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योगिनी एकादशी: व्रत कथा, पूजा विधि और धार्मिक महत्व
लेखक: रुचि

योगिनी एकादशी: व्रत कथा, पूजा विधि और धार्मिक महत्व

योगिनी एकादशी 2026 में कब है?

सनातन धर्म में योगिनी एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। यह आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एक अत्यंत पुण्यदायी एकादशी है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से पापों का नाश होता है, रोगों से मुक्ति मिलती है तथा जीवन में सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

योगिनी एकादशी का व्रत करने से अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।

वर्ष 2026 में योगिनी एकादशी 10 जुलाई, शुक्रवार को मनाई जाएगी। यह एकादशी विशेष रूप से पाप नाश, स्वास्थ्य लाभ और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। 

योगिनी एकादशी 2026 तिथि व समय

• एकादशी: योगिनी एकादशी, 10 जुलाई 2026

• एकादशी तिथि प्रारम्भ: 10 जुलाई 2026 को प्रातः 08:18 बजे

• एकादशी तिथि समाप्त: 11 जुलाई 2026 को प्रातः 05:24 बजे

• व्रत पारण: 11 जुलाई 2026 को द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद 

योगिनी एकादशी की सभी तिथियां, शुभ मुहूर्त और पंचांग अनुसार सटीक जानकारी जानने के लिए: - हमारा विस्तृत पंचांग अवश्य देखें। 

आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का महत्व

युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण जी से पूछा - आषाढ़ के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है? कृपया उसका वर्णन कीजिए।

भगवान श्री कृष्ण बोले- नृप श्रेष्ठ! आषाढ़ के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम योगिनी है। यह बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली है। संसार सागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए यह सनातन नौका के समान है। तीनों लोको में यह सारभूत व्रत है। जो अट्ठासी हजार ब्राहणों को भोजन कराता है, उसके सामान ही फल उस मनुष्य को भी मिलता है, जो योगिनी एकादशी का व्रत करता है।

योगिनी, महान पापो को शांत करने वाली और महान पुण्य फल देने वाली है, इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

यदि आप एकादशी व्रत की उत्पत्ति, भगवान विष्णु से इसका संबंध और सनातन धर्म में एकादशी के धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं तो: - एकादशी की उत्पत्ति का विस्तृत वर्णन पढ़ सकते हैं। 

योगिनी एकादशी की व्रत कथा

अलकापुरी में राजाधिराज कुबेर रहते हैं। वे सदा भगवान शिव की भक्ति में तत्पर रहने वाले हैं। उनका हेममाली नाम वाला एक यक्ष सेवक था, जो पूजा के लिए फूल लाया करता था। हेममाली की पत्नी बहुत सुंदर थी। उसका नाम विशालाक्षी था। वह यक्ष कामपाश में आबद्ध होकर सदा अपनी पत्नी में आसक्त रहता था। एक दिन की बात है, हेममाली मान सरोवर से फूल लाकर अपने घर में ही ठहर गया और पत्नी के प्रेम का रसास्वादन करने लगा; अत: कुबेर के भवन में ना जा सका।

इधर कुबेर मंदिर में बैठकर शिव का पूजन कर रहे थे। उन्होंने दोपहर तक फूल आने की प्रतीक्षा की। जब पूजा का समय व्यतीत हो गया तो यक्षराज ने कुपित होकर सेवकों से पूछा- यक्षों ! दुरात्मा हेममाली क्यों नहीं आ रहा है, इस बात का पता तो लगाओ।

यक्षों ने कहा- राजन! वह तो पत्नी की कामना में आसक्त हो अपनी इच्छा के अनुसार घर में ही रमण कर रहा है। उसकी बात सुनकर कुबेर क्रोध से भर गए और तुरंत ही हेममाली को बुलवाया। देर हुई जानकर हेममाली के नेत्र भय से व्याकुल हो रहे थे। वह आकर कुबेर के सामने खड़ा हुआ। उसे देखकर कुबेर की आंखें क्रोध से लाल हो गई।

वे बोले-ओ पापी! ओ दुष्ट! ओ दुराचारी! तूने भगवान की अवहेलना की है, अत: कोढ़ से युक्त और अपनी उस प्रियतमा से वियुक्त होकर इस स्थान से कहीं दूर चला जा। कुबेर के ऐसा कहने पर वह उसी स्थान पर नीचे गिर गया। उस समय उसके हृदय में अत्यंत दुख हो रहा था। कोढ़ से सारा शरीर पीड़ित था।

परंतु शिव पूजा के प्रभाव से उसकी स्मरण शक्ति लुप्त नहीं हुई थी। पातक से दबा होने पर भी वह अपने पूर्व कर्म को याद रखता था। तदनन्तर इधर-उधर घूमता हुआ वह पर्वतों में श्रेष्ठ मेरुगिरी के शिखर पर गया। वहाँ उसे तपस्या के पुंज मुनिवर मार्कण्डेयजी का दर्शन हुआ। पापकर्म यक्ष ने दूर से ही मुनि के चरणों में प्रणाम किया।

मुनिवर मार्कण्डेय ने उसे भय से काँपते देख परोपकार की इच्छा से निकट बुलाया और कहा- तुझे कोढ़ के रोग ने कैसे दबा लिया ? तू क्यों इतना अधिक निंदनीय जान पड़ता है? यक्ष बोले-मुने! मैं कुबेर का अनुचर हूँ। मेरा नाम हेममाली है। मैं प्रतिदिन मान सरोवर से फूल ले आकर शिव पूजा के समय कुबेर को दिया करता था।

एक दिन पत्नी सहवास के सुख में फँस जाने के कारण मुझे समय का ज्ञान नहीं रहा; अत: राजाधिराज कुबेर ने कुपित होकर मुझे शाप दे दिया, जिससे मैं कोढ़ से आक्रांत होकर अपनी प्रियतमा से बिछुड़ गया। मुनि श्रेष्ठ ! इस समय किसी शुभ कर्म के प्रभाव से मैं आपके निकट आ पहुँचा हूँ। संतो का चित्त स्वभावता परोपकार में लगा रहता है, यह जानकर मुझ अपराधी को कतर्व्य का उपदेश दीजिये।

मार्कण्डेयजी ने कहा- तुमने यहाँ सच्ची बात कही है, असत्य -भाषण नहीं किया है ; इसलिए मैं तुम्हे कल्याणप्रद व्रत का उपदेश करता हूँ। तुम आषाढ़ के कृष्णा पक्ष में योगिनी एकादशी का व्रत करो। इस व्रत के पुण्य से तुम्हारा कोढ़ निश्चय ही दूर हो जायेगा।

भगवान श्री कृष्ण कहते है - मार्कण्डेय जी के उपदेश से उसने योगिनी एकादशी का व्रत किया, जिससे उसके शरीर का कोढ़ दूर हो गया। मुनि के कथनानुसार उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान करने पर वह पूर्ण सुखी हो गया। नृप श्रेष्ठ! यह योगिनी का व्रत ऐसा ही बताया गया है।

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योगिनी एकादशी की पूजा विधि

मार्कण्डेयजी ने कहा- सुनो, मैं तुम्हें इस व्रत की शुभ कारक विधि बतलाता हूँ, आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में दशमी के उत्तम दिन को श्रद्धायुक्त चित्त से प्रातः काल स्नान करें। फिर मध्याहन काल में एकाग्र चित्त हो एक समय भोजन करें तथा रात्रि में भूमि पर सोए, रात के अंत में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन नित्यकर्म करके स्नान करे, इसके बाद भक्ति भाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करें-

अद्य स्थित्वानिराहारः सर्वभोगविवर्जितः।

श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं में भवाच्युत।।

कमलनयन भगवान, नारायण! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करूंगा। अच्युत! आप मुझे शरण दे। फिर धूप और गंध आदि से भगवान हरीकेश का पूजन करके रात्रि में उनके समीप जागरण करे। तत्पश्चात सवेरा होने पर द्वादशी के दिन पुन: भक्ति पूर्वक श्री हरि की पूजा करें। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करा कर भाई- बंधु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करें।

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