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अष्ट सिद्धि एवं अष्ट निधि
लेखक: कुलदीप

अष्ट सिद्धि एवं अष्ट निधि

अष्ट सिद्धि एवं अष्ट निधि

सिद्धियाँ कुल अट्ठारह प्रकार की होती है जिसमे विशेष आठ प्रकार की है। अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व, वशित्व और कामावसायिता। ये आठ प्रकार की सिद्धियां "अष्टसिद्धि" कहलाती हैं। इन गुप्त शक्तियों को जागृत करने के लिए प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनि विशेष शास्त्रीय विधान का सहारा लेते आए हैं।

इस सिद्धियों का वर्णन भागवत पुराण में मिलता है। भागवत पुराण के अनुसार उद्धव के पूछने पर श्री कृष्ण जी ने अष्ट सिद्धियों का वर्णन करते हुए कहा- उद्धव! जो साधक इंद्रिय, प्राण और मन को अपने वश में करके अपना मन मुझमे लगाने लगता है, मेरे विद्यमान होने का विश्वास करने लगता है, तब उसके सामने बहुत-सी सिद्धियाँ उपस्थित होती है।

योगियों ने अट्ठारह सिद्धियाँ बतलायी है, उनमें से जो आठ प्रकार की मुख्य सिद्धियाँ है वह श्री कृष्ण जी में ही निहित है। हनुमान जी को भी "अष्ट सिद्धि नवनिधि के दाता" कहा जाता है। शारीरिक कष्टों से मुक्ति और इन शक्तियों के आशीर्वाद हेतु हनुमान बाहुक पाठ का विशेष महत्व माना गया है। बाकी दस सिद्धियाँ तो सात्विक गुणों के विकास से साधक को मिल जाती है। उनमे से तीन सिद्धियाँ तो शरीर की ही है-‘अणिमा’, ‘महिमा’ और ‘लघिमा’। 

अणिमा - जिस साधक को यह सिद्धि प्राप्त हो जाती है उसका शरीर अणुता को प्राप्त हो जाता है अर्थात उसका शरीर इतना मजबूत हो जाता है की वह पत्थर की चट्टान आदि में भी आसानी से प्रवेश कर सकता है ।

महिमा-इस सिद्धि को प्राप्त करने वाले साधक को आकाश आदि पाँच तत्वों में जिस तत्व में वह मन लगाता है उसे उस तत्व का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। ज्ञान प्राप्त हो जाने से वह जन्म-मृत्यु और अदृश्य विषयों को भी देख सकता है।

लघिमा- इस सिद्धि को प्राप्त करने वाले साधक के पास अपने शरीर को बहुत छोटा कर लेने का सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है।

प्राप्ति- यदि साधक अपनी इंद्रियों को वश में कर लेता है तो उसे ‘प्राप्ति’ नामक सिद्धि प्राप्त हो जाती है।

 प्राकाम्य- इस सिद्धि को प्राप्त करने वाला साधक सांसारिक और पारलौकिक वस्तुओं का अपनी इच्छानुसार जब चाहे प्राप्त कर सकता है।

ईशित्व- माया और उसके कार्यों को इच्छानुसार संचालित करना अर्थात शरीर और प्राणी को अपनी इच्छानुआर कार्य के लिए प्रेरित करने का सामर्थ्य उसमें आ जाता है इस सिद्धि को ‘ईशित्व’ कहते है। जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और प्रभुत्व के लिए विजय प्राप्ति अनुष्ठान के माध्यम से इन शक्तियों का आह्वान किया जाता है।

वशित्व- जिस साधक के पास ‘वशित्व’ नामक सिद्धि होती है वह विषयों में रहकर भी उनमें आसक्त नहीं होता है, वह समस्त प्राणियों को अपने वश में कर लेता है वह जिस प्राणी को जिस कार्य के लिए प्रेरित करता है तो कोई भी प्राणी उसके कार्य को टाल नहीं सकता।

कामावसायिता’- नामक सिद्धि प्राप्त होने से साधक अपनी इच्छानुसार जिस-जिस सुख की कामना करता है वह उसे प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है।

ऊपर बतायी गयी आठ सिद्धियों के अलावा और भी कई सिद्धियाँ है जैसे भूख और प्यास को नियंत्रित करना, बहुत दूर की वस्तु को देख पाना और बातों को सुन पाना। मन के साथ ही शरीर को उस स्थान पर ले जाना, अपनी इच्छा के अनुसार रूप बना लेना। दुसरे शरीर में प्रवेश कर जाना, ‘इच्छामृत्यु’ इच्छानुसार शरीर त्यागना, अप्सराओं के साथ देवो की क्रीडा का दर्शन करना, संकल्प की सिद्धि, सब जगह सबके द्वारा बिना किसी आपत्ति के सबकी बात स्वीकार करना। ये दस सिद्धियाँ सत्वगुण के विकास से प्राप्त होती है। भूत, भविष्य और वर्तमान की बात जान लेना, ठंडा और गरम, सुख-दुःख और राग-द्वेष आदि के वश में होना, दूसरों के मन की बात जान लेना। सूर्य, जल, अग्नि और विष आदि की शक्ति को निस्तब्ध और किसी से भी पराजित न होना, ये पाँच सिद्धियाँ भी योगियों को प्राप्त हो जाती है।

अष्ट निधियाँ - पद्म, महापद्म, मकर, कच्छप, मुकुंद, नंदक, नील, शंख। पद्यिनी नामक विद्या की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी जी ही हैं। ये सभी निधियाँ उन्ही की है, उनकी कृपा होने पर ही इन निधियों की दृष्टि मनुष्यों पर पड़ती है, क्योंकि वे ही इन निधियों का आधार है। जीवन में सुख-समृद्धि और भाग्य प्राप्ति के लिए अनुष्ठान करते समय इन निधियों के अधिष्ठाताओं का ध्यान करना अत्यंत फलदायी होता है। देवताओं की पूजा और महात्माओं की सेवा करने से देवताओं की कृपा और महात्माओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिस मनुष्य को देवताओ की कृपा और महात्माओं का आशीर्वाद प्राप्त हो जाए तो इन निधियों की दृष्टि उस मनुष्य पर पड़ जाती है, इन निधियों की दृष्टि पड़ने पर मनुष्य को सदैव धन ही प्राप्त होता है।

पद्म- यह निधि सत्वगुणी है। इसके प्रभाव से मनुष्य सोने, चाँदी और तांबे का क्रय-विक्रय करने वाला बड़ा व्यापारी बनता है, और इस निधि की दृष्टि पड़ने पर उसके व्यापार में बहुत अधिक मात्रा में वृद्धि होती है और वह धनवान बन जाता है। धन की अधिकता और सात्विक गुणी होने के कारण वह अनुष्ठान करता है, ब्राह्मणों को दान देता है, सभा मण्डल और भगवान के मंदिर बनवाता है।

महापद्म- यह निधि भी सात्विक है। इसकी कृपा से मनुष्य में भी सात्विक गुण आ जाते है, इस निधि की कृपा से मणि, मोती और मूंगा आदि का क्रय-विक्रय करने वाला बड़ा व्यापारी बनता है, उसे इस व्यापार में अधिक मात्रा में लाभ प्राप्त होता है। इस निधि की कृपा, धन की अधिकता और सात्विक गुणी होने के कारण वह योगी पुरुषों को दान देता है, आश्रम बनवाता है और खुद भी उन्ही के स्वाभाव का हो जाता है, इस निधि की कृपा सात पीढ़ियों तक बनी रहती है, उसके पुत्र-पौत्र सब उसी के स्वभाव के होते है।

मकर- यह निधि तमोगुणी है। इस निधि की दृष्टि जिस मनुष्य पर पड़ती है चाहे वह सात्विक ही क्यों न हो वह भी तमोगुणी हो जाता है। वह हथियारों का क्रय-विक्रय करने वाला बड़ा व्यापारी बनता है। वह राजाओं से दोस्ती करता है, वह पराक्रम से अपना जीवन चलाने वाले लोगों को तथा उनके मित्रों को धन देता है। हथियारों के अलावा अन्य वस्तुओं का क्रय-विक्रय करने में उसका मन ही नहीं लगता। इस निधि की कृपा केवल एक ही मनुष्य तक चलती है, वह व्यक्ति धन के कारण लुटेरों के हाथ या किसी युद्ध में मारा जाता है।

कच्छप- यह निधि भी तमोगुणी है। इस निधि की दृष्टि जिस मनुष्य पर पड़ती है वह भी तमोगुणी हो जाता है। वह मनुष्य किसी पर विश्वास नहीं करता है, जैसे कछुआ अपनी रक्षा के लिए अपने सब अंगों को समेट लेता है, उसी प्रकार वह व्यक्ति भी सब ओर से धन संग्रह करके उस धन की रक्षा के लिए चिंतित रहता है। वह न तो उस धन को अपने काम में ही लगाता है और न ही किसी को दान आदि देता है उसे अपने धन के नष्ट हो जाने का भय बना रहता है, इसलिए उसकी रक्षा के लिए वह उसे जमीन मे गाड़कर रखता है। इस निधि की कृपा केवल एक ही पीढ़ी तक चलती है।

मुकुंद- यह निधि रजोगुणी है। इस निधि की दृष्टि पड़ने पर मनुष्य रजोगुणी हो जाता है और गिटार, बाँसुरी, ढोलक आदि बाजों का संग्रह करता है, इस निधि की कृपा से उसे धन तो बहुत प्राप्त होता है पर वह उस धन को नाचने और गाने वालों को ही देता है, उसके पास सभी प्रकार की भोग वस्तुएं होती है पर वह शराबी, कैदी, जुआरी और नाटक खेलने वाले व्यक्तियों को ही भोग की वस्तुएं देता रहता है। इस निधि की कृपा भी केवल एक ही पीढ़ी तक चलती है।

नन्दक- यह महानिधि रजोगुण और तमोगुण से संयुक्त है। इस निधि की दृष्टि पड़ने पर मनुष्य पूर्ण रूप से जडता (सांसारिक वस्तुओ का लोभ ) को प्राप्त होता है। इस निधि की कृपा से उसे धन बहुत अधिक मात्रा में प्राप्त होता है वह सभी प्रकार की धातुओं, रत्नों, अनाज आदि का क्रय-विक्रय करने वाला बड़ा व्यापारी बनाता है। वह अपने घर पर अकेला ही कमाने वाला होता है, वह अपने परिवार वालों और रिश्तेदारों का बहुत सम्मान करता है पर वह अपने अपमान की थोड़ी सी भी बात सहन नहीं करता। जब कोई उसे अधिक सम्मान देता है तो वह ऊसके ऊपर बहुत प्रसन्न हो जाता है, इस निधि की कृपा से उसके पास धन भी बहुत होता है इसलिए वह उस व्यक्ति को वह सभी वस्तुएं दे देता है जिस-जिस वस्तु की वह उससे कामना करता है। उसका स्वभाव कोमल हो जाता है। उसकी स्त्री बहुत ही सुंदर, सुशील और संतानवती होती है। यह निधि सात पीढ़ियों तक चलती है। इस निधि की कृपा से मनुष्य की आयु बढ़ जाती है। जिस मनुष्य को यह निधि प्राप्त हो जाती है वह मनुष्य अपने मित्रों से प्रेम नहीं करता। एक मित्र से ऊबकर दूसरे मित्र से प्रेम करने लगता है।

नील- यह महानिधि सत्वगुणी और रजोगुणी है। इस निधि की दृष्टि पड़ने पर मनुष्य भी सत्वगुणी और रजोगुणी हो जाता है। वह पुरुष वस्त्र, कपास, धान्य, फल, फूल, मोती, मूंगा, शंख, सीपी, लकड़ी तथा जल से पैदा होने वाली वस्तुओं का क्रय-विक्रय का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है। इस निधि की कृपा से वह अपने व्यापर में बहुत लाभ कमाता है, वह मनुष्य अपने व्यापार को बरकरार रखने के लिए तालाब बनवाता है, बगीचे लगाता है, नदियों पर पुल बँधवाता है और उसे पौधे लगाने का बहुत ही शौक होता है। चंदन और फूल आदि के द्वारा वह धन और प्रसिद्धि भी कमाता है। यह निधि केवल तीन पीढ़ियों तक ही सीमित रहती है।

शंख- यह निधि भी रजोगुणों और तमोगुणों से युक्त होती है और यह निधि अपने स्वामी को भी रजोगुणी और तमोगुणी बना देती है। जिसके पास शंख नामक निधि होती है, वह बहुत ही धन कमाता है पर उस धन का उपयोंग वह केवल अपने स्वार्थ के लिए ही करता है, वह अपने परिवार के लोगों को ज़रा सा भी धन नहीं देता है, उसके परिवार के लोग गरीब ही रहते है। वह किसी को भी अपना नहीं मानता। इस निधि के द्वारा वह केवल अपना ही पेट भरता है वह अपने भाई, बहन, पुत्र, मित्र और स्त्री को कुछ भी नहीं देता।

इनके अलावा एक निधि और भी कही जाती है उसका नाम है ‘खर्व’। कहते है यह निधि सभी निधियों का मिश्रण है। खर्व निधि की पुष्टि पुराण नहीं करते ।

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