फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी कहा जाता है। सनातन धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित इस एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। आमलकी एकादशी को आंवला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस एकादशी का संबंध भगवान विष्णु और आंवले के पवित्र वृक्ष से है। धार्मिक मान्यताओं में आंवले के वृक्ष को भगवान विष्णु का प्रिय माना गया है। इसलिए आमलकी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ आंवले के वृक्ष की पूजा और प्रदक्षिणा का भी विशेष महत्व बताया गया है।
आमलकी एकादशी 2027 कब है?
आमलकी एकादशी 2027 में 18 मार्च, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 18 मार्च 2027 को सुबह 4:24 बजे शुरू होकर 19 मार्च 2027 को सुबह 1:53 बजे समाप्त होगी।
आमलकी एकादशी 2027: 18 मार्च 2027, गुरुवार
एकादशी तिथि प्रारंभ: 18 मार्च 2027, सुबह 4:24 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 19 मार्च 2027, सुबह 1:53 बजे
तिथि और पारण का समय स्थान के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है।
व्रत एवं पारण के लिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता दें।
फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी का महत्व
युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण जी से कहा- फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम और महत्त्व बताने की कृपा कीजिए।
भगवान श्रीकृष्ण बोले- धर्म नंदन सुनो, तुम्हें इस समय वह प्रसंग सुनाता हूँ, जिसे राजा मान्धाता के पूछने पर महात्मा वसिष्ठ ने कहा था। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम आमलकी है। इसका पवित्र व्रत विष्णु लोक की प्राप्ति कराने वाला माना जाता है। मान्धाता ने पूछा- यह आमलकी की उत्पत्ति कब हुई, मुझे बताइए।
आमलकी एकादशी की कथा
वसिष्ठ जी ने कहा- आमलकी महान वृक्ष है, जो सब पापों का नाश करने वाला माना जाता है। भगवान विष्णु के थूकने पर उनके मुख से चंद्रमा के समान कान्तिमान एक बिंदु प्रकट हुआ। वह बिंदु पृथ्वी पर गिरा। उसी से आमलकी यानी आंवले का महान वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसे सभी वृक्षों का आदि भूत कहा गया है।
इसी समय समस्त प्रजा की सृष्टि करने के लिए भगवान ने ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया। उन्हीं से इन प्रजाओं की सृष्टि हुई। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग तथा निर्मल अंत:करण वाले महाऋषियों को ब्रह्मा जी ने जन्म दिया।
उनमें से देवता और ऋषि उस स्थान पर आए, जहां विष्णु प्रिय आमलकी का वृक्ष था। उस वृक्ष की ओर देखने लगे और खड़े-खड़े सोचने लगे। सभी वृक्ष हमारे परिचित हैं, किन्तु उस वृक्ष को हम नहीं जानते हैं।
उन्हें इस प्रकार चिंता करते देखकर आकाशवाणी हुई- महाऋषियो! यह सर्वश्रेष्ठ आमलकी का वृक्ष है, जो विष्णु को प्रिय है। इसके स्मरण मात्र से गोदान का फल मिलता है, स्पर्श करने से दोगुना और फल खाने से तीन गुना पुण्य प्राप्त होता है।
इसके मूल में विष्णु, इसके ऊपर ब्रह्मा, स्कंध में परमेश्वर भगवान रुद्र, शाखाओं में मुनि, टहनियों में देवता, पत्तों में वसु, फूलों में मरुद्गण तथा फलों में समस्त प्रजापति वास करते हैं।
ऋषि बोले- भगवान! आप संतुष्ट हैं तो हम लोगों के हित के लिए कोई ऐसा व्रत बतलाइए, जो स्वर्ग और मोक्ष रूपी फल प्रदान करने वाला हो।
विष्णु बोले- फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में यदि पुष्य नक्षत्र से युक्त द्वादशी हो तो वह महान पुण्य देने वाली और बड़े-बड़े पापों को नाश करने वाली होती है। भगवान विष्णु ने कहा- इस व्रत की जो उत्तम विधि है, उसको श्रवण करो। संपूर्ण तीर्थों के सेवन से जो पुण्य प्राप्त होता है तथा सब प्रकार के दान देने से जो फल मिलता है, वह सब उपयुक्त विधि के पालन से सुलभ होता है।
वशिष्ठ जी कहते हैं- महाराज! इतना कहकर देवेश्वर भगवान विष्णु वहीं अंतर्धान हो गए। तत्पश्चात समस्त महाऋषियों ने उक्त व्रत का पूर्ण रूप से पालन किया। इसी प्रकार तुम्हें भी इस व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए।
एकादशी व्रत की उत्पत्ति, इसकी पौराणिक कथा और भगवान विष्णु से जुड़े धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानने के लिए: -हमारा एकादशी की उत्पत्ति लेख पढ़ें।
आमलकी एकादशी की पूजा विधि
एकादशी के दिन प्रातःकाल नित्यकर्म करके संकल्प करें कि मैं एकादशी को निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन करूंगा। आप मुझे अपनी शरण में रखें।
विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह परशुराम जी की स्वर्ण प्रतिमा बनवाएं। प्रतिमा अपनी शक्ति और धन के अनुसार सुवर्ण की होनी चाहिए। स्नान आदि करके पूजा और हवन करें।
इसके बाद सभी प्रकार की सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष के नीचे जाएं। नवीन कलश की स्थापना करें। कलश में पंचरत्न और दिव्य गन्ध आदि छोड़ दें। जलते हुए दीपकों की श्रेणी सजाकर रखें।
कलश के ऊपर स्वर्ण निर्मित परशुराम जी की मूर्ति की स्थापना करें। पूजा के लिए नवीन छाता, जूता और वस्त्र भी मंगाकर रखें और वहीं रात्रि व्यतीत करें।
इसके बाद भगवान विष्णु का नाम लेकर आमलकी वृक्ष की परिक्रमा 108 या 28 बार करें। फिर सवेरा होने पर श्रीहरि की आरती करें। ब्राह्मण की पूजा करके वहां की सभी सामग्री उन्हें अर्पित कर दें।
परशुराम जी के वस्त्र, जूता आदि सभी वस्तुएं दान कर दें। तत्पश्चात आमलकी का स्पर्श करके उसकी प्रदक्षिणा करें और स्नान करने के बाद विधिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराएं और साथ बैठकर स्वयं भी भोजन करें।
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आमलकी एकादशी का धार्मिक महत्व
आमलकी एकादशी को भगवान विष्णु और आंवले के पवित्र वृक्ष से संबंधित महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आंवले के वृक्ष में विभिन्न देवी-देवताओं का वास माना गया है और इसे भगवान विष्णु का प्रिय वृक्ष बताया गया है।
इसी कारण आमलकी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ आंवले के वृक्ष की पूजा, स्पर्श और प्रदक्षिणा करने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।
इस व्रत को श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से धार्मिक पुण्य की प्राप्ति और भगवान विष्णु की कृपा मिलने की मान्यता है।
आमलकी एकादशी पर क्या करें?
आमलकी एकादशी के दिन भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार भगवान विष्णु की पूजा और व्रत कर सकते हैं।
• प्रातःकाल स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
• भगवान विष्णु और श्रीहरि का पूजन करें।
• आंवले के वृक्ष की पूजा करें।
• भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें।
• एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करें।
• अपनी क्षमता के अनुसार उपवास या फलाहार करें।
• आंवले के वृक्ष की प्रदक्षिणा करें।
• रात्रि में भगवान विष्णु का स्मरण और भजन-कीर्तन करें।
• द्वादशी के दिन उचित समय पर पारण करें।
• अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य करें।
आमलकी एकादशी व्रत में आंवले के वृक्ष का महत्व
आमलकी एकादशी की धार्मिक परंपरा में आंवले के वृक्ष को विशेष महत्व दिया गया है। पौराणिक कथा के अनुसार, आमलकी वृक्ष को भगवान विष्णु का प्रिय माना गया है और इसके विभिन्न भागों में देवी-देवताओं के निवास का वर्णन मिलता है।
इसी कारण इस एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे पूजा करना, उसकी प्रदक्षिणा करना और श्रद्धापूर्वक उसका पूजन करना धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
आमलकी एकादशी का व्रत क्यों रखा जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आमलकी एकादशी का व्रत पापों से मुक्ति, धार्मिक पुण्य और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने की कामना से किया जाता है।
इस व्रत से जुड़ी कथा में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति और उसके धार्मिक महत्व का वर्णन मिलता है। इसलिए भक्त इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ आंवले के वृक्ष की आराधना भी करते हैं।
व्रत और पूजा आस्था का विषय हैं, इसलिए इन्हें अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार करना चाहिए।
आमलकी एकादशी 2027 में 18 मार्च, गुरुवार को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि 18 मार्च सुबह 4:24 बजे शुरू होकर 19 मार्च सुबह 1:53 बजे समाप्त होगी। स्थान के अनुसार तिथि और पारण के समय में अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना उचित है।
आमलकी एकादशी भगवान विष्णु और आंवले के पवित्र वृक्ष से जुड़ा महत्वपूर्ण व्रत है। इसकी पौराणिक कथा में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति और उसके धार्मिक महत्व का वर्णन मिलता है। भक्त इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, कथा श्रवण और आंवले के वृक्ष की पूजा करके अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
आमलकी एकादशी भक्तों को भक्ति, संयम और धार्मिक आचरण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।