर बढ़ती दिखाई देती है।
• विषुव के आसपास सूर्य अधिकांश स्थानों पर लगभग पूर्व में उदित और पश्चिम में अस्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
विषुव क्या होता है?
विषुव वर्ष में दो बार होने वाली खगोलीय घटना है, जब सूर्य का केंद्र पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल को पार करता है। इस समय दोनों गोलार्धों को लगभग समान मात्रा में सूर्यप्रकाश मिलता है।
विषुव वर्ष में कितनी बार होता है?
विषुव वर्ष में दो बार होता है—एक मार्च में और दूसरा सितंबर में।
क्या विषुव के दिन दिन और रात 12-12 घंटे होते हैं?
नहीं, हर स्थान पर बिल्कुल 12-12 घंटे नहीं होते। सूर्य के आकार, atmospheric refraction और स्थान के अक्षांश के कारण वास्तविक daylight अवधि में अंतर हो सकता है।
विषुव के समय सूर्य कहाँ होता है?
विषुव के समय सूर्य का केंद्र पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल पर होता है। भूमध्य रेखा पर दोपहर के समय सूर्य लगभग सिर के ऊपर दिखाई देता है।
क्या विषुव ही ऋतु परिवर्तन का कारण है?
नहीं। ऋतुओं का मुख्य कारण पृथ्वी की लगभग 23.4° axial tilt और सूर्य के चारों ओर उसकी परिक्रमा है। विषुव ऋतु चक्र के महत्वपूर्ण खगोलीय संकेत हैं।
मार्च और सितंबर विषुव में क्या अंतर है?
मार्च विषुव में उत्तरी गोलार्ध वसंत की ओर और दक्षिणी गोलार्ध शरद ऋतु की ओर बढ़ता है। सितंबर विषुव में इसका उल्टा होता है।
विषुव (Equinox) पृथ्वी और सूर्य की गति से संबंधित एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है, जो वर्ष में दो बार—मार्च और सितंबर में—होती है। इस समय सूर्य का केंद्र पृथ्वी के भूमध्यरेखीय तल को पार करता है और दोनों गोलार्धों को लगभग समान मात्रा में सूर्यप्रकाश मिलता है।
विषुव को आम तौर पर दिन और रात के बराबर होने के लिए जाना जाता है, लेकिन वैज्ञानिक रूप से दिन और रात की अवधि बिल्कुल 12-12 घंटे होना जरूरी नहीं है। सूर्य के आकार और वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण दिखाई देने वाला daylight थोड़ा अधिक हो सकता है।