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पौष पुत्रदा एकादशी: तिथि, व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व
लेखक: रुचि

पौष पुत्रदा एकादशी: तिथि, व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व

पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। भगवान विष्णु को समर्पित इस व्रत को संतान सुख और परिवार की मंगलकामना से जुड़ा माना जाता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को पौष शुक्ल एकादशी के महत्व के बारे में बताया था। उन्होंने कहा कि यह एकादशी पापों का नाश करने वाली और मनुष्य की धार्मिक एवं आध्यात्मिक उन्नति में सहायक मानी जाती है। इस एकादशी के अधिदेवता भगवान नारायण हैं।

पुत्रदा एकादशी का व्रत विशेष रूप से संतान की कामना रखने वाले दंपतियों द्वारा श्रद्धा के साथ किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से संतान सुख की प्राप्ति और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

एकादशी व्रत की उत्पत्ति, इसकी पौराणिक कथा और भगवान विष्णु से जुड़े धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानने के लिए: - हमारा एकादशी की उत्पत्ति लेख पढ़ें। 

पुत्रदा एकादशी 2027 कब है?

पौष पुत्रदा एकादशी 2027 में 18 जनवरी, सोमवार को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, पौष शुक्ल एकादशी तिथि 18 जनवरी 2027 को सुबह 10:29 बजे से शुरू होकर 19 जनवरी 2027 को सुबह 7:51 बजे तक रहेगी।

कुछ वैष्णव गणनाओं में 19 जनवरी को गौण/वैष्णव पुत्रदा एकादशी के रूप में भी दर्शाया गया है। इसलिए व्रत और पारण के लिए: - अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना उचित है। 

पौष पुत्रदा एकादशी 2027: 18 जनवरी 2027, सोमवार

एकादशी तिथि प्रारंभ: 18 जनवरी 2027, सुबह 10:29 बजे

एकादशी तिथि समाप्त: 19 जनवरी 2027, सुबह 7:51 बजे

तिथि और पारण का समय स्थान के अनुसार अलग हो सकता है।

पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा

बहुत समय पहले भद्रावती पुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम चंपा था। राजा और रानी सभी प्रकार के सुखों से संपन्न थे, लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण दोनों चिंतित रहते थे।

राजा के पितर भी इस बात से दुखी रहते थे कि उनके वंश को आगे बढ़ाने वाला कोई पुत्र नहीं है। एक दिन राजा सुकेतुमान घोड़े पर सवार होकर वन में भ्रमण करने के लिए निकल पड़े।

वन में घूमते-घूमते उन्हें बहुत प्यास लगी। जल की तलाश करते हुए राजा को एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया। सरोवर के पास कई मुनियों के आश्रम थे। राजा ने मुनियों को वेदों का पाठ करते हुए देखा और उनके पास जाकर श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया।

मुनियों ने राजा को आशीर्वाद दिया और उनके आने का कारण पूछा। राजा ने अपना परिचय दिया और उनसे अपनी संतान संबंधी चिंता बताई।

मुनियों ने स्वयं को विश्वदेव बताया और कहा कि वे माघ मास के निकट आने पर स्नान के लिए वहां आए हैं। उन्होंने राजा को बताया कि उस दिन पुत्रदा एकादशी है और इस व्रत के पालन से संतान सुख की प्राप्ति की कामना पूरी हो सकती है।

राजा ने मुनियों से पुत्र प्राप्ति का उपाय पूछा। तब मुनियों ने उन्हें पुत्रदा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने की सलाह दी और कहा कि भगवान केशव की कृपा से उनकी संतान की इच्छा पूरी हो सकती है।

राजा ने मुनियों के बताए अनुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक किया। इसके बाद उनकी पत्नी रानी चंपा ने गर्भ धारण किया और समय आने पर उन्हें एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। वह पुत्र गुणवान और प्रजा का पालन करने वाला बना।

इसी कारण भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा कि पुत्रदा एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत का पालन करने से संतान सुख और आध्यात्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है।

पुत्रदा एकादशी की पूजा विधि

पुत्रदा एकादशी का व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ किया जाता है। व्रत से एक दिन पहले अर्थात दशमी तिथि को सात्त्विक भोजन ग्रहण करना और संयम का पालन करना शुभ माना जाता है।

एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर धूप, पुष्प, गंध और नैवेद्य आदि अर्पित करें।

व्रत का संकल्प लेते समय भगवान विष्णु से प्रार्थना करें-

“अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः।

श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥”

अर्थात—हे कमलनयन भगवान नारायण! मैं आज सभी भोगों से दूर रहकर निराहार रहूंगा और कल भोजन करूंगा। हे अच्युत! आप मेरी शरण बनें।

एकादशी के दिन भगवान विष्णु का पूजन करने के साथ उनके मंत्रों का जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और भगवान की कथा का श्रवण किया जा सकता है। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार उपवास या फलाहार करते हैं।

रात्रि में भगवान विष्णु के समीप जागरण और भजन-कीर्तन करने की भी धार्मिक परंपरा है।

द्वादशी तिथि को स्नान करके भगवान विष्णु की पुनः पूजा करें। इसके बाद अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा दान-दक्षिणा दें। इसके बाद उचित समय पर पारण करके व्रत पूर्ण करें।

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पुत्रदा एकादशी व्रत में किन बातों का ध्यान रखें?

पुत्रदा एकादशी के व्रत में श्रद्धालुओं को सात्त्विक और संयमित जीवनशैली अपनाने का प्रयास करना चाहिए। व्रत की विधि व्यक्ति की क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार रखी जा सकती है।

• भगवान विष्णु का ध्यान और पूजन करें।

• एकादशी के दिन सात्त्विक आचरण रखें।

• भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें।

• विष्णु सहस्रनाम या धार्मिक ग्रंथों का पाठ करें।

• जरूरतमंद लोगों को दान दें।

• द्वादशी के दिन उचित समय पर पारण करें।

• स्वास्थ्य संबंधी समस्या होने पर कठोर उपवास से बचें।

पुत्रदा एकादशी का धार्मिक महत्व

पुत्रदा एकादशी को भगवान विष्णु की आराधना और संतान सुख की कामना से जुड़ा महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। पौराणिक कथा में राजा सुकेतुमान की संतान प्राप्ति की इच्छा और पुत्रदा एकादशी के व्रत के प्रभाव का वर्णन मिलता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को श्रद्धा से करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है तथा संतान, परिवार के सुख और आध्यात्मिक उन्नति की कामना की जाती है।

इसके अतिरिक्त एकादशी व्रत को आत्मसंयम, भक्ति और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण का माध्यम भी माना जाता है।

पुत्रदा एकादशी का व्रत किसे करना चाहिए?

पुत्रदा एकादशी का व्रत विशेष रूप से वे दंपति श्रद्धा से करते हैं जो संतान सुख की कामना रखते हैं। हालांकि एकादशी का व्रत केवल संतान प्राप्ति की इच्छा तक सीमित नहीं है। भगवान विष्णु के भक्त सामान्य रूप से भी इस व्रत को धार्मिक श्रद्धा और आध्यात्मिक साधना के रूप में कर सकते हैं।

व्रत रखने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों या किसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को कठोर उपवास करने के बजाय अपनी स्थिति के अनुसार धार्मिक आचरण अपनाना चाहिए।

पुत्रदा एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा कैसे करें?

पुत्रदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को साफ करके भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

इसके बाद भगवान को पुष्प, तुलसी दल, धूप, दीप, नैवेद्य और फल अर्पित करें। भगवान विष्णु के मंत्र का जाप करें और पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा का पाठ या श्रवण करें।

दिनभर भगवान विष्णु का स्मरण करते रहें और अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत या फलाहार करें। रात में भजन, कीर्तन और भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करना भी शुभ माना जाता है।

पुत्रदा एकादशी और संतान सुख की मान्यता

पुत्रदा एकादशी का सबसे प्रमुख धार्मिक पक्ष संतान सुख की कामना से जुड़ा है। पौराणिक कथा में राजा सुकेतुमान को पुत्र की प्राप्ति होने के कारण इस व्रत को संतान प्राप्ति की कामना से विशेष रूप से जोड़ा जाता है।

हालांकि यह धार्मिक मान्यता है। संतान संबंधी किसी भी स्वास्थ्य या प्रजनन संबंधी समस्या के लिए योग्य चिकित्सक की सलाह लेना आवश्यक है। धार्मिक व्रत और पूजा को आस्था एवं आध्यात्मिक साधना के रूप में किया जा सकता है।

पौष पुत्रदा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित महत्वपूर्ण एकादशी है। 2027 में यह व्रत 18 जनवरी, सोमवार को मनाया जाएगा, जबकि एकादशी तिथि 18 जनवरी सुबह 10:29 बजे से 19 जनवरी सुबह 7:51 बजे तक रहेगी। क्षेत्र और वैष्णव परंपरा के अनुसार व्रत की तिथि में अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार व्रत और पारण करना उचित है।

पुत्रदा एकादशी की कथा राजा सुकेतुमान से जुड़ी है और धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत संतान सुख, परिवार की मंगलकामना और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

श्रद्धा, संयम और भक्ति के साथ इस व्रत का पालन करना धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

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