जया एकादशी 2027 में कब है?
माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। वर्ष 2027 में जया एकादशी का व्रत 17 फरवरी 2027, बुधवार को रखा जाएगा।
जया एकादशी 2027: तिथि और समय
जया एकादशी का व्रत 17 फरवरी 2027, बुधवार को रखा जाएगा। यह एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष में आती है। पंचांग के अनुसार जया एकादशी की तिथि 16 फरवरी की रात्रि से शुरू होकर 17 फरवरी की शाम तक रहेगी।
जया एकादशी 2027 की तिथि और समय:
• जया एकादशी व्रत: 17 फरवरी 2027, बुधवार
• एकादशी तिथि प्रारंभ: 16 फरवरी 2027, रात 8:21 बजे
• एकादशी तिथि समाप्त: 17 फरवरी 2027, शाम 5:34 बजे
जया एकादशी का महत्त्व
युधिष्ठिर ने पूछा- भगवन्! कृपा करके यह बताइये कि शुक्ल पक्ष में कौन-सी एकादशी होती है? उसकी विधि क्या है तथा इस एकादशी में किस देवता की पूजा की जाती है?
भगवान श्रीकृष्ण बोले - राजेन्द्र! माघ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, उसका नाम जया एकादशी है। इसे पापों का नाश करने वाली और पवित्र करने वाली एकादशी माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह व्रत भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है तथा ब्रह्महत्या जैसे गंभीर पाप और पिशाचत्व से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।
जया एकादशी की कथा में भगवान विष्णु की भक्ति और एकादशी व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से मुक्ति मिलने का वर्णन मिलता है। इसलिए श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की पूजा, व्रत, नाम-स्मरण और जागरण करते हैं।
एकादशी व्रत की उत्पत्ति, इसकी पौराणिक कथा और भगवान विष्णु से जुड़े धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानने के लिए: - हमारा एकादशी की उत्पत्ति लेख पढ़ें।
जया एकादशी की व्रत कथा
एक समय की बात है, स्वर्गलोक में देवराज इन्द्र राज्य करते थे। देवगण पारिजात वृक्षों से भरे हुए नन्दनवन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे। पचास करोड़ गन्धर्वों के नायक देवराज इन्द्र ने स्वेच्छानुसार वन में विहार करते हुए बड़े हर्ष के साथ नृत्य का आयोजन किया।
इस आयोजन में गन्धर्व गान कर रहे थे, जिनमें पुष्पदन्त, चित्रसेन तथा उसका पुत्र प्रमुख थे। चित्रसेन की पत्नी का नाम मालिनी था। मालिनी से एक कन्या उत्पन्न हुई थी, जो पुष्पवन्ती के नाम से प्रसिद्ध थी। पुष्पदन्त गन्धर्व का एक पुत्र था, जिसे लोग माल्यवान् के नाम से जानते थे।
माल्यवान् पुष्पवन्ती के रूप पर अत्यन्त मोहित था। ये दोनों इन्द्र के संतोष के लिए नृत्य करने के उद्देश्य से वहाँ आए थे। इनके साथ अप्सराएँ भी थीं। परस्पर अनुराग के कारण दोनों मोह के वशीभूत हो गए और उनका मन विचलित हो गया। इस कारण वे ठीक प्रकार से गान नहीं कर सके। कभी ताल भंग हो जाता और कभी गीत रुक जाता।
इन्द्र ने उनके इस प्रमाद को अपना अपमान समझकर क्रोधित होकर दोनों को शाप दे दिया। उन्होंने कहा कि तुम दोनों पतित होकर पति-पत्नी के रूप में पिशाच योनि को प्राप्त हो जाओ।
इन्द्र के शाप से दोनों अत्यन्त दुःखी हुए और हिमालय पर्वत पर चले गए। वहाँ पिशाच योनि प्राप्त होने के कारण वे भयंकर कष्ट भोगने लगे। वे पर्वत की कन्दराओं में विचरण करते हुए अपने पूर्व कर्मों और पिशाच योनि के दुःख से पीड़ित रहने लगे।
एक दिन पिशाच ने अपनी पत्नी पिशाची से कहा- हमने कौन-सा पाप किया है, जिसके कारण हमें यह पिशाच योनि प्राप्त हुई? नरक का कष्ट अत्यन्त भयंकर है और पिशाच योनि भी बहुत दुःख देने वाली है। इसलिए हमें आगे पापों से बचने का प्रयास करना चाहिए।
इस प्रकार दोनों दुःख में जीवन व्यतीत कर रहे थे। दैवयोग से उन्हें माघ मास की जया एकादशी प्राप्त हुई। उस दिन दोनों ने सभी प्रकार के आहार का त्याग कर दिया। उन्होंने जल भी ग्रहण नहीं किया और किसी जीव की हिंसा नहीं की। वे दुःख से पीड़ित होकर एक पीपल के वृक्ष के समीप बैठे रहे।
सूर्यास्त के बाद रात्रि हुई। उन्हें नींद नहीं आई और उन्होंने पूरी रात जागकर बिताई। अगले दिन द्वादशी का समय आया। इस प्रकार उनसे जया एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण अनजाने में ही पूर्ण हो गया।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जया एकादशी के व्रत के प्रभाव और भगवान विष्णु की कृपा से दोनों की पिशाच योनि समाप्त हो गई। पुष्पवन्ती और माल्यवान् अपने पूर्व स्वरूप में वापस आ गए। उनके शरीर पर पहले की तरह आभूषण सुशोभित होने लगे और वे दोनों विमान पर बैठकर स्वर्गलोक पहुँचे।
वहाँ उन्होंने देवराज इन्द्र को प्रणाम किया। उन्हें अपने पूर्व स्वरूप में देखकर इन्द्र को आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा कि किस पुण्य के प्रभाव से उनका पिशाचत्व समाप्त हुआ।
माल्यवान् ने बताया कि भगवान वासुदेव की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिली है।
इन्द्र ने कहा कि जो लोग एकादशी व्रत में तत्पर रहते हैं और भगवान श्रीकृष्ण की शरण में रहते हैं, वे पूजनीय हैं। इसके बाद दोनों को स्वर्ग में सम्मान प्राप्त हुआ।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी कारण जया एकादशी को पापों से मुक्ति और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने वाली महत्वपूर्ण एकादशी माना जाता है।
जया एकादशी की पूजा विधि
जया एकादशी के व्रत की तैयारी दशमी तिथि से शुरू करने की परंपरा बताई गई है। दशमी के दिन प्रातः स्नान करके श्रद्धापूर्वक पूजा करें और मध्याह्न में एक समय भोजन करें। रात्रि में भूमि पर सोने की परंपरा भी बताई गई है।
एकादशी के दिन प्रातः नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्नान करें और भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। संकल्प के समय निम्न मंत्र का पाठ किया जाता है-
अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः।
श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत।।
अर्थ: हे कमलनयन भगवान नारायण! आज मैं सभी भोगों का त्याग करके निराहार रहकर कल भोजन करूंगा। हे अच्युत! आप मुझे अपनी शरण प्रदान करें।
इसके बाद भगवान हरि का धूप, गंध, पुष्प आदि से पूजन करें। भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के मंत्रों का जाप करें और अपनी श्रद्धा के अनुसार भजन-कीर्तन करें।
जया एकादशी की रात भगवान विष्णु के समीप जागरण करने की परंपरा भी बताई गई है। अगले दिन द्वादशी तिथि में भगवान श्रीहरि की पुनः पूजा करें। इसके बाद अपनी परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार पारण करें तथा सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान-दक्षिणा दें।
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जया एकादशी के व्रत में क्या करें?
जया एकादशी के दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की पूजा कर सकते हैं। अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखें तथा भगवान का नाम-स्मरण, मंत्र जाप, भजन-कीर्तन और धार्मिक कथा का श्रवण करें।
रात्रि में जागरण करने की परंपरा है। अगले दिन द्वादशी तिथि में भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद विधिपूर्वक व्रत का पारण किया जाता है।
व्रत के नियम व्यक्ति की परंपरा, स्वास्थ्य और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए कठिन उपवास करने से पहले अपनी शारीरिक स्थिति का ध्यान रखना चाहिए।
जया एकादशी का धार्मिक महत्व
जया एकादशी को भगवान विष्णु की भक्ति और एकादशी व्रत की परंपरा से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। इसकी कथा में माल्यवान् और पुष्पवन्ती के पिशाच योनि से मुक्त होने का वर्णन मिलता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जया एकादशी का व्रत पापों के नाश, भगवान विष्णु की कृपा और आध्यात्मिक शुद्धि की भावना से किया जाता है। इस दिन व्रत, पूजा, मंत्र जाप, भगवान का नाम-स्मरण और कथा श्रवण को विशेष महत्व दिया जाता है।
जया एकादशी व्रत का पारण
जया एकादशी के व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। पारण के लिए स्थानीय पंचांग में दिए गए समय का पालन करना उचित माना जाता है। भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद अपनी परंपरा के अनुसार भोजन ग्रहण करके व्रत पूर्ण किया जाता है।
जया एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली महत्वपूर्ण एकादशी है। इसकी व्रत कथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा युधिष्ठिर को सुनाई गई कथा के रूप में वर्णित है। माल्यवान् और पुष्पवन्ती की कथा में जया एकादशी के व्रत और भगवान विष्णु की भक्ति के धार्मिक प्रभाव का वर्णन मिलता है।
श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की पूजा, व्रत, मंत्र जाप, कथा श्रवण और जागरण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जया एकादशी का व्रत पापों से मुक्ति और भगवान की कृपा प्राप्त करने की भावना से किया जाता है।