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सफला एकादशी: तिथि, व्रत कथा, पूजा विधि और धार्मिक महत्व
लेखक: रुचि

सफला एकादशी: तिथि, व्रत कथा, पूजा विधि और धार्मिक महत्व

एकादशी व्रत को भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। वर्ष में आने वाली प्रत्येक एकादशी का अपना अलग धार्मिक महत्व, व्रत कथा और पूजा विधान बताया गया है। इन्हीं में पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी कहा जाता है।

‘सफला’ शब्द का अर्थ है- सफलता प्रदान करने वाली। धार्मिक मान्यता के अनुसार सफला एकादशी का व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है तथा उसके शुभ कार्यों की सिद्धि और जीवन में सकारात्मकता का मार्ग प्रशस्त होता है।

इस एकादशी के दिन भगवान नारायण की पूजा, व्रत, दीपदान, फल अर्पण और रात्रि जागरण का विशेष महत्व बताया गया है। सफला एकादशी की महिमा भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को बताई थी। इसकी व्रत कथा में राजा माहिष्मत के पुत्र लुम्भक का वर्णन मिलता है, जिसके जीवन में सफला एकादशी के व्रत से महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ।

आइए जानते हैं सफला एकादशी 2027 कब है, इसका धार्मिक महत्व क्या है, व्रत कथा क्या है और इस दिन भगवान विष्णु की पूजा किस प्रकार करनी चाहिए।

सफला एकादशी 2027 कब है?

सफला एकादशी 3 जनवरी 2027, रविवार को मनाई जाएगी।

यह पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि होगी। पंचांग गणना के अनुसार एकादशी तिथि 2 जनवरी 2027 को दोपहर लगभग 2:26 बजे शुरू होकर 3 जनवरी 2027 को शाम लगभग 4:10 बजे समाप्त होगी। 

सफला एकादशी व्रत: रविवार, 3 जनवरी 2027

पक्ष: कृष्ण पक्ष

मास: पौष

तिथि: एकादशी

व्रत और पारण के लिए अपने स्थान के स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।

पौष मास के कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी का महत्त्व

युधिष्ठिर ने पूछा- स्वामिन्! पौष मास के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है ? उसकी क्या विधि है ? तथा उसमें किस देवता की पूजा की जाती है ? यह बताइये। 

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-राजेन्द्र ! बतलाता हूँ, सुनो; बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले यज्ञों से भी मुझे उतना संतोष नहीं होता, जितना एकादशी व्रत के अनुष्ठान से होता है। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके एकादशी का व्रत करना चाहिये। पौष मास के कृष्णपक्ष में 'सफला' नाम की एकादशी होती है। उस दिन पूर्वोक्त विधान से ही विधिपूर्वक भगवान् नारायण की पूजा करनी चाहिये।

एकादशी कल्याण करने वाली है। अतः इसका व्रत अवश्य करना उचित है। जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़, देवताओं में श्रीविष्णु तथ मनुष्यों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सम्पूर्ण व्रतों में एकादशी तिथि श्रेष्ठ है। राजन्! 'सफला' एकादशी को नाम मन्त्रों का उच्चारण करके फलों के द्वारा श्रीहरि का पूजन करे। नारियल के फल, सुपारी, बिजौरा नीबू, जमीरा नीबू, अनार, सुन्दर आँवला, लौंग, बेर तथा विशेषतः आम के फलों से देव देवेश्वर श्री हरि की पूजा करनी चाहिये। इसी प्रकार धूप-दीप से भी भगवान् की अर्चना करे। सफला एकादशी को विशेष रूप से दीप- दान करने का विधान है। रात को वैष्णव पुरुषों के साथ जागरण करना चाहिये। जागरण करने वाले को जिस फल की प्राप्ति होती है, वह हजारों वर्ष तपस्या करने से भी नहीं मिलता। 

सफला एकादशी की व्रत कथा

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा- नृपश्रेष्ठ! अब 'सफला एकादशी की शुभकारिणी कथा सुनो। चम्पावती नाम से विख्यात एक पुरी है, जो कभी राजा माहिष्मत की राजधानी थी। राजर्षि माहिष्मत के पाँच पुत्र थे। उनमें जो ज्येष्ठ था, वह सदा पाप कर्म में ही लगा रहता था। परस्त्रीगामी और वेश्यासक्त था। उसने पिता के धन को पाप कर्म में ही खर्च किया।

वह सदा दुराचार परायण तथा ब्राह्मणों का निन्दक था। वैष्णवों और देवताओं की भी हमेशा निन्दा किया करता था। अपने पुत्र को ऐसा पापाचारी देखकर राजा माहिष्मत ने राजकुमारों में उसका नाम लुम्भक रख दिया। फिर पिता और भाइयों ने मिलकर उसे राज्य से बाहर निकाल दिया।

लुम्भक उस नगर से निकल कर घने वन में चला गया। वहीं रहकर उस पापी ने प्रायः समूचे नगर का धन लूट लिया। एक दिन जब वह चोरी करने के लिये नगर में आया तो रात में पहरा देने वाले सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया। किन्तु जब उसने अपने को राजा माहिष्मत का पुत्र बतलाया तो सिपाहियों ने उसे छोड़ दिया। फिर वह पापी वन में लौट आया और प्रतिदिन मांस तथा वृक्षों के फल खाकर जीवन निर्वाह करने लगा। उस दुष्ट का विश्राम स्थान पीपल वृक्ष के निकट था। वहाँ बहुत वर्षों का पुराना पीपल का वृक्ष था। उस वन में वह वृक्ष एक महान् देवता माना जाता था। पापबुद्धि लुम्भक वहीं निवास करता था। 

बहुत दिनों के पश्चात् एक दिन किसी संचित पुण्य के प्रभाव से उसके द्वारा एकादशी के व्रत का पालन हो गया। पौष मास में कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन पापिष्ठ लुम्भक ने वृक्षों के फल खाये और वस्त्रहीन होने के कारण रातभर जाड़े का कष्ट भोगा। उस समय न तो उसे नींद आयी और न आराम ही मिला। वह निष्प्राण-सा हो रहा था।

सूर्योदय होने पर भी उस पापी को होश नहीं हुआ। 'सफला' एकादशी के दिन भी लुम्भक बेहोश पड़ा रहा। दोपहर होने पर उसे चेतना प्राप्त हुई। फिर इधर-उधर दृष्टि डाल कर वह आसन से उठा और लँगड़े की भाँति पैरों से बार-बार लड़खड़ाता हुआ वन के भीतर गया। वह भूख से दुर्बल और पीड़ित हो रहा था। राजन् ! उस समय लुम्भक बहुत-से फल लेकर ज्यों ही विश्राम-स्थान पर लौटा, त्यों ही सूर्यदेव अस्त हो गये। तब उसने वृक्ष की जड़ में बहुत-से फल निवेदन करते हुए कहा - 'इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु संतुष्ट हों।' यों कहकर लुम्भक ने रातभर नींद नहीं ली। इस प्रकार अनायास ही उसने इस व्रत का पालन कर लिया।

उस समय सहसा आकाशवाणी हुई- 'राजकुमार ! तुम सफला एकादशी के प्रसाद से राज्य और पुत्र प्राप्त करोगे।' 'बहुत अच्छा' कहकर उसने वह वरदान स्वीकार किया। इसके बाद उसका रूप दिव्य हो गया। तब से उसकी उत्तम बुद्धि भगवान् विष्णु के भजन में लग गयी। दिव्य आभूषणों की शोभा से सम्पन्न होकर उसने अकण्टक राज्य प्राप्त किया और पंद्रह वर्षों तक वह उसका संचालन करता रहा।

उस समय भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से उसके मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। जब वह बड़ा हुआ, तब लुम्भक ने तुरंत ही राज्य की ममता छोड़कर उसे पुत्र को सौंप दिया और वह भगवान् श्रीकृष्ण के समीप चला गया, जहाँ जाकर मनुष्य कभी शोक में नहीं पड़ता।

राजन्! इस प्रकार जो सफला एकादशी का उत्तम व्रत करता है, वह इस लोक में सुख भोगकर मरने के पश्चात् मोक्ष को प्राप्त होता है। संसार में वे मनुष्य धन्य हैं, जो 'सफला' एकादशी के व्रत में लगे रहते हैं। उन्हीं का जन्म सफल है। महाराज! इसकी महिमा को पढ़ने, सुनने तथा उसके अनुसार आचरण करने से मनुष्य राजसूय यज्ञ का फल पाता है। 

सफला एकादशी के व्रत की पूजा विधि

राजेंद्र! सुनो, मैं तुम्हें इस व्रत की शुभ कारक विधि बतलाता हूं। पौष मास के कृष्ण पक्ष में दशमी के उत्तम दिन को श्रद्धा युक्त चित्त से प्रातः काल स्नान करें। फिर मध्याहन काल में स्नान करके एकाग्र चित्त हो एक समय भोजन करें तथा रात्रि में भूमि पर सोए। रात के अंत में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन नित्यकर्म करके स्नान करे। इसके बाद भक्ति भाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करें- 

अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः।

श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं में भवाच्युत।।

कमलनयन भगवान, नारायण! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करूंगा। अच्युत ! आप मुझे शरण दे। फिर धूप और गंध आदि से भगवान हरीकेश का पूजन करके रात्रि में उनके समीप जागरण करे। तत्पश्चात सवेरा होने पर द्वादशी के दिन पुन: भक्ति पूर्वक श्री हरि की पूजा करें। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करा कर भाई- बंधु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करें। 

एकादशी की उत्पत्ति की कथा पढ़ें

एकादशी तिथि की उत्पत्ति से जुड़ी कथा में भगवान विष्णु और मुर नामक दैत्य का प्रसंग आता है। एकादशी की उत्पत्ति, भगवान विष्णु की लीला और इस तिथि के धार्मिक महत्व को विस्तार से जानने के लिए हमारा संबंधित लेख पढ़ें।

एकादशी की उत्पत्ति और एकादशी व्रत की कथा के बारे में विस्तार से पढ़ें 

सफला एकादशी का व्रत कैसे रखें?

व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी शारीरिक क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करना चाहिए। व्रत से पहले दशमी तिथि को सात्त्विक भोजन करने और संयम रखने की परंपरा है।

एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार निर्जल, फलाहार या अन्य निर्धारित तरीके से व्रत रख सकते हैं।

यदि स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या हो या उपवास करना संभव न हो, तो कठोर उपवास करने के बजाय भगवान विष्णु का स्मरण, पूजा और सात्त्विक आहार के साथ व्रत की भावना बनाए रखना अधिक उचित है।

सफला एकादशी पर अनुष्ठान के लिए निःशुल्क परामर्श

यदि आप सफला एकादशी पर केवल सामान्य पूजा के बजाय अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुसार किसी जप, पाठ या अनुष्ठान के बारे में जानना चाहते हैं, तो पहले विशेषज्ञ से परामर्श लेना उपयोगी हो सकता है। अलग-अलग उद्देश्य के लिए अलग-अलग अनुष्ठान किए जाते हैं और सही विधि का चयन व्यक्ति की परिस्थिति के अनुसार किया जा सकता है।

सफला एकादशी पर कौन-सा अनुष्ठान आपके लिए उपयुक्त हो सकता है: -इसकी जानकारी के लिए निःशुल्क परामर्श लें।  

सफला एकादशी पर कौन-कौन से अनुष्ठान किए जा सकते हैं?

सफला एकादशी भगवान विष्णु की आराधना का विशेष अवसर है। इस दिन भगवान विष्णु से संबंधित स्तोत्र, मंत्र जाप और पाठ श्रद्धा के अनुसार किए जा सकते हैं।

इनमें विष्णु सहस्रनाम पाठ विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। विष्णु सहस्रनाम में भगवान विष्णु के एक हजार नामों का स्मरण किया जाता है और इसे भगवान श्रीहरि की आराधना का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र माना जाता है।

यदि आप स्वयं पाठ करने में असमर्थ हैं या विधिपूर्वक अनुष्ठान करवाना चाहते हैं, तो योग्य आचार्यों द्वारा विष्णु सहस्रनाम अनुष्ठान करवाने का विकल्प भी उपलब्ध है।

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सफला एकादशी पर क्या करें?

सफला एकादशी के दिन श्रद्धालु निम्न कार्य कर सकते हैं-

• भगवान विष्णु की पूजा करें।

• विष्णु मंत्र का जाप करें।

• विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

• भगवान को फल अर्पित करें।

• दीपदान करें।

• धार्मिक ग्रंथों का पाठ या श्रवण करें।

• सामर्थ्य के अनुसार दान करें।

• रात्रि में भगवान विष्णु का स्मरण और भजन करें।

• द्वादशी को उचित विधि से व्रत का पारण करें।

सफला एकादशी पर क्या नहीं करना चाहिए?

एकादशी को भगवान विष्णु की भक्ति, संयम और सात्त्विक जीवन से जोड़ा जाता है। इसलिए इस दिन मन, वचन और कर्म से संयम रखने का प्रयास करना चाहिए।

क्रोध, निंदा, छल-कपट और अनावश्यक विवाद से बचना चाहिए। भोजन और व्रत के नियमों में अपनी पारिवारिक परंपरा तथा स्थानीय धार्मिक मान्यता का पालन करना उचित है।

सफला एकादशी का आध्यात्मिक संदेश

सफला एकादशी की कथा केवल व्रत रखने की परंपरा नहीं बताती, बल्कि जीवन में परिवर्तन और भक्ति की शक्ति का संदेश भी देती है। कथा में लुम्भक का जीवन यह दर्शाता है कि मनुष्य चाहे कितनी भी गलत दिशा में चला गया हो, उसके भीतर परिवर्तन और ईश्वर की ओर लौटने का मार्ग हमेशा खुला रह सकता है।

इसलिए सफला एकादशी को भगवान विष्णु की भक्ति, आत्मसंयम और सकारात्मक जीवन की ओर बढ़ने के अवसर के रूप में देखा जा सकता है।

सफला एकादशी 2027 का व्रत 3 जनवरी, रविवार को रखा जाएगा। इस दिन श्रद्धा के साथ भगवान विष्णु की पूजा करें, दीपदान करें, फल अर्पित करें और अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का पालन करें।

भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति आए, यही प्रार्थना है।

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