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वरुथिनी एकादशी: तिथि, शुभ मुहूर्त, कथा, पूजा विधि और महत्व
लेखक: रुचि

वरुथिनी एकादशी: तिथि, शुभ मुहूर्त, कथा, पूजा विधि और महत्व

वरुथिनी एकादशी 2026 में कब है?

वरुथिनी एकादशी 2026 में 13 अप्रैल, सोमवार को पड़ रही है। वरुथिनी एकादशी तिथि के आधार पर मनाई जाती है, इसलिए इसकी तारीख हर साल बदलती रहती है।

इस दिन व्रत और भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।

एकादशी तिथि का समय

• एकादशी तिथि प्रारंभ: 13 अप्रैल 2026 को प्रातः 01:16 बजे 

• एकादशी तिथि समाप्त: 14 अप्रैल 2026 को प्रातः 01:08 बजे 

एकादशी के दिन शुभ मुहूर्त में पूजा करने से अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है। जो श्रद्धालु वरुथिनी एकादशी का व्रत रखते हैं, वे इसकी तैयारी एक दिन पहले से ही शुरू कर देते हैं, ताकि व्रत और पूजा विधि विधिपूर्वक संपन्न हो सके।

एकादशी व्रत तिथि के अनुसार किया जाता है और यह हर साल बदलती रहती है। वरुथिनी एकादशी 2025 में 24 अप्रैल को थी और 2027 में 2 मई को पड़ेगी।

यदि आप वरुथिनी एकादशी का सटीक शुभ मुहूर्त जानना चाहते हैं, तो आप हमारे अनुभवी आचार्य से परामर्श ले सकते हैं। पूजा के लिए सही समय जानने के लिए अभी आचार्य जी से संपर्क करें। 

अशुभ काल (जिनसे बचना चाहिए)

एकादशी के दिन पूजा करते समय कुछ अशुभ काल से बचना चाहिए, जैसे:

• राहुकाल 

• यमगंड काल 

• गुलिक काल 

इन अशुभ काल का सटीक समय जानने के लिएहमारा विस्तृत पंचांग अवश्य देखें। 

वैशाख मास की कृष्ण पक्ष की वरुथिनी एकादशी का महत्व

युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण जी से पूछा- वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? उसकी महिमा बताइए। 

भगवान श्री कृष्ण बोले- वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'वरुथिनी' के नाम से प्रसिद्ध है। यह इस लोक और परलोक में भी सौभाग्य प्रदान करने वाली है।

वरुथिनी के व्रत से ही सदा सौख्य का लाभ और पाप की हानि होती है। यह समस्त लोको को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाली है। 

 नृप श्रेष्ठ! घोड़े के दान से हाथी का दान श्रेष्ठ होता है। भूमि दान उससे भी बड़ा है। भूमि दान से अधिक महत्व तिल दान का है। तिल दान से बढ़कर स्वर्ण दान और स्वर्ण दान से बढ़कर अन्न दान है क्योंकि देवता, पितर तथा मनुष्यों को अन्न से ही तृप्ति होती है।

वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा

विद्वान पुरुषों ने कन्यादान को भी अन्नदान के समान बताया है। कन्यादान के तुल्य ही धेनु का दान है यह साक्षात भगवान का कथन है। ऊपर बताए हुए सब दानों से बड़ा विद्यादान है। 

मनुष्य वरुथिनी एकादशी का व्रत करके विद्यादान का भी फल प्राप्त कर लेता है। जो लोग पाप से मोहित होकर कन्या के धन से जीविका चलाते हैं, वे पुण्य का क्षय होने पर यातनामय नरक में जाते हैं। 

अतः सर्वथा प्रयत्न करके कन्या के धन से बचना चाहिए, उसे अपने काम में नहीं लगाना चाहिए। जो अपनी शक्ति के अनुसार आभूषणों से विभूषित करके पवित्र भाव से कन्या का दान करता है, उसके पुण्य की संख्या बताने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं। 

वरुथिनी एकादशी व्रत करके भी मनुष्य उसी के समान फल प्राप्त करता है। वरुथिनी के व्रत से ही मान्धाता तथा धुन्धुमार आदि अन्य अनेक राजा स्वर्ग लोक को प्राप्त हुए हैं। 

रात को जागरण करके जो भगवान मधुसूदन का पूजन करते हैं, वह सब पापों से मुक्ति हो परम गति को प्राप्त होते हैं।

अतः पापभीरु मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न करके एकादशी का व्रत करना चाहिए। यमराज से डरने वाला मनुष्य अवश्य वरुथिनी का व्रत करें। 

राजन! इसके पढ़ने और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है और मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक में प्रतिष्ठित होता हैं। 

वरुथिनी एकादशी की पूजा विधि

व्रत करने वाला वैष्णव पुरुष दशमी तिथि को काँस, उड़द, मसूर, चना, कोदो, काँस शाक, मधु, दूसरे का अन्न, दो बार भोजन, तथा मैथुन इन 10 वस्तुओं का परित्याग कर दें।

एकादशी को जुआ खेलना, नींद लेना, पान खाना, दांतुन करना, दूसरों की निंदा करना, चुगली करना, चोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध तथा असत्य- भाषण- इन 11 बातों को त्याग दें।

द्वादशी को काँस, उड़द, शराब, मधु,, तेल, पतितों से वार्तालाप, व्यायाम, परदेश गमन, दो बार भोजन, मैथुन, बैल की पीठ पर सवारी और मसूर- इन 12 वस्तुओं का त्याग करें।

दशमी के उत्तम दिन को श्रद्धा युक्त चित्त से प्रातः काल स्नान करें। फिर मध्याहन काल में स्नान करके एकाग्र चित्त हो एक समय भोजन करें तथा रात्रि में भूमि पर सोए रात के अंत में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन नित्यकर्म करके स्नान करे, इसके बाद भक्ति भाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करें-   

 अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः।

श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं में भवाच्युत।।

 ' कमलनयन भगवान, नारायण! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करूंगा। अच्युत! आप मुझे शरण दे। 

फिर धूप और गंध आदि से भगवान हरीकेश का पूजन करके रात्रि में उनके समीप जागरण करे। तत्पश्चात सवेरा होने पर द्वादशी के दिन पुन: भक्ति पूर्वक श्री हरि की पूजा करें।

उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करा कर भाई- बंधु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करें। 

क्या आप जानते हैं—एकादशी देवी कौन हैं, उनका प्राकट्य कब, कैसे और क्यों हुआ, और सबसे पहले यह व्रत किसने रखा?इन गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए यह कथा अवश्य पढ़ें। 

यदि आप वरुथिनी एकादशी व्रत की सही तिथि, पूजा विधि, व्रत कथा और इसके दिव्य फलों व गूढ़ महत्व को विस्तार से जानना चाहते हैं, तो एकादशी व्रत एवं अनुष्ठान से जुड़ी व्यक्तिगत मार्गदर्शन के लिएअभी अनुभवी पंडित से नि:शुल्क परामर्श प्राप्त करें।  

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