पृथ्वीलोक और यमलोक के बीच की दूरी छियासी हजार योजन(1 योजन = 12.8 कि.मी) है। मरने के बाद वह जीव एक दिन में अधिक से अधिक दो सौ सैंतालीस योजन और आधा कोस का मार्ग ही तय करने में सक्षम होता है। इस गति से चलने के कारण वह जीव तीन सौ अड़तालीस दिनों में यमलोक पहुँच पाता है।
इस यात्रा के दौरान यमदूत उस जीव को खीचते हुए ले जाते है। जो प्राणी अपने जीवन में पाप करते है, मनुष्य शरीर रहते हुए कोई पुण्य अर्जित नहीं कर पाते है, केवल अपने पुत्र, पत्नी और सगे संबंधियों के स्वार्थ हेतु लगे रहते है, उन्हे इस मार्ग में कष्ट भोगना पड़ता है। प्राणी मरने के बाद तेरह दिनों तक अपने घर पर ही विचरण करता है तथा तेरहवें दिन यमदूत अपनी शक्ति से बनाए गए रस्सी के घेरे में उस जीव को बाँध लेते है।
बहुत क्रोधित होकर डंडे से प्रहार करते हुए उसे खीचकर दक्षिण दिशा में स्थित यमलोक की ओर ले जाते है। वह मार्ग कुश, काँटों, बाँबियों, कीलों और कठोर पत्थरों से भरा हुआ होता है। उस मार्ग में अग्नि दहकती रहती है। सूर्य की प्रचंड गर्मी और मच्छरों से भरे उस मार्ग में यमदूत प्राणी को मारते पीटते और घसीटते हुए ले जाते है।
जिसने अपने जीवन में पाप के अलावा कुछ भी सत्यकर्म नहीं किए , केवल पाप ही कमाया है वह पापी यमलोक के भयानक कष्टों और पीड़ा से भरे हुए मार्ग में जाता है और शरीर के जलने के कारण वह बहुत कमजोर हो जाता है। कर्मों के अनुसार उस प्राणी के अंगों को जानवर खाते है, मार्ग में उसे भेदा जाता है उसके शरीर में छेदन किया जाता है जिससे उस शरीर को बहुत पीड़ा सहन करना पड़ता है। जीव अपने कर्म के अनुसार शरीर प्राप्त करके अनेकों प्रकार के कष्ट भोगता है।
दारुण पीड़ा से भरे यमलोक के इस मार्ग में सोलह पुर (नगर) पड़ते है-याम्य, सौरिपुर, नगेन्द्रभवन, गंधर्वपुर, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्र भवन, बाह्यपद, दुःखद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीताढय और बहुभीति । जीव को जब यमदूतों द्वारा घसीट कर लाया जाता है तो वह जीव इन्ही सोलह पुरो को पार करते हुए यमलोक में प्रवेश करता है।
यमदूतों के साथ पहले याम्यपुर में प्रवेश करके वह जीव ‘हे पुत्र! मेरी रक्षा करो’ ‘मेरी रक्षा करो’ ऐसी करुणा भरी पुकार लगाता हुआ, दया की गुहार लगाता है और रोते हुए अपने द्वारा किये गए पापों को याद करता है और अठारहवें दिन वह यमराज के उस नगर में अर्थात याम्यपुरी पहुँच जाता है।
वहाँ पुष्प भद्रा नामक नदी बहती है उस नदी के पास एक बहुत ही सुंदर बरगद का वृक्ष होता है जहाँ वह जीव विश्राम करना चाहता है पर यमदूत उसे वहाँ विश्राम नहीं करने देते।
उसके पुत्र के द्वारा प्रेमपूर्वक अथवा अन्य किसी के द्वारा प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वी पर जो मासिक पिण्डदान दिया जाता है, उसी को वह जीव वहाँ पर खाता है।
उसके बाद वहाँ से उसकी यात्रा सौरिपुर के लिये होती है। चलते समय यम के दूत उसे मुग्दर से पीटते हैं। उस दुःख से अत्यंत व्यथित होकर वह इस प्रकार विलाप करता है-
जलाशायो नैव कृतो मया तदा मनुष्यतृप्यै पशुपक्षितृप्तये।
गोतृप्तिहेतोर्न च गोचरः कृतः शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम्॥
उस जन्म में मनुष्य और पशु-पक्षियों की प्यास-संतुष्टि के लिये मैंने जलाशय नहीं खुदवाया। गायों की भूख-शान्ति के लिये चरागाह का दान भी नहीं दिया। अतः हे शरीर। जैसा तुमने कर्म किया है उसी के अनुसार अब तुम अपना निपटारा करो।
उस सौरिपुर में कामरूपधारी अपनी इच्छा के अनुसार सदा एक स्थिति में रहनेवाला एवं निरंतर चलने वाला राजा राज्य करता है उसका दर्शन करने से जीव डर से काँप जाता है और अपने अहित होने के संदेह से ग्रसित होकर ऐसा जानकर की मेरे पक्ष में कोई बोलने वाला नहीं है, वह जीव अपने पुत्र और स्वजनों के द्वारा पृथ्वी पर दिये गये जलयुक्त पिण्डको खाकर आगे चल देता है। वहाँ से वह आगे बढ़ता है और रास्ते में यमदूतों की तलवारों का बहुत आक्रमण सहता है और इस प्रकार बड़बड़ाता है-
न नित्यदानं न गवाह्निकं कृतं पुस्तं च दत्तं न हि वेदशास्त्रयोः ।
पुराणदृष्टो न हि सेवितोऽध्वा शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम् ॥
हे शरीर! मैंने जलआदि का कभी भी दान नहीं दिया है, न तो नियम से प्रतिदिन गाय को खिलाने के लिए गोग्रास आदि का कर्म किया है और न तो वेदों की पुस्तक का ही दान किया है। मैंने पुराणों में बताये हुए मार्ग (तीर्थ आदि) का अनुसरण नहीं किया है, अत: हे शरीर! जैसा तूने किया है, उसी में अपना उद्धार कर।
इसके बाद जीव 'नगेन्द्रनगर' में जाता है। वहाँ वह दूसरे महीने में अपने बंधुओं द्वारा दिया गया खाना खाता है और आगे बढ़ता है। जब चलते समय यमदूत उस पर कृपाण मुक्कों से आक्रमण करते हैं तो वह इस प्रकार बड़बड़ाता है-
पराधीनमभूत् सर्वं मम मूर्खशिरोमणेः ।।
महता पुण्ययोगेन मानुष्यं लब्धवानहम् ।
महान पुण्य करने के बाद मुझे मनुष्य शरीर की प्राप्ति हुई, लेकिन मैं राजभोग में ही लगा रहा और उसी के वश में रहा तथा मनुष्य शरीर प्राप्त करने के बाद भी मैं कोई अच्छे कर्म नहीं कर सका।
इस प्रकार तीसरा महीना समाप्त होते ही शोकग्रस्त आत्मा ‘गंधर्वनगर’ पहुंच जाती है। इसके बाद वहां चढ़ाए गए तीसरे मासिक पिंड को खाकर वह फिर आगे बढ़ता है। रास्ते में यमदूत उस पर अपनी कटार की नोक से प्रहार करते हैं, जिससे वह घायल हो जाता है और असहनीय दर्द से चिल्लाते हुए कहता है-
मया न दत्तं न हुतं हुताशने तपो न तप्तं हिमशैलगह्वरे ।
न सेवितं गाङ्गमहो महाजलं शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम् ॥
मैंने न तो कोई दान दिया है, न अग्नि में आहुति दी है, न ही हिमालय की किसी गुफा में जाकर तपस्या की है। अरे! मैं इतना नीच हूँ कि मैंने परम पवित्र गंगा जल का भी सेवन नहीं किया, इसलिये हे शरीर !अपने कर्मों के अनुसार स्वयं का निपटान करो।
चौथे मास में जीव ‘शैलागमपुर’ पहुँच जाता है। वहाँ पर लगातार पत्थरों की बारिश होती रहती है। पुत्र द्वारा दिये गये चतुर्थ मासिक श्राद्ध को ग्रहण कर जीव सरक-सरक कर चलता है, परन्तु पत्थरों की मार खाकर गिर पड़ता है और रोते हुए यह कहता है-
न ज्ञानमार्गो न च योगमार्गों न कर्ममार्गो न च भक्तिमार्गः ।
न साधुसङ्गात् किमपि श्रुतं मया शरीर हे निस्तर यत् त्वया कृतम् ॥
मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन में न तो ज्ञान का मार्ग अपनाया, न योग का, न कर्म का, न भक्ति का मार्ग, न साधु-संतों की संगति करके उनसे केवल कुछ अनुकूल बातें ही सुनी हैं। अतः हे शरीर! फिर अपने आप को उसी के अनुसार निपटाएं जैसा तुमने किया है।
मृत्यु के पाँचवें मास से कुछ दिन पहले ही वह जीव 'क्रौंचपुर' पहुँच जाता है, उस समय पुत्र या स्वजनों के द्वारा दिये गये उन षाण्मासिक श्राद्ध के पिण्ड और जल का सेवन करके वहाँ थोड़ी देर आराम करता है।
इसके बाद छठे मास में जीव 'क्रूरपुर' की ओर चल देता है। मार्ग में वह पृथ्वीपर दिये गये पांचवें मासिक पिण्ड को खाकर जलपान करता है। उसके बाद वह पुनः क्रूर पुर की ओर बढ़ता है, लेकिन रास्ते में यमदूत उस पर पट्टियों (विशेष हथियार) से प्रहार करते है, जिससे वह गिर जाता है और इस प्रकार बड़बड़ाता है-
हा मातर्हा पितर्भातः सुता हा हा मम स्त्रियः ॥
युष्माभिर्नोपदिष्टोऽह- मवस्थां प्राप्त ईदृशीम्।
हे मेरे माता-पिता और भाइयों! हे मेरे बेटे! हे मेरी पत्नी! आप लोगों ने मुझे ऐसी कोई सलाह न दी, जिससे मैं उन दुष्कर्मों से बच पाता, जिसके कारण मेरी यह हालत हुई।
उस प्राणी का इस प्रकार विलाप सुनकर यमदूत उस प्राणी से कहते हैं- अरे मूर्ख! तुम्हारी माँ कहाँ है, तुम्हारे पिता कहाँ हैं, तुम्हारी पत्नी कहाँ है, तुम्हारा बेटा कहाँ है और तुम्हारे मित्र कहाँ हैं? तुम अकेले ही चलो और इस मार्ग पर अपने दुष्कर्मों का फल भोगो। हे मूर्ख ! तू जान ले इस मार्ग में चलने वाले लोगों को दूसरे की शक्ति का भरोसा करना बेकार है।
परलोक में जाने के लिए किसी और के सहारे की जरूरत नहीं होती। वहाँ स्वयं अर्जित किये गए पुण्य ही साथ देते है। तुम्हारा तो उसी मार्ग से जाना तय है, जिस मार्ग में किसी खरीदने और बेचने वाले के द्वारा भी आवश्यक सुख-साधन को जुटाया नहीं जा सकता।
इसके बाद जीव 'विचित्रनगर' की ओर प्रस्थान करता है। रास्ते में यमदूत उसे काटों द्वारा घात करते है, घात पर घात होने से उसे अत्यंत पीड़ा सहनी पड़ती है जिससे वह दुःखी होकर इस प्रकार कराहते हुए कहता है-
कुत्र यामि न हि गामि जीवितं हा मृतस्य मरणं पुनर्न वै।
हाय! मैं कहाँ जा रहा हूँ, ये असहनी पीड़ा मुझसे सहन नहीं होती। मैं निश्चित रूप से अब जीवित नहीं रहना चाहता, फिर भी मैं जीवित हूँ। मरा हुआ प्राणी दोबारा नहीं मरता।
इस प्रकार कराहते हुए जीव यातना का शरीर धारण करता है और 'विचित्रनगर' में चला जाता है। जहां विचित्र नाम का राजा राज्य करता है। वहां वह षणमासिक पिंड से अपनी भूख मिटाता है और अगले नगर की ओर चल देता है। रास्ते में यमदूत उस पर भाले से हमला कर देते हैं, जिससे वह घायल हो जाता है, घायल होकर तड़पते हुए कहता है-
माता भ्राता पिता पुत्रः कोऽपि मे वर्तते न वा।
यो मामुद्धरते पापं पतन्तं दुःखसागरे ॥
क्या मेरे माता-पिता, भाई या पुत्रों में से कोई है? जो मुझ पापी को इस दुःख के सागर में डूबने से बचा सके?
जीव इसी प्रकार कराहता हुआ मार्ग पर चलता रहता है। उसी मार्ग पर 'वैतरणी' नाम की एक नदी है, जो सौ योजन चौड़ी है और खून और मवाद से भरी हुई है। जैसे ही मृतक उस नदी के किनारे पहुँचता है तो वहाँ मौजूद नाविक और मल्लाह उसे देखकर कहते हैं कि यदि तुमने वैतरणी गाय का दान किया है तो इस नाव पर बैठ जाओ और खुशी-खुशी इस नदी को पार कर जाओ। इस नदी को वही सुखपूर्वक पार कर सकता है जिसने वैतरणी नामक गाय का दान किया हो।
जिसने वैतरणी गाय का दान नहीं किया हो, उसे नाविक हाथ पकड़कर घसीटते हुए ले जाते हैं। कौआ, बगुला और उल्लू नामक पक्षी अपनी तीखी और नुकीली चोंचों से उसे अपने आक्रमणों से बहुत पीड़ा पहुँचाते है। अंत समय आने पर वैतरणी गाय का दान ही मनुष्य के लिए कल्याणकारी होता है।
यदि कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में वैतरणी नामक गाय का दान करता है तो वह गाय उसके सभी पापों का नाश कर देती है और उसे यमलोक न ले जाकर विष्णुलोक ले जाती है। जब सातवाँ महीना आता है तो वह जीव 'बह्यपद' नामक नगर में पहुँचता है। वहाँ वह सातवें महीने में दिये गये भोजन को खाकर परिघ (आड़ हेतु खड़ी वस्तु) की पीड़ा से पीड़ित होकर इस प्रकार बड़बड़ाता हुआ आगे बढ़ता है-
न दत्तं न हुतं तप्तं न स्नातं न कृतं हितम्।
यादृशं चरितं कर्म मूढात्मन् भुंक्ष्व तादृशम् ।।
हे शरीर! मैंने जीवन भर दान, यज्ञ, तप, तीर्थयात्रा, परोपकार आदि कोई भी शुभ कर्म नहीं किया है। अरे मूर्ख! अब अपने कर्म के अनुसार भोग करो।
इसके बाद आठवें महीने में वह जीव 'दुःखदपुर' पहुँचता है। वहाँ वह आठवें महीने में अपने स्वजनों के द्वारा दिए गए पिंडों का सेवन करके जलपान करता है और इसके बाद वह 'नानक्रांद' नामक नगर के लिए चल देता है। मार्ग पर चलते समय रक्तस्राव से पीड़ित होकर बिलखता हुआ वह इस प्रकार विलाप करता है:
क्व जायाचटुलैश्चाटुपटुभिर्वचनैर्मम ।।
भोजनं भल्लभल्लीभिर्मुसलैश्च क्व मारणम् ।
हाय! कहाँ मैं अपनी चंचल आँखों वाली पत्नी की चापलूसी भरी बातों से आनंदित होकर भोजन करता था और कहाँ मुझे भालों, कुल्हाड़ियों और बर्छियों से मारा जा रहा है!
इस प्रकार कराहता हुआ वह जीव नवें मास में 'नानाक्रन्दपुर' पहुँच जाता है। तत्पश्चात नवें मास में पुत्र द्वारा दिये गये पिण्ड का भोजन करके वह बिलख-बिलख कर रोता है। तत्पश्चात् यमदूत दसवें मास में उसको 'सुतप्तभवन' की ओर घसीटते हुए हल से मारते-पीटते ले जाते हैं। हल के द्वारा कुचले और रौंदे जाने के कारण वह इस प्रकार रोते और पीड़ा को सहन करते हुए कहता है-
क्व सूनुपेशलकरैः पादसंवाहनं मम ॥
क्व दूतवज्रप्रतिमकरैर्मत्पदकर्षणम्।
हाय! कहाँ पुत्रों के नाजुक-नाजुक हाथों से मेरे पैर दाबे जाते थे, जिससे मेरी थकान मिट जाती थी और कहाँ आज इन यमदूतों के वज्र के समान कठोर हाथों से पैर पकड़ कर मुझे बेरहमी से घसीटा जा रहा है।
दसवें महीने में वहीं पर पिण्ड को खाकर और जलपान करके वह जीव फिर आगे की ओर रेंगते हुए सरकने लगता है। ग्यारहवाँ महिना पूरा होते ही वह 'रौद्रपुर' पहुँच जाता है। मार्ग में यमदूत जैसे ही उसकी पीठ पर आक्रमण करते हैं, वह चिल्लाते, बिलखते, रोते हुए, लोट-पोट हो जाता है और इस प्रकार सिसक-सिसक कर कहता है-
क्वाहं सतूलीशयने परिवर्तन् क्षणे क्षणे।
भटहस्तभ्रष्टयष्टिकृष्टपृष्ठः वव वा पुनः॥
कहाँ मैं रूई से बने हुए बेहद मुलायम गद्दे पर लेटकर प्रत्येक पल में करवटें बदलता था और कहाँ आज यमदूतों के हाथों से बेरहमी से मारी जा रही लाठियों के वार से मेरी पीठ कट जाने के कारण मैं कटी पीठ से करवट बदल रहा हूँ।
इसके बाद वह जीव पृथ्वी पर दिये गये जल पिण्ड को खाकर 'पयोवर्षण' नामक नगर की ओर चला जाता है। रास्ते में यमदूत कुल्हाड़ी से उसके सिर पर आक्रमण करते हैं। घायल होकर चीखते, चिल्लाते हुए वह इस प्रकार का विलाप करता है-
भृत्यकोमलकरैर्गन्धतैलावसेचनम् ॥
क्व क्व कीनाशानुगैः क्रोधात्कुठारैः शिरसि व्यथा ।
हाय! कहाँ नौकरों के कोमल हाथों से मेरे सिर पर सुगन्धित तेल की मालिश होती थी और कहाँ आज क्रोध से भरे हुए यमदूत मेरे सिर पर कुल्हाड़ियों से प्रहार कर रहे हैं।
इस पयोवर्षण नामक नगर में वह जीव ऊनाब्दिक श्राद्ध(एक वर्ष पूरा होने से एक दिन पहले किया जानेवाला श्राद्ध) का दुःखपूर्वक और असहाय कष्टों को सहते हुए उपभोग करता है। बाद में वर्ष बीतते ही वह 'शीताढ्य' नगर की ओर चल देता है। रास्ते में चलते समय यमदूत चाकू से मृतक की जीभ काट देते हैं, जिससे उसे अत्यंत पीड़ा होती है, और फिर दुखी होकर इस प्रकार दर्द से तड़पता हुआ रुदन करते हुए कहता है-
प्रियालापैः क्व च रसमधुरत्वस्य वर्णनम्।
उक्तमात्रे ऽसिपत्रादिजिह्वाच्छेदः क्व चैव हि ।।
अरे! कहाँ आपसी प्रेम भरी बातचीत के जरिए यह जीभ की मिठास का गुणगान किया जाता था, कहाँ आज मेरी वही जीभ मुंह खोलते ही तलवारों जैसे तेज चाकुओं से काटी जा रही है।
इसके बाद उसी नगर में वह जीव वार्षिक पिंडोदक और श्राद्ध में दी जाने वाली अन्य वस्तुओं का सेवन करता है और आगे बढ़ता है। वह पिंडज शरीर में प्रवेश करके 'बहुभिति' नामक नगर में जाता है। वहाँ वह अपने पापों को प्रकट करता है और रास्ते में स्वयं की निंदा करता है।
यमपुरी के इस पथ में स्त्री भी इसी प्रकार विलाप करती है। इसके बाद मृतक नजदीक ही स्थित यमपुरी चला जाता है। वह यमलोक चौवालीस योजन तक फैला हुआ है। इसमें श्रवण नाम के तेरह प्रतिहार हैं। श्रवणकर्म करने से वे प्रतिहार अति प्रसन्न होते है अन्यथा वे क्रोधित होते हैं। ऐसे लोक में पहुंचकर जीव मृत्यु और अंत के समय के मध्य में स्थित क्रोध से लाल आंखों वाले काले पर्वत के समान भयानक आकृति वाले यमराज को देखता है।
बड़े-बड़े दांतों से उनका चेहरा बेहद डरावना दिखता है। उसकी भौंहें तनी हुई रहती हैं, जिससे उसकी आकृति भयावह प्रतीत होती है। अत्यंत विकृत चेहरे वाली सैकड़ों व्याघ्रियां उन्हें चारों ओर से घेरे रहती है। उनके एक हाथ में छड़ी और दूसरे हाथ में भैरव-पाश है। यमलोक पहुंची आत्मा को यम के द्वारा बताई गई शुभ और अशुभ गति प्राप्त होती है।
जो लोग छाता, जूता, चप्पल और मकान का दान करते हैं, जो पुण्य कर्म करते हैं, वे वहां पहुंचकर सौम्य मुख और सुंदर रूप वाले, कानों में कुंडल और सिर पर मुकुट धारण करने वाले यमराज को देखते हैं। चूँकि जीव को वहाँ भूख लगती है इसलिए एकादशाह, द्वादशाह, षण्मास तथा वार्षिक तिथि पर बहुत से ब्रह्मणो को भोजन कराना चाहिए। जो व्यक्ति बेटे,पत्नी, मित्रों तथा अन्य सगे-संबंधियों के द्वारा कहे गए उनके स्वार्थ को ही पूर्ण करना अपना कर्तव्य समझता है और अपने परलोक को बनाने के लिए, दान आदि कोई भी पुण्यकर्म नहीं करता, वह व्यक्ति अंत में कष्ट पाता है।
शास्त्रों में श्राद्ध, पिंडदान और पितृ तर्पण को दिवंगत आत्माओं की शांति तथा पितृ कृपा प्राप्ति का महत्वपूर्ण माध्यम बताया गया है। यदि आप पितृ दोष, पितृ अशांति या पूर्वजों के कल्याण हेतु वैदिक उपाय जानना चाहते हैं तो: - पितृ दोष निवारण अनुष्ठान के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
उपर्युक्त कृत्य गरुड पुराण से लिया गया है। एक बार जब गरुड जी ने यमलोक की यात्रा की तो उनके मन में अनेक प्रश्न उत्पन्न हुए जिनका उत्तर देते हुए, भगवान श्री कृष्ण जी यमलोक की यात्रा का वर्णन करते है। श्री कृष्ण जी गरुड जी से कहते है कि इस यात्रा का वर्णन उन लोगों के लिए है जो अपने पूरे जीवन में सत्कर्म नहीं करते है और सदैव पाप कर्म में संलिप्त रहते है।
श्री कृष्ण जी यमलोक का वर्णन करते हुए कहते है कि व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के बाद वह तेरह दिनों तक तो अपने घर में ही रहता है परंतु तेरह दिन बाद उसे यमलोक की यात्रा करनी पड़ती है।
भगवान श्री कृष्ण जी कहते है कि जब तेरह दिन बाद जीव की यमलोक की यात्रा शुरू होती है तो उसे उसके कर्मों के अनुसार एक विशिष्ट शरीर की प्राप्ति होती है और उस शरीर में ही उसे अपने कर्मों के अनुसार यमलोक में मिलने वाले सभी दारुण कष्टों को सहते हुए यमलोक की यात्रा पूरी करनी पड़ती है।
अतः यमलोक की यात्रा के दौरान पड़ने वाले दारुण कष्टों से बचने के लिए मनुष्य को जीवन में सदैव सत्कर्म करते रहना चाहिए। साथ ही सामाजिक कार्यों में संलिप्त रहना चाहिए। मनुष्य को अपने जीवन में केवल उतना ही धन संचय करना चाहिए जितना उसके लिए आवश्यक हो बाकी धन उसे दान और सत्कर्म में लगाना चाहिए क्योंकि व्यक्ति कि मृत्यु के बाद संचित धन उसके साथ नहीं जाता है अपितु उस धन से किया गया दान, धर्म, पुण्य और सत्कर्म ही उसे यमलोक के दारुण दुख से बचाते है।
व्यक्ति को अपने जीवन में समाज कल्याण के कार्य जैसे पेड़ लगाना, गाय दान करना, पशु-पक्षियों को अन्न जल देना, अन्न का दान देना, समाज को बेहतर बनाने का कार्य करना, ईश्वर को याद करना, परायी स्त्री पर दृष्टि न डालना साथ ही मनुष्य को ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे समाज में शांति व्यवस्था कायम रहे व सभी एक दूसरे से प्रसन्न रहे।
इस प्रकार के सत्कर्म ही मनुष्य को कल्याण प्रदान कर सकते है अर्थात ऐसे सत्कर्म करने वाले व्यक्ति को यमलोक की यात्रा के दौरान मिलने वाली यातनाओं को झेलना नहीं पड़ता है। साथ ही आसानी से मनुष्य को बैकुंठलोक की प्राप्ति हो जाती है।
इस वृतांत से हमे यह शिक्षा मिलती है कि हम अपने कर्मों से ही अपना भाग्य बनाते है। यदि हमारे कर्म अच्छे होंगे तो हमारा भाग्य सदैव अच्छा होगा अतएव मनुष्य को अपने जीवन में सदैव सत्कर्म की ओर अग्रसर रहना चाहिए।
सनातन ज्योति में अनुभवी आचार्यों द्वारा वैदिक परंपराओं के अनुसार विभिन्न अनुष्ठान पूर्ण विधि-विधान के साथ संपन्न कराए जाते हैं। यदि आप अपने जीवन, परिवार या पूर्वजों के कल्याण हेतु किसी विशेष अनुष्ठान की जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो: - निःशुल्क परामर्श प्राप्त कर सकते हैं।