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मोहिनी एकादशी: तिथि, व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व
लेखक: रुचि

मोहिनी एकादशी: तिथि, व्रत कथा, पूजा विधि और महत्व

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मोहिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को पापों से मुक्ति और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

मोहिनी एकादशी 2027 में 16 मई, रविवार को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 15 मई की शाम से शुरू होकर 16 मई की शाम तक रहेगी।

मोहिनी एकादशी 2027 कब है?

वर्ष 2027 में मोहिनी एकादशी 16 मई, रविवार को मनाई जाएगी। यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है। 

मोहिनी एकादशी 2027: 16 मई 2027, रविवार

एकादशी तिथि प्रारंभ: 15 मई 2027, शाम 6:19 बजे

एकादशी तिथि समाप्त: 16 मई 2027, शाम 5:14 बजे 

तिथि और पारण के समय में स्थान के अनुसार अंतर हो सकता है, इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने शहर के स्थानीय: - पंचांग के अनुसार समय देखना चाहिए।  

मोहिनी एकादशी का महत्व

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है और उसका क्या महत्व है। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें मोहिनी एकादशी के महत्व के बारे में बताया।

धार्मिक कथा के अनुसार, पूर्वकाल में भगवान श्रीराम ने भी महर्षि वसिष्ठ से इसी एकादशी के महत्व के बारे में पूछा था। महर्षि वसिष्ठ ने बताया कि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी मोहिनी एकादशी कहलाती है। इसे पापों का नाश करने वाली और श्रेष्ठ व्रतों में से एक माना गया है।

मान्यता है कि मोहिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति मोह-माया और पाप कर्मों के प्रभाव से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है तथा भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करता है।

मोहिनी एकादशी की व्रत कथा

महर्षि वसिष्ठ ने भगवान श्रीराम को मोहिनी एकादशी की कथा सुनाते हुए बताया कि सरस्वती नदी के रमणीय तट पर भद्रावती नाम की नगरी थी। वहां धृतिमान नामक राजा राज्य करते थे।

उसी नगर में धनपाल नाम का एक वैश्य रहता था। वह धन-धान्य से संपन्न और धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था। वह हमेशा पुण्य कर्मों में लगा रहता था। उसने लोगों के लिए प्याऊ, कुएं, मठ, बगीचे, तालाब और घर आदि बनवाए थे। वह भगवान विष्णु का भक्त था और शांत स्वभाव का था।

धनपाल के पांच पुत्र थे—सुमना, ध्रुतिमान, मेधावी, सुकृत और धृष्टबुद्धि। इनमें धृष्टबुद्धि गलत संगति और बुरे कर्मों में लिप्त रहता था। उसे जुआ और अन्य दुर्व्यसनों की आदत थी। वह अपने पिता का धन भी बर्बाद करता रहता था।

एक दिन धृष्टबुद्धि को बुरे आचरण में देखकर उसके पिता ने उसे घर से निकाल दिया। परिवार और संबंधियों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। इसके बाद वह दुख और शोक में जीवन बिताने लगा।

एक दिन पुण्य के प्रभाव से वह महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम पहुंचा। उसने महर्षि से अपने उद्धार का उपाय पूछा। महर्षि कौण्डिन्य ने उसे वैशाख शुक्ल एकादशी अर्थात मोहिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।

धृष्टबुद्धि ने महर्षि के बताए अनुसार विधिपूर्वक मोहिनी एकादशी का व्रत किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्रत के प्रभाव से उसके पाप नष्ट हुए और उसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त हुई।

इस प्रकार मोहिनी एकादशी की कथा व्यक्ति को बुरे कर्मों और मोह-माया से दूर होकर धर्म तथा भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

एकादशी की उत्पत्ति, पौराणिक कथा और धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानने के लिए: - हमारा एकादशी की उत्पत्ति लेख पढ़ें। 

मोहिनी एकादशी की पूजा विधि

मोहिनी एकादशी से एक दिन पहले अर्थात दशमी तिथि को श्रद्धापूर्वक स्नान करके सात्विक भोजन करना चाहिए। धार्मिक परंपरा के अनुसार, दशमी की रात भूमि पर सोने और संयम का पालन करने की बात कही गई है।

एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।

संकल्प के समय निम्न मंत्र का पाठ किया जाता है-

अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः।

श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत।।

अर्थात—हे कमलनयन भगवान नारायण! आज मैं सभी भोगों का त्याग करके निराहार रहूंगा और अगले दिन भोजन करूंगा। हे अच्युत! आप मेरी शरण स्वीकार करें।

इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने धूप, दीप, गंध, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करके पूजा करें। भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें और श्रद्धा के अनुसार दिनभर व्रत रखें।

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मोहिनी एकादशी पर रात्रि जागरण

एकादशी की रात भगवान विष्णु के समीप जागरण करने की परंपरा भी बताई गई है। इस दौरान भगवान विष्णु का स्मरण, भजन, कीर्तन और मंत्र-जाप किया जा सकता है।

भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार रात्रि जागरण कर सकते हैं।

मोहिनी एकादशी का पारण

द्वादशी तिथि को प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके बाद अपनी परंपरा के अनुसार ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराएं तथा दान-दक्षिणा दें।

इसके बाद परिवार के सदस्यों के साथ व्रत का पारण करें। पारण का सही समय स्थान और पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है, इसलिए अपने शहर के पंचांग से द्वादशी पारण समय अवश्य देखें।

मोहिनी एकादशी व्रत के नियम

मोहिनी एकादशी का व्रत रखने वाले भक्त अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत का पालन कर सकते हैं। धार्मिक परंपरा में इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, संयम, सात्विक आहार और भगवान के नाम का स्मरण करने का महत्व बताया गया है।

व्रत रखने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए। विशेष रूप से बीमार, वृद्ध, गर्भवती या नियमित दवा लेने वाले लोगों को व्रत के संबंध में चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता देनी चाहिए।

मोहिनी एकादशी का धार्मिक महत्व

मोहिनी एकादशी भगवान विष्णु की भक्ति और आत्मसंयम से जुड़ा महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत से व्यक्ति को पाप कर्मों से मुक्ति, मानसिक शांति और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

मोहिनी एकादशी की कथा व्यक्ति को यह संदेश भी देती है कि गलत मार्ग पर जाने के बाद भी सच्चे पश्चाताप, भक्ति और सद्कर्मों के माध्यम से जीवन को बेहतर दिशा देने का प्रयास किया जा सकता है।

मोहिनी एकादशी पर क्या करें?

• प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु का ध्यान करें।

• श्रद्धापूर्वक एकादशी व्रत का संकल्प लें।

• भगवान विष्णु की पूजा करें।

• विष्णु मंत्र या भगवान के नाम का जाप करें।

• अपनी क्षमता के अनुसार सात्विक व्रत रखें।

• रात्रि में भजन, कीर्तन या भगवान विष्णु का स्मरण करें।

• द्वादशी के दिन जरूरतमंदों को भोजन और दान दें।

• द्वादशी तिथि में उचित समय पर व्रत का पारण करें।

मोहिनी एकादशी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाला महत्वपूर्ण एकादशी व्रत है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति तथा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग मिलता है।

वर्ष 2027 में मोहिनी एकादशी 16 मई, रविवार को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 15 मई की शाम से 16 मई की शाम तक रहेगी। स्थान के अनुसार तिथि और पारण के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है। 

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