अपरा एकादशी 2026 में कब है?
अपरा एकादशी 2026 में 13 मई, बुधवार को पड़ रही है। अपरा एकादशी तिथि के आधार पर होती है,
इस दिन व्रत और पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
एकादशी तिथि प्रारंभ: 12 मई 2026 को दोपहर 2:52 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 13 मई 2026 को दोपहर 1:32 बजे
एकादशी के दिन शुभ मुहूर्त में पूजा करने से अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है। जो श्रद्धालु एकादशी व्रत रखते हैं, वे इसकी तैयारी एक दिन पहले से ही शुरू कर देते हैं, ताकि व्रत और पूजा विधि विधिपूर्वक संपन्न हो सके।
एकादशी पूजन एवं व्रत तिथि के अनुसार किया जाता है और यह आधुनिक कैलंडर में हर साल बदल जाती है। एकादशी 2025 में 23 मई को थी और एकादशी 2027 में 1 जून को पड़ेगी।
यदि आप अपरा एकादशी का सटीक शुभ मुहूर्त जानना चाहते हैं, तो आप हमारे अनुभवी आचार्य से परामर्श ले सकते हैं। पूजा के लिए सही मुहूर्त जानने के लिए अभी आचार्य जी से बात करें।
एकादशी के दिन पूजा करते समय कुछ अशुभ काल से बचना चाहिए, जैसे:
• राहुकाल
• यमगंड काल
• गुलिक काल
अशुभ काल के सही समय को जानने के लिए हमारा पंचांग अवश्य देखें।
ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी का महत्व
युधिष्ठिर ने श्री कृष्ण जी से पूछा -जनार्दन! ज्येष्ठ के कृष्ण पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? मैं उसका महत्त्व सुनना चाहता हूँ। उसे बताने की कृपा करें। भगवान श्री कृष्ण बोले- राजन! तुमने संपूर्ण लोको के हित के लिए बहुत उत्तम बात पूछी है।
राजेंद्र! इस एकादशी का नाम अपरा एकादशी या वैष्णव अपरा एकादशी है। यह बहुत पुण्य प्रदान करने वाली और बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली है। ब्रह्म हत्या से दबा हुआ, गौ हत्या करने वाला, गर्भस्थ बालक को मारने वाला, पर निंदक तथा पर-स्त्री लम्पट पुरुष भी अपरा एकादशी के सेवन से निश्चित ही पाप रहित हो जाता है।
जो झूठी गवाही देता, माप तौल में धोखा देता, बिना जाने ही नक्षत्रों की गणना करता और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैध का काम करता है, ये सब नरक में निवास करने वाले प्राणी है। परंतु अपरा एकादशी के सेवन से वे सभी पाप रहित हो जाते हैं। यदि क्षत्रिय क्षात्र धर्म का परित्याग करके युद्ध से भागता है, तो वह क्षत्रियोचित धर्म से भ्रष्ट होने के कारण घोर नरक में पड़ता है।
जो शिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही गुरु की निंदा करता है, वह भी महापाप से युक्त होकर भयंकर नरक में गिरता है। किन्तु अपरा एकादशी के सेवन से ऐसे मनुष्य भी सद्गति को प्राप्त होते है।
माघ में जब सूर्य मकर राशि पर स्थित हों, उस समय प्रयाग में स्नान करने वाले मनुष्यों को जो पुण्य प्राप्त होता है, काशी में शिवरात्रि का व्रत करने से जो पुण्य प्राप्त होता है,
गया में पिण्डदान करके पितरों को तृप्ति प्रदान करने वाला पुरुष जिस पुण्य का भागी होता है, बृहस्पति के सिंह राशि पर स्थित होने पर गोदावरी में स्नान करने वाला मानव जिस फल को प्राप्त करता है,
बदरिकाश्रम की यात्रा के समय भगवान् केदार के दर्शन से तथा बदरीतीर्थ के सेवन से जो पुण्य फल उपलब्ध होता है तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दक्षिणा सहित यज्ञ करके हाथी, घोड़ा और सुवर्ण-दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है ;अपरा एकादशी के सेवन से भी मनुष्य वैसे ही फल प्राप्त करता है।
'अपरा' को उपवास करके भगवान् वामन की पूजा करने से मनुष्य सब पापो से मुक्त हो श्री विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। इसको पढ़ने और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है।
एकादशी पूजा विधि
कृष्ण जी बोले- राजेंद्र! सुनो, मैं तुम्हें इस व्रत की शुभ कारक विधि बतलाता हूँ ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्ष में दशमी के उत्तम दिन को श्रद्धा युक्त चित्त से प्रातः काल स्नान करे । फिर एकाग्र चित्त हो एक समय भोजन करें तथा रात्रि में भूमि पर सोए रात के अंत में निर्मल प्रभात होने पर एकादशी के दिन नित्यकर्म करके स्नान करे इसके बाद भक्ति भाव से निम्नांकित मंत्र पढ़ते हुए उपवास का नियम ग्रहण करें-
अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः।
श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं में भवाच्युत।।
'कमलनयन भगवान, नारायण! आज मैं सब भोगों से अलग हो निराहार रहकर कल भोजन करूंगा । अच्युत ! आप मुझे शरण दे। फिर धूप और गंध आदि से भगवान हरि केश का पूजन करके रात्रि में उनके समीप जागरण करे । तत्पश्चात सवेरा होने पर द्वादशी के दिन पुन: भक्ति पूर्वक श्री हरि की पूजा करें। उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन करा कर भाई- बंधु, नाती और पुत्र आदि के साथ स्वयं मौन होकर भोजन करें।
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