फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को विजया एकादशी कहा जाता है। सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने भी लंका पर विजय प्राप्त करने से पहले विजया एकादशी का व्रत किया था।
विजया एकादशी को भगवान विष्णु की आराधना, विजय, सफलता और बाधाओं पर विजय से जुड़ा महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। इसे वैष्णव विजया एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
विजया एकादशी 2027 कब है?
विजया एकादशी 2027 में 4 मार्च, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 3 मार्च 2027 को सुबह 4:47 बजे शुरू होकर 4 मार्च 2027 को सुबह 7:26 बजे समाप्त होगी।
विजया एकादशी 2027: 4 मार्च 2027, गुरुवार
एकादशी तिथि प्रारंभ: 3 मार्च 2027, सुबह 4:47 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 4 मार्च 2027, सुबह 7:26 बजे
विजया एकादशी की कथा
युधिष्ठिर बोले- वासुदेव! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? कृपया आप मुझे बताए।
भगवान श्री कृष्ण ने कहा :- युधिष्ठिर! एक बार नारद जी ने कमल के आसन पर विराजमान होने वाले ब्रह्मा जी से प्रश्न किया- सुरश्रेष्ठ! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में जो "विजया" नाम की एकादशी होती है उसका वर्णन कीजिए।
विजया एकादशी की कथा
ब्रह्मा जी बोले- सुनो! मैं एक उत्तम कथा सुनाता हूं, जो पापों का हरण करने वाली है। यह व्रत बहुत ही प्राचीन, पवित्र और पाप नाशक है। यह विजया नाम की एकादशी राजाओं को विजय प्रदान करती है। इसे वैष्णव विजया एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
पूर्व काल की बात है। भगवान श्री रामचंद्र जी 14 वर्ष के लिए वन में गए और वहां पंचवटी में सीता तथा लक्ष्मण के साथ रहने लगे। वहां रहते समय रावण ने चंचलता वश श्री राम की तपस्विनी पत्नी सीता को हर लिया। उस दुख से श्री राम व्याकुल हो उठे। उस समय सीता की खोज करते हुए वे वन में घूमने लगे।
उन्हें जटायु मिले, जिनकी आयु समाप्त हो चुकी थी। इसके बाद उन्होंने वन के भीतर कबंध नामक राक्षस का वध किया। फिर सुग्रीव के साथ उनकी मित्रता हुई। तत्पश्चात श्रीराम के लिए वानरों की सेना एकत्र हुई। हनुमान जी ने लंका के उद्यान में जाकर सीता जी का दर्शन किया और उन्हें श्री राम की चिह्न स्वरूप मुद्रिका प्रदान की। वहां से लौटकर श्री रामचंद्र जी से मिले और लंका का सारा समाचार उनसे निवेदन किया।
हनुमान जी की बात सुनकर श्रीराम ने सुग्रीव की अनुमति ले लंका को प्रस्थान करने का विचार किया और समुद्र के किनारे पहुंचकर उन्होंने लक्ष्मण से कहा- सुमित्रानंदन किस पुण्य से इस समुद्र को पार किया जा सकता है।
लक्ष्मण बोले- महाराज! आप ही आदि देव हैं और पुराण पुरुष पुरुषोत्तम है। आपसे क्या छुपा है? यहां से आधे योजन की दूरी पर बकदाल्भ्य नामक मुनि का आश्रम है। उन्हीं से इसका उपाय पूछिए। लक्ष्मण की अत्यंत सुन्दर बात सुनकर श्री राम चंद्र जी महामुनि बकदाल्भ्य से मिलने के लिए गए।
वहां पहुंचकर उन्होंने मस्तक झुकाकर मुनि को प्रणाम किया। मुनि उनको देखते ही पहचान गए कि यह पुराण पुरुषोत्तम श्रीराम है, जो किसी कारणवश मानव शरीर में अवतीर्ण हुए हैं। श्री राम! आपका कैसे यहां आगमन हुआ? श्री राम बोले ब्राह्मण! आपकी कृपा से राक्षसों सहित लंका को जीतने के लिए सेना के साथ समुद्र के किनारे आया हूं।
अब जिस प्रकार समुद्र पार किया जा सके, वह उपाय बताइए। मुझ पर कृपा कीजिए। बकदाल्भ्य ने कहा- श्री राम! फाल्गुन के कृष्ण पक्ष में जो 'विजया' नाम की एकादशी होती है या जिसे वैष्णव विजया एकादशी के नाम से भी संबोधित करते हैं, उसका व्रत करने से आपकी विजय होगी।
निश्चय ही आप अपनी वानर सेना के साथ समुद्र को पार कर लेंगे। राजन! ब्रह्मा जी कहते हैं- यह सुनकर श्री रामचंद्र जी ने मुनि के कथनानुसार उस समय एकादशी का व्रत किया। उसके करने से श्री रामचंद्र जी विजय हुए। उन्होंने संग्राम में रावण को मारा, लंका पर विजयी पायी और सीता को प्राप्त किया। जो मनुष्य इस विधि से व्रत करते हैं, उन्हें इस लोक में विजय प्राप्त होती है और उनका परलोक में भी अक्षय बना रहता है।
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और जानें कि भगवान विष्णु से एकादशी व्रत का संबंध कैसे स्थापित हुआ।
विजया एकादशी की पूजा विधि
अब व्रत की फलदायक विधि सुनिए। दसवीं का दिन आने पर एक कलश स्थापित करें। वह सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी का भी हो सकता है। उस कलश को जल से भरकर उसमें पल्लव डाल दें। उसके ऊपर भगवान नारायण के सुवर्णमय विग्रह की स्थापना करें। फिर एकादशी के दिन प्रातः काल स्नान करें। कलश को पुनः स्थिरता पूर्वक स्थापित करें। कलश के ऊपर सप्तधान्य और जौ रखें।
गन्ध, धूप, दीप और भांति भांति के नैवेद्य से पूजन करे। कलश के सामने बैठकर सारा दिन उत्तम कथा-वार्ता आदि के द्वारा व्यतीत करें तथा रात में भी वहां जागरण करें। घी का दीपक जलाएं। द्वादशी के दिन सूर्य उदय होने पर उस कलश को किसी नदी के समीप ले जाकर स्थापित करें। उनकी विधिवत पूजा करके देव-प्रतिमा सहित उस कलश को वेदवेत्ता ब्राह्मण के लिए दान कर दें। महाराज! कलश के साथ ही और बड़े-बड़े दान देने चाहिए।
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विजया एकादशी का धार्मिक महत्व
विजया एकादशी को धार्मिक मान्यताओं में विजय और सफलता से जुड़ा महत्वपूर्ण व्रत माना गया है। इसकी पौराणिक कथा भगवान श्रीराम और रावण के युद्ध से संबंधित है। कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने समुद्र पार करके लंका पर विजय प्राप्त करने से पहले इस एकादशी का व्रत किया था।
इसी कारण भक्त विजया एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करके जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करने और अपने कार्यों में सफलता की कामना करते हैं।
विजया एकादशी पर क्या करें?
विजया एकादशी के दिन भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार भगवान विष्णु की पूजा और व्रत कर सकते हैं।
• प्रातःकाल स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
• भगवान विष्णु या भगवान नारायण की पूजा करें।
• धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।
• भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें।
• एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करें।
• अपनी क्षमता के अनुसार उपवास या फलाहार करें।
• रात्रि में भगवान विष्णु का स्मरण और जागरण करें।
• द्वादशी के दिन उचित समय पर पारण करें।
• अपनी श्रद्धा के अनुसार दान-पुण्य करें।
विजया एकादशी का व्रत क्यों रखा जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजया एकादशी का व्रत विजय, सफलता और जीवन की बाधाओं को दूर करने की कामना से किया जाता है। भगवान श्रीराम की कथा से जुड़े होने के कारण इस व्रत का धार्मिक महत्व और भी विशेष माना जाता है।
हालांकि व्रत और पूजा आस्था का विषय हैं, इसलिए इन्हें श्रद्धा और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार करना चाहिए।
विजया एकादशी फाल्गुन कृष्ण पक्ष में आने वाली महत्वपूर्ण एकादशी है। 2027 में विजया एकादशी 4 मार्च, गुरुवार को मनाई जाएगी। भगवान श्रीराम से जुड़ी इसकी पौराणिक कथा इसे विशेष धार्मिक महत्व प्रदान करती है। भक्त इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, कथा श्रवण और दान-पुण्य करके अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
विजया एकादशी का संदेश भक्त को धर्म, संयम, भक्ति और दृढ़ संकल्प के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।