कामदा एकादशी 2027 में कब है?
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी कहा जाता है। वर्ष 2027 में कामदा एकादशी का व्रत 17 अप्रैल 2027, शनिवार को रखा जाएगा। यह चैत्र शुक्ल पक्ष में आने वाली महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है।
कामदा एकादशी 2027 की तिथि और समय
• कामदा एकादशी व्रत: 17 अप्रैल 2027, शनिवार
• एकादशी तिथि प्रारंभ: 16 अप्रैल 2027, सुबह 11:23 बजे
• एकादशी तिथि समाप्त: 17 अप्रैल 2027, सुबह 9:30 बजे
तिथि और पारण का समय स्थान के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है।
इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करनी चाहिए।
कामदा एकादशी का महत्व
युधिष्ठिर ने पूछा - वासुदेव! आपको नमस्कार है। अब मेरे सामने यह बताइये कि चैत्र शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है?
भगवान श्रीकृष्ण बोले - राजन्! एकाग्रचित्त होकर यह पुरातन कथा सुनो, जिसे वसिष्ठजी ने दिलीप के पूछने पर कहा था।
दिलीप ने पूछा - भगवन्! मैं एक बात सुनना चाहता हूँ। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है?
वसिष्ठ जी बोले - राजन्! चैत्र शुक्ल पक्ष में कामदा नाम की एकादशी होती है। इसे परम पुण्यमयी और पापरूपी ईंधन के लिए दावानल के समान माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कामदा एकादशी का व्रत पापों का नाश करने वाला और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने वाला माना जाता है।
कामदा एकादशी की व्रत कथा में ललिता द्वारा अपने पति ललित को राक्षस योनि से मुक्त कराने के लिए इस व्रत को करने का वर्णन मिलता है। कथा के अनुसार, कामदा एकादशी के व्रत का पुण्य अपने पति को समर्पित करने से ललित का राक्षस भाव समाप्त हो गया और उसे पुनः गंधर्व स्वरूप प्राप्त हुआ।
एकादशी व्रत की उत्पत्ति, इसकी पौराणिक कथा और भगवान विष्णु से जुड़े धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानने के लिए: - हमारा एकादशी की उत्पत्ति लेख पढ़ें।
कामदा एकादशी की व्रत कथा
प्राचीन काल की बात है, नागपुर नाम का एक सुंदर नगर था, जहाँ सोने के महल बने हुए थे। उस नगर में पुण्डरीक आदि महाभयंकर नाग निवास करते थे। पुण्डरीक नाम का नाग उन दिनों वहाँ राज्य करता था। गंधर्व, किन्नर और अप्सराएँ भी उस नगरी में निवास करते थे।
वहाँ एक श्रेष्ठ अप्सरा थी, जिसका नाम ललिता था। उसके साथ ललित नाम का गंधर्व भी था। दोनों पति-पत्नी के रूप में रहते थे और एक-दूसरे के प्रति अत्यंत अनुरक्त थे। ललिता के हृदय में सदा अपने पति की ही छवि रहती थी और ललित के हृदय में भी सुंदरी ललिता का नित्य निवास था।
एक दिन नागराज पुण्डरीक राजसभा में बैठकर मनोरंजन कर रहे थे। उस समय ललित का गान हो रहा था, किंतु उसके साथ उसकी प्रिय पत्नी ललिता वहाँ उपस्थित नहीं थी। गाते-गाते उसे ललिता का स्मरण हो आया। उसका मन विचलित हो गया, जिससे उसके पैरों की गति रुक गई और उसकी वाणी भी लड़खड़ाने लगी।
नागों में श्रेष्ठ कर्कोटक को ललित के मन की स्थिति का पता चल गया। उसने राजा पुण्डरीक को ललित के गान में हुई त्रुटि और उसके विचलित होने की बात बता दी।
कर्कोटक की बात सुनकर नागराज पुण्डरीक की आँखें क्रोध से लाल हो गईं। उसने कामातुर ललित को शाप देते हुए कहा - तू मेरे सामने गान करते समय भी अपनी पत्नी के वशीभूत हो गया है, इसलिए तू इसी क्षण राक्षस हो जा।
महाराज पुण्डरीक के इतना कहते ही ललित गंधर्व से राक्षस बन गया।
ललिता अपने पति की विकराल आकृति देखकर बहुत चिंतित हुई। वह भारी दुःख में पड़ गई और सोचने लगी कि अब क्या करे और कहाँ जाए। अपने पति को इस अवस्था में देखकर वह अत्यंत दुःखी हुई और रोती हुई घने जंगलों में उसके पीछे-पीछे घूमने लगी।
वन में उसे एक सुंदर आश्रम दिखाई दिया। वहाँ एक शांत और दयालु मुनि बैठे हुए थे, जिनका किसी भी प्राणी के साथ वैर-विरोध नहीं था। ललिता शीघ्रता से उनके पास गई, उन्हें प्रणाम किया और उनके सामने खड़ी हो गई।
मुनि ने दुःखी ललिता को देखकर पूछा - तुम कौन हो और यहाँ कैसे आई हो? मुझे सत्य-सत्य बताओ।
ललिता ने कहा - महामुने! मेरे पति एक गंधर्व हैं और मेरा नाम ललिता है। मेरे पति अपने पाप के कारण राक्षस हो गए हैं। उनकी यह अवस्था देखकर मुझे चैन नहीं है। कृपया मुझे ऐसा उपाय बताइए, जिससे मेरे पति इस राक्षस योनि से मुक्त हो सकें।
मुनि ने कहा - इस समय चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी आने वाली है। यह एकादशी पापों को नष्ट करने वाली और उत्तम मानी जाती है। तुम विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करो और इस व्रत से प्राप्त पुण्य अपने पति को समर्पित कर दो। ऐसा करने से तुम्हारे पति को शाप से मुक्ति मिल सकती है।
मुनि के वचन सुनकर ललिता को बहुत प्रसन्नता हुई। उसने कामदा एकादशी के दिन श्रद्धापूर्वक उपवास किया और द्वादशी के दिन मुनि के समीप भगवान वासुदेव के सामने अपने व्रत का पुण्य पति के उद्धार के लिए समर्पित किया।
ललिता ने कहा - मैंने कामदा एकादशी का जो व्रत किया है, उसके पुण्य के प्रभाव से मेरे पति का राक्षस भाव दूर हो और उन्हें इस शाप से मुक्ति प्राप्त हो।
वसिष्ठ जी कहते हैं कि ललिता के इतना कहते ही उसी क्षण ललित का पाप दूर हो गया। उसने दिव्य देह धारण कर ली और उसका राक्षस भाव समाप्त हो गया। उसे पुनः गंधर्व स्वरूप प्राप्त हुआ।
इसके बाद दोनों पति-पत्नी कामदा एकादशी के प्रभाव से पहले की अपेक्षा और भी सुंदर रूप धारण करके विमान पर आरूढ़ हुए और अत्यंत शोभा पाने लगे।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, कामदा एकादशी का व्रत पापों और नकारात्मक कर्मों से मुक्ति की भावना से किया जाता है। इस एकादशी के माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से भी पुण्य प्राप्त होने की मान्यता बताई गई है।
कामदा एकादशी की पूजा विधि
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा - राजेन्द्र! सुनो, मैं तुम्हें इस व्रत की शुभकारक विधि बताता हूँ।
कामदा एकादशी के व्रत की तैयारी दशमी तिथि से करने की परंपरा बताई गई है। दशमी के दिन श्रद्धापूर्वक प्रातःकाल स्नान करें। इसके बाद मध्याह्न में एकाग्रचित्त होकर एक समय भोजन करें और रात्रि में भूमि पर सोने की परंपरा का पालन करें।
एकादशी के दिन प्रातः नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्नान करें। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए श्रद्धापूर्वक व्रत का संकल्प लें।
संकल्प के समय निम्न मंत्र का पाठ किया जाता है -
अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः।
श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत।।
अर्थ: हे कमलनयन भगवान नारायण! आज मैं सभी भोगों का त्याग करके निराहार रहूँगा। हे अच्युत! आप मुझे अपनी शरण प्रदान करें।
इसके बाद शालिग्राम शिला के समक्ष विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करें। धूप, दीप, गंध, पुष्प आदि अर्पित करें और भगवान श्रीहरि का ध्यान एवं मंत्र जाप करें।
अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों का सत्कार करें और उन्हें भोजन कराकर दान-दक्षिणा दें। इसके बाद रात्रि में भगवान हरि के समीप जागरण करने की परंपरा है।
द्वादशी के दिन प्रातः पुनः भगवान श्रीहरि की भक्ति भाव से पूजा करें और अपनी परंपरा तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार व्रत का पारण करें।
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कामदा एकादशी के व्रत में क्या करें?
कामदा एकादशी के दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की पूजा कर सकते हैं। अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार उपवास रखें तथा भगवान का नाम-स्मरण, मंत्र जाप, भजन-कीर्तन और धार्मिक कथा का श्रवण करें।
पूजा के दौरान भगवान विष्णु को धूप, दीप, पुष्प, गंध और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जा सकती है। धार्मिक परंपरा के अनुसार रात्रि में जागरण और भगवान का स्मरण करने का भी महत्व बताया गया है।
अगले दिन द्वादशी तिथि में भगवान श्रीहरि की पूजा करने के बाद विधिपूर्वक व्रत का पारण करें।
व्रत के नियम अलग-अलग परंपराओं में भिन्न हो सकते हैं। इसलिए अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए व्रत के नियमों का पालन करना उचित है।
कामदा एकादशी का धार्मिक महत्व
कामदा एकादशी को भगवान विष्णु की भक्ति और पापों से मुक्ति की भावना से जुड़ी महत्वपूर्ण एकादशी माना जाता है। इसकी व्रत कथा में ललिता द्वारा अपने पति ललित के उद्धार के लिए कामदा एकादशी का व्रत करने का वर्णन मिलता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत के प्रभाव से ललित को राक्षस योनि से मुक्ति मिली और उसका पूर्व गंधर्व स्वरूप वापस प्राप्त हुआ। इसी कारण कामदा एकादशी को संकट, पाप और नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति की कामना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, मंत्र जाप, कथा श्रवण और रात्रि जागरण को विशेष महत्व दिया जाता है।
कामदा एकादशी व्रत का पारण
कामदा एकादशी के व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। द्वादशी के दिन प्रातः भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद स्थानीय पंचांग में दिए गए पारण समय के अनुसार व्रत खोलना उचित माना जाता है।
पारण का समय स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए 2027 में व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को अपने शहर के पंचांग के अनुसार पारण समय की पुष्टि करनी चाहिए।
कामदा एकादशी चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली महत्वपूर्ण एकादशी है। इसकी व्रत कथा में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई ललिता और ललित की कथा का वर्णन मिलता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, कामदा एकादशी का व्रत पापों से मुक्ति, भगवान विष्णु की कृपा और मनोकामनाओं की पूर्ति की भावना से किया जाता है। श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की पूजा, व्रत, मंत्र जाप, कथा श्रवण और जागरण करते हैं।