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श्री कृष्ण द्वारा गरुड के प्रश्नों के उत्तर
लेखक: कृष्णा

श्री कृष्ण द्वारा गरुड के प्रश्नों के उत्तर

जब गरुड जी ने श्री कृष्ण जी से मृत्युलोक के दुखों को देखकर प्रश्न किये तो श्री कृष्ण उनके प्रश्नों को सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले, आपने मनुष्यों की भलायी के विषय में बहुत ही बढ़िया बात पूछी है। शरीर के मृत हो जाने पर उनकी आत्मा की शांति के लिए की जाने वाली क्रियाओं को सावधानीपूर्वक सुनें।

हे गरुड! जो पूरी तरह से भेदरहित है, जिसका वर्णन कहानियों और स्मृतियों में मिलता है, जिसको इन्द्र और अन्य देवता, योगी और योगमार्ग का चिन्तन करने वाले ज्ञानी नहीं देख सके हैं, जो गोपनीय है, उस मुख्य तत्त्व को जिसे मैंने अभी तक किसी और से नहीं कहा है, तुम मेरे प्रिय भक्त हो, इसलिये मैं तुम्हें बता रहा हूँ।

इस संसार मे नियमानुसार अंतिम संस्कार के बिना आत्मा की शांति नहीं है। इसलिए मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार नियमपूर्वक करना अति आवश्यक है।

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अंतिम संस्कार पुत्रादि ही नियम से करते है इस लिए सुपुत्र का होना श्रेष्ठ माना गया है। परंतु इसे कोई भी कर सकता है जो पूरी श्रद्धा से सभी नियम माने। जैसे शिष्य भी पुत्र के समान होता है। भाई, बहन, मित्र, रिश्तेदार यह सभी अंतिम संस्कार और श्राद्ध कर सकते है । शव के नीचे की जमीन पर तिल के साथ कुश फैलाने से शव की आधार भूमि रजस्वला स्त्री के समान हो जाती है जो प्रसव कराने में सक्षम होती है। मृत व्यक्ति के मुख में पंचरत्न डालना बीज बोने के समान है, जिससे प्राणी की शुभ गति सुनिश्चित होती है। अत: तिल, कुश, पंचरत्न आदि का निवेश श्रद्धापूर्वक और विधि-विधान से करना आवश्यक है।

सबसे पहले गाय के गोबर से जमीन को लीपना चाहिए, इसके बाद उस पर तिल और कुश बिछा देना चाहिए। तत्पश्चात उस मृत्यु की पीड़ा से व्याकुल व्यक्ति को उस जमीन पर कुश और तिल से बने हुए आसन के ऊपर लिटा देना चाहिये। ऐसा करने से प्राणी अपने सभी पापों को जला देता है और पाप से मुक्त हो जाता है। मृत शरीर के नीचे फैले कुश के समूह मरने वाले प्राणी को अवश्य ही स्वर्ग ले जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है।

जिस भूमि पर मल-मूत्र नहीं होता वह सदैव पवित्र रहती है। और जहाँ मल-मूत्र का मिश्रण हो वहाँ मल-मूत्र को साफ करके गाय के गोबर से लेप करने से वह शुद्ध हो जाती है। जब किसी मरते हुए व्यक्ति को बिना गाय के गोबर से लिपी हुई जमीन पर सुलाया जाता है तो उसके शरीर में यक्ष, पिशाच और राक्षस जैसे दुष्ट लोग प्रवेश कर जाते हैं।

मरते हुए व्यक्ति की मुक्ति के लिए उसे जमीन पर मण्डल बनाकर सुलाना चाहिए, क्योंकि प्रतिदिन होम, श्राद्ध, शरीर को शुद्ध करने के लिए जल से धोना, ब्राह्मण पूजन तथा भूमि पर किये गए शुभ कर्म मोक्ष के लिए माने गए हैं। गाय के गोबर से बिना लिपी और बिना मण्डल बनी हुयी जमीन पर मरने वाले व्यक्ति को नहीं सुलाना चाहिये। जमीन पर बनाये गये ऐसे मण्डल में ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लक्ष्मी तथा अग्नि आदि देवता उपस्थित हो जाते हैं, इसलिए मण्डल का निर्माण जरूर करना चाहिये। बिना मण्डल बनी हुयी जमीन पर प्राण-त्यागने पर वह चाहे बालक हो, वृद्ध हो या जवान हो, उसको दूसरा शरीर नहीं मिलता। उस जीव की आत्मा वायु के साथ इधर उधर भटकती रहती है। उस प्रकार की वायु भूत जीवात्मा के लिये न तो श्राद्ध किया जाता है और न तो जल तर्पण की क्रिया करने से उस जीवात्मा को मुक्ति ही मिलती है।

हे गरुड! तिल की उत्पत्ति मेरे पसीने से हुयी है। अतः तिल पूर्ण रूप से शुद्ध और पवित्र हैं। मरने वाले व्यक्ति के लिए तिल का प्रयोग करने पर उस व्यक्ति के पास असुर, दानव और दैत्य नहीं आते है। तिल सफेद, काले और गोमूत्र के रंग के समान होते हैं। 'वे मेरे शरीर के द्वारा किये गये सभी पापों को नष्ट करते है। ऐसी भावनाएं होनी चाहिए। एक तिल का दान बत्तीस तोले सोने के दान के बराबर है। तर्पण, दान और होम में दिया गया तिल का दान बहुत ही पुण्यकारी और अक्षय होता है। कुश की उत्पत्ति मेरे रोयें से हुयी है और तिल की उत्पत्ति मेरे पसीने से। इसीलिये देवताओं को तृप्त करने के लिए मुख्य रूप से कुश की आवश्यकता होती है और पितरों को तृप्त करने के लिए तिल की आवश्यकता होती है।

देवताओं और पितरों की तृप्ति होने से पूरे संसार की तृप्ति हो जाती है और पूरे संसार के पालनकर्ता हमारे रक्षक श्री हरि है इसलिए विश्व की तृप्ति होने से उनकी भी तृप्ति हो जाती है। अतः पितरों की उन्नति और उनके मोक्ष आदि प्राप्त करने के लिए तिल का उपयोग करने हेतु जो श्राद्ध की विधियाँ बतायी गयी हैं, उन्हीं विधियों के अनुसार व्यक्ति को मुख्य देवताओ तथा पितृजनों को संतृप्त करना चाहिये।

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तिल का उपयोग करने से ब्रह्मा, पितर और देवेश्वर आदि सभी देवता तृप्त होते हैं। अपसव्य (दाहिने कंधे पर जनऊ रख कर ) होकर कर्म करने से पितरों की संतृप्ति होती है। मनुष्य को यह जानना चाहिए कि कुश के मूल भाग में ब्रह्मा, मध्य भाग में विष्णु और अग्र भाग में शिव हैं। ये तीनों देव कुश में स्थापित माने गए हैं।

हे पक्षिराज। ब्राह्मण, मन्त्र, कुश, अग्नि और तुलसी-ये बार बार समर्पित होने पर भी बासी नहीं माने जाते। इनका उपयोग पूजा में बार-बार किया जा सकता है । तुलसी, ब्राह्मण, गौ, विष्णु और एकादशी व्रत- ये पाँच संसार सागर में डूबते हुए मनुष्यों को नाव की भाँति पार लगाते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ। विष्णु, एकादशी व्रत, गीता, तुलसी, ब्राह्मण और गाय - ये छह इस अभौतिक संसार में लोगों को मुक्ति प्रदान करने के साधन हैं, इसे षट्पदी कहा जाता है -

दर्भमूले स्थितो ब्रह्मा मध्ये देवो जनार्दनः ।।

दर्भाग्रे शंकरं विद्यात् त्रयो देवाः कुशे स्मृताः ।

विप्रा मन्त्राः कुशा वह्निस्तुलसी च खगेश्वर ।।

नैते निर्माल्यतां यान्ति क्रियमाणाः पुनः पुनः ।

तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग ।।

पञ्च प्रवहणान्येव भवाव्धौ मज्जतां नृणाम्।

विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनवः ॥

असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी।

जिस प्रकार तिलों की पवित्रता की तुलना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार कुश और तुलसी भी अत्यंत पवित्र हैं। ये तीन पदार्थ मरते हुए व्यक्ति को उसके दुख से बचाते हैं। कुश को दोनों हाथों से उखाड़कर पृथ्वी पर रखना चाहिए और जल छिड़कना चाहिए तथा मृत्यु के समय इसे मरने वाले व्यक्ति के दोनों हाथों में रखना चाहिए।

जिसके हाथों में कुश हों और जो कुशों से घिरा हो, वह मंत्रहीन होने पर भी विष्णुलोक को प्राप्त करता है। इस असार संसार सागर में जमीन को गोबर से लीपने से, मृत व्यक्ति को कुश आसन बिछा कर उस पर सुलाने से, शुद्ध अग्नि में जलाने से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

लवण और उसका दिव्य रस उत्तम लोक को प्राप्त कराने वाला है, वह प्राणियों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। लवण के बिना अन्न-रस बेस्वाद होते हैं। इसीलिये लवण-रस पितरों को अति प्रिय होता है और यह स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला है। यह लवण रस भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुआ है। जो योगी इसे जानते हैं वे लवण दान करने को कहते हैं। इस पृथ्वी पर यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री तथा शूद्र वर्ण के व्यक्ति बेचैनी और उतावलेपन में हो और उसके प्राण न निकलते हों तो उस व्यक्ति को स्वर्ग प्राप्त कराने के लिए लवण का दान करना चाहिए।

हे पक्षीन्द्र! अब मृत्यु के विषय में बहुत सावधानी से सुनें। मृत्यु एक ऐसा समय है जिसे काल कहते है, उसका समय आ जाने पर आत्मा शरीर से अलग हो जाती है। मृत्यु अपने निश्चित समय पर ही आती है। मृत्यु आने पर होने वाली पीड़ा और दर्द के प्रभाव से प्राणी अपने किये कर्मों को पूरी तरह से भूल जाता है। जिस प्रकार वायु बादलों को इधर-उधर खींच लेती है, उसी प्रकार जीव-जन्तु काल के वश में रहते हैं।

सात्विक, राजसिक और तामसिक - ये सभी भावनाएँ काल के वश में हैं। ये समय के अनुसार प्राणियों में अपना प्रभाव फैलाते हैं। सूर्य, चन्द्र, शिव, वायु, इन्द्र, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, मित्र, औषधि, आठों वसु, नदी, सागर और भाव-अभाव-ये सभी काल के अनुसार उचित समय पर प्रकट होते हैं, बढ़ते हैं, घटते हैं और मृत्यु के समीप होने पर काल के प्रभाव से इनका विनाश हो जाता है।

हे पक्षिन्, जब मृत्यु समीप आ जाती है तो उसके कुछ समय पहले ईश्वरीय संयोग से कोई रोग प्राणी के शरीर में उत्पन्न हो जाता है। इन्द्रियाँ असमर्थ हो जाती हैं और बल, प्रकाश तथा वेग में शक्ति नहीं रह जाती। हे खग! एक साथ करोड़ों बिच्छुओं द्वारा काटे जाने का जो अनुभव जीवित प्राणियों को होता है। मृत्यु से होने वाली पीड़ा(दर्द) का अनुमान उसी से करना चाहिए। उसके बाद ही चेतना समाप्त होती है और जड़ता आती है।

इसके बाद यमराज के दूत उस प्राणी के समीप आकर खड़े हो जाते हैं और उसके प्राणों को जबरन अपनी ओर खीचने लगते है। उस समय उस प्राणी के प्राण गले में आ जाते हैं। मृत्यु के पहले मृतक का रूप घृण्य हो उठता है। वह झाग उगलने लगता है। उसका मुँह लार से भर जाता है। इसके बाद शरीर के अंदर मौजूद अंगूठे के आकार का वह पुरुष चिल्लाते हुए अपने घर की ओर देखता हुआ यमदूतों के द्वारा यमलोक ले जाया जाता है।

मृत्यु के समय शरीर में प्रवाहित होने वाली वायु क्रोधित होकर तीव्र गति प्राप्त कर लेती है और उसकी शक्ति से अग्नि तत्व भी क्रोधित हो जाता है। ईंधन के बिना तेज गर्मी जीव के अंतरतम में प्रवेश करने लगती है, जिससे जीव को अत्यधिक पीड़ा का अनुभव होता है। परन्तु उदान नाम की वायु, जो भक्तों तथा भोग में आसक्त न होने वालों को नीचे की ओर जाने से रोकती है, ऊर्ध्वगामी हो जाती है।

जो झूठ नहीं बोलते, जो प्रेम का उल्लंघन नहीं करते, आस्तिक होते हैं और विश्वास रखते हैं, वे सुखपूर्वक मरते हैं। जो लोग काम, ईर्ष्या और द्वेष के कारण अपना धर्म नहीं छोड़ते, सदाचारी और सज्जन होते हैं, वे सभी निश्चय ही सुख से मरते हैं।

जो मोह और अज्ञान का उपदेश करते हैं। मृत्यु के समय वे घोर अंधकार में फँस जाते हैं। जो झूठी गवाही देते हैं, जो झूठ बोलने वाले, विश्वासघाती और निन्दा करनेवाले हैं। उनकी मृत्यु बेहोशी के रूप में होती है। उन्हें ले जाने के लिए दुर्गंधयुक्त और भय से भरे हुए यमदूत नामक दुष्टात्माएं लाठी और मुद्गरों से सुसज्जित होकर आती हैं। ऐसी भयानक स्थिति देखकर प्राणी का शरीर भय से कांपने लगता है।

उस समय वह अपनी रक्षा के लिए लगातार अपने माता-पिता और पुत्र को याद करता है और रोता, चीखता चिल्लाता है। उस समय प्रयत्न करने पर भी ऐसे प्राणी के गले से एक भी शब्द बिल्कुल साफ़ नहीं निकलता। डर के मारे जीव की आंखें नाचने लगती हैं. उसकी सांसें तेज हो जाती हैं और मुंह सूख जाता है। इसके बाद पीड़ा से व्याकुल होकर वह अपने शरीर का त्याग कर देता है और तभी वह सभी के लिए न छूने योग्य और घृणास्पद हो जाता है। हे गरुड! इस प्रकार मैंने प्रसंगानुसार मृत्यु का स्वरूप बताया।

अब मैं आपको आपके दूसरे सवाल का जवाब बता रहा हूं जो बेहद अजीब है। हे पक्षिराज । जीव पूर्व जन्म में प्राप्त विभिन्न रोगों से पीड़ित होकर यहीं घूमता रहता है। देव, असुर और यक्ष आदि योनियाँ भी प्राणियों को सुख प्रदान करती हैं। मनुष्य, पशु, पक्षी आदि की योनियाँ अत्यंत कष्टकारी हैं। हे खगेश्वर । इन योनियों में प्राणियों को उनके क्रम के अनुसार उनके कर्मों का फल मिलता है। अब मैं इस सन्दर्भ में आपसे कर्म का परिणाम का भी वर्णन करूँगा।

हे गरुड! जीव अपने अच्छे और बुरे कर्मों के फल की विविधता को भोगने के लिए इस संसार में जन्म लेता है। ब्रह्महत्या जैसे महान अपराध करने वाले और नरक के अत्यंत कष्टकारी और क्रूर लोकों को भोगने के बाद जिस लक्षण के साथ इस पृथ्वी पर पुनः जन्म लेते हैं, उसके बारे में मुझसे सुनिए।

हे खगेन्द्र ! ब्राह्मण की हत्या करने वाले महापातकी को हिरण, घोड़ा, सूअर और ऊँट का जीवन मिलता है। जो सोना चुराता है वह कृमि, कीट और पतंग के लोक में जाता है, जो गुरूपत्नी के साथ संभोग करता है वह क्रमशः घास, लता और गुल्म के लोक में जन्म लेता है।

ब्रह्मघाती तपेदिक का रोगी, शराबी के दाँत टेढ़े-मेढ़े, सोने का चोर कायर और गुरुपत्नी का प्रेमी त्वचा का रोगी होता है। जो व्यक्ति महापापियों की संगति करता है वह भी इसी प्रकार के रोग से पीड़ित होता है।

एक वर्ष तक पापी व्यक्ति की संगति करने से जीव स्वयं पापी हो जाता है। परस्पर बातचीत करने, छूने, श्वास-प्रश्वास, साथ घूमने, साथ रहने , साथ भोजन करने, यज्ञ, उपदेश तथा योनि-संभोग से मनुष्य के शरीर में पापों का संचार होता है।

पराई स्त्री के साथ संभोग करने और ब्राह्मण का धन चुराने से मनुष्य अगले जन्म में ब्रह्मराक्षस का जीवन पाता है जो जंगल और निर्जन देश में रहता है। मणि चुराने वाला बहुत दरिद्र जीवन प्राप्त करता है।

जो मनुष्य वृक्ष की पत्तियां और सुगंध चुराता है उसे छछूंदर के शरीर में जाना पड़ता है। जो अनाज चुराता है वह चूहे का शरीर पाता है, जो वाहन चुराता है वह अगले जन्म में ऊँट होता है और जो फल चुराता है वह बंदर का शरीर पाता है।

मंत्र पढ़े बिना भोजन करने से कौए का, घर का सामान चुराने से गिद्ध का, शहद चुराने से मधुमक्खी का, फल चुराने से गिद्ध का जीवन मिलता है। यदि कोई गाय को चुराता है तो उसे गाय का जीवन मिलता है, और यदि कोई आग चुराता है तो उसे बगुले का जीवन मिलता है।

स्त्रियों के कपड़े चुराने से श्वेत प्रदर और रस चुराने से भोजन आदि में रुचि कम हो जाती है। जो कांस्य चुराता है वह हंस की योनि को प्राप्त करता है, जो दूसरे का धन हड़प लेता है वह मिर्गी रोग से पीड़ित होता है और जो गुरु की हत्या करता है वह क्रूर, बौना होता है और जो अपनी पत्नी का परित्याग करता है वह शब्दवेधी होता है।

जो देवताओं और ब्राह्मणों के धन का अपहरण करता है और दूसरों का मांस खाता है, वह पांडु रोग से पीड़ित होता है। जिसे खाने योग्य और न खाने योग्य का ज्ञान नहीं होता, वह अगले जन्म में घेंघा नामक बड़ी बीमारी से पीड़ित होता है। दूसरे के धरोहर को चुराने वाला काना होता है। जो स्त्री के बल पर इस संसार में जीवन यापन करता है वह अगले जन्म में लंगड़ा होता है।

जो व्यक्ति अपनी पतिव्रता पत्नी को त्याग देता है वह अगले जन्म में दुर्भाग्यशाली होता है। अकेले मिठाई खाने वाला दम घुटने का रोगी होता है। कोई व्यक्ति यदि किसी ब्राह्मण पत्नी के साथ संभोग करे तो गीदड़, बिस्तर को चुराने वाला दरिद्र, कपड़े चुराने वाला कीट-पतंग होता है। यदि कोई व्यक्ति जन्म से अंधा है और उसमें मत्स्य दोष है, दीपक चुराने वाला भिखारी होता है। मित्र की हत्या करने से उल्लू का जीवन मिलता है। पिता आदि बड़े परिजनों की बुराई करने से प्राणी क्षयरोग(टीबी) से पीड़ित होता है। झूठ बोलने वाला हकलाकर बोलने वाला होता है और झूठी गवाही देनवाला जलोदर रोग से पीड़ित रहता है। जो पापी विवाह में बाधा डालता है वह मच्छर की योनि में जाता है। यदि उसे दोबारा मनुष्य योनि भी मिले तो उसका होंठ कटा हुआ होता है।

जो व्यक्ति चतुष्पथ पर मल-मूत्र का त्याग करता है वह कुकर्मी होता है। जो व्यक्ति किसी कन्या को प्रदूषित करता है वह मूत्र असंयम और नपुंसकता से पीड़ित होता है। जो वेदों को बेचता है वह अधर्मी होता है और उसे अगले जन्म में बाघ का जीवन मिलता है। अयाज्य का यज्ञ कराने वाले को अगले जन्म में सूअर की योनि प्राप्त होती है। जो अभक्ष्य खाता है वह बिलौटा और जो जंगलों को जलाते हैं वे जुगनू की योनि प्राप्त करते है। बासी और वर्जित भोजन खाने वाले को कीड़े का जीवन मिलता है और मत्स्य दोष से पीड़ित व्यक्ति को मधुप(भौंरा) का जीवन मिलता है।

घर आदि में आग लगाने वाला कोढ़ी और अदत्त का आदान करने से मनुष्य बैल होता है। गायों की चोरी करने पर सांप का जीवन मिलता है। अन्न की चोरी करने पर प्राणी अपच रोग से ग्रसित होता है। जल की चोरी करने वाला मछली की योनि प्राप्त करता है, दूध की चोरी करने वाला सारस और ब्राह्मण को बासी भोजन दान करने से कुबड़ा की योनि प्राप्त होती है। हे पक्षिन्। यदि कोई व्यक्ति फल चुराता है, तो उसकी संतान मर जाती है। जो व्यक्ति किसी को न देकर अकेले ही भोजन करता है, वह अगले जन्म में नि:संतान होता है। जो संन्यास आश्रम को त्याग देता है वह पिशाच होता है।

जल की चोरी करने से पपीहा पक्षी और पुस्तक की चोरी करने वाला जन्म से अंधा होता है। जो ब्राह्मणों को दान देने का वचन देकर नहीं देता, उसे गीदड़ की गति प्राप्त होती है। जो लोग झूठी बदनामी करते हैं उन्हें कछुए की योनि में जाना पड़ता है। एक फल विक्रेता अगले जन्म में दुर्भाग्यशाली होता है। जो ब्राह्मण शूद्र कन्या से विवाह करता है, उसे भेड़िये का जीवन प्राप्त होता है। यदि कोई व्यक्ति आग को पैर से छूता है तो वह बिलौटा होता है और यदि वह किसी जानवर का मांस खाता है तो वह रोगी हो जाता है। जल के स्रोत को नष्ट करने वाले लोग मछली की योनि प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य श्रीहरि की कथा और साधु-संतों की स्तुति नहीं सुनते, वे कान के रोग से पीड़ित होते हैं। जो व्यक्ति किसी अजनबी के मुंह का भोजन चुरा लेता है, वह मूर्ख व्यक्ति होता है।

भगवान की पूजा में प्रयुक्त होने वाले पारंपरिक वाद्ययंत्रों को चुराने वाला व्यक्ति घेंघा रोग से पीड़ित होता है। जो व्यक्ति अहंकार के वशीभूत होकर धार्मिक कार्य करता है वह चर्म रोग से पीड़ित होता है। विश्वासघाती व्यक्ति को सिरदर्द का रोग होता है। शिव की संपत्ति और चढ़ाए गए फूल और प्रसाद को हटाकर उसका सेवन करने वाले को यौन पीड़ा होती है। यदि स्त्रियाँ पाप की भागीदार हैं तो उन्हें उन जानवरों की पत्नियाँ बनना पड़ता है। यह निश्चित रूप से समझना चाहिए कि उपर्युक्त कर्मों का फल भोगने के बाद मनुष्य इन सभी योनियों के नरक में प्रवेश करता है।

हे खगपते। जिस प्रकार इस संसार में नाना प्रकार के द्रव्य उपस्थित हैं, उसी प्रकार प्राणियों की विभिन्न जातियाँ भी हैं। वे सभी अपने-अपने विभिन्न कर्मों के प्रतिफल-रूप में सुख-दुःख एवं बहुत प्रकार की योनियों का भोग करते हैं। तात्पर्य यही है कि प्राणी को शुभ कर्म करने से शुभ फलकी प्राप्ति और अशुभ कर्म करने से अशुभ फल की प्राप्ति होती है।

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