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पंचाक्षर मंत्र क्या है ? (ॐ नमः शिवाय) मंत्र की उत्पत्ति कैसे हुयी?
लेखक: कृष्णा

पंचाक्षर मंत्र क्या है ? (ॐ नमः शिवाय) मंत्र की उत्पत्ति कैसे हुयी?

पंचाक्षर मंत्र (ॐ नमः शिवाय) की उत्पत्ति

शिवपुराण में पंचाक्षर मंत्र की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है जिसमें ब्रह्मा और विष्णु जी के पूछने पर भगवान शिव जी ने अपने स्वरूप का परिचय देते हुए पंचाक्षर मंत्र की उत्पत्ति और महत्व को बताया है।

भगवान शिव जी कहते है- पूर्वकाल में मैंने अपने स्वरूप को मंत्र के द्वारा दर्शाया है, जिसे यह संसार ओंकार नाम से जानता है, वह मंत्र बहुत ही कल्याणकारी तथा समस्त सिद्धियों को प्रदान करने वाला है।

सबसे पहले मेरे मुख से ओंकार (ॐ) प्रकट हुआ, मनुष्य इसका उच्चारण करके मेरे स्वरूप की पहचान कर लेता है। इस मंत्र में मेरा ही स्वरूप समाहित है। ओंकार का ध्यान करने से सदैव मेरा ही ध्यान होता है अर्थात मेरे भक्त ओंकार मंत्र से मेरा ही ध्यान करते है।

मेरे उत्तरी मुख से ‘आकर' का, पश्चिमी मुख से 'उकार' का, दक्षिण मुख से 'मकार' का, पूर्व मुख से ‘चंद्र बिन्दु’ और मध्य मुख से ‘नाद’ प्रकट हुआ। इस प्रकार पाँच तत्वों के मिलने पर ओंकार की उत्पत्ति हुयी और इन सभी तत्वों के मिलने से प्रणव 'ॐ' नाम का एक अक्षर बन गया।

यह मन्त्र जगत् के समस्त रूप, नामों और वेदों को एक सार्थक स्वरूप में जोड़ता है, यह मंत्र स्त्री रूप में भी प्रकट होता है और पुरुष रूप में भी अर्थात शिव और शक्ति दोनों का ही स्मरण कराता है और इसी से पंचाक्षर मन्त्र की उत्पत्ति हुई है, जो मेरे स्वरूप को दर्शाता है।

इस मंत्र की शुरुआत ‘अ’ शब्द से हुयी है और ‘म’ शब्द से इसकी समाप्ति हुयी है इस प्रकर यह प्रणव मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' के रूप में प्रकाश में आया है और इसे ही ‘पंचाक्षर मंत्र’ कहते है।

पंचाक्षर मंत्र और ओंकार का रहस्य

इस पंचाक्षर मन्त्र की माता के वर्ण से पाँच भेद या विशेषताएं हैं। ये पाँच भेद आमतौर पर परमेश्वरी, जगदम्बा, जगजननी, आदिशक्ति, और शिव रूप इसी मंत्र में विद्यमान है। पंचाक्षर मंत्र (ॐ नमः शिवाय) से ही गायत्री मंत्र प्रकट हुआ गायत्री मंत्र से ही सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए और उन वेदों से करोड़ों मंत्र निकले उन मंत्रों के माध्यम से विभिन्न कार्यों की सिद्धि होती है। परंतु इस प्रणव (ॐ) और पंचाक्षर मंत्र से सम्पूर्ण मनोरथों की पूर्ण सिद्धि होती है।

पंचाक्षर मंत्र जप के लाभ और महत्व

इस पंचाक्षर मंत्र के जप से भोग और मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते है। मेरे साकार स्वरूप से संबंधित सभी मंत्र राजयोग और मोक्ष प्रदान करने वाले, कल्याणकारी और शुभ कारक है अर्थात इस मंत्र के जाप से मनुष्य को इस पृथ्वीलोक में सुख-समृद्धि प्राप्त होती है, सुख भोगकर मृत्यु हो जाने के बाद उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है अर्थात वह शिवलोक में निवास करता है दोबार इस संसार में जन्म नहीं लेता।

यदि आप भगवान शिव की कृपा, आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति, रोग-बाधाओं से रक्षा तथा मोक्षदायक शिव साधना करना चाहते हैं तो: - महामृत्युंजय मंत्र जप अनुष्ठान के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

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